श्री सम्मेद शिखर जी कूट अर्घ्यावली
- जय जिनेन्द्र ग्रुप, दिल्ली
गणधरों की कूट से आरम्भ कर, श्री कुन्थुनाथ भगवान की ज्ञानधर कूट आदि, प्रत्येक कूट का अलग दोहा एवं अर्घ्य। पूर्ण अर्घ्यावली का पाठ नीचे, मूल PDF अंत में संलग्न।
A separate doha and arghya for each koot (tonk) of Shri Sammed Shikhar Ji, published by Jai Jinendra Group, Delhi. Full text below, original PDF attached at the end.
प्रत्येक कूट के अर्घ्य सहित विधान का पाठ: श्री सम्मेदशिखर विधान
अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| १ | २४ तीर्थंकरों के गणधरों की कूट |
| २ | ज्ञानधर कूट |
| ३ | मित्रधर कूट |
| ४ | नाटक कूट |
| ५ | संवल कूट |
| ६ | संकुल कूट |
| ७ | सुप्रभ कूट |
| ८ | मोहन कूट |
| ९ | निरजर कूट |
| १० | ललित कूट |
| ११ | ऋषभ देव भगवान की टोंक |
| १२ | विद्युत वर कूट |
| १३ | स्वयंभु कूट |
| १४ | धवल कूट |
| १५ | श्री १००८ वासुपूज्य भगवान |
| १६ | आनन्द कूट |
| १७ | सुदत्तवर कूट |
| १८ | अविचल कूट |
| १९ | कुन्दप्रभु कूट |
| २० | महावीर भगवान की टोंक |
| २१ | प्रभास कूट |
| २२ | सुवीर कूट (संकुल कूट) |
| २३ | सिद्धवर कूट |
| २४ | नेमिनाथ भगवान की टोंक |
| २५ | स्वर्ण भद्र कूट |
एक निवेदन…
सभी जैन धर्म प्रेमियों को सादर जय जिनेन्द्र…
आप सभी से अनुरोध है कि सम्मेद शिखर जी की वंदना के लिए आप
जो पुस्तक मंदिर जी में से लेते है वंदना करने के बाद आप उस
पुस्तक को या तो कमरे पर छोड़ देते है या फिर पार्श्वनाथ भगवान
की टोंक पर छोड़ देते है, जिससे उस पुस्तक की अविनय होती है।
अतः आप सभी से नम्र निवेदन है की इस अर्घावली का फोन के द्वारा
उपयोग करे जिससे आपको इस पुस्तक की आवश्यकता नही होगी।
जय जिनेन्द्र ग्रुप, दिल्ली
अरूण जैन
९२८९०४४४१४
मुकुल जैन
८८२६०८०००६
सुधांशु जैन
९९१०३६९७३५
२४ तीर्थंकरों के गणधरों की कूट
चौबीसों जिनराज के, गण नायक है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह
ॐ ह्रीं श्री गौतम स्वामी आदि गणधर देव ग्राम के
उद्यान आदि भिन्न-भिन्न स्थानों से निर्वाण पधारें हैं,
तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति
स्वाहा॥१॥
श्री १००८ कुन्थनाथ भगवान
ज्ञानधर कूट
बकरा
कुन्थनाथ जिनराज का, कूट ज्ञान धर जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री कुन्थनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ९६ कोड़ा-कोड़ी ९६
करोड़ ३२ लाख ९६ हजार ७४२ मुनि इस परम पुनीत कूट से
सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥२॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ नमिनाथ भगवान
मित्रधर कूट
नील कमल
नमिनाथ जिनराज का, कूट मित्रधर जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ९ कोड़ा-कोड़ी १
अरब ४५ लाख ७ हजार ९४२ मुनि इस परम पुनीत कूट से
सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥३॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ अरहनाथ भगवान
नाटक कूट
मछली
अरहनाथ जिनराज का, नाटक कूट धर जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री अरहनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ९९ करोड़ ९९ लाख ९९ हजार
९९९ मुनि (यानि १ कम १ अरब मुनि) मुनि इस परम पुनीत कूट
से सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥४॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से ९६ करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ मल्लिनाथ भगवान
संवल कूट
कलश
मल्लिनाथ जिनराज का, संवल कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ९६ करोड़ मुनि इस
परम पुनीत कूट से सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा
मन, वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं
निर्वपामीति स्वाहा॥५॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ श्रेयांसनाथ भगवान
संकुल कूट
गैंडा
श्रेयांसनाथ जिनराज का, संकुल कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ९६ कोड़ा-कोड़ी ९६
करोड़ ९६ लाख ९ हजार ५४२ मुनि इस परम पुनीत कूट से
सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥६॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ पुष्पदंत भगवान
सुप्रभ कूट
मगरमच्छ
पुष्पदंत जिनराज का, सुप्रभ कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेन्द्रादि मुनि १ कोड़ा-कोड़ी ९६
लाख ७ हजार ४८० मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध
भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥७॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ पद्मप्रभु भगवान
मोहन कूट
लाल कमल
पद्मप्रभु जिनराज का, मोहन कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्रादि मुनि ९९ करोड़ ८७ लाख
४३ हजार ७९० मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध भये,
तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार
नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥८॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक लाख उपवास का फल होता है।
श्री १००८ मुनिसुव्रतनाथ भगवान
निरजर कूट
कछुआ
मुनिसुव्रत जिनराज का, निरजर कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ९९ कोड़ा-कोडी़
९७ करोड़ ९ लाख ९९९ मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध
भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥९॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड प्रोषध का फल होता है।
श्री १००८ चन्द्रप्रभ भगवान
ललित कूट
चन्द्रमा
चन्द्रप्रभु जिनराज का, ललित कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभ जिनेन्द्रादि मुनि ९८४ अरब ७२ करोड़
८० लाख ८४ हजार ५५५ मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध
भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार
नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥१०॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से १६लाख प्रोषध का फल होता है।
श्री १००८ ऋषभदेव भगवान
ऋषभ देव भगवान की टोंक
बैल
ऋषभदेव जिन सिद्ध भए, गिरि कैलाश से जोय।
मन वच तन कर पुजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्लीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्रादि मुनि १० हजार मुनि
कैलाश पर्वत से सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को
मेरा मन, वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो,
जलादि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥११॥
श्री १००८ शीतलनाथ भगवान
विद्युत वर कूट
कल्पवृक्ष
शीतलनाथ जिनराज का, विद्युत वर कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री शीतलनाथ जिनेन्द्रादि मुनि १८ कोड़ा-कोड़ी ४२
करोड़ ३२ लाख ४२ हजार ९०५ मुनि इस परम पुनीत कूट
से सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥१२॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ अनन्तनाथ भगवान
स्वयंभु कूट
सेही
अनन्तनाथ जिनराज का, स्वयंभु कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री अनन्तनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ९६ कोड़ा-कोड़ी ७०
करोड़ ७० लाख ७० हजार ७०० मुनि इस परम पुनीत कूट
से सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥१३॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से १ करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ सम्भवनाथ भगवान
धवल कूट
घोडा
सम्भवनाथ जिनराज का, धवल कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री सम्भवनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ९ कोड़ा-कोड़ी ७२
लाख ४२ हजार ५०० मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध
भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार
नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥१४॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से ४२ लाख उपवास का फल होता है।
श्री १००८ वासुपूज्य भगवान
वासुपूज्य भगवान
भैंसा
वासूपूज्य जिन सिद्ध भए, चम्पापुर है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेन्द्रादि चम्पापुर मंदारगिरि
से १ हजार मुनि सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद
को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार नमस्कार
हो, जलादि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥१५॥
श्री १००८ अभिनन्दन भगवान
आनन्द कूट
बन्दर
अभिनन्दन जिनराज का, आनन्द कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्रादि मुनि ७२ कोड़ा-कोड़ी ७० करोड़ ३६ लाख ४२ हजार ७०० मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥१६॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से १ लाख उपवास का फल होता है।
श्री १००८ धर्मनाथ भगवान
सुदत्तवर कूट
वज्र
धर्मनाथ जिनराज का,सुदत्तवर कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री धर्मनाथ जिनेन्द्रादि मुनि २९ कोड़ा-कोड़ी १९
करोड़ ९ लाख ९ हजार ७९५ मुनि इस परम पुनीत कूट से
सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥१७॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ सुमतिनाथ भगवान
अविचल कूट
चक्वा
सुमतिनाथ जिनराज का, अविचल कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्रादि मुनि १ कोड़ा-कोड़ी ८४
करोड़ ७२ लाख ८१ हजार ७०० मुनि इस परम पुनीत कूट
से सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥१८॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से ९ करोड़ ३२ लाख उपवास का फल होता है।
श्री १००८ शन्तिनाथ भगवान
कुन्दप्रभु कूट
हिरण
शान्तिनाथ जिनराज का, कुन्दप्रभ कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ९ कोड़ा-कोड़ी ९
लाख ९ हजार ९९९ मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध भये,
तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार
नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥१९॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ महावीर भगवान
महावीर भगवान की टोंक
सिंह
महावीर जिन सिद्ध भये, पावापुर से जोय।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर नमूँ पद होय॥
ॐ ह्रीं श्री महावीर स्वामी पावापुर के पदम सरोवर
स्थान से ३६ मुनि सहित मोक्ष पधारे तिनके
चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार
नमस्कार हो। जलादि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥२०॥
श्री १००८ सुपार्श्वनाथ भगवान
प्रभास कूट
स्वास्तिक
सुपार्श्वनाथ जिनराज का, प्रभास कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ४९ कोड़ा-कोड़ी ८४
करोड़ ७२ लाख ७ हजार ७४२ मुनि इस परम पुनीत कूट से
सिद्ध भये, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥२१॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से ३२ करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ विमलनाथ भगवान
सुवीर कूट (संकुल कूट)
थूकर
विमलनाथ जिनराज का, सुवीर कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री विमलनाथ जिनेन्द्रादि मुनि ७० करोड़ ६०लाख
६ हजार ७४२ मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध भये,
तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार
नमस्कार हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥२२॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड उपवास का फल होता है।
जय जिनेन्द्र ग्रुप, दिल्ली
श्री १००८ अजितनाथ भगवान
सिद्धवर कूट
हाथी
अजितनाथ जिनराज का, सिद्धवर कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्रादि मुनि १ अरब ८० करोड़
५४ लाख मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध भये, तिनके
चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार नमस्कार
हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥२३॥
इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से ३२ करोड उपवास का फल होता है।
श्री १००८ नेमिनाथ भगवान
नेमिनाथ भगवान की टोंक
शंख
नेमिनाथ जिन सिद्ध भए , सिद्ध क्षेत्र गिरनार।
मन वच तन कर पूजहूँ , भवदधि पार उतार॥
ॐ ह्रीं श्री नेमिनाथ जिनेन्द्रादि शम्बू प्रद्युम्न अनिरूद्ध
इत्यादि ७२ करोड़ ७०० मुनि गिरनार पर्वत से मोक्ष
गए, तिनके चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से
बारम्बार नमस्कार हो, जलादि अर्घ निर्वपामीति
स्वाहा॥२४॥
श्री १००८ पार्श्वनाथ भगवान
स्वर्ण भद्र कूट
सर्प
पार्श्वनाथ जिनराज का, स्वर्णभद्र कूट है जेह।
मन वच तन कर पूजहूँ , शिखर सम्मेद यजेह॥
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्रादि ८२ करोड़ ८४ लाख ४५
हजार ७४२ मुनि इस परम पुनीत कूट से सिद्ध भये, तिनके
चरणारविंद को मेरा मन, वचन काय से बारम्बार नमस्कार
हो, जलादि अर्घं निर्वपामीति स्वाहा॥२५॥
एक बार इस कूट का शुद्ध भाव से ध्यान व दर्शन करने से पशुगति से छुटकारा हो जाता है
और ६ करोड़ उपवास का फल एक ही बार की वन्दना करने से होता है।
मूल दस्तावेज़ (PDF): Sammed_Shikhar_Ji_Koot_Arghyavali.pdf (१.१ MB)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/51347।
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