(हरिगीतिका)
स्थापना
निज ब्रह्म में नित लीन परिणति से सुशोभित हे प्रभो ।
पूजित परम निज पारिणामिक से विभूषित हे विभो ।।
आओ तिष्ठों अत्र तुम सन्निकट हो मुझमय अहो ।
बालयति पाँचों प्रभु को वन्दना शत बार हो ।।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लि-नेमि-पार्श्व-वीर पंच बालयति जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लि-नेमि-पार्श्व-वीर पंच बालयति जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लि-नेमि-पार्श्व-वीर पंचबालयति जिनेन्द्र! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
(इति आह्वाननम् स्थापनम् सन्निधिकरणंच)
(वीर छन्द)
हे प्रभु ध्रुव की ध्रुव परिणति के पावन जल में कर स्नान ।
शुद्ध अतीन्द्रिय आनन्द का तुम करो निरन्तर अमृत पान ।।
क्षणवर्ती पर्यायों का तो जन्म-मरण है नित्य स्वभाव ।
पंच बालयति-चरणों में हो पर-संयोग-वियोग अभाव ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
अहो सुगन्धित चेतन अपनी परिणति में नित महक रहा ।
क्षणवर्ती चैतन्य विवर्तन की ग्रन्थि में चहक रहा ।।
द्रव्य और गुण पर्यायों में सदा महकती चेतन गन्ध ।
पंच बालयति के चरणों में नाशूं राग-द्वेष दुर्गन्ध ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।
परिणामों के ध्रुव प्रवाह में बहे अखण्डित ज्ञायक भाव ।
द्रव्य-क्षेत्र-अरु काल-भाव में नित्य अभेद अखण्ड स्वभाव ।।
निज गुण-पर्यायों में जिनका अक्षय पद अविचल अभिराम ।
पंच बालयति जिनवर मेरी परिणति में नित करो विराम ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
गुण अनन्त के सुमनों से हो शोभित प्रभु ज्ञायक उद्यान ।
त्रैकालिक ध्रुव परिणति में तुम प्रतिपल करते नित्य विराम ।।
इसके आश्रय से प्रभु तुमने नष्ट किया है काम-कलंक ।
पंच बालयति के चरणों में धुला आज परिणति का पंक ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
हे प्रभु अपने ध्रुव प्रवाह में रहो निरन्तर शाश्वत तृप्त ।
षट्रस की क्या चाह तुम्हें तुम निज रस के अनुभव में मस्त ।।
तृप्त हुई अब मेरी परिणति ज्ञायक में करती विश्राम ।
पंच बालयति के चरणों में क्षुधा रोग का रहा न नाम ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सहज ज्ञानमय ज्योति प्रज्ज्वलित रहती ज्ञायक के आधार ।
प्रभो ! ज्ञान दर्पण में त्रिभुवन पल - पल होता ज्ञेयाकार ।।
प्रभो निखरती मम श्रुत-परिणति अपने में तव केवलज्ञान ।
पंच बालयति के प्रसाद से प्रगट हुआ ज्ञायक का ज्ञान ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
त्रैलौकिक परिणति में व्यापी ज्ञान सूर्य की मंगल धूप ।
जिसमें सकल कर्ममल क्षयकर हुए प्रभो तुम त्रिभुवन भूप ।।
मैं ध्याता तुम ध्येय हमारे मैं हूँ तुममय एकाकार ।
पंच बालयति जिनवर मेरे शीघ्र नशो अब त्रिविध विकार ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सहज ज्ञान का ध्रुव प्रवाह फल सदा भोगता चेतन राज ।
अपनी चित् परिणति में रमता पुण्य-पाप फल का क्या काज ।।
महामोक्षफल की न कामना शेष रहे अब हे जिनराज ।
पंच बालयति के चरणों में जीवन सफल हुआ है आज ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचम परम भाव की पूजित परिणति में जों करें विराम ।
कारण परमपारिणमिक का अवलम्बन लेते अभिराम ।।
वासुपूज्य अरु मल्लि-नेमिप्रभु-पार्श्वनाथ-सन्मति गुणखान ।
अर्घ्य समर्पित पंच बालयति को पंचम गति लहूँ महान् ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
पंच बालयति नित बसो मेरे हृदय मँझार ।
उनके उर में बस रहा प्रिय चैतन्यकुमार ।।
(छप्पय)
प्रिय चैतन्य कुमार सदा परिणति में राजे,
पर-परिणति से भिन्न सदा नित में अनुरागे ।
दर्शन ज्ञानमयी उपयोग सुलक्षण शोभित,
जिसकी निर्मलता पर आतमज्ञानी मोहित ।
ज्ञायक त्रैकालिक बालयति मम परिणति में व्याप्त हो,
मैं नमूँ बालयति पंच को पंचम गति पद प्राप्त हो ।
(वीरछन्द)
धन्य धन्य हे वासुपूज्य जिन गुण अनन्त में करो निवास,
निज आश्रित परिणति में शाश्वत महक रही चैतन्य सुवास ।
सत् सामान्य सदा लखते हो क्षायिक दर्शन से अविराम,
तेरे दर्शन से निज दर्शन पाकर हर्षित हूँ गुणखान ।।
मोह मल्ल पर विजय प्राप्त कर महाबली हे मल्लि जिनेश,
निज गुण परिणति में शोभित हो शाश्वत मल्लिनाथ परमेश ।
प्रतिपल लोकालोक निरखत केवलज्ञान स्वरूप चिदेश,
विकसित हो चित् लोक हमारा तव किरणों से सदा दिनेश ।
राजमति तज नेमि जिनेश्वर शाश्वत सुख में लीन सदा,
भोक्ता भोग्य विकल्प विलय कर निज में निज का भोग सदा ।
मोह रहित निर्मल परिणति में करते प्रभुवर सदा विराम,
गुण अनन्त का स्वाद तुम्हारे सुख में बसता हे अविराम ।
जिनका आत्मपराक्रम लखकर कमठ शत्रु भी हुआ परास्त,
क्षायिक श्रेणी आरोहण कर मोह शत्रु को किया विनष्ट ।
पार्श्वनाथ के चरण युगल में क्यों बसता यह सर्प कहो,
बल अनन्त लखकर जिनवर का चूर कर्म का दर्प अहो ।
क्षायिक दर्शन ज्ञान वीर्य से शोभित हैं सन्मति भगवान्,
भरत क्षेत्र के शासन नायक अन्तिम तीर्थंकर सुखखान ।
विश्व सरोज प्रकाशक जिनवर हो केवल मार्तण्ड महान्,
अर्घ्य समर्पित चरण कमल में वन्दन वर्द्धमान भगवान् ।।
ॐ ह्रीं श्री पंचबालयतिजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(सोरठा)
पंचम भाव स्वरूप बालयति को नमूँ ।
पाऊँ शुद्ध स्वरूप निज कारण परिणाममय ।।
(पुष्पांजलि क्षिपेत्)
Artist: पण्डित अभयकुमार जैन
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ २१० से २१३