श्री पंचमेरु पूजन | Shri Panchmeru Pujan

सोरठा

पंचमेरु अभिराम, शोभे ढाई द्वीप में।
अस्सी श्री जिनधाम, अकृत्रिम अविकार हैं।।
जिनप्रतिमा सुखकार, इक इक में शत आठ हैं।
होवे जय जयकार, भाव सहित पूजा करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनप्रतिमासमूह ! अत्रावतरावतर
संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ।
(छन्द १२ मात्रा)
लेऊँ प्रभु समकित जल, धुल जावे मिथ्यामल।
पंचमेरु असी मंदिर, जिनबिम्ब जजूँ सुखकर ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यः जन्मजरामृत्यु -

विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

ले क्षमा भाव चन्दन, कर जिनवर का सुमिरन ।
पंचमेरु असी मंदिर, जिनबिम्ब जजूँ सुखकर ॥
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यः संसारताप-

विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

क्षत् का अभिमान तजूँ, अक्षत निज भाव भजूँ।
पंचमेरु असी मंदिर, जिनबिम्ब जजूं सुखकर ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यः अक्षयपद प्राप्तये

अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

ले पुष्प शील के शुभ, नाशें प्रभु काम अशुभ।
पंचमेरु असी मंदिर, जिनबिम्ब जजूँ सुखकर ॥
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यः कामबाण

विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

समता रस स्वादी बनूँ, दुर्दोष क्षुधादि हनूँ ।
पंचमेरु असी मंदिर, जिनबिम्ब जजूं सुखकर ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यः क्षुधारोग विनाशनाय

नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निज ज्ञान सु परकाशे, अज्ञान तिमिर नाशे ।
पंचमेरु असी मंदिर, जिनबिम्ब जजूँ सुखकर ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यः मोहांधकार

विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

निज ध्येय रूप ध्याऊँ, दश धर्म सु महकाऊँ।
पंचमेरु असी मंदिर, जिनबिम्ब जजूँ सुखकर ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यः अष्टकर्म दहनाय

धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

विषमय विधि फल त्यागा, शिवफल में चित पागा।
पंचमेरु असी मंदिर, जिनबिम्ब जजूँ सुखकर ॥
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यः मोक्षफल प्राप्तये

फलं निर्वपामीति स्वाहा।

ले भाव अर्घ्य सुन्दर, निज विभव लहूँ जिनवर।

पंचमेरू असी मंदिर, जिनबिम्ब जजूँ सुखकर ॥
ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यः अनर्घ्यपद प्राप्तये

अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

दोहा

पंचमेरु के जिन भवन, पूजत हो आनन्द।
गाऊँ जयमाला सुखद, नशें कर्म के फन्द ॥

पद्धरि

जय पंचमेरु जग में महान्, शाश्वत अकृत्रिम तीर्थ जान।
तीर्थंकर का जन्माभिषेक, इन्द्रादि करें उत्सव विशेष ॥
जय प्रथम सुदर्शन मेरु सार, स्थित सु द्वीप जम्बू मंझार।
लख योजन उन्नत अति विशाल, शोभे भूपर वन भद्रशाल ॥
ऊपर चढ़ पाँच शतक योजन, नंदन वन दीखे मनमोहन।
ऊँचा साढ़े बासठ सहस्र, योजन सोहे वन सोमनस ।।
तहँ तैं छत्तीस सहस योजन, गिरशीस लसे शुभ पांडुक वन।
चारों दिशि के वन में सुन्दर, शोभें चैत्यालय श्री जिनवर ॥
इक-इक में इकशत आठ लसे, जिनबिम्ब लखत दुर्मोह नशे।
ज्यों दर्पण में तनरूप लखे, त्यों आत्मस्वरूप प्रत्यक्ष दिखे ॥
फिर विजय-अचल धातकीखण्ड, पूरव-पश्चिम दिशि अतिउतंग ।
मंदर विद्युन्माली सु-नाम, पुष्कर में राजे अति ललाम ॥
योजन चौरासी सहस उतंग, चारों मेरु सोहे अभंग।
तहँ सोलह-सोलह चैत्यालय, मनहर सुखकर श्रीजिन आलय ॥
इन्द्रादिक सुर अरु विद्याधर, चारण ऋद्धिधारी मुनिवर।
प्रभु भाव वंदना करूँ सार, निज भाव माँहिं मैं भी निहार ॥
पूजूं वंदूँ आनन्दित हो, तासों विधि बंधन खंडित हो।
भोगों की चित में दाह नहीं, इन्द्रादिक पद की चाह नहीं।॥
अकृत्रिम शुद्धातम साधू, अविनाशी शिवपद आराधूं।
अपना पद अपने में पाऊँ, चरणों में बलिहारी जाऊँ ॥

ॐ ह्रीं श्री पंचमेरुसम्बन्धि अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यः जयमालाअर्घ्यं ।

दोहा

मंगलकर होवे सदा, जिनपूजा जग माँहिं।
अपनो भाव सुधारि के भवि निश्चय शिव पाँहिं।
।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि ॥
नन्दीश्वर द्वीप (अष्टाह्निका) पूजन
(वीरछन्द)
नंदीश्वर के अकृत्रिम जिनमंदिर अरु जिनबिम्ब अहा।
ज्ञान माँहिं स्थापन करते उछले ज्ञानानन्द महा॥
ज्ञानमयी ही हो आराधन, सहजपने निष्काम प्रभो।
तृप्त सदैव रहूँ निज में ही, और चाह नहिं शेष विभो ॥
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनप्रतिमासमूह ! अत्रावतरावतर
संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ।

अडिल्ल

स्वाभाविक निर्मल जल से अविकार हैं।
दुखमय जन्म जरा मृत नाशनहार हैं ।।
नंदीश्वर के बावन मंदिर अकृत्रिम ।
पूजूँ श्री जिनबिम्ब अनूपम जिन समं ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय

जलं निर्वपामीति स्वाहा।

जड़ चन्दन नहीं अन्तर्ताप विनाशकं ।
सहज भाव चन्दन भवताप विनाशकं ॥ नंदीश्वर…।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यः संसारतापविनाशनाय

चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

अमल भाव अक्षत ले मंगलकार हैं।
स्वाभाविक अक्षय पद के दातार हैं ।॥ नंदीश्वर.. ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यः अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं.. ।
आत्मीक गुण पुष्प जगत् में सार हैं।
विषय चाह दव दाह शमन कर्तार हैं ।॥ नंदीश्वर.. ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय

पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

भोजन व्यंजन नहीं क्षुधा को नाशते।
तातें पूजूँ अकृत बोध नैवेद्य ले ॥ नंदीश्वर..।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय

नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जड़ दीपक नहिं मोह विनाशनहार है।
मोह नशे जब जाने जाननहार है ॥ नंदीश्वर.. ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यः मोहांधकारविनाशनाय

दीपम् निर्वपामीति स्वाहा।

प्रगटे अग्नी निर्मल आतम धर्म की।
जिससे होवे हानि सर्व ही कर्म की ॥ नंदीश्वर.. ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यः अष्टकर्मदहनाय धूपं..।
पाऊँ परम भावफल प्रभु मंगलमयी।
और कामना शेष नहीं मन में रही ॥ नंदीश्वर.. ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यः मोक्षफलप्राप्तये फलं ..।

शुद्धभावमय अर्घ्य करूँ आनन्द सों।

पद अनर्घ्य पाऊँ छूटूं भवफन्द सों ॥ नंदीश्वर..।।

ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य.. ।

जयमाला

सोरठा- धर्म पर्व सुखकार, हे जिन ! पाया भाग्य से।
ध्याऊँ प्रभुपद सार, विषय कषायारम्भ तजि ।।

चौपाई

अष्टम द्वीप नंदीश्वर सार, पूजूं वन्दूँ भाव संभार।
इक-इक अंजनगिरि अविकार, चार-चार दधिमुख सुखकार ।।
आठ-आठ रतिकर मनुहार, दिशि-दिशि तेरह मंदिर सार।
बावन मंदिर यों पहिचान, निरखत होवे हर्ष महान् ।।
रत्नमयी मनहर जिनबिम्ब, सन्मुख भासे निज चिद्बिम्ब।
वर्णन है जिन-आगम माँहिं, भाव सहित पूजत मन लाहिं ॥
कार्तिक फाल्गुनऽषाढ़ मंझार, अन्त आठ दिन आनन्दधार।
जहँ सुरगण वन्दन को जाँहि, पुरुषार्थी सम्यक्त्व लहाहिं ॥
यद्यपि शक्ति गमन की नाँहिं, तदपि ज्ञान में सहज लखाहिं।
भाव वन्दना कर सुखकार, निज अकृत्रिम भाव निहार ॥
हुआ सहज संतुष्ट जिनेश, अब वांछा प्रभु रही न लेश।
निज प्रभुता निज में विलसाय, काल अनन्त सु मग्न रहाय ॥
धर्म पर्व मंगलमय सार, जिस निमित्त हो तत्त्व विचार।
कर उद्यम पाऊँ पद सार, जय जय समयसार अविकार।।
पर्व अठाई मंगलरूप, ध्याऊँ निज अनुपम चिद्रूप।
नित्य पवित्र परम अभिराम, शाश्वत परमातम सुखधाम ॥
स्वयं सिद्ध अकृत्रिम जान, अजर अमर अव्यय पहिचान।
देखन योग्य स्वयं में देख, विलसे उर आनन्द विशेष ॥
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यःअनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला

अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दोहा

धन्य हुआ कृतकृत्य हुआ, पाया श्री जिनधर्म ।
मर्म तत्त्व का प्राप्त कर, लहूँ सहज शिवशर्म ।।
।। पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि ॥
ज्ञान राग से तन्मय नहीं होता, ज्ञान तो राग से बहुत दूर है।
संयोग के सहारे प्राप्त सुख क्षणिक होता है।
पाप छोड़ने में सबसे पहले मोह (पर में अपनापन) को छोड़ना।
अंसभव कल्पना ही अंसतोष की जड़ है।
चित्त की कलुषता पाप बन्ध का कारण है।


Artist: रवींद्र जी आत्मन्
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह