श्री पावापुर तीर्थक्षेत्र को भक्तिभाव से करूँ प्रणाम ।
जल मन्दिर में महावीरस्वामी के चरणकमल अभिराम । ।
इसी भूमि से मोक्ष प्राप्त कर परम सिद्धपुरी का धाम ।
विनयसहित पूजन करता हूँ पाऊँ निजस्वरुप विश्राम । ।
निश्चय नाम अभेद वस्तु का और भेद का है व्यवहार ।
अज्ञानी व्यवहाराश्रित है ज्ञानी को निश्चय आधार । ।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
प्रभु पद्म सरोवर नीर प्रासुक लाया हूँ ।
मिथ्यात्त्व दोष को क्षीण करने आया हूँ ।।
पावापुर तीर्थ महान भारत में नामी ।
जय महावीर भगवान त्रिभुवन के स्वामी ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो जन्मजरा मृत्यु विनाशनाय जल नि ।
बावन चंदन तरु सार उत्तम लाया हूँ ।
निज शान्त स्वरूप अपार पाने आया हूँ ।।पावापुर।।२ ।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो संसार ताप विनाशनाय चंदन नि ।
धवलोज्ज्वल तंदुल पुन्ज भगवन लाया हूँ ।
प्रभु निज शुद्धातम कुन्ज, पाने आया हूँ । ।पावापुर ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो अक्षय पद प्राप्तये अक्षत नि ।
कल्पद्रुम सुमन मनोज्ञ सुरभित लाया हूँ ।
अंतर का स्वपर विवेक पाने आया हूँ । ।पावापुर ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो कामवाण विध्वंसनाय पुष्प नि ।
चरू विविध भाँति के दिव्य अनुपम लाया हूँ ।
चैतन्य स्वभाव सुभव्य पाने आया हूँ ।।पावापुर।।५ ।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि ।
ज्योतिर्मय दीप प्रकाश नूतन लाया हूँ ।
अज्ञान मोह का नाश करने आया हूँ । ।पावापुर ।।६।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीप नि ।
भावों की अनुपम धूप शुचिमय लाया हूँ ।
निज आतमरूप अनूप पाने आया हूँ । । पावापुर ।।७।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो अष्टकर्म दहनाय धूप नि ।
पर्यायों के भँवर जाल में उलझा स्वयं दुख पाता है ।
निज स्वरुप से सदा अपरिचित रह भव कष्ट उठाता है । ।
सुर कल्प वृक्ष फल आज पावन लाया हूँ ।
शिवसुखमय मोक्ष स्वराज पाने आया हूँ ।।पावापुर।।८ ।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो मोक्ष फल प्राप्ताय फल नि ।
निज अनर्घ अनूठा देव पावन लाया हूँ ।
निज सिद्ध स्वपद स्वयमेव पाने आया हूँ ।।पावापुर।।९ ।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य नि ।
जयमाला
पावापुर जिनतीर्थ को निज प्रति करूँ प्रणाम ।
महावीर निर्वाण भू सुन्दर सुखद ललाम ।।१।।
त्रिशलानंदन नृप सिद्धार्थराज के पुत्र सुवीर जिनेश ।
कुंडलपुर के राजकुँवर वैशालिक सन्मति नाथ महेश ।।२।।
गर्भ जन्म कल्याण प्राप्तकर भी न बने भोगों के दास ।
बाल ब्रम्हचारी रहकर भवतन भोगों से हुए उदास ।।३।।
तीस वर्ष में दीक्षा लेली बारह वर्ष किया तप ध्यान ।
पाप पुण्य परभाव नाशकर प्रभु ने पाया केवलज्ञान ।।४।।
समवशरण रचकर इन्द्रों ने किया ज्ञान कल्याण महान ।
खिरी दिव्यध्वनि विपुलाचल पर सबनेकिया आत्मकल्याण ।।५।।
तीस वर्ष तक कर विहार सन्मति पावापुर में आये ।
शुक्ल ध्यानधर योग निरोध किया जगती मंगल गाये ।।६।।
अ इ उ ऋ लृ उच्चारण में लगता है जितनाकाल ।
कर्मप्रकृति पच्चासीक्षयकर जा पहुँचे त्रिभुवन के भाल ।।७।।
कार्तिक कृष्ण अमावस्या का ऊषाकाल महान हुआ ।
वर्धमान अतिवीर वीर श्री महावीर निर्वाण हुआ ।।८।।
धन्य हो गई पावानगरी धन्य हुआ यह भारत देश ।
अष्टादश गणराज्यों के राजों ने उत्सव किया विशेष ।।९।।
लोकाकाश प्रमाण असंख्य प्रदेशी जीव त्रिकाली है ।
जो ऐसा मानता जीव वह अनुपम वैभवशाली है । ।
तन कपूरवत उड़ा शेष नख केश रहे शोभा शाली ।
इन्द्रादिक ने मायामय तन रचकर की थी दीवाली ।।१०।।
अग्निकुमार सुरों ने मुकुटानल से तन को भस्म किया ।
सभी उपस्थित लोगों ने भस्मी का सिर पर तिलक लिया ।।११।।
पद्म सरोवर बना स्वयं ही जल मंदिर निर्माण हुआ ।
खिले कमल दल बीच सरोवर प्रभु का जय जयगान हुआ ।।१२।।
चतुर्निकाय सुरों ने आकर किया मोक्ष कल्याण महान ।
वीतरागता की जय गूँजी वीतरागता का बहुमान ।।१३।।
श्वेतभव्य जल मंदिर अनुपम रक्तवर्ण का सेतु प्रसिद्ध ।
चरण चिन्ह श्री महावीर के अति प्राचीन परम सुप्रसिद्ध ।।१४।।
शुक्ल पक्ष में धवल चंद्रिका की किरणें नर्तन करती ।
भव्य जिनालय पद्म सरोवर की शोभा मनको हरती ।।१५।।
तट पर जिन मंदिर अनेक हैं दिव्य भव्य शोभाशाली ।
महावीर की प्रतिमाएँ खडगासन पद्मासन वाली ।।१६।।
वृषभादिक चौबीस जिनेश्वर प्रभु की प्रतिमाएँ पावन ।
विनय सहित वंदन करता हूँ भाव सहित दर्शन पूजन ।।१७।।
जीवादिक नव तत्वों पर प्रभु सम्यक् श्रद्धा हो जाए ।
आत्म तत्व का निश्चय अनुभव इस नर भव में हो जाए ।।१८।।
यही भावना यही कामना भी एक उद्देश्य प्रधान ।
पावापुर की पूजन का फल करूँ आत्मा का ही ध्यान ।।१९।।
यह पवित्र भू परम पूज्य निर्वाण की जननी ।
जो भी निज का ध्यान लगाए उसको भव सागर तरणी ।।२०।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो पूर्णार्घ्यं नि स्वाहा ।
पावापर के तीर्थ की महिमा अपरम्पार ।
निज स्वरुप जो जानते हो जाते भवपार । ।
इत्याशीर्वाद
जाप्यमन्त्र-ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो नम ।
पाप पुण्य का फल बंधन है शुद्ध भाव से होता मुक्त ।
शुद्ध भाव से जो सुदूर है वही जीव पर से संयुक्त ।।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २९७ से ३०१