मंगलाष्टक
अर्हन्तो भगवन्त इन्द्रमहिताः सिद्धाश्च सिद्धीश्वराः
आचार्या जिनशासनोन्नतिकराः पूज्या उपाध्यायकाः ।
श्रीसिद्धान्तसुपाठकाः मुनिवराः रत्नत्रयाराधकाः,
पञ्चैते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥१ ॥
श्रीमन्नम्र-सुरासुरेन्द्र-मुकुट-
प्रद्योत-रत्नप्रभा
भास्वत्पाद-नखेन्दवः प्रवचनाम्भोधीन्दवःस्थायिनः ।
ये सर्वे जिनसिद्ध- सूर्यनुगतास्ते पाठकाः साधव,
स्तुत्या योगिजनैश्च पञ्चगुरवः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ २ ॥
सम्यग्दर्शन-बोध-वृत्तममलं रत्नत्रयं पावनं,
मुक्तिश्री
नगराधिनाथ-जिनपत्युक्तोपवर्गप्रदः ।
धर्मःसूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं चैत्यालयं श्रयालयं,
प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ३ ॥
नाभेयादि-जिनाधिपास्त्रिभुवनख्याताः चतुर्विंशतिः,
श्रीमन्तो भरतेश्वरप्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश ।
ये विष्णुप्रतिविष्णु-लांङ्गलधराःसप्तोतरा विंशति,
त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्ठिपुरुषाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥४॥
ये सर्वोषधऋद्धयः सुतपसो वृद्धिंगता पंच ये,
ये चाष्टाँगमहानिमित्तकुशला येष्टाविधाश्चारणाः ।
पञ्चज्ञानधरास्त्रयोपिबलिनो ये बुद्धि-ऋद्धीश्वराः,
सप्तैते सकलार्चिता गणभृतः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥५ ॥
कैलाशे वृषभस्य निर्वृतिमही वीरस्य पावापुरे,
चम्पायां वसुपूज्य सज्जिनपतेः सम्मेदशैलेर्हताम् ।
शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्यार्हतो,
निर्वाणावनयः प्रसिद्धविभवाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ६ ॥
ज्योतिर्व्यन्तर-भावनामरगृहे मेरौ कुलाद्रौ तथा,
जम्बू-शाल्मलि-चैत्यशाखिषु तथा वक्षार-रौप्याद्रिषु ।
इष्वाकारगिरौ च कुण्डलनगे द्वीपे च नन्दीश्वरे,
शैले ये मनुजोत्तरे जिनगृहाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ७ ॥
यो गर्भावतरोत्सवो भगवतां जन्माभिषेकोत्सवो,
यो जातः परिनिष्क्रमेण विभवो यः केवलज्ञानभाक् ।
यः कैवल्यपुरप्रवेशमहिमा संभावितः स्वर्गिभिः,
कल्याणानि च तानि पञ्च सततं कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥८ ॥
इत्थं श्री जिनमंगलाष्टकमिदं सौभाग्यसंपत्पदं,
कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थङ्कराणांमुखात्ः ।
ये श्रृण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनैर्धर्मार्थकामान्विता,
लक्ष्मीराश्रियते व्यपायरहिता निर्वाणलक्ष्मीरपि ॥९ ॥
मंगल पंचक
गुणरत्नभूषा विगतदूषाः सौम्यभावनिशाकराः
सद्बोध-भानुविभा-विभाषितदिक्चया विदग्धांवराः
निःसीमसौख्यसमूह मण्डितयोगखण्डितरतिवराः
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते श्री वीरनाथ जिनेश्वराः ॥
सद्ध्यानतीक्ष्ण-कृपाणधारा निहतकर्मकदम्बका,
देवेन्द्रवृन्दनरेन्द्रवन्द्याः प्राप्तसुखनिकुरम्बकाः
योगीन्द्रयोगनिरूपणीयाः प्राप्तबोधकलापकाः
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते सिद्धाः सदा सुखदायका ॥
आचारपंचकचरणचारणचुंचवः समताधराः
नानातपोभरहेतिहापितकर्मकाः सुखिताकराः
गुप्तित्रयीपरिशीलनादिविभूषिता वदतांवराः
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते श्री सूरयोऽर्जितशंभराः ॥
द्रव्यार्थ भेद विभिन्नश्रुतभरपूर्णतत्त्व निभालिनो
दुर्योगयोगनिरोधदक्षाः सकलवरगुणशालिनः
कर्तव्यदेशनतत्परा विज्ञानगौरवशालिनः
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते गुरुदेवदीधितिमालिनः ॥
संयमसमित्यावश्यका- परिहाणिगुप्तिविभूषिताः
पंचाक्षदान्तिसमुद्यताः समतासुधापरिभूषिताः
भूपृष्ठाविष्टरसायिनो विविधर्द्धिवृन्द विभूषिताः
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते मुनयः सदा शमभूषिताः ॥
भजन
श्री इन्द्रध्वज का पाठ करो सब ठाठ बाट से चेतन।
हो जाए सम्यग्दर्शन ।।
है मध्यलोक अति ही सुन्दर, तेरह द्वीपों तक जिनमन्दिर।
इन्द्रादिक सुर करते हैं आकर पूजन ॥
हो जाए सम्यग्दर्शन ।।
पूजन कर नृत्य, गीत गाते, अति विनय भाव से हर्षाते ।
हर मन्दिर पर करते हैं, ध्वज आरोहण ॥
हो जाए सम्यग्दर्शन ।।
तुम भी इन्द्रध्वज मंडल रच, अरिहन्तों के चरणों को भज ।
भावों की ध्वजा चढ़ाओ, हर्षित हो मन ।।
हो जाए सम्यग्दर्शन ।।
यह नर भव पुनः असंभव है, लो भेदज्ञान जो संभव है।
पुरुषार्थ पूर्वक सफल करो, यह जीवन, कट जाए भव के बन्धन ।।
हो जाए सम्यग्दर्शन ॥
मंगलाचरण
दोहा
पंच प्रभु जयवन्त हों, चौबीसों तीर्थेश ।
करुणा करि जग को दिया, मुक्तिमार्ग उपदेश ॥
परिणामों की स्वच्छता, का प्रतीक जिन-बिम्ब ।
क्योंकि इसी में निरखता, मैं निज का प्रतिबिम्ब ॥
जयवन्तो जिन-बिम्ब सब, जयवन्तो जिनराज ।
जिन-चैत्यालय नमन कर, ध्वजा चढ़ाऊँ आज ॥
सोरठा
प्रभु परमेष्ठी पंच, चैत्यालय जिन-चैत्य जय ।
जिनवाणी जिनधर्म, नव देवों को है नमन ॥
संकल्प
छंद - गीतिका
मुक्ति पाने के लिए अब मैं जिनालय आउँगा।
निज-स्वरूप महान लख प्रभु सुछवि उर में ध्याउँगा ॥
जिन सरीखा रूप निर्मल है हमारे पास भी ।
आवरण है किन्तु उर में पूर्ण ज्ञान प्रकाश भी ॥
जिनागम का स्वाध्याय प्रधान मंगलमय करूँ।
द्रव्यश्रुत पढ़ भावश्रुत की दिव्य महिमा उर धरूँ ॥
भावश्रुत का ज्ञान ही सम्यक्त्व रवि प्रगटाएगा।
भेदज्ञान अपूर्व सचमुच मोक्ष में ले जाएगा ॥
जब स्वरूपाचरण की छवि निज हृदय में आएगी ।
एक दिन संयम-प्रभा स्वयमेव ही. मुस्काएगी ॥ ।
भाव-मुनि बन अप्रमत्तदशा स्वयं होगी प्रगट ।
झूल सप्तम और षष्टम पाप सब होंगे विघट ॥
पुण्य भी फिर नष्ट होंगे क्षीण होगी दुष्कषाय ।
तब दशा अरहंत होगी प्रगट उर शिव सौख्यदाय ॥
ज्ञान का भंडार प्रगटा बनेंगे हम केवली ।
श्री जिनवर की शरण में आज अनुपम निधि मिली ॥
पीठिका
छंद्र - ताटंक
इस अनंत आकाश मध्य है तीन लोक रचना सुन्दर ।
उर्ध्व मध्य अरु अधोलोक त्रय वातवलय वेष्ठित मनहर ॥
अधोलोक में सात नर्क हैं मिलता जहाँ पाप का फल ।
उर्ध्वलोक में स्वर्गादिक हैं मिलता जहाँ पुण्य प्रतिफल ॥
मध्यलोक चित्रा पृथ्वी पर असंख्यात योजन भारी ।
असंख्यात हैं द्वीप असंख्यों हैं समुद्र बहुजल धारी ॥
ढाइ द्वीप तक मनुज लोक है जिसमें पाँच सुमेरु प्रसिद्ध ।
आगे मानुषोत्तर पर्वत मनुज लोक सीमा सुप्रसिद्ध ॥
नन्दीश्वर है द्वीप आठवाँ श्री जिन-चैत्यालय छविमान ।
अरु ग्यारहवाँ कुन्डलवर तेरहवाँ द्वीप रुचकवर जान ॥
इन सब में हैं चारशतक अट्ठावन श्री जिन-चैत्यालय ।
भक्तिभाव से ध्वजा चढ़ाते इन्द्रादिक मिल मंगलमय ॥
मेरु सुदर्शन विजय अचल मंदर विद्युन्माली अभिराम ।
सब पर सोलह-सोलह जिन-चैत्यालय जिनबिम्बों के धाम ॥
अस्सी मेरु जिनालय वन्दूँ गजदंतो के वन्दूँ बीसः।
वक्षारों के अस्सी वन्दूँ वृक्षों पर दस हैं जगदीश ॥ .
विजयार्थों के एक शतक सत्तर इष्वाकारों के चार।
कुलाचलों के तीस जिनालय मानुषोत्तर के हैं चार ॥
नन्दीश्वर के बावन जिनगृह कुन्डलवर के चार महान ।
चार रुचकवर सर्व मिलाकर चार शतक अट्ठावन जान ॥
सभी अकृत्रिम जिन-चैत्यालय एक-शतक-वसु बिम्ब सहित ।
उन्चास-सहस्त्र-चारसौ-चौंसठ रत्नमयी प्रतिमा-शोभित ॥
आगे द्वीप समुद्रों का दूना-दूना विस्तार बृहत् ।
जिनशासन भूगोल ज्ञान का सागर है अनुपम अद्भुत ॥
अस्सी मेरु जिनालय, माला चिन्ह ध्वजा आरोहण कर ।
गजदंतो के बीस, जिनालय गज चिन्हांकित ध्वज सुन्दर ॥
जम्बू शाल्मलि धातकि पुष्कर तरु के दस पर अंशुक चिन्ह ।
वक्षारों के अस्सी गृह पर ध्वजा चढ़ाते गरुड़ सुचिन्ह ॥
विजयार्थों के एक शतक सत्तर पर वृषभ चिन्ह के ध्वज ।
तीस कुलाचल के जिनगृह पर कमल चिन्ह की पावन ध्वज ॥
इष्वाकार जिनालय चारों पर, गज चिन्ह ध्वजा छविमान ।
मानुषोत्तर चार जिनालय गज चिन्हांकित ध्वजा प्रधान ॥
नन्दीश्वर बावन चैत्यालय चकवा-चकवी ध्वजा प्रसिद्ध ।
कुन्डलगिरि के चार जिनालय चिन्ह मयूर सहज सुप्रसिद्ध ॥
द्वीप रुचकवर चार जिनालय हंस चिन्ह अंकित ध्वज जान ।
इन्द्र सदलबल चार शतक अट्ठावन ध्वजा चढ़ाते आन ॥
महाध्वजाएँ लाखों लघु-लघु ध्वजा सहित लहराती हैं।
सुरबालाएँ अतिकमनीय मनोहर नृत्य सजाती हैं ॥
मैं भी सादर ध्वजा चढाऊँ वीतराग रंग रंगी हुई।
शाश्वत सुखमय मुक्तिवधू का वरण करूँ जो सजी हुई ॥
महिमामय मंगल विधान है सबसे उत्तम इन्द्रध्वज ।
निज-स्वरूप अवलम्बन द्वारा पाऊँ शुद्ध स्वभाव सहज ॥
अनेकान्तमय जिनशासन है स्याद्वाद ध्वज मंगलमय ।
वस्तु-स्वरूप जानकर प्रगटे निर्मल चेतनराज अभय ॥
पूजन क्रमांक-१
समुच्चय जिनालय पूजन
स्थापना
वीरछन्द
मध्यलोक में चारशतक अट्ठावन शोभित चैत्यालय ।
अन्तर्मुख मुद्रामय शोभित वीतरागता के आलय ॥
निश्चय भक्ति प्राप्ति हेतु मैं भाव सहित करता पूजन ।
शाश्वत सुख के दिग्दर्शक सर्वज्ञ जिनेश्वर को वन्दन ॥
दोहा
इन्द्रध्वज पूजन करूं, गाऊँ मंगलगान ।
चौबीसों जिनवर नमूँ, करूँ आत्मकल्याण ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतुःशताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र अवतर
अवतर संवौषट् (इत्याह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतुःशताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ
ठः ठः (इतिस्थापनम् ।)
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतुःशताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र मम
सन्निहितो भव वषट् (इतिसन्निधिकरणम् ।) (पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
छंद - ताटंक
भक्ति-भावना के निर्मल-जल से जिन-चरण पखारूँगा ।
जन्म-जरा-मृतु रोग रहित निज शाश्वत रूप निहारूँगा ॥
मध्यलोक के जिनमन्दिर को वन्दन करने जाऊँगा ।
इन्द्रध्वज पावन विधान कर धर्म ध्वजा फहराऊँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतुःशताष्टपंचाशतजिनालयजिनबिम्बेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु
विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जिन-चरणों की भक्ति सुगंधित चन्दन चरणों में लाया।
भव-आताप मिटाने को अब वीतराग प्रभु को ध्याया ॥मध्य. ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतुःशताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो संसारताप-
विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक १
जिन-चरणों की भक्ति अखंडित, अक्षय पद की दाता है।
जग के क्षत-विक्षत पद से अब, रहा न मेरा नाता है ॥
मध्यलोक के जिनमन्दिर को वन्दन करने जाऊँगा।
इन्द्रध्वज पावन विधान कर धर्मध्वजा फहराऊँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतु:शताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा !
भक्ति-भावना शील सुमन हे प्रभु! चरणों में अर्पित है।
पंचेन्द्रिय की विषय-वासना जिनवर आज विसर्जित है ॥ मध्य० ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतु:शताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बेभ्योकामबाण
विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
भक्ति-भावना के रसमय नैवेद्य, समर्पित करता हूँ।
अनुभवरससे तृप्तहुआ, अब क्षुधाव्याधिको हरता हूँ ॥ मध्य० ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतु:शताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो क्षुधारोग
विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जिन-चरणों की भक्ति दीप में भेद-ज्ञान कीज्योतिजले ।
निजको निज, पर को पर जानूँ, चिरविस्मृत निज रूप मिले ॥मध्य० ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतु:शताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो मोहान्धकार-
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
जिन-चरणों की भक्ति-अनल में कर्मकाष्ठका होम करूँ ।
राग-द्वेष का धूम्र उड़े जब, निज चैतन्य व्योम विचरूँ ॥ मध्य० ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतुःशताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अष्टकर्मदहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
भक्ति-भावना के तरु में जब, मधुमय शिवफल फलता है।
आवागमन मिटे इस जग से शाश्वत ध्रुवपद मिलता है ॥ मध्य० ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतु:शताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
देव-शास्त्र-गुरु भक्ति-भावमय अर्घ्य समर्पित करता हूँ।
निज अनर्घ्य पद प्राप्ति हेतु जग-वैभव अर्पित करता हूँ ॥
मध्यलोक के जिनमन्दिर को वन्दन करने जाऊँगा ।
इन्द्रध्वज पावन विधान कर धर्मध्वजा फहराऊँगा ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचतु:शताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपद
प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
त्रिलोकवर्ती जिनालयों की अर्ध्यावली
छंद - रोला
अधोलोक जिन भवन शाश्वत पूजूँ स्वामी ।
सात कोटि अरु लाख बहत्तर उज्ज्वल नामी ॥
भावसहित वन्दन कर उत्तम अर्घ्य चढ़ाऊँ ।
भवबंधन का नाश करूँ शिवसुख उपजाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री अधोलोकसंबंधिसातकरोड़बहत्तरलाख अकृत्रिम जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
मध्यलोक के चार शतक अट्ठावन वन्दूँ ।
विनयभाव से अर्घ्य चढ़ा निज को अभिनन्दूँ ॥
तेरह द्वीपों तक शाश्वत जिन चैत्यालय हैं।
मानों अपने मध्यलोक में सिद्धालय हैं ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधिचारसौअट्ठावन अकृत्रिम जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
उर्ध्वलोक जिनमंदिर शाश्वत जिन-चैत्यालय ।
चौरासी लख सहस्र संतानवे तेईस आलय ॥
कर्म कलुषता नाश हेतु मैं अर्घ्य चढ़ाऊँ ।
शुद्ध स्वभाव भाव की महिमा उर में लाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री ऊर्ध्वलोकसंबंधिचौरासीलाखसंतानवेहजारतेईस अकृत्रिमजिनालय
जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पूर्णाघ्य
सब मिल आठ करोड़रु छप्पन लाख जिनालय ।
संतानवे सहस्त्र चार शत इक्यासी जय ॥
तीन लोक में कृतिम-अकृत्रिम गृह असंख्य हैं।
वीतराग अरहन्त प्रभू में गुण अनन्त है ॥
जलफलादि वसु द्रव्य, भाव से चरण चढ़ाऊँ ।
निज पुरुषार्थ जगा, शिवपथ पर चरण बढ़ाऊँ ॥
दोहा
कृत्रिम-अकृत्रिम भवन, पूजूँ मैं जिनराज ।
लखूँ शुद्ध परमात्मा, सिद्ध होन के काज ॥
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोकवर्ती समस्त कृत्रिमाकृत्रिम-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
दोहा
भगवन्तों की भक्ति से, हो जाऊँ भव पार।
क्योंकि इसी की शक्ति से, मिलता निज आधार ॥
छन्द - रोला
धन्य-धन्य जिनराज जगत में तेरी महिमा ।
ऋषि-मुनि गणधर भी गाते प्रभु तेरी गरिमा ॥
मानतुंग कृत भक्ति-सरोवर का जल लाया ।
अशुभ राग का मैल नाश शुभ अवसर पाया ॥
पंगु चढ़े गिरि त्यों मैं भक्ति करूँ प्रभु तेरी ।
मैं लघु, कार्य महान, कहो क्या क्षमता मेरी ?
भक्ति-भाव से विवश हुआ प्रभु भक्ति करता ।
भक्तिभाव ही मुझमें अद्भुत शक्ति भरता ॥
ऐसी भक्ति करूँ मैं, अब भगवान तुम्हारी ।
बन जाऊँ भगवान स्वयं, शिवमय सुखकारी ॥
गुरुवर समन्तभद्र से प्रेरित, तव यश गाता ।
वीतराग सर्वज्ञ देव ही मुझको भाता ॥
अद्भुत महिमामय है केवलज्ञान तुम्हारा ।
निज स्वरूप में लीन, तदपि जग जाननहारा ॥
निश्चय से तन्मय होकर निज को ही जाने ।
किन्तु स्वच्छता में अनन्त परद्रव्य लखाने ॥
है अनन्त दर्शन भी प्रभुवर तेरा अनुपम ।
अवलोकन युगपत् सब जग का करता उत्तम ॥
सुख अनन्त तुम ही भोगो अद्भुत बलधारी ।
दर्श-ज्ञान-सुख-वीर्य जगत को अचरजकारी ॥
ध्रौव्योत्पाद-विनाशमयी सत् तुम बतलाते ।
हो सर्वज्ञ अतः तुम ही, गुरुवर गुण गाते ॥
निर्ग्रन्थों ने ग्रन्थ रचे जिनमें यश गाया।
स्याद्वाद अरु अनेकान्त का ध्वज लहराया ॥
प्रभु की अन्तर्मुख मुद्रा, अब मुझको भाती ।
रंग-राग से भिन्न, निजातम रूप दिखाती ॥
वन्दन करता जिन-चैत्यालय ले धर्मध्वज ।
पावन पूजन करता हूँ प्रभुवर इन्द्रध्वज ॥
सोरठा
जिनवर का सन्देश, आत्मा ही परमात्मा ।
हैं असंख्य प्रदेश, गुण अनन्तमय एक नित ॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधि-चतु:शताष्टपंचाशत्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपद-
प्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछंद
ज्ञान स्वभावी शुद्धातम रंग अनेकान्तमय ध्वज में व्याप्त ।
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर मंगलमय भविजन को आप्त ॥
इन्द्रध्वज विधान करता हूँ विनयभाव से हर्षित आज ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो कर्मनाश हो हे जिनराज ॥
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
पूजन क्रमांक-२
जम्बूद्वीपस्थ सुदर्शनमेरु स्थित सोलह जिनालय पूजन
स्थापना
सोरठा
तीनलोक के मध्य, जम्बूद्वीप प्रसिद्ध है।
अकृत्रिम जिनगेह, अठहत्तर इस द्वीप में ॥
इसका है विस्तार, एक लाख योजन महा ।
दूना लवण समुद्र, घेरे चारों ओर से ॥
छंद - ताटंक
जम्बूद्वीप सुमेरु सुदर्शन मध्यलोक में स्वर्णमयी ।
भद्रशाल नंदनवन सुमनस पांडुकवन सौन्दर्यजयी ॥
योजन एक लाख ऊँचा, इक सहस्त्र भूमि के भीतर है।
प्रथम स्वर्ग के ऋजु विमान से बाल बराबर अंतर है ॥
दोहा
मेरु सुदर्शन पूजिये, सोलह भवन महान ।
जिन-प्रतिमा सतरहशतकअट्ठाईस प्रमाण ॥
आठों द्रव्य चढ़ाइये, होकर भाव विभोर ।
स्वाध्याय से प्रगट हो, ज्ञान सूर्य की कोर ॥
ॐ ह्रीं श्री जम्बूद्वीपे सुदर्शनमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र अवतर अवतर
संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । (पुष्पांजलिं
क्षिपेत्)
छन्द - चान्द्रायण
स्वाध्याय से भेद-ज्ञान जल लाऊँगा ।
जन्म-जरादिक दुख सम्पूर्ण मिटाऊँगा ॥
मेरु सुदर्शन सोलह चैत्यालय जजूँ ।
भक्ति भाव से वीतराग प्रभु को भजूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं…
स्वाध्याय की गंध ज्ञान में लाऊँगा।
अब अनादि का भवज्वर पूर्ण हटाऊँगा ॥
मेरु सुदर्शन सोलह चैत्यालय जजूँ ।
भक्तिभाव से वीतराग प्रभु को भजूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं …
स्वाध्याय से अक्षत गुण उर में सजा ।
अक्षय पद पाऊँ क्षतमय पद दूँलजा ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं…
स्वाध्याय से निजगुण पुष्प सजाऊँगा ।
काम-व्याधि पर अब तो मैं जय पाऊँगा ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्…
स्वाध्याय से आत्मतृप्ति मैं पाऊँगा ।
क्षुधा वेदना का मैं नाम मिटाऊँगा ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य…
स्वाध्याय से ज्ञान ज्योति प्रगटाऊँगा।
मोह-महातम नाश, स्वरूप लखाऊँगा ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं …
स्वाध्याय से ध्यान अग्नि सुलगाऊँगा।
अष्टकर्म बन्धन को पूर्ण हटाऊँगा ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ षोडश जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं …
स्वाध्याय का फल पाऊँगा आज मैं।
मोक्ष सुफल पा होऊँगा जिनराज मैं ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं …
स्वाध्याय से निजगुण अर्घ्य बनाऊँगा।
पद अनर्घ्य संसारजयी मैं पाऊँगा ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य …
पूजन क्रमांक २
अर्ध्यावलि
वीरछन्द
मेरु सुदर्शन की भू पर है भद्रशाल वन अतिरमणीक ।
चारों दिशि में चार जिनालय जिनमुनि तप भू ध्यान प्रतीक ।
पूर्ण अनन्त चतुष्टय पाने जिनबिम्बों को ध्याऊँगा।
भव्य अकृत्रिम चैत्यालय पर मंगल ध्वजा चढ़ाऊँगा ॥
चौपाई
पूरब दिशि शाश्वत जिनधाम, भद्रशाल वन करूँ प्रणाम।
ज्ञान अनन्तानन्त सुहाय, जिन-मन्दिर पर ध्वजा चढ़ाय ॥ १ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ भद्रशालवनस्थित पूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं …
दक्षिण दिशि चैत्यालय एक, जागे उर में स्व-पर विवेक ।
दृग अनन्त की महिमा आय, जिनमन्दिर पर ध्वजा चढ़ाय ॥ २ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ भद्रशालवनस्थित दक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
पश्चिम दिशि जिन-भवन महान, ऊपर स्वर्ण कलशछविमान ।
वीर्य अनन्त सहज प्रगटाय, जिनमन्दिर पर ध्वजा चढ़ाय ॥ ३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ भद्रशालवनस्थित पश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं …
उत्तरदिशि उत्तम जिनगेह, परभावों से तजूँ सनेह ।
सुखअनन्तक्षण में विलसाय, जिनमन्दिर पर ध्वजा चढ़ाय ॥४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ भद्रशालवनस्थित उत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
छंद - ताटंक
भद्रशाल से पाँच शतक योजन ऊँचा है नंदनवन ।
पूरब दक्षिण पश्चिम उत्तर एक-एक जिनराज भवन ॥
चार अभाव जानकर स्वामी निज स्वभाव में आऊँगा ।
भव्य अकृत्रिम चैत्यालय पर मंगल ध्वजा चढ़ाऊँगा ॥
चौपई
नंदनवन जिनभवन ललाम, पूरब दिशि में है अभिराम ।
प्राक्-अभाव समझ में आय, अनेकान्तमय ध्वजा चढ़ाय ॥ ५ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ नन्दनवनस्थित पूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
दक्षिण दिशि जिनगेह अनूप, ध्वजा पंक्तियाँ दृश्य अनूप ।
बुधि प्रध्वंस-अभाव लहाय, अनेकान्तमय ध्वजा चढ़ाय ॥६ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ नन्दनवनस्थित दक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
पश्चिम दिशि जिनमंदिर जान, उर में जगे भेद-विज्ञान ।
जब अन्योन्याभाव बताय, अनेकान्तमय ध्वजा चढ़ाय ॥ ७ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ नन्दनवनस्थित पश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य …
उत्तर दिशि प्रभु प्रतिमा धाम, मानस्तंभ सहित अभिराम ।
जब अत्यन्त-अभाव सुहाय, अनेकान्तमय ध्वजा चढ़ाय ॥८ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ नन्दनवनस्थित उत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अ…
छंद - ताटंक
नंदनवन से साढे बासठ सहस्त्र योजन सुमनस वन ।
चारों दिशि में चार जिनालय नित पूजन करते सुरगण ॥
द्रव्य क्षेत्र अरु काल भावमय निज शुद्धातम ध्याऊँगा ।
भव्य अकृत्रिम चैत्यालय पर मंगल ध्वजा चढाऊँगा ॥
छंद - राधिका
पूरब दिशि वन सौमनस महान मनोहर ।
शाश्वत जिन-चैत्यालय की शोभा सुन्दर ॥
सामान्य-विशेषात्मक निज द्रव्य प्रवर है।
चैतन्य-चन्द्र चन्द्राकर शिव सुखकर है ॥ ९ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ सौमनसवनस्थित पूर्वीदक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं
दक्षिण दिशि वन सौमनस एक चैत्यालय ।
प्रतिमाएँ एक-शतक-वसु का गर्भालय ॥
निज भेदाभेद असंख्य प्रदेशी वर है।
चैतन्य-चन्द्र चन्द्राकर शिव सुखकर है ॥ १० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ सौमनसवनस्थित दक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य …
पश्चिम दिशि वन सौमनस जिनेन्द्र विराजे ।
आत्मानुभूति के साज स्वयं ही साजे ॥
पूजन क्रमांक २
है नित्यानित्य स्वकाली वस्तु प्रवर है।
चैतन्य-चन्द्र चन्द्राकर शिव सुखकर है ॥ ११ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ सौमनसवनस्थित पश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
उत्तर दिशि वन सौमनस जिनालय पावन ।
जिनमंदिर शिखर महान उच्च अतिपावन ॥
निज भाव अनन्त अखण्ड गुणों का घर है।
चैतन्य-चन्द्र चन्द्राकर शिव सुखकर है ॥ १२ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ सौमनसवनस्थित उत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
छंद - ताटंक
छत्तिस सहस्त्र योजन ऊपर सौमनस सुवन से पांडुकवन ।
चारों दिशि में एक-एक चैत्यालय शोभित हरता मन ॥
चार चौकड़ी का अभाव कर मोह शत्रु विनशाऊँगा।
भव्य अकृत्रिम चैत्यालय पर मंगल ध्वजा चढ़ाऊँगा ॥
छंद - राधिका
पूरब दिशि पाडुंकवन जिनगेह अकीर्तम ।
है स्वर्णमयी रत्निम प्रतिमाएँ अनुपम ॥
यह अनन्तानुबंधी कषाय क्षयकर है।
चैतन्य-चन्द्र अविनाशी अजर-अमर है ॥ १३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ पांडुकवनस्थित पूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
दक्षिण दिशि में जिन-चैत्यालय सुखकारी ।
वसु द्रव्य सजा पूजें सब ही नर-नारी ॥
अप्रत्याख्यानावरणी दुख का घर है।
चैतन्य-चन्द्र अविनाशी अजर-अमर है ॥ १४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ पांडुकवनस्थित दक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
पश्चिम दिशि जिनमंदिर की शोभा न्यारी ।
पूजन करते सुर विद्याधर नभ-चारी ॥
प्रत्याख्यानावरणी का क्षय सुखकर है।
चैतन्य-चन्द्र अविनाशी अजर-अमर है ॥ १५ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ पांडुकवनस्थित पश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं …
उत्तर दिशि में जिन-चैत्यालय मंगलमय ।
क्षयकर्ता सर्व अमंगल चिन्मय सुखमय ॥
संज्वलन कषाय कहें जिनवर दुखकर है।
चैतन्य-चन्द्र अविनाशी अजर-अमर है ॥ १६ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ पांडुकवनस्थित उत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
पूर्णार्ध्य
दोहा
पूर्ण अर्घ्य अर्पण करूँ, गिरि सुमेरु जिनगेह ।
बरसे बारम्बार प्रभु, ज्ञान सुधारस मेह ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरौ चतुर्दिक्षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्य…
जयमाला
दोहा
जिनवाणी की कृपा से, करूँ सदा स्वाध्याय ।
उर विवेक हो जाग्रत, ये ही ज्ञान उपाय ॥
चौपाई
स्वाध्याय वाचना समंत, यही तत्त्व निर्णयः का पंथ ।
स्वाध्याय पृच्छना महान, शंकादिक होते अवसान ॥
स्वाध्याय जिनश्रुत आम्नाय, शिवगरिमामय ज्ञानप्रदाय ।
स्वाध्याय अनुप्रेक्षा जान, बार-बार निज चिन्तन मान ॥
स्वाध्याय जिन धर्मउपदेश, धारूँ नग्न दिगंबर वेश ।
धन्य-धन्य जिनश्रुत स्वाध्याय, स्वाध्याय सम्यक्त्व प्रदाय ॥
स्वाध्याय बिन निर्णय नाँहि, तत्त्वाभ्यास बिना सुख नाँहि ।
तत्त्वज्ञान बिन समकित नाँहि, संमकित बिन को मुक्ति लहाहिं ॥
स्वाध्याय ही मंगलरूप, परमशान्ति दायक शिवरूप ।
यह सम्यग्दर्शन का स्रोत, होऊँ इससे ओतःप्रोत ॥
पूजन क्रमांक २
मन-वच-काय करूँ स्वाध्याय, जो भी करे आत्मसुख पाय ।
आत्मज्ञान की यह विधि जान, करूँ आत्मा का कल्याण ॥
जिनवाणी के द्वादश अंग, नमूं झुकाकर मैं वसु अंग ।
आचारांग प्रथम विख्यात, समिति गुप्ति व्रत वर्णन ख्यात ॥
दूजा सूत्रकृतांग महान, ज्ञान विनय का कथन प्रधान ।
तीजा स्थानांग प्रसिद्ध, देख शोध थल गमन सुसिद्ध ॥
चौथा समवायांग महान, द्रव्य क्षेत्र भाव का ज्ञान ।
पंचम व्याख्या प्रज्ञप्ति अंग, है विज्ञान कथन सर्वंग ॥
षष्टम ज्ञातृधर्म कथांग, धर्म कथाएँ सांगोपांग ।
सप्तम उपासकाध्ययनांग, श्रावक धर्म विवेचन रंग ॥
अष्टम अन्तःकृत सुदशांग, अन्तःकृत केवली कथांग ।
नवम अनुत्तरांग प्रख्यात, दस-दस साधु अनुत्तर प्राप्त ॥
दशम प्रश्न व्याकरण प्रसिद्ध, प्रश्नोत्तर व्याकरण सुसिद्ध ।
ग्यारहवाँ विपाक सूत्रांग, पुण्य-पाप फल का कथनांग ॥
दृष्टिप्रवाद बारहवाँ जान, नाशक मिथ्यातम अज्ञान ।
आत्मज्ञान बिन सब अज्ञान, एकादश नौ पूर्व अजान ॥
दोहा
पाँच भेद परिकर्म के, दृष्टिवाद के भेद ।
जीव शाश्वत सिद्ध है, सदा त्रिकाल अभेद ॥
प्रथम चंद्र प्रज्ञप्ति में, चंद्र आयु परिवार ।
द्वितीय सूर्य प्रज्ञप्ति में, कथन सूर्य परिवार ॥
जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति में, द्रह सरि नर तिर्यंच ।
द्वीप समुद्र प्रज्ञप्ति में, सागर द्वीप प्रपंच ॥
है व्याख्या प्रज्ञप्ति में, धर्माधर्माकाश ।
भव्य-अभव्य सुजीव का, कथन काल अविनाश ॥
कथन सूत्र अधिकार में, पर-मत का परिहार।
है प्रथमानुयोग में पुण्यकथा का सार ॥
चौथा भेद सुपूर्वगत, चौदह भेद प्रसिद्ध ।
जो भी इनको जानते, हो जाते हैं सिद्ध ॥
वीरछंद
है उत्पाद पूर्व, अग्रायणी, वीर्यवाद, अस्तिनास्ति प्रवाद ।
ज्ञानप्रवाद रु सत्यप्रवाद, सु आत्मप्रवाद रु कर्म प्रवाद ॥
प्रत्याख्यान, विद्यानुवाद कल्याण वाद सु प्राणावाद ।
क्रिया विशाल रु, लोकबिन्दु, चौदह पूरब हैं ज्ञान प्रदाय ॥
है पाँचों ही भेद चूलिका दृष्टिवाद के भेद यथा ।
जलगत, थलगत, मायागत अरु रूपगता, आकाशगता ॥
अग्रायणी पूर्व के जानों भेद पांच हैं मुख्य प्रधान ।
आनुपूर्वी, नाम, प्रमाण, वक्तव्य सु अर्थाधिकार जान ॥
अर्थाधिकार के भेद चतुदर्श, सामायिक, संस्तवन महान ।
तीर्थवन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक और कृतिकर्म प्रधान ॥
दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्पाकल्प, कल्पव्यवहार ।
महाकल्प अर पुंडरीक, महापुंडरीक, निषिधिकासार ॥
यही प्रकीर्णक चौदह कहलाते इनका भी स्वरूप लो जान ।
पंच महाव्रतधारी मुनियों की होती इनसे पहचान ॥
भेद-प्रभेद अनेकों हैं अरु असंख्यात जिनवाणी के ।
द्रव्य-भाव श्रुत सहित भेद हरते हैं दुःख हर प्राणी के ॥
दोहा
जिनवाणी को नमन कर, पूजूँ गृह शिवकार ।
जिनवाणी की कृपा से, हो जाऊँ भवपार ॥
जयवन्तो त्रयलोक में, जिनवाणी सुखकार ।
स्याद्वाद शैली करे, सब विवाद परिहार ॥
ॐ ह्रीं श्री जम्बूद्वीपस्थ सुदर्शनमेरुसम्बन्धि षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीतिः स्वाहा ।
वीरछंद
मेरु सुदर्शन सोलह जिनगृह हमने पूजे हर्षित हो ।
माला चिन्हांकित ध्वज आरोहण करता हूँ पुलकित हो ॥
इन्द्रध्वज पावन विधान की पूजन का उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो जिनगुण-संपति मिले जिनेश ॥
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
भजन
निरखी-निरखी मनहर मूरति, तोरी हो जिनन्दा ।
खोई-खोई आतम निज-निधि, पाई हो जिनन्दा ॥ टेक ॥
मोह दुःख का घर है मैंने, आज सरासर देखा है…२
आतम-धन के आगे झूठा, जग का सारा लेखा है…२
मैं अपने में घुल-मिल जाऊं, तो पाऊं जिनन्दा ॥१ ॥
तू भवनाशी मैं भववासी, भवसागर से तिरना है… २
शुद्ध-स्वरूपी तुझसा बनकर, शिवरमणी को वरना है… २
मैं अपने में ही रम जाऊं, वर पाऊं जिनन्दा ॥२ ॥
नादानी में अबलों मैंने, पर को अपना मान्ना है… २
काया की माया में भूला, तुझको नहीं पहचाना है… २
अब भूलों पर रोता ये मन, मोरा हो जिनन्दा ।।३ ।।
पूजन क्रमांक-३
सुदर्शनमेरु संबंधी चार गजदन्त जिनालय पूजन
स्थापना
वीरछन्द
मेरु सुदर्शन संबंधी गजदंत जिनालय चार प्रसिद्ध ।
इन्द्रादिक सुर शीश झुकाते प्रभु पूजन कर होंगे सिद्ध ॥
हस्तिदंत सम गिरि गजदंतों की शोभा सबसे न्यारी ।
तत्त्वों के सम्यक् निर्णय की थाली लाया मनहारी ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र
अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(पुष्पांजलिं क्षिपेत्) ।
छन्द- हरिगीतिका
तत्त्वनिर्णय नीर निर्मल जिन-चरण अर्पण करूँ ।
लब्धि पाय क्षयोपशम अब तत्त्व का निर्णय करूँ ॥
मेरु के गजदंत जिनगृह-पूजकर निज निधि मिले ।
वीतराग जिनेन्द्र प्रभु पद-कमल उर-सर में खिले ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
जन्म- जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
तत्त्व-निर्णय से महकते, भाव का चन्दन लिया।
विशुद्धभावों ने प्रभो ! आताप भव का हर लिया ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
• तत्त्व-निर्णय से अखण्डित जानकर निजभाव को ।
तन्दुल अखण्ड करूँ समर्पित, क्षत करूँ पर भाव को ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ३
तत्त्वनिर्णय से सुगंधित, भक्ति-सुमनों से सजा।
कर रहा यह माल अर्पित मोह भी भागा लजा ॥
मेरु के गजदंत जिनगृह-पूजकर निज निधि मिले।
वीतराग जिनेन्द्र प्रभु पद-कमल उर-सर में खिले ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
तत्त्व-निर्णय रस सने चरु जिन-चरण अर्पण करूँ।
करण निर्मल भूमि में सम्यक्त्व आरोपण करूँ ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थित सिध्दकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तत्त्व-निर्णय से प्रजालूँ दीप भेद-विज्ञान का।
मोह का उपशम करूँ लूँ राज्य सम्यग्ज्ञान का ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
तत्त्व-निर्णय से समझलूँ रूप ज्ञायक भाव का।
ध्यान अग्नि में क्षयोपशम करूँ मोह विभाव का ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
तत्त्व-निर्णय का सुफल सम्यक्त्व क्षायिक प्राप्त हो।
श्रेष्ठ फल युत हे जिनेश्वर वीतरागी आप्त हो ॥ मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि चतुर्गजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
तत्त्व-निर्णय ही है प्रदायक पद अनर्घ्य महान का।
अर्घ्य अर्पण से करूँ संकल्प जिन गुणगान का ॥मेरु० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालयजिन बिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अर्ध्यावलि
चौपई
मेरु सुदर्शन विदिशा जान, आग्नेय गजदन्त महान ॥
महासौमनस नाम प्रसिद्ध, सात कूट में इक सुप्रसिद्ध ॥ १ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरोः आग्नेयविदिशि महासौमनसगजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालय-
जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
है नै ऋत्य दिशा में एक, विद्युत्प्रभ गजदंत सुनेक ॥
नवकूटों से गिरि शोभंत, इक पर श्री जिनगृह भगवंत ॥ २ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरोः नैऋत्यविदिशि विद्युत्प्रभगजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालय-
जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
है वायव्य कोण में दिव्य, गंधमादनाचल अति भव्य ॥
सप्तकूट युत हैं गजदंत, इक पर श्री जिनगृह भगवंत ॥ ३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरोः वायव्यविदिशि गंधमादनगजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालय-
जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्रप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
मेरु सुदर्शन दिशि ईशान, माल्यवान गजदंत महान ॥
नवकूटों से युक्त विशाल, इकपर चैत्यालय सुविशाल ॥४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरोः ईशानविदिशि माल्यवानगजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालय-
जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूर्णार्ध्य
दोहा
चार शतक बत्तीस हैं, जिन-प्रतिमा अरहंत ।
पूर्ण-अर्घ्य अर्पण करूँ, धन्य-धन्य भगवन्त ॥
धन्य-धन्य जिन बिम्ब हैं, धन्य-धन्य जिनराज ।
शुद्धातम साधन करूँ, पाऊँ निजपद राज ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरोः चतुर्विदिशायां-चतुर्गजदन्तस्थित-चतु:जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ३
जयमाला
दोहा
अनेकान्तमय वस्तु को, कहता है स्याद्वाद ।
भाव भासना सहित ध्वज, चढ़ा रहा अविवाद ॥
छंद - रोला
भाव-भासना बिन तत्त्वों का निर्णय कैसा ?
बिना बीज के वृक्ष पल्लवित होवे कैसा ?
भाव-भासना बिन अभ्यास व्यर्थ हो जाता।
भाव-भासना ही सम्यक् निर्णय का दाता ॥
सात तत्त्व के नाम रटे हैं इस चेतन ने ।
लक्षण जाने, मर्म न पाया अब तक मन ने ॥
देता है उपदेश सभी को तत्त्वज्ञान के ।
किन्तु भासना बिन भ्रमता है बिना भान के ॥
स्याद्वाद ही सम्यक् निर्णय में सक्षम है।
तत्त्वज्ञान से हो जाता क्षय भव विभ्रम है ॥
सप्तभंग ही समाधान-कारी विवाद सब ।
वस्तुतत्त्व का निर्णय होता निर्विवाद सब ॥
स्यात् अस्ति है स्यात् नास्ति है मंगलकारी ।
अस्ति-नास्ति है स्यात् सहित विवाद परिहारी ॥
स्यात् सहित है अवक्तव्य कथनी सब युगपत् ।
स्यात् अस्ति युत अवक्तव्य है यह जानो अब ॥
स्यात् नास्तियुत अवक्तव्य की महिमा जानो ।
अस्ति-नास्ति युत अवक्तव्य स्यात् पहचानो ॥
सप्तभंग से स्याद्वाद अद्भुत शोभित है।
जिन-आगम की इस शैली पर जग मोहित है ॥
स्याद्वाद महिमा से शोभित है जिनवाणी ।
सकल विवाद नाश करती माता कल्याणी ॥
“दसंणमूलो धम्मो,” हृदय सजाऊँ स्वामी ।
"चारित्तं खलु धम्मो,” पाऊँ अंतर्यामी ॥
दोहा
स्याद्वाद में निहित है, दोनों भाव-अभाव ।
गिरि गजदन्त नमूँ सदा, पाऊँ आत्म स्वभाव ॥
ॐ ह्रीं श्री जम्बूद्वीपस्थ सुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थित सिद्धकूटजिनालय-
जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछंद
जंबूद्वीप सुगजदंतों के जिनगृह पूजे हर्षित हो ।
सिंह चिन्ह की ध्वजा चढ़ाऊँ अंतर मन से पुलकित हो ॥
इन्द्रध्वज पावन विधान की पूजन का उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो जिनगुण संपति मिले जिनेश ॥
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
भजन
इन्द्रध्वज मंडल भला भया।
देखो देखो देखो जी आनन्द छा गया ॥ टेक ॥
मध्यलोक के भव्य जिनालय, शास्वत जिनप्रतिमा सुखकारी।
शुद्धातम के दर्श कराती, अर्न्तमुख छवि लगती प्यारी ॥
जिन-पूजन का अवसर आ गया, देखो देखो जी आनन्द छा गया ॥१ ॥
सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चरितमय, जग को मुक्ति मार्ग बताती ।
ज्ञान भिन्न है राग भिन्न है, भविजन को सन्देश सुनाती।
भेद-विज्ञान हमें भा गया, देखो देखो देखो जी आनन्द छा गया ॥२ ॥
वस्तु कथञ्चित नित्य-अनित्य अनेकान्त की महिमा न्यारी।
स्याद्वाद शैली पर मोहित होते हैं, मुनि सुर नर-नारी ॥
यह जिनशासन हमें भा गया, देखो देखो जी आनन्द छा गया ॥३ ॥
पूजन क्रमांक-४
सुदर्शनमेरु संबंधी जम्बू-शाल्मलि वृक्ष जिनालय पूजन
स्थापना
वीरछंद
मेरु सुदर्शन संबंधी है जम्बूवृक्ष प्रसिद्ध महान ।
इसी वृक्ष के कारण जम्बूद्वीप नाम हो गया प्रधान ॥
उत्तर में उत्तर कुरु शोभित भोगभूमि के दिशि ईशान ।
जम्बूतरु की उत्तर शाखा पर जिन-चैत्यालय छविमान ॥
दक्षिण भाग सुभूमि देवकुरु की नैऋत्य दिशा शुभ जान ।
शाल्मलि दक्षिण शाखा पर है जिन-चैत्यालय महिमावान ॥
दोनों तरु पृथ्वीकायिक हैं पांच शतक योजन विस्तार ।
सम्यक् नौका पर चढ़ स्वामी हो जाऊँ भवदधि के पार ॥
ॐ ह्रीं श्री जम्बूद्वीपस्थ सुदर्शनमेरुसम्बन्धि जम्बू-शाल्मलिवृक्षद्वयस्थितजिनालय-
जिनबिम्बसमूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम
सन्निहितो भव भव वषट् । (पुष्पांजलिं क्षिपेत्) ।
छंद - चौपई / आंचलिबद्ध हाकलि
निःशंकित निज आत्म स्वरूप में अपनापन भव हर रूप ।
महासुख हो, जय जिनराज महाप्रभु हो ॥
जम्बू-शाल्मलि वृक्ष महान वन्दूँ द्वय जिन-भवन प्रधान ।
परम प्रभु हो, जय जिनदेव महा विभु हो ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि जम्बू-शाल्मलिवृक्षद्वयस्थितजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
समकित चंदन शान्त स्वरूप । आकाँक्षा नाशक अनुरूप ॥ महा० ॥
जम्बू-शाल्मलि वृक्ष महान । वन्दूँ द्वय जिन-भवन प्रधान ॥ परम० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि जम्बूशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।
समकित अक्षत भाव विशुद्ध । निर्विचिकित्सा करते शुद्ध ।
महासुख हो, जय जिनराज महाप्रभु हो ॥
जम्बू-शाल्मलि वृक्ष महान वन्दूँ द्वय जिन-भवन प्रधान ।
परम प्रभु हो, जय जिनदेव महा विभु हो ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि जम्बूशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
समकित पुष्प काम-मद नाश । दृष्टि-अमूढ़ स्वरूप प्रकाश ॥ महा. ॥
जम्बू-शाल्मलि वृक्ष महान । वन्दूँ द्वय जिन-भवन प्रधान ॥ परम. ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि जम्बूशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
समकित चरु उत्तम सुखदाय । क्षुधा व्याधि उपगूहन थाय ॥ महा. ॥
जम्बू-शाल्मलि वृक्ष महान । वन्दूँ द्वय जिन-भवन प्रधान ॥ परम. ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि जम्बूशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
समकित दीप ज्योति मुसकाय । निज-परस्थितिकरण कराय ॥ महा. ॥
जम्बू-शाल्मलि वृक्ष महान । वन्दूँ द्वय जिन-भवन प्रधान ॥ परम. ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि जम्बूशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
समकित धूप प्रसिद्ध सुगंध । वात्सल्य से हरती बंध ॥ महा. ॥
जम्बू-शाल्मलि वृक्ष महान । वन्दूँ द्वय जिन-भवन प्रधान ॥ परम. ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
समकित फल सुख शान्तिप्रदाय । धर्म प्रभाव सुफल सुखदाय ॥
महासुख हो, जय जिनराज महाप्रभु हो ॥
जम्बू-शाल्मलि वृक्ष महान । वन्दूँ द्वय जिन-भवन प्रधान ॥
परम प्रभु हो, जय जिनदेव महा विभु हो ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बू-शाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ४
अष्टांगी सम्यक्त्व महान । पद अनर्घ्य का मिले वितान ॥ महा. ॥
जम्बू-शाल्मलि वृक्ष महान । वन्दूँ द्वय जिन-भवन प्रधान ॥ परम. ॥
ॐ ह्री श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि जम्बूशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्ध्यावलि
शार्दूलविक्रीड़ित
जम्बू वृक्ष महान चैत्य पूजूँ, भाऊँ सदा भावना।
निज शुद्धात्म स्वभाव प्राप्त कर लूँ, हो पूर्ण यह कामना ॥
क्रम नियमित पर्याय सर्व जानूँ, सम्यक्त्व की प्राप्ति हित ।
रत्नत्रयमय नित्य गीत गाऊँ, भूलूँ नहीं साधना ॥ १ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धी जम्बूवृक्षस्थित जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
शाल्मलि वृक्ष महान चैत्यपूजूँ शुद्धात्म की प्राप्तिहित ।
निर्मल ज्ञान स्वरूप दिव्य मेरा परिपूर्ण है संयमित ॥
जिन दीक्षा भगवती भव्य पाऊँ मुनिराज निर्ग्रन्थ बन ।
ज्ञानानन्द स्वरूप नित्य ध्याऊँ सम्पूर्ण पा बल अमित ॥ २ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धी शाल्मलिवृक्षस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्ध्य
पदप्राप्तये निर्वपामीति स्वाहा ।
• पूर्णार्घ्य
सोरठा
दो जिनभवन महान, जम्बू शाल्मलि वृक्ष के ।
भवदुख हो अवसान, पूर्ण अर्घ्य अर्पित करूँ ॥
निज गुण का यह अर्घ्य, अर्पित है निज आत्म को ।
पाऊँ पद अन-अर्घ्य, नमूँ सदा शुद्धात्म को ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धी जम्बूशाल्मलिवृक्षद्वयस्थितजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
दोहा
सम्यग्दर्शन ही प्रथम, मुक्तिभवन सोपान ।
निज आश्रय से प्राप्त कर, बन जाऊँ भगवान ॥
छंद-रोला
निश्चय सम्यग्दर्शन ही निज उर में लाऊँ।
आत्मतत्त्व की ही प्रतीति दृढ़ पूरी पाऊँ ॥
मैं हूँ पर से भिन्न आत्मा गुण अनंतमय ।
निज से पूर्ण अभिन्न चिदातम मैं मंगलमय ॥
औपशमिक क्षायिक क्षयोपशम सम्यग्दर्शन ।
यही अधिगमज तथा निसर्गज कहते भगवन ॥
आर्ष, बीज, उपदेश, मार्ग, अरु सूक्ष्म सुजानो ।
तथा अर्थ, विस्तार और संक्षेप प्रमानो ॥
यह अवगाढ और परमावगाढ होता है।
अष्ट अंगयुत, दश प्रकार, भवभ्रम खोता है ॥
शंका काँक्षा आदि दोष पच्चीस रहित है।
शुद्ध स्वरूपाचरण शक्ति से सहज सहित है ॥
जीव अजीव आस्रव संवर बंध निर्जरा ।
मोक्ष सहित सातों तत्त्वों की भूमि उर्वरा ॥
यह व्यवहार सु सम्यग्दर्शन कहलाता है।
मुक्तिमार्ग आभास जीव को बहलाता है ॥
प्रभु समकित व्यवहार अनंतों भव में पाया।
किन्तु न अब तक मुक्तिमार्ग निज में दरशाया ॥
देव शास्त्र गुरु की सच्ची श्रद्धा नहिं पायी ।
वीतराग जिनधर्म सुछवि नहिं उर को भायी ॥
रागी-द्वेषी देवों से सुख की अभिलाषा ।
रहा सदा ही, किन्तु आज तक मैं प्रभु प्यासा ॥
पूजन क्रमांक ४
जीव शाश्वत चेतन, जड़ अजीव पुद्गल तन ।
राग-द्वेष आस्रव से करता आया बंधन ॥
संवर का तो भाव नहीं प्रभुउर में आया।
किन्तु निर्जरा कर अकाम दुख ही दुख पाया ॥
मोक्ष तत्त्व का नाम सुना पर भाव न समझा ।
कर्म रहित होने का यत्न किया पर उलझा ॥
तत्त्वज्ञान अभ्यास पूर्वक भाव-भासना ।
पाय काल समकित निधि पाई, मिटी वासना ॥
तीन काल तीनों लोकों में समकित दुर्लभ ।
भवसागर तरने की तरणी हुई अब सुलभ ॥
शुद्ध बुद्ध चैतन्य, भेद बिन, मैं अखंड हूँ।
धौव्य त्रिकाली शिवस्वरूप हूँ, अति प्रचंड हूँ ॥
गुण-पर्याय भेद भी नहीं दृष्टि में आता ।
मुझको तो केवल अपना स्वरूप दर्शाता ॥
यही दृष्टि का विषय, जो कि पर्याय रहित है।
जीव त्रिकाली, सर्व श्रेष्ठ शिव सौख्य सहित है ॥
है अनंत शक्तियाँ सन्निहित इसके भीतर ।
स्वयं सिद्ध है बना-बनाया यह जगदीश्वर ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि जम्बू-शाल्मलिवृक्षाद्वार्यस्थत जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछन्द
जम्बूद्वीप सुजम्बू-शाल्मलि जिनगृह पूजे हर्षित हो ।
अंशुक चिन्ह विभूषित ध्वज-आरोहण करता पुलकित हो ॥
इन्द्रध्वज पावन विधान की पूजन का उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो जिनगुण सम्पति मिले जिनेश ॥
पुंष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
पूजन क्रमांक-५
सुदर्शनमेरु संबंधी सोलह वक्षार जिनालय पूजन
स्थापना
छंद - रोला
जम्बूद्वीप सुगिरि सोलह वक्षार जानिये ।
मेरु सुदर्शन आसपास उत्तम प्रमाणिये ॥
पूर्व-विदेह नदी सीता उत्तर तट चारों ।
पूर्व-विदेह नदी सीता दक्षिण तट चारों ॥
सीतोदा दक्षिण तट पश्चिम-विदेह चारों ॥
सीतोदा उत्तर तट पश्चिम-विदेह चारों ॥
ये सोलह वक्षार जिनालय से हैं शोभित ।
स्वर्गों के सुर इन्द्र सदा पूजन कर मोहित ॥
मोक्षमार्ग के नेता, ज्ञाता विश्व-तत्त्व के ।
आज पधारो मम उर में, भेत्ता भूभृत के ॥
सम्यग्ज्ञान प्रगट कर आतम रूप लखाऊँ ।
अनेकान्त में भी सम्यक् एकान्त सुध्याऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वापरविदेहस्थ षोडशवक्षारस्थित-सिद्धकूटजिनालय-
जिनबिम्बसमूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम
सन्निहितो भव भव वषट् । (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
चौपई
सम्यग्ज्ञान सुनीर चढ़ाय, संशय विभ्रम मोह नशाय ॥
मेरु सुदर्शन के वक्षार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यों
जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
भेद-ज्ञान चंदन सुप्रताप, विनशे ज्ञेय-लुब्धता ताप ॥
मेरु सुदर्शन के वक्षार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ५
अक्षत सम्यग्ज्ञान स्वरूप, जानूँ निज अखण्ड चिद्रूप ॥
मेरु सुदर्शन के वक्षार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
भेद-ज्ञान के सुमन चढ़ाय, पर-ज्ञेयों का लोभ नशाय ॥
मेरु सुदर्शन के वक्षार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
भेद-ज्ञान रसमय नैवेद्य, पर-सन्मुखता का नहिं खेद ॥
मेरु सुदर्शन के वक्षार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यग्ज्ञान सुदीप उजार, स्व-पर स्वरूप प्रकाशन हार ॥
मेरु सुदर्शन के वक्षार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षोडशवक्षारस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यग्ज्ञान सुधूप चढ़ाय, अष्टकर्म अरि काष्ठ जलाय ॥
मेरु सुदर्शन के वक्षार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
भेद-ज्ञान के फल शिवरूप, मोक्ष सुफल पाऊँ चिद्रूप ॥
मेरु सुदर्शन के वक्षार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
अष्ट अंगमय सम्यग्ज्ञान, अर्घ्य चढ़ाय भजूँ भगवानं ॥
मेरु सुदर्शन के वक्षार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्ध्यावलि
वीरछन्द
सीता सरिता के उत्तर तट भद्रशाल वेदी सुविशाल ।
चित्रकूट वक्षार स्वर्णमय पर हैं चार कूट नत भाल ॥
सरित ओर के सिद्धकूट पर श्री जिनवर का पावनधाम ।
नाचूँ गाऊँ ध्वजा चढ़ाऊँ भक्तिभाव से करूँ प्रणाम ॥ १ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिपूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे चित्रकूटवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
सीता सरिता के उत्तर तट पद्म-कूट वक्षार महान ।
स्वर्णमयी चारों कूटों में इक पर जिनगृह है छविमान ॥२ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे पद्मकूटवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
नलिनकूट वक्षारं सुपावन एक कूट पर जिनगृह जान ।
जिन-प्रतिमाओं के दर्शन से होते कर्म शत्रु अवसान ॥३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे नलिनकूटवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
एक शैल वक्षार मनोरम सुरांगनाएँ करती नृत्य ।
षट आवश्यक में आवश्यक एक मात्र अनुभव सत्कृत्य ॥४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे एकशैलवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अनर्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
छंद - रोला
पूर्व-विदेह सहित सीता दक्षिण तट आओ ।
वेदी देवारण्य निकट जिन महिमा गाओ ॥
है त्रिकूट वक्षार चारकूटों में इक पर।
इकशत वसु जिन-प्रतिमा युक्त जिनालय सुन्दर ॥५ ॥
ॐ हीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतंटे त्रिकूटवक्षार
स्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यों अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ५
सीतासरि वैश्रवणकूट वक्षार मनोहर ।
भावसहित मैं पूजूँ श्री जिनवर का मंदिर ॥ ६ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटे वैश्रवणकूट
वक्षारस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा ।
सीता दक्षिण है वक्षार सुअंजनात्मा ।
चारकूट में एक कूट पर जिनगृह परमात्मा ॥७ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटे अंजनात्मावक्षार
स्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सीता दक्षिण तट अंजन वक्षार मनोहर ।
चारकूट में एक कूट श्री जिन-मंदिर ॥८ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटेअंजनात्मावक्षार
स्थित सिद्धकूटजिनालजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछंद
है पश्चिम विदेह सीतोदा दक्षिण ओर चार वक्षार ।
सुरांगनाओं की पग पायल घुंघरू की झनझन झंकार ॥
सीतोदा दक्षिण तट वेदी भद्रशाल के निकट महान ।
श्रद्धावान नाम का है वक्षार कूट इक जिनगृहजान ॥९ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिम्विदेहस्थ सीतोदासरितादक्षिणतटेश्रद्धावानवक्षार
स्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
सीतोदा दक्षिण वक्षार सु विजटावान कूट हैं चार ।
एक कूट पर श्री जिन-मंदिर जिसकी महिमा अपरंपार ॥१० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदासरितादक्षिणतटे विजटावान
वक्षारस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.स्वाहा ।
सीतोदा दक्षिण आशीविष है वक्षार कूट हैं चार ।
एककूट पर जिन-चैत्यालय जिसकी महिमा का नापार ॥११ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदासरितादक्षिणतटे आशीविष
वक्षारस्थित सिद्धकूटजिनालयजनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदपाप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
सीतोदा दक्षिण वक्षार सुखावह चार कूट से युक्त।
एक कूट पर जिनगृह उत्तम विविध चार वन से संयुक्त ॥१२ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदासरितादक्षिणतटे सुखावह
वक्षारस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्ध्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि. स्वाहा ।
प्रथम मेरु पश्चिम विदेह सीतोदा सरि उत्तर तट चार ।
हैं वक्षार महान स्वर्णमय शीश झुकाऊँ बारंबार ॥
सीतोदा उत्तर तट वेदी देवारण्य महान बनी ।
चंद्रमाल वक्षार कूट इक पर जिनगृह में विश्वधनी ॥१३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे चन्द्रमालवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सूर्यमाल वक्षार सहित सीतोदा उत्तर तट पर एक ।
चारकूट में एक कूट पर श्री जिन-भवन नमूँ सविवेक ॥१४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे सूर्यमालवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सीतोदा सरि उत्तर तट पर नागमाल वक्षार प्रसिद्ध ।
एक कूट पर श्री जिन-मंदिर जहाँ विराजे जिन सुप्रसिद्ध ॥१५ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे नागमालवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सीतोदा उत्तर तट शोभित देवमाल वक्षार महान ।
एक कूट पर जिन-चैत्यालय मोहनाश में सक्षम जान ॥१६ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे देवमालवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूर्णार्ध्य
वीरछन्द
मेरु सुदर्शन पूर्व तथा पश्चिम में सोलह गिरि वक्षार ।
पूर्ण अर्घ्य है जिन-बिम्बों को, रागभाव सब कर दूँ क्षार ॥
एकसहस्र सात सौ, अट्ठाईस बिम्ब को करूँ प्रणाम ।
जिन-प्रतिमा जिनवरसम लखकर पाऊँनिज काज्ञाननिधान ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पूर्वापरविदेहस्थ षोडशवक्षारस्थितसिद्धकूट
जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ५
जयमाला
दोहा
सम्यग्दर्शन युक्त है, निर्मल सम्यग्ज्ञान ।
अनेकान्तमय वस्तु के, प्रतिपादक भगवान ॥
वीरछन्द
निज अभेद का ज्ञान सुनिश्चित आठ भेद सब हैं व्यवहार ।
सम्यग्ज्ञान परम हितकारी शिव सुखदाता मंगलकार ॥
अक्षर पद वाक्यों का शुद्धोच्चारण है व्यंजन-आचार ।
शब्दों के यथार्थ अर्थ का अवधारण है अर्थाचार ॥
शब्द अर्थ दोनों का सम्यक् जानपना है उभयाचार ।
योग्यकाल में जिनश्रुत का स्वाध्याय कहाता कालाचार ॥
नम्र-रूप रह लेश न उद्धत होना ही है विनयाचार ।
सदा ज्ञान का आराधन, स्मरण सहित उपध्यानाचार ॥
शास्त्रों के पाठी अरु श्रुत का आदर है बहुमानाचार ।
नहीं छुपाना शास्त्र और गुरु नाम अनिह्नव है आचार ॥
आठ अंग है यही ज्ञान के इनसे दृढ़ हो सम्यग्ज्ञान ।
पाँच भेद हैं मति श्रुत अवधि मनःपर्यय अरु केवलज्ञान ॥
मति होता है इन्द्रिय मन से तीन शतक अरु छत्तीस भेद ।
श्रुत के प्रथमं करणं चरणं द्रव्यं चउ अनुयोग सु भेद ॥
द्वादशांग चौदह पूरब परिकर्म चूलिका प्रकीर्णक ।
अक्षर और अनक्षरात्मक भेद अनेकों हैं सम्यक् ॥
अवधि ज्ञान त्रय देशावधि परमावधि सर्वावधि जानो ।
भवप्रत्यय के तीन और गुणप्रत्यय के छह पहिचानो ॥
मनःपर्यय ऋजुमति विपुलमति उपचार अपेक्षा से जानो ।
नय-प्रमाण से जान ज्ञान प्रत्यक्ष परोक्ष पृथक् मानो ॥
अनेकान्त की महिमा गाऊँ कर एकान्तवाद का नाश ।
अनेकान्त में ही होता है निर्मल वस्तु-स्वरूप प्रकाश ॥
वस्तु अनंत गुणात्मक एवं है अनंत धर्मात्मक रूप ।
पर-गुण पर-पर्याय न इसमें निज-गुण निज-पर्याय स्वरूप ॥
निज धर्मों से वस्तु अलंकृत हैं अभाव रूपी पर-धर्म ।
एक काल में दोनों धर्म विराजमान हैं वस्तु स्वधर्म ॥
द्रव्य-क्षेत्र अरु काल-भाव से अस्ति स्वरूपी वस्तुस्वभाव ।
अपने स्व-चतुष्टय से है अन्य चतुष्टय सदा अभाव ॥
मैं अपने से अपने में हूँ, पर से पर में कभी नहीं ।
अस्ति-नास्ति नय धर्म विभूषित संशयात्मक कभी नहीं ॥
अनेकान्त के महामंत्र को जानूँ करूँ आत्म कल्याण ।
जिनशासन आधार यही है अनेकान्त अविवाद प्रधान ॥
जिनशासन में अनेकान्त भी नहीं सर्वथा माना है।
वस्तु कथंचित् अनेकान्तमय अरु एकान्त प्रमाणा है ॥
जो प्रमाण से साधित है वह अनेकान्त ही वस्तुस्वरूप ।
नय पद्धति से साधित है सम्यक्-एकान्त वस्तु का रूप ॥
सोरठा
अस्ति-नास्तिमय धर्म-युगल परस्पर विरुद्ध है।
साथ रहें, ये धर्म वस्तु विषै अविरुद्ध हैं ॥
रहते धर्म अनन्त, एक वस्तु में साथ ही ।
कहते जिन भगवन्त, अनेकान्त का मर्म यह ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पूर्वापरविदेहस्थ षोडशवक्षारपर्वतस्थित सिद्धकूट
जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछन्द
जम्बूद्वीप सुवक्षारों के जिनगृह पूजे हर्षित हो ।
गरुड़ चिन्ह की ध्वजा चढ़ाऊँ अन्तर्मन से पुलकित हो ॥
इन्द्रध्वज पावन विधान की पूजन का उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो जिनगुण संपति मिले जिनेश ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
पूजन क्रमांक-६
सुदर्शनमेरु संबंधी चौंतीस विजयार्थ जिनालय पूजन
स्थापना
छंद - सरसी
मेरु सुदर्शन संबंधित है पूर्व-विदेह महान ।
मेरु सुदर्शन संबंधित पश्चिम-विदेह छविमान ॥
सोलह-सोलह रजताचल जिनका विजयार्ध सुनाम ।
क्षेत्र भरत-ऐरावत के दो रजताचल अभिराम ॥
भावपूर्वक करूँ वन्दना चैत्यालय विजयार्ध ।
निज चैतन्य-चंद्रिका निरखूँ निर्मल हो पुरुषार्थ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिपूर्वापरविदेह-भरतैरावत सम्बन्धि-चतुस्त्रिंशत
विजयार्धपर्वतस्थित जिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ
तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (पुष्पांजलिं क्षिपेत्) ।
चौपाई
सम्यक् चारित्र जल सुखकारी, अनन्तानुबन्धी परिहारी ।
जय विजयार्ध सुगिरि चौंतीसा, वन्दूँ भाव सहित जगदीशा ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि चतुस्त्रिंशत विजयार्धपर्वतस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
निर्मल सम्यक् चारित्र चन्दन, अप्रत्याख्यानी ताप निकन्दन ।
जय विजयार्ध सुगिरि चौंतीसा, वन्दूँ भाव सहित जगदीशा ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि चतुस्त्रिंशत विजयार्धपर्वतस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यक् चारित्र धर्म अखण्डित, प्रत्याख्यानी करता खंडित ।
जय विजयार्ध सुगिरि चौंतीसा, बन्दूँ भाव सहित जगदीशा ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि चतुस्त्रिंशत विजयार्धपर्वतस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अक्षयपदप्राप्तयेअक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यक्चारित्र पुष्प सुगंधी, ज्वलन संज्वलन होती ठंडी।
जय विजयार्ध सुगिरि चौंतीसा, वन्दूँ भाव सहित जगदीशा ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि चतुस्त्रिंशत विजयार्धपर्वतस्थित जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
चारित्र चरु ले दिव्य महाना, सामायिक निज तृप्ति प्रधाना ।
जय विजयार्ध सुगिरि चौंतीसा, वन्दूँ भाव सहित जगदीशा ॥
ॐ ह्रीं श्री श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि चतुस्त्रिशत विजयार्धपर्वतस्थितजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यक् चारित्र दीप प्रजालूँ, छेदोपस्थापन विधि पालूँ ।
जय विजयार्ध सुगिरि चौंतीसा, वन्दूँ भावसहित जगदीशा ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि चतुस्त्रिंशत विजयार्धपर्वतस्थित जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यक् चारित्र धूप सुगंधित, हो परिहारविशुद्धि अखण्डित ।
जय विजयार्ध सुगिरि चौंतीसा, वन्दूँ भावसहित जगदीशा ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-चतुस्त्रिशत विजयार्धपर्वतस्थित जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यक् चारित्र फल अति पावन, सूक्ष्म साम्पराय मन भावन ।
जय विजयार्ध सुगिरि चौंतीसा, वन्दूँ भावसहित जगदीशा ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसंबन्धि चतुस्त्रिंशत विजयार्धपर्वतस्थित जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
सम्यक् चारित्र अर्घ्य अनूपम, यथाख्यात परिणति चिद्रूपम् ।
जय विजयार्ध सुगिरि चौंतीसा, वन्दूँ भावसहित जगदीशा ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि चतुस्त्रिशत विजयार्धपर्वतस्थित जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्ध्यावलि
वीरछन्द
मेरु सुदर्शन पूर्व और पश्चिम में है बत्तीस विदेह ।
एक-एक विजयार्ध रजतगिरि जिन पर हैं शाश्वत जिनगेह ॥
भरत और ऐरावत में दो रूपाचल पर दो जिनधाम ।
इन चौंतीस जिनालय की जिन-प्रतिमाओं को करूँ प्रणाम ॥
तीन सहस छह शतक बहत्तर रत्नमयी जिन-बिम्ब महान ।
छह खंडों का होता है प्रत्येक क्षेत्र अति शोभावान ॥
पूजन क्रमांक ६
तीर्थंकर चौबीस चक्रवर्ती बारह इनमें होते।
नव नारायण नव प्रतिनारायण बलभद्र सु नव होते ॥
वैताढ्यों के जिनमन्दिर पर वन्दन करने जाऊँगा ।
भव्य अकृत्रिम चैत्यालय पर मंगल ध्वजा चढ़ाऊँगा ॥
छन्द – उपमान चाल-अहो जगत गुरुदेव
आर्यखंड है एक, भद्रशाल है वेदी ।
कच्छा देश मनोज्ञ, जिन-मंदिर भव छेदी ॥ १ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिपूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे कच्छादेशमध्यविजयार्ध
पर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
सीता उत्तर ओर, देश सुकच्छा सुन्दर ।
रजताचल के शीश, सुन्दर है जिन-मंदिर ॥२ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे सुकच्छादेशमध्यविजयार्ध-
पर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्मभूमि का क्षेत्र, देश महाकच्छा है।
रजताचल के शीष, चैत्यालय अच्छा है ॥ ३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे महाकच्छादेशमध्यविज-
यार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अध्यै निर्वपामीति स्वाहा ।
कच्छकावती है देश, मध्य रजतगिरि जानो ।
तीर्थंकर का जन्म, निश्चित होता मानो ॥ ४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे कच्छकावतीदेशमध्यविज-
यार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
आवर्ता है देश, कर्म भूमि विख्याता ।
शुक्ल ध्यान जो ध्याय, निश्चित शिवपद पाता ॥५ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटेआवर्तादेशमध्यविजयार्ध-
पर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
लांगलावर्ता देश, आर्यखंड से शोभित ।
गिरि विजयार्ध जिनेन्द्र, गृह पर सुरनर मोहित ॥ ६ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे लांगलावर्तादेशमध्यविज-
यार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
मध्य पुष्कला देश, है विजयार्ध मनोरम ।
धर्म ध्यान सुप्रताप, क्षय होता मिथ्यातम ॥७ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे पुष्कलादेशमध्यविजया-
र्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
रजताचल विजयार्ध, देश पुष्कलावती के ।
तीर्थंकर प्रभु होंय, स्वामी पंचम गति के ॥८ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतानद्युत्तरतटे पुष्कलावतीदेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
छंद - तिलोकी
पूर्व विदेह नदी सीता दक्षिण सुतद देवारण्य वेदिका बहुत प्रसिद्ध है ॥
इनसे सम्बन्धित विजयार्ध रजतगिरि, बार-बार मैं भावसहित वन्दन करूँ ॥
वत्सा देश मध्यरूपाचल शीष पर, स्वर्णमयी जिन-चैत्यालय सुप्रसिद्ध हैं ॥
श्री जिनचैत्यालय मैं पूजूँ भाव से, ध्वजा चढ़ाऊँ गाऊँ मंगलगान है ॥ ९ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थसीतासरितादक्षिणतटे वत्सादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
म्लेच्छ पांच अरु आर्यखंड है एकयुत, देश सुवत्सा गिरि वैताढ्य महान है।
श्री जिनचैत्यालय मैं पूजूँ भाव से, ध्वजा चढाऊँ गाऊँ मंगलगान है ॥१० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरु सम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतासरितदक्षिणतटे सुवत्सादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
देश महावत्सा शोभाशाली महा, तीर्थंकर प्रभुओं का जन्मस्थान है।
श्री जिनचैत्यालय मैं पूजूँ भाव से, ध्वजा चढाऊँ गाऊँ, मंगलगान है ॥११ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटे महावत्सादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
देश वत्सकावती महान प्रसिद्ध है, निज स्वभाव जो भजता होता सिद्ध है ॥
श्री जिनचैत्यालय मैं पूजूँ भाव से, ध्वजा चढाऊँ गाऊँ मंगलगान है ॥१२ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटे वत्सकावती देशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
रम्यादेश यहाँ मुनिराज विराजते, मोह शत्रु को अपने हाथों क्षय करें।
श्री जिनचैत्यालय मैं पूजूँ भाव से, ध्वजा चढाऊँ गाऊँ मंगलगान है ॥१३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटे रम्यादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
देश सुरम्या होते हैं तीर्थेश जी, लोकालोक जानते हैं सर्वज्ञ जिन ।
श्री जिनचैत्यालय मैं पूजूँ भाव से, ध्वजा चढाऊँ गाऊँ मंगलगान है ॥१४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटेतासुरम्यादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
रमणीया है देश रजत विजयार्ध युत, दिव्यध्वनि गुन्जित होती जिनराज की ।
श्री जिनचैत्यालय मैं पूजूँ भाव से, ध्वजा चढाऊँ गाऊँ मंगलगान है ॥१५ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटेरमणी रयादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
देश मंगलावती साधु परमेष्ठी, निज स्वभाव साधन से पाते मोक्षपद ।
श्री जिनचैत्यालय मैं पूजूँ भाव से, ध्वजा चढाऊँ गाऊँ मंगलगान है ॥१६ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटे मंगलावतीदेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्योअर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
छंद - सार / जोगीरासा
अपरविदेह नदी सीतोदा के दक्षिण तट जाओ ।
भद्रशाल वेदिका मनोहर देश आठ लख आओ ॥
पचपन-पचपन उभय दिशा में विद्याधर नगरी है।
नवकूटों से युक्त आठ सुन्दर विजयार्ध सुगिरि है ॥
दोहा
रजताचल के शीश पर, पद्मादेश मझार ।
श्री जिनवर पूजन करूँ, पाऊँ पद अविकार ॥ १७ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानदीदक्षिणतटे पद्मादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
रजताचल के शिखर पर, देश सुपद्मा मध्य ।
पूजूँ जिन सिद्धायतन, त्यागूँ सब सावद्य ॥१८ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानदीदक्षिणतटे सुपद्मादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
देश महापद्मा बड़ा, आर्यखंड है एक ।
रूपाचल सिद्धायतन, पूजूँ धार विवेक ॥१९ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानदीदक्षिणतटे महापद्मादेश-
मध्यविजयार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्योअर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
देश पद्मकावती में, रजताचल जिनधाम ।
बार-बार वन्दन करूँ, पाऊँ निज ध्रुवधाम ॥ २० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानदीदक्षिणतटे पद्मकावतीदेश-
मध्यविजयार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
रजताचल वैताढ्य है, शंखादेश विचित्र ।
अपने सम्यग् ज्ञान में, देखूँ निज के चित्र ॥ २१ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानदीदक्षिणतटे शंखादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
रजतमयी विजयार्ध है, नलिना देश महान ।
साम्यभाव चारित्र से, पाऊँ पद निर्वाण ॥२२ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानदीदक्षिणतटेनलिना-
देशमध्यपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
तीर्थंकर की जन्म भू कुमदा देशप्रसिद्ध ।
रत्नत्रय परिपूर्ण कर, हो जाऊँ मैं सिद्ध ॥ २३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानदीदक्षिणतटे कुमदादेश-
मध्यविजयार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
रूपाचल मन मोहना, सरित देश के मध्य ।
निज स्वरूप की प्राप्ति हित, नित्य चढ़ाऊँ अर्घ्य ॥२४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानदीदक्षिणतटेसरितदेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
सोरठा
वेदी देवारण्य, सीतोदा उत्तर दिशा ।
गिरि विजयार्ध प्रसिद्ध, आठ देश में आठ हैं ॥
जिनगृह पूजूँ एक, वप्रा के विजयार्ध का ।
ज्ञान सुधारस मेह, सतत निरंतर प्राप्त हो ॥ २५ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे वप्रादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
रजताचल अभिराम, देश सुवप्रा जानिये ।
पूजूँ मैं जिनधाम, अष्ट मूलगुण धारकर ॥ २६ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे सुवप्रादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
रूपाचल के शीश, देश महावप्रा निकट ।
वन्दूँ श्री जगदीश, पाँचों अणुव्रत पालकर ॥ २७ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे महावप्रादेशमध्य
विजयार्धपर्वत स्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
गिरि वैताढ्य मनोज्ञ, देश वप्रकावती में।
प्रतिमा पालन योग्य, जिनपूजन करके बनूँ ॥२८ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे वप्रकावतीदेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
रूपाचल विख्यात, गंधादेश महान में ।
प्रतिमाएँ निर्दोष पालूँ तो ऐलक बनूँ ॥ २९ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे गंधादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
रजताचल है मध्य, देश सुगंधा कर्म भू ।
मुनिपद धारण हेतु, तीन चौकडी क्षय करूँ ॥ ३० ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे सुगंधादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
रूपाचल जिनगेह, देश गंधिला पूज लूँ ।
करूँ उग्र पुरुषार्थ, क्षायिक श्रेणी पर चढूँ ॥३१ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे गंधिलादेशमध्य
विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
है विजयार्ध अचल, गंधमालिनी देश में ।
चार घातिया नाश, पाऊँ केवल ज्ञान निधि ॥३२ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे गंधमालिनीदेश-
मध्यविजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
छंद - ताटंक
गिरि हिमवान सु पद्मद्रह है, गंगा सिन्धु नदी उद्गम ।
गंगा पूर्व, सिन्धु पश्चिम की ओर सदा बहती अनुपम ॥
गिरि विजयार्ध गुफा से आकर लवण उदधि में मिलती है ।
चौदह-चौदह सहस्र नदी परिवार संग ले चलती है ॥
मेरु सुदर्शन भरतक्षेत्र में नगरी मुख्य अयोध्या जान ।
रजताचल के श्री जिन चैत्यालय को मैं पूजूँ धर ध्यान ॥३३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि भरतक्षेत्रस्थ विजयार्धपर्वतस्थित-सिद्धकूट
जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
शिखरी महापुण्डरीक द्रह रक्ता रक्तोदा अनुपम ।
रक्ता पूर्व दिशा, रक्तोदा पश्चिम बहती सुन्दरतम ॥
गिरि विजयार्ध गुफा से बहकर लवण उदधि में जाती है।
चौदह-चौदह सहस्त्र नदी परिवार संग में लाती है ॥
मेरु सुदर्शन उत्तर ऐरावत में नगर अयोध्या जान ।
गिरि विजयार्ध श्री जिनचैत्यालय को मैं पूजूँ धर ध्यान ॥३४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि ऐरावतक्षेत्रस्थ विजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालय
जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पूर्णार्घ्य
सोरठा
मेरु सुदर्शन श्रेष्ठ कर्मभूमि चौंतीस हैं।
इतने ही विजयार्ध, स्वर्णमयी जिन भवनयुत ॥
• चौंतीसों जिन गेह, बन्दूँ मन-वच और तन ।
पूर्ण अर्घ्य ले नाथ, पूजूँ सब सिद्धायतन ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि चतुस्त्रिशतविजयार्धपर्वतस्थित सिद्धकूट
जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ६
जयमाला
दोहा
दृढ़ सम्यक् चारित्र की, महिमा अपरंपार ।
इसे धार प्राणी हुए, भव समुद्र से पार ॥
वीरछंद
निश्चय सम्यग्दर्शन पूर्वक ही होता है सम्यग्ज्ञान।
सम्यग्ज्ञान पूर्वक होता है सम्यक्चारित्र महान ।
अष्ट अंग युत सम्यग्दर्शन तथा अष्ट विध सम्यग्ज्ञान ॥
तेरह विध सम्यक्चारित्र परम पावन है श्रेष्ठ प्रधान ॥
अनंतानुबंधी जाते ही होता है सम्यक्त्व महान ।
अप्रत्याख्यानावरणी जाते ही एकदेश व्रत जान ॥
अहिंसादि पाँचों अणुव्रत से जाता है अविरति का भाव ।
सकलदेश व्रत होता है तो जाता है प्रमाद का भाव ॥
प्रत्याख्यानावरणी जाती होता तेरह विधि चारित्र ।
पंचमहाव्रत पंचसमिति त्रयगुप्ति पालता परम पवित्र ॥
षट् आवश्यक, द्वादशतप, पंचेन्द्रियजय, अरु पंचाचार ।
अट्ठाईस मूलगुण धारूँ चौ आराधन हैं सुखकार ॥
परम अहिंसा, परम सत्य व्रत, परम अचौर्य, परम ब्रह्मचर्य ।
अपरिग्रहयुत पंचमहाव्रत धारण करते जिन मुनिवर्य ॥
ईर्या, भाषा, समिति एषणा अरु आदाननिक्षेपण जान ।
प्रतिष्ठापना समिति पाँच का पालक करता मुक्ति प्रयाण ॥
मनोगुप्ति अरु वचनगुप्ति अरु कायगुप्ति त्रय से शोभित ।
तेरह विध चारित्र यही पालन करते निज में मोहित ॥
सामायिक चारित्र धारकर क्रमशः छेदोपस्थापन ।
फिर परिहारविशुद्धि आचरण पालूँगा मैं अति पावन ॥
फिर सूक्ष्मसांपराय प्राप्तकर मैं श्रेणी चढ़ जाऊँगा ।
यथाख्यात चारित्र धार कैवल्यसूर्य प्रगटाऊँगा ॥
यह सम्यक्चारित्र पूर्णकर मुक्ति भवन में जाता ।
सादि अनंतकाल तक चेतन निजानंद रस पाता है ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि पूर्वापरविदेहभरतैरावतस्थित चतुस्त्रिशतविजयार्धपर्वत-
स्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछंद
जम्बूद्वीप सुगिरि विजयार्ध जिनालय पूजे हर्षित हो ।
वृषभ चिन्ह की ध्वजा चढ़ाऊँ अंतर्मन से पुलकित हो ॥
इन्द्रध्वज पावन विधान की पूजन का उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो जिनगुण-संपति मिले जिनेश ॥
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
भजन
निरखो अंग-अंग जिनवर के, जिनसे झलके शान्ति अपार ॥ टेक ॥
चरण-कमल जिनवर कहें, घूमा सब संसार ।
पर क्षण-भंगुर जगत में, निज आत्म-तत्त्व ही सार ।
यातें पद्मासन विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार ॥ १ ॥
हस्त-युगल जिनवर कहें, पर का करता होय ।
ऐसी मिथ्या बुद्धि से, भ्रमण-चतुर्गति होय ।
याते पद्मासन विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार ॥ २ ॥
लोचन-द्वय जिनवर कहें, देखा सब संसार ।
पर दुःखमय गति-चार में, ध्रुव-आत्मतत्त्व ही सार ॥ ३ ॥
अन्तर्मुख - मुद्रा अहो, आत्मतत्व दरसाय ।
जिन-दर्शन कर निज दर्शन पा, सत-गुरु-वचन सुहाय ॥
यातें अन्तर्दृष्टि विराजें जिनवर, झलके शान्ति अपार ॥ ४ ॥
पूजन क्रमांक-७
सुदर्शनमेरु संबंधी षट कुलाचल जिनालय पूजन
स्थापना
छंद - गीतिका
षटकुलाचल गिरि सुदर्शन के महान सुभव्य हैं।
महा महिमामय जिनालय श्रृंग पर दृष्टव्य है ॥
हिमवन महाहिमवान निषध, सुरुक्मि, शिखरी, नील है।
उत्तम क्षमा के भाव से पूजन करूँ गुणशील हैं ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धिषटकुलाचलस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनप्रतिमासमूह
अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव
वषट् । (पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
छंद - गोपी / रेखता
निजातमसरिता का जल आज, लिया गुणश्रेष्ठ क्षमा जिनराज ।
जिनालय षटकुलाचल जय, प्रभो मिथ्या मल होवे क्षय ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
क्षमा चन्दन की अनुपम गंध, करे प्रभु क्रोध कषाय सुमन्द ।
जिनालय षटकुलाचल जय, प्रभो अविरति पर पाऊँ जय ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
अखण्डित क्षमा भावतन्दुल, लहूँ अविनाशी पद निर्मल ।
जिनालय षटकुलाचल, जय, प्रमादों पर मैं पाऊँ जय ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अक्षयपदा
प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
निजातम तरु के क्षमा सुमन, हरें प्रभु ! मन्मथ की दुर्गन्ध ।
जिनालय षटकुलाचल जय, कषायों को मैं करूँ विजय ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
क्षमा भाव रसमय नैवेद्य, हरें प्रभु ! क्षुधा व्याधि का खेद ।
जिनालय षटकुलाचल जय, करूँ मैं केवलज्ञान उदय ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो क्षुधारोग
विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तम क्षमा भाव की ज्योत, करे सम्यक्-चारित्र उद्योत ।
जिनालय षटकुलाचल जय, दशा अर्हन्त हो शिवमय ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो मोहान्धकार-
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
ध्यान की अग्नि, क्रोध की धूप, लखूँ निज क्षमा-भाव चिद्रूप ।
जिनालय षटकुलाचल जय, सकल योगों पर पाऊँ जय ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिबिम्बेभ्यो
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
निजातम तरु का क्षमा सुफल, करे सम्यक्-चारित्र सफल ।
जिनालय षटकुलाचल जय, करूँ मैं प्राप्त सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो मोक्षफल
प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम क्षमा भाव का अर्घ्य, चढ़ाकर पाऊँ पद अन्-अर्घ्य ।
जिनालय षटकुलाचल जय, मोक्षपद लूँ क्रम-क्रम निर्भय ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपद
प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्ध्यावलि
चौपाई
भव्य षटकुलाचल मंदिर जय, भविजन को दायक रत्नत्रय ।
छहसौ अड़तालीस बिम्ब जय, जिनवरसम जिन-प्रतिमाजय जय ॥
दोहा
स्वर्णमयी हिमवान पर, ग्यारह कूट महान ।
एक कूट पर जिनभवन, मानों मुक्ति विहान ॥१ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-हिमवानपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ७
श्रेष्ठ महाहिमवान है, रजतमयी सुविशाल ।
वसुकूटों में एक पर, जिनगृह महा विशाल ॥२ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-महाहिमवानपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिन-
बिम्बेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
तप्त स्वर्णसम वर्ण है, निषधाचल छविमान ।
नवकूटों में एक पर, श्री जिनभवन प्रधान ॥३ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-निषधपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
मणि वैडूर्य प्रसिद्ध सम, नील कुलाचल जान ।
नवकूटों में एक है, जिन-चैत्यालय वान ॥४ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-नीलपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
रुक्मिशिखर रजताचलं, आठ कूट सुखकार ।
एक कूट पर जिनभवन, गरिमामयी अपार ॥५ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-रुक्मिपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
ग्यारह कूट सुयुक्त है, शिखरी स्वर्णिम जान ।
एक कूट पर जिनभवन, वन्दूँ नित्य महान ॥६ ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-शिखरीपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पूर्णार्ध्य
सोरठा
पृथ्वीकाय कमल, अचलों पर षट महाद्रह ।
श्री ह्री धृति कीर्ति, बुद्धि लक्ष्मी के भवन ॥
नित्य झुकाऊँ शीश, अकृत्रिम जिनभवन को ।
बिम्ब रत्नमय सर्व, पूर्ण-अर्घ्य अर्पण करूँ ॥
देते हैं सन्देश, आत्मा में है अनन्त बल ।
धरूँ दिगवंर वेश, पाऊँ अनुपम ध्रुव अचल ॥
छंद - सरसी
दस योजन गहरा पद्मद्रह इसकी छटा पृथक् ।
एक सहस योजनलंबा है चौड़ा पाँच शतक ॥
पृथ्वीकायिक कमल एक योजन का गोलाकार ।
आगे द्वय द्रह दूने-दूने कमल सहित विस्तार ॥
शेष तीन द्रह का इनके सम ही जानों विस्तार ।
शुद्ध आत्मा अति विस्तृत है गुणसमुद्र भंडार ॥
छंद - ताटंक
भरत हैमवत हरि विदेह रम्यक हैरण्य व ऐरावत ।
सातों क्षेत्र विभाजित करते यही षटकुलाचल पर्वत ॥
कर्म-भूमि अरू भोग-भूमियाँ जानो आगम के अनुसार ।
धर्म-भूमि निज आत्मद्रव्य है इसका ही लो अब आधार ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपद-
प्राप्तये पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
दोहा
क्षमा धर्म धारी प्रभो, किया क्रोधरिपु नाश ।
बार-बार वन्दन करूँ, क्षमाभाव की आश ॥
छंद - ताटंक
उत्तम क्षमा धर्म है सुख का सागर 'तीन लोक में सार ।
जन्म-मरण दुख का अभाव कर शीघ्र नाश करता संसार ॥
क्रोध कषाय विनाशक दुर्गति नाशक मुनियों द्वारा पूज्य ।
व्रत संयम को सफल बनाता सुगति प्रदाता है अतिपूज्य ॥
पृथ्वीकायिक, जलकायिक अरु अग्निकाय, वायुकायक ।
तथा वनस्पतिकायिक जीवों के प्रति करुणा सुख-दायक ॥
दो इन्द्रिय, त्रय, चऊ, पंचेन्द्रिय जीव असंज्ञी दया करूँ ।
नारक मानुष देव चतुर्विध त्रसथावर उर दया धरूँ ॥
पूजन क्रमांक ७
सब जीवों को निजसम समझें सब पर क्षमाभाव राखूँ ।
सब जीवों से क्षमा कराऊँ क्षमाभाव रसफल चाखूँ ॥
जहाँ क्षमा है वहीं धर्म है स्वपर दया का मूल महान ।
जय-जय उत्तम क्षमा धर्म की जो है जग में श्रेष्ठ प्रधान ॥
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरुसम्बन्धि-षटकुलाचलस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछन्द
दिव्य षटकुलाचल के जिनगृह हमने पूजे हर्षित हो ।
कमल चिन्ह की ध्वजा चढाऊँ अन्तर्मन से पुलकित हो ॥
इन्द्रध्वज पावन विधान की पूजन का उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो जिनगुण सम्पति मिले जिनेश ॥
इत्याशीर्वादः
भजन
मेरे मन मन्दिर में आन, पधारो महावीर भगवान ॥ टेक ॥
भगवान तुम आनन्द सरोवर, रूप तुम्हारा महा मनोहर ।
निशिदिन रहे तुम्हारा ध्यान, पधारो महावीर भगवान ॥ १ ॥
सुर किन्नर गणधर गुण गाते, योगी तेरा ध्यान लगाते ।
गाते सब तेरा यश गान, पधारो महावीर भगवान ॥ २ ॥
जो तेरी शरणागत आया, तूने उसको पार लगाया ।
तुम हो दया निधि भगवान, पधारो महावीर भगवान ॥ ३ ॥
भगत जनों के कष्ट निवारें, आप तरे हमको भी तारें ।
कीजे हमको आप समान, पधारो महावीर भगवान ॥ ४ ॥
आये हैं हम शरण तिहारी, पूजा हो स्वीकार हमारी ।
तुम हो करुणा दयानिधान, पधारो महावीर भगवान ॥ ५ ॥
रोम-रोम पर तेज तुम्हारा, भू-मण्डल तुमसे उजियारा ।
रवि-शशि तुम से ज्योर्तिमान, पधारो महावीर भगवान ॥ ६ ॥
पूजन क्रमांक-८
धातकीखंड द्वीपस्थ विजयमेरु स्थित सोलह जिनालय पूजन
स्थापना
दोहा
विजय मेरु संबंधि हैं, चैत्यालय छविमान ।
सर्व अठत्तर जानिये, मंगलमयी महान ॥
वीरछंद
एक लाख योजन का जम्बूद्वीप लवण समुद्र दो लाख ।
इससे घिरा हुआ है चारों ओर सुरम्य जिनालय साख ॥
चार लाख योजन का तत्पश्चात धातकी खंड महान ।
आठ लाख योजन का कालोदधि घेरे है इसे प्रधान ॥
पूर्व दिशा में विजयमेरु है सहस्त्र चुरासी योजनवान ।
चारों वन में चार-चार जिन-चैत्यालय शाश्वत भगवान ॥
इन्द्रादिक सुर देव-देवियाँ जाकर गाते प्रभु गुणगान ।
विनयभाव से पूजन करके धरूँ पारिणामिक का ध्यान ॥
ॐ ह्रीं श्री पूर्वधातकीखण्डद्वीपे विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र अवतर
अवतर संवौषट् । (इत्याह्वाननम्) ।
ॐ ह्रीं श्री पूर्वधातकीखण्डद्वीपे विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र तिष्ठ
तिष्ठ ठः ठः । (इति स्थापनम्) ।
ॐ ह्रीं श्री पूर्वधातकीखण्डद्वीपे विजयमेरौषोडशजिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र मम
सन्निहितो भव भव वषट् (इति सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
छंद- पदपादाकुलक (त्रोटक) चाल - जय केवलभानु कला सदनं
मैं विनय भाव का नीर भरूँ, मद पिता-भूप-मल नाश करूँ ।
उत्तम मार्दव पाऊँ स्वामी, यह विनय सुनो अंतर्यामी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं…
यह विनयभाव चन्दन शीतल, माता-कुल-मद नाशे निर्मल ।
उत्तम मार्दव पाऊँ स्वामी, यह विनय सुनो अंतर्यामी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदन…
पूजन क्रमांक ८
मैं विनयभाव से पुंज धरूँ, मद-रूप त्याग निजरूप वरूँ ।
उत्तम मार्दव पाऊँ स्वामी, यह विनय सुनो अंतर्यामी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अक्षय पदप्राप्तये अक्षतं…
मैं विनय सुमन चुन-चुन लाऊँ, दुर्गन्ध ज्ञान-मद विनशाऊँ ।
उत्तम मार्दव पाऊँ स्वामी, यह विनय सुनो अंतर्यामी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो कामबाणविनाशनाय पुष्…
यह विनयभाव रससिक्त चरु, प्रभुवर मैं धन-मद व्याधि हरूँ ।
उत्तम मार्दव पाऊँ स्वामी, यह विनय सुनो अंतर्यामी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं…
उरज्ञान-विनय की ज्योति धरूँ, हे प्रभु बल-मद-तमत्वरितहरूँ ।
उत्तम मार्दव पाऊँ स्वामी, यह विनय सुनो अंतर्यामी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं …
तप-विनय अग्निप्रभु प्रगटकरूँ, तप-मद अरिकाष्ठ सुहोम करूँ ।
उत्तम मार्दव पाऊँ स्वामी, यह विनय सुनो अंतर्यामी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं…
मैं विनय वृक्ष के फल लाऊँ, प्रभुता-मद नाश सुफल पाऊँ ।
उत्तम मार्दव पाऊँ स्वामी, यह विनय सुनो अंतर्यामी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं…
अष्टांग विनय का अर्घ्य धरूँ, लूँ पद अनर्घ्य दीनता हरूँ ।
उत्तम मार्दव पाऊँ स्वामी, यह विनय सुनो अंतर्यामी ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य…
अर्ध्यावलि
छंद-नागराज (चामर)
विजयमेरु भद्रशाल वन महान जानिये ।
भूमि पर चार दिशि चार भवन मानिये ॥
अष्ट द्रव्य अर्घ्य बना विनय से चढ़ाइये ।
मृदुल भावमय स्वभाव-भाव नित्य ध्याइये ॥
पूर्व दिशा चैत्यालय एक, ध्वजा चढ़ाऊँ मैं सविवेक ।
निश्चय-नय ही है भूतार्थ, नय व्यवहार नहीं सत्यार्थ ॥१ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ भद्रशालवनस्थित-पूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
दक्षिण दिशि जिन-भवन महान, ध्वजा चढ़ाऊँ धर निज ध्यान ।
दो प्रकार है नय व्यवहार, असद्भूत सद्भूत विचार ॥२ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ भद्रशालवनस्थित-दक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
पश्चिम दिशा जिनालय सिद्ध, ध्वजा चढ़ाऊँ ध्याऊँ सिद्ध ।
है व्यवहार पूर्णतः हेय, मुक्तिमार्ग में नहीं उपेय ॥३ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ भद्रशालवनस्थित पश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
सिद्धकूट उत्तर दिशि जान, ध्वजा चढ़ाय बनूँ भगवान ।
निश्चय उपादेय विख्यात, है परमार्थभूत प्रख्यात ॥ ४ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ भद्रशालवनस्थित उत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
छंद - ताटंक
भद्रशाल के ऊपर पाँचशतक योजन पर नंदनवन ।
चार दिशा में चार जिनालय चलती यहाँ स्वभाव पवन ॥
जिनवर की वाणी को सुनकर मिट जाता है चिर-विभ्रम ।
स्याद्वाद गंगा में सप्तनयों की लहरें अति उत्तम ॥
चौपाई
पूरबदिशि जिन-भवन सुजानो, निज-स्वभाव ही परम प्रमानो ।
नैगमनय सापेक्ष बखाना, अनिष्पन्न को निष्पन्न माना ॥५ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ नन्दनवनस्थितपर्वृदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
दक्षिण दिशा जिनालय मनहर, मानो सम्यग्दर्शन का घर ।
संग्रहनय करता सब संग्रह, वन्दूँ सर्व जिनेन्द्र सुनिष्पृह ॥६ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ नन्दनवनस्थित दक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
पश्चिम दिशि का जिन-चैत्यालय, वीतराग जिन मुद्रा-आलय ।
विधिपूर्वक व्यवहार कथन वर, वन्दूँ प्रतिपादक सब जिनवर ॥७ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ नन्दनवनस्थित पश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं…
पूजन क्रमांक ८
उत्तर दिशि जिन-भवन सुहाना । आत्मसिद्धि फल सबने जाना ।
वर्तमानग्राही ऋजूसूत्रा। वन्दूँ जिनवर तज उत्सूत्रा ॥८ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ नन्दनवनस्थित उत्तरदिक् जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य
वीरछंद
साढे पचपन सहस्त्र योजन ऊपर वन सौमनस महान ।
पूरब दक्षिण पश्चिम उत्तर जिनगृह हैं स्वर्णिम छविमान ॥
भाव सहित मैं श्री जिनवर को वन्दन करने जाऊँगा ।
भव्य अकृत्रिम चैत्यालय पर मंगल ध्वजा चढ़ाऊँगा ॥
छंद - हरिगीतिका
सौमनस वन के जिनालय पूर्व को पूजूँ सदा ।
भक्तिभाव अपूर्व उरं धर गीत गाऊँ सर्वदा ॥
शब्दनय का ज्ञान कर निर्दोष हो मेरा कथन ।
भेद और अभेद को जानूँ धरूँ उर जिन वचन ॥९ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ सौमनसवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
दिशा दक्षिण जिनभवन की सुछवि नित निरखा करूँ ।
कौन निज है, कौन पर है प्रतिसमय परखा करूँ ॥
समभिरूद्ध सुनय पिछानूँ भेदरूप ग्रहण करूँ।
अर्थ नाना उलंघन कर एक अर्थ ग्रहण करूँ ॥१० ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ सौमनवसवनस्थितदक्षिणदिक् जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
दिशा पश्चिम जिनालय में एक-शत-वसु बिम्ब जिन ।
भावना शुद्धात्म की भा कर्म नाशें एक दिन ॥
सुनय एवं भूतनय है, मात्र भावों का ग्रहण।
जिस क्रियामय परिणमित हो अर्थ, उसका ही वरण ॥ ११ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ सौमनसवनस्थितपश्चिमदिं जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य
दिशा उत्तर चैत्यालय को करूँ शत-शत प्रणाम ।
निजालंबन भाव द्वारा प्राप्त करलूँ मुक्ति धाम ॥
भेद हैं श्रुतज्ञान के नय, इन्हें सम्यक् जानिये ।
एक निश्चयभूत शुद्ध पदार्थ निज पहचानिये ॥१२ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ सौमनसवनस्थित उत्तरदिक् जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
वीरछंद
अट्ठाईस सहस योजन ऊपर पांडुकवन महाविशाल ।
तीर्थंकर के जन्मोत्सव से गर्वित इसका ऊँचा भाल ॥
भरतक्षेत्र के तीर्थंकर कापांडुक-शिला सदाअभिषेक ।
ऐरावत के तीर्थंकर का रक्तकंबला पर अभिषेक ॥
पूर्व विदेह तीर्थंकर का रक्त-शिला होता अभिषेक ।
अपर विदेह तीर्थंकर का पांडुकंबला हो अभिषेक ॥
पांडुक वन की विदिशाओं में चारों शिला सुशोभित हैं।
क्षीरोदधि जल से होता अभिषेकइन्द्र-सुर मोहित हैं ॥
छंद - हरिगीतिका
पूर्वदिशि में शिला पांडुक निकट ही जिनभवन है।
दे रहा संदेश जग को आत्मा सुख-सदन है ॥
चार हैं निक्षेप इनका ज्ञान करना चाहिए ।
नाम जो भी रखा हो निरपेक्ष-गुण पहचानिये ॥१३ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ पाण्डुकवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
दिशा दक्षिण जिनालय के गीत जग में गूँजते ।
इन्द्र सुर नर साधु विद्याधर सदा ही पूजते ॥
धातु या पाषाण आदिक में हुई जो कल्पना ।
तद्-अतद् आकार जो निक्षेप वह स्थापना ॥१४ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ पाण्डुकवनस्थित दक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
दिशा पश्चिम जिनालय की ध्वजाएँ मन मोहती ।
स्वर्णकलशों की छटायें उच्चनभ में सोहती ॥
पर्याय भावी भूत को कर मुख्य कहना वर्तमान ।
युवराजको भी नृपतिकहना द्रव्य यह निक्षेप जान ॥१५ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ पाण्डुकवनस्थित पश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य …
दिशा उत्तर चैत्यालय अकृत्रिम शोभायमान ।
प्राण चारों से रहित यह आत्मा चैतन्यप्राण ॥
द्रव्य की पर्याय जो हो वर्तमान वही कहे।
ध्याउँ मैं निज भाव चेतन जो सदा मुझमें रहे ॥१६ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ पाण्डुकवनस्थित उत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अर्घ्य…
पूर्णार्घ्य
छन्द - हरिगीतिका
वस्तु का एकाँश जाने नय कहाता है सही ।
नाम द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिक है सही ॥
मुख्यता जो द्रव्य को कहता विषय द्रव्यार्थिक ।
पर्याय को जो विषय करता वही पर्यायार्थिक ॥
सर्वदेशों को ग्रहण करता प्रमाण सुजान के ।
प्रत्यक्ष और परोक्ष जानो 'भेद भव्य प्रमाण के ॥
विजय सुरगिरि जिनालय सोलह सदा वन्दन करूँ ।
पूर्ण अर्घ्य समर्पयामि सुनय प्रमाण हृदय धरूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
दोहा
मार्दव पति जिनराज को, वन्दन करूँ त्रिकाल ।
जागृत मार्दव भाव कर, पाऊँ पद सुविशाल ॥
छन्द - ताटंक
उत्तम मार्दव धर्म ज्ञानमय वसु मद रहित परम सुखकार ।
मानकषाय नष्ट करता है विनय गुणों का है भण्डार ॥
विनय बिना तत्त्वों का हो सकता न कभी सम्यक्श्रद्धान ।
दर्शन ज्ञान चरित्र विनय तप बिना न होता सम्यग्ज्ञान ॥
पंच परम परमेष्ठी चैत्यालय श्रीजिन चैत्य तथा जिनधर्म ।
जिनवाणी को विनय सहित वन्दूँ हो जाऊँ मैं निष्कर्म ॥
ऊर्ध मध्य अरु अधोलोक के कृत्रिम अकृत्रिम जिनबिम्ब ।
सिद्धक्षेत्र सब विनय पूर्वक वन्दूँ देखूँ निज प्रतिबिम्ब ॥
देव-शास्त्र-गुरु विनयभाव से नमन करूँ हो मार्दव युक्त ।
सिद्धस्वपद की प्राप्ति करूँ मैं परभावों से होकर मुक्त ॥
जहाँ मार्दव वहीं धर्म है वहीं मोक्ष नगरी का द्वार ।
उत्तम मार्दव धर्म हमारा विनय भाव की जय-जयकार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ षोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछन्द
विजयमेरु के सोलह जिनगृह हमने पूजे हर्षित हो ।
मालाचिन्ह विभूषित ध्वजा चढ़ाऊँ स्वामी पुलकित हो ॥
इन्द्रध्वज पावन विधान की पूजन का उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो जिनगुण सम्पति मिले जिनेश ॥
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
भजन
ऊँचे ऊँचे शिखरों वाला रे, यह तीरथ हमारा ।
तीरथ हमारा हमें लागे प्यारा ॥टेक॥
श्री जिनवर से भेंट करावें ।
जग को मुक्ति मार्ग दिखावें ॥
मोह का नाश करावे रे यह तीरथ हमारा ॥१ ॥
शुद्धातम से प्रीति लगावे ।
जड़-चेतन को भिन्न बतावे ॥
भेद-विज्ञान करावे रे यह तीरथ हमारा ॥२ ॥
पूजन क्रमांक-९
विजयमेरु संबंधी चार गजदंत जिनालय पूजन
स्थापना
छंद - सरसी
खंड धातकी दिशा पूर्व में विजयमेरु श्रीमंत ।
इससे संबंधित गरिमामय चार श्रेष्ठ गजदंत ॥
शाश्वत हैं जिनगेह अकृत्रिम अनुपम शोभावंत ।
एक-एक में एक-शतक-वसु प्रतिमाएँ अरहंत ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिन
प्रतिमासमूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो
भव भव वषट् । (पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।)
छंद - त्रोटक चाल - जय केवलाभानु कला सदनं
उत्तम आर्जव जल धार करूँ, वक्रता मैल परिहार करूँ ।
शुद्धात्मतत्व का ध्यान करूँ, गजदन्तों पर जयगान करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्पण है सरल भाव चन्दन, करता स्वभाव का अभिनन्दन ।
शुद्धात्मतत्व का ध्यान करूँ, गजदन्तों पर जयगान करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
मैं सरल भाव अक्षत लाया, अपना अक्षयपद अपनाया ।
शुद्धात्मतत्व का ध्यान करूँ, गजदन्तों पर जयगान करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
मैं सरल सुमन प्रभु चरण धरूँ, माया कुशील का नाश करूँ ।
शुद्धात्मतत्व का ध्यान करूँ, गजदन्तों पर जयगान करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
मैं सरलभाव चरु भेंट करूँ, माया उदराग्नि विनाश करूँ ।
शुद्धात्मतत्व का ध्यान करूँ, गजदन्तों पर जयगान करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम आर्जव की ज्योति जले, माया-कषाय-तम त्वरित घुले ।
शुद्धात्मतत्व का ध्यान करूँ, गजदन्तों पर जयगान करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
ध्रुवधाम-ध्यानमय यज्ञ करूँ, अब कपट काष्ठ को होम करूँ ।
शुद्धात्मतत्व का ध्यान करूँ, गजदन्तों पर जयगान करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
यह धर्म-वृक्ष का आर्जव-फल, निश्चित ही पाऊँगा शिवफल ।
शुद्धात्मतत्व का ध्यान करूँ, गजदन्तों पर जयगान करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
यह आर्जव अर्घ्य सरलतम है, पदवी अनर्घ्य सर्वोत्तम है।
शुद्धात्मतत्व का ध्यान करूँ, गजदन्तों पर जयगान करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित सिद्धक्टजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्ध्यावलि
वीरछंद
विजयमेरु आग्नेय दिशा में रजत सौमनस है गजदंत ।
सप्तकूट में एक कूट पर जिन-चैत्यालय महिमावंत ॥१ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरो:आग्नेयविदिशि सौमनसगजदन्तपर्वतस्थित- सिद्धकूटजिनालय
जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ९
विजयमेरु नैऋत्य दिशा में विद्युत्प्रभ सुन्दर गजदंत ।
स्वर्णिम नव कूटों में इक पर जिन-चैत्यालय गरिमावंत ॥२ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरो:नैऋत्यविदिशि विद्युत्प्रभगजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूट
जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
विजयमेरु वायव्य कोण में गंधमादनाचल गजदंत ।
स्वर्णिम सप्त कूट में इस पर चैत्यालय है श्री अरहंत ॥३ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरो:वायव्यविदिशि गन्धमादनाचलगजदन्तपर्वतस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
विजयमेरु ईशान कोण में माल्यवान अनुपम गजदंत ।
मणि वैडूर्यमयी नव कूटों में इक पर जिनगृह भगवन्त ॥४ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरौ:ईशानविदिशि माल्यवानगजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूट
जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पूर्णार्ध्य
छंद - ताटंक
रजत सौमनस स्वर्णिम विद्युत्प्रभ अरु गंधमादनाचल ।
माल्यवान गजदंत चार हैं इन्द्रादिक वंदित सुविमल ॥
चार शतक अरु अड़तालीस जिनेन्द्र-बिम्ब से हैं संयुक्त ।
जिन-दर्शन से निज-दर्शन कर होऊँ निज वैभव से युक्त ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरोःचतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
दोहा
परम सरलता धार कर, आप हुए जिनराज ।
आर्जव गुण धारण करूँ, पाऊँ निजपद-राज ॥
छन्द - ताटंक
उत्तम आर्जव धर्म कुटिलता से विरहित ऋजुता से पूर्ण ।
निज आतम का परम मित्र है, करता है माया का चूर्ण ॥
लेशमात्र भी मायाचारी कुगति प्रदायक अति दुखकार ।
सरल भाव चेतन गुण धारी टंकोत्कीर्ण महा- सुखकार ॥
छ्यालीस गुण युत अरिहन्त, सिद्धशिलापति सिद्ध महान ।
आचार्योपाध्याय, साधु सब परमेष्ठी ऋजुता की खान ॥
जिनवाणी जिनधर्म सिद्ध भू अतिशय क्षेत्र महान प्रसिद्ध ।
ऋजुतापूर्वक नमन करूँ मैं शुभभावों से होकर विद्य ॥
कृतिम अकृत्रिम चैत्यालय, जिनचैत्य सरलता से ध्याऊँ।
सकल पूज्य स्थान नमन कर निश्छलभाव हृदय लाऊँ ॥
शिवमय शाश्वत मोक्ष प्रदाता मंगलमय अनमोल परम ।
उत्तम आर्जव धर्म आत्म का अभयरूप निश्चल अनुपम ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरोः चतुर्गजदन्तपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछन्द
विजयमेरुयुत गजदन्तों के जिनगृह पूजे हर्षित हो ।
सिंह चिन्ह की ध्वजा चढ़ाऊँ अन्तर्मन से पुलकित हो ॥
इन्द्रध्वज पावन विधान की पूजन का उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो जिनगुण सम्पति मिले जिनेश ॥
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
भजन
करलो इन्द्रध्वज का पाठ आई मंगल घड़ी।
आई मंगल घड़ी आई सुखद घड़ी ॥ टेक ॥
मध्यलोक के चारशतक अठ्ठावन जिनगृह पूजो ।
सभी अकृतिम शाश्वत जिन-चैत्यालय नित पूजो ॥१ ॥
विविध चिन्ह की ध्वजा चढ़ाओ गाओ मंगलचार ।
इस विधान का उत्तम फल है पुष्य अटूट अपार ॥२ ॥
इन्द्रों सम अतंरमन सज्जित करके लो वसु द्रव्य ।
निज भावों की ध्वजा चढ़ाओ हो जावोगे धन्य ॥ ३ ॥
पूजन क्रमांक-१०
विजयमेरु संबंधी धातकी एवं शाल्मलि वृक्ष जिनालय पूजन
स्थापना
छंद - ताटंक
खंडधातकी वृक्ष-धातकी से ही विश्व प्रसिद्ध हुआ ।
भेद-ज्ञान बिन कोई भी प्राणी न आज तक सिद्ध हुआ ॥
विजयमेरु ईशान और नैऋत्य कोण, मन मोहित है।
उत्तरकुरु में धातकि, देवकुरु में शाल्मलि शोभित है ॥
जलफलादि वसुद्रव्य सजाकर पूजन करूँ हृदय हर्षाय ।
निज चैतन्यराज दर्शन कर पाऊँ निज अनुभव सुखदाय ॥
दोनों तरु की दो सौ सोलह प्रतिमाओं को नमन करूँ ।
परम सत्य की प्राप्ति हेतु मिथ्यात्व मोह को वमन करूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बसमूह
अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव
वषट् सन्निधिकरणम् । (पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
चौपई
सत्य धर्म मय नीर चढ़ाय, हित-मित-प्रिय बोलूँ सुखदाय ।
धातकी-शाल्मलि वृक्ष निहार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
जन्म जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत्य धर्म चन्दन सुप्रताप, नाश करूँ भव-ज्वर का ताप ।
धातकि-शाल्मलि वृक्ष निहार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत्य धर्म अक्षत निजरूप, पाऊँ अक्षय पद शिवभूप ।
धातकी-शाल्मलि वृक्ष निहार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत्य धर्म के सुमन चढ़ाय, काम व्याधि परिपूर्ण नशाय ।
धातकि-शाल्मलि वृक्ष निहार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत्य धर्म नैवेद्य सजाय, पाऊँ महा तृप्ति सुखदाय ।
धातकि-शाल्मलि वृक्ष निहार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत्य धर्म के दीप उजार, ज्ञान ज्योति जगमग तमहार ।
धातकि शाल्मलि वृक्ष निहार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत्य धर्म की धूप चढ़ाय, अष्टकर्म अरि काष्ठ जलाय ।
धातकि-शाल्मलि वृक्ष निहार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत्य धर्म के फल शिव रूप, पाऊँ मोक्ष सुफल चिद्रूप ।
धातकि-शाल्मलि वृक्ष निहार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत्य धर्म के अर्घ्य बनाय, पद अनर्घ्य अविकल प्रगटाय ।
धातकि शाल्मलि वृक्ष निहार, जिनवर महिमा अपरम्पार ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित-जिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक १०
अर्ध्यावलि
दोहा
वृक्ष धातकी बिम्ब-जिन, एक शतक वसु दिव्य ।
ध्वजा चढाऊँ भाव से, जिन-मन्दिर पर भव्य ॥१ ॥
ॐ ह्रीं श्री पूर्वधातकीखण्डद्वीपस्थ विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीवृक्षस्थित-जिनालय
जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
श्री जिनगृह पूजूँ सदा, शाल्मलि वृक्षप्रसिद्ध ।
ध्वजा चढ़ाऊँ भाव से, पाऊँ स्व-पद् प्रसिद्ध ॥२ ॥
ॐ ह्रीं श्री पूर्वधातकीखण्डद्वीपस्थ-विजयमेरुसम्बन्धि-शाल्मलिवृक्षस्थित-जिनालय
जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पूर्णार्घ्य
चौपई
मेरु-विजय धातकि तरु जान । जिनगृह दिशि ईशान प्रधान ॥
शुद्ध भाव के अर्घ्य बनाय । आत्मसिद्धि का करूँ उपाय ॥
मेरु-विजय शाल्मलि तरु जान । हैं नैऋत्य दिशा भगवान ॥
समता भाव महान जगाय । पूजूँ चैत्यालय शिवदाय ॥
ॐ ह्रीं श्री पूर्वधातकीखण्डद्वीपस्थ-विजयमेरुसम्बन्धि-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित
जिनालयजिन्बिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
दोहा
परम सत्य का ध्यान धर, उत्तम सत्य प्रकाश ।
सत्पथ दरशाया प्रभो, पाया मुक्ति निवास ॥
चौपाई
उत्तम सत्य धर्म हितकारी, परमसत्य आश्रित सुखकारी।
वचन गुप्ति के धारी मुनिवर, मुक्ति सदन पा होते जिनवर ॥
सब धर्मों में यही प्रधाना, भव तम नाशक सूर्य समाना ।
सुगति प्रदायक मंगल दाता, भव सागर से भवि तिर जाता ॥
जनपद-सत्य हृदय में धारूँ, सम्यक्-सत्य सदा स्वीकारूँ ।
स्थापना-सत्य भी जानूँ, नाम सत्य निर्भय पहचानूँ ॥
रूप-सत्य से सबको निरखूँ, सत्य-अपेक्षा ही मैं परखूँ ।
यह व्यवहार-सत्य सुखकारी, संभावना-सत्य दुखहारी ॥
भाव-सत्य निज अन्तर लाऊँ, उपमा-सत्य जान हर्षाऊँ ।
क्रोध-अतिचार क्षमा से नाखूँ, लोभ अतिचार असत्य विनाशैं ॥
भय अतिचार पूर्ण निरवारूँ, हास्यातिचार न उर में धारूँ ।
जिन आज्ञा उल्लंघन त्यागूँ, यह अतिचार न उर में पालूँ ॥
सत्य धर्म युत अणुव्रत धारूँ, सत्य महाव्रत मैं स्वीकारूँ ।
उत्तम सत्य धर्म सुखकारी, त्रिभुवनपद दाता शिवकारी ॥
ॐ ह्रीं श्री पूर्वधातकीखण्डद्वीपस्थ विजयमेरुसम्बन्धी-धातकीशाल्मलिवृक्षद्वयस्थित
जिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछंद
खंड धातकी-शाल्मलि तरु गृह हमने पूजे हर्षित हो ।
अंशुक चिन्ह विभूषित ध्वजा चढ़ाऊँ स्वामी पुलकित हो ॥
इन्द्रध्वज पावन विधान की पूजन का उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगतिगमन हो जिनगुण-सम्पति मिले जिनेश ॥
पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
भजन
आयो आयो रे हमारो बड़ो भाग, कि हम आए पूजन को ।
पूजन को प्रभु दर्शन को, पावन प्रभु-पद पर्शन को ॥ टेक ॥
जिनवर की अर्न्तमुख मुद्रा आतम दर्श कराती ।
मोह महामल प्रक्षालन कर शुद्ध स्वरूप दिखाती ॥१ ॥
भव्य अकृत्रिम चैत्यालय की जग में शेभा भारी।
मंगल ध्वज ले सुरपति आए शोभा जिसकी न्यारी ॥२ ॥
अनेकान्तमय वस्तु समझ जिन शासन ध्वज लहरावें ।
स्याद्वाद शैली से प्रभुवर मुक्ति मार्ग समझावें ॥३ ॥
पूजन क्रमांक-११
विजयमेरु संबंधी षोडश वक्षार जिनालय पूजन
स्थापना
छन्द - मरहट्ठामाधवी
खंड-धातकी विजयमेरु वक्षार सु सोलह जानिये ।
पूरब और अपर विदेह में स्वर्णमयी पहचानिये ॥
तीनों काल वर्तता चौथा काल सदैव विदेह में।
सतरह शतक तथा अठ्ठाइस प्रतिमा सब जिनगेह में ॥
हे जिन ! आज पधारो प्रभुवर, मेरे निर्मल भाव में।
मेरे उर में सदा विराजो, रमूँ सदा निज भाव में ॥
प्रभु की पूजन रचूँ आज मैं स्याद्वाद-ध्वज हाथ ले ।
निजस्वभाव में लीन रहूँ नित शौचधर्म का साथ ले ॥
ॐ ह्रीं श्री पूर्वधातकीखंडद्वीपे विजयमेरुसम्बन्धि-पूर्वपश्चिमविदेहक्षेत्रस्थषोडश-
वक्षारपर्वतस्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बसमूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र
तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट । (पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
चौपाई
शौच धर्म जल शिव सुखकारी, मिथ्यादर्शन मल परिहारी ।
विजयमेरु वक्षार जिनालय, वन्दन कर पाऊँ सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
शौच धर्म चन्दन शिवदायी, भव-आताप तुरत नश जाई ।
विजय मेरु वक्षार जिनालय, वन्दन कर पाऊँ सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-षोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
शौच धर्म अक्षत शुचिरूपा, प्राप्त करूँ शुद्धात्म स्वरूपा ।
विजयमेरु वक्षार जिनालय, वन्दन कर पाऊँ सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
शौच धर्ममय पुष्प सुगंधी, काम व्यथा हो जाती ठंडी ।
विजयमेरु वक्षार जिनालय, वन्दन कर पाऊँ सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
शौच धर्म चरु दिव्य महाना, क्षुधा रोग नाशक गुणवाना ।
विजयमेरु वक्षार जिनालय, वन्दन कर पाऊँ सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-षोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
शौच धर्म के दीप संजोए क्षय अज्ञान मोह तम होवे ।
विजयमेरु वक्षार जिनालय, वन्दन कर पाऊँ सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
शौच धर्म की धूप अनूपम, अष्टकर्म क्षय के अनुरूपम् ।
विजयमेरु वक्षार जिनालय, वन्दन कर पाऊँ सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि षोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
शौच धर्म फल महा मनोहर, प्रगट मुक्तिफल होता सुखकर ।
विजयमेरु वक्षार जिनालय, वन्दन कर पाऊँ सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-षोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
शौच धर्म के अर्घ्य अपारा, पद-अनर्घ्य दाता अविकारा ।
विजयमेरु वक्षार जिनालय, वन्दन कर पाऊँ सिद्धालय ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-षोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो
अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ११
अर्ध्यावलि
वीरछंद
भद्रशाल वेदी उत्तर तट सीता पूर्व-विदेह प्रसिद्ध ।
चित्रकूट वक्षार मनोहर यहाँ विराजे शाश्वत सिद्ध ॥
रत्न-बिम्ब इक-शत-वसु पूजूँ श्री जिनवर गुण गाऊँगा ।
स्याद्वादमय ध्वजा चढाऊँ अनेकान्त को पाऊँगा ॥१ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ-सीतानद्युत्तरतटे चित्रकूटवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
सीता-उत्तर पद्मकूट वक्षार विदेह-पूर्व में मान ।
जिन-चैत्यालय पूजन करके करूँ नाथ अपना कल्याण ॥२ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ-सीतानद्युत्तरतटे पद्मकूटवक्षारस्थित-
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
सीता-उत्तर नलिनकूट वक्षार विदेह-पूर्व में जान।
जिनगृह पूजूँ निज महिमा पा कर्माष्टक कर दूँ अवसान ॥३ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थ-सीतानद्युत्तरतटे नलिनकूटवक्षारस्थित-
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
सीता-उत्तर एक शैल वक्षार विदेह-पूर्व छविमान ।
पूजूँ मैं जिन-भवन शाश्वत पाऊँ स्व-परभेद-विज्ञान ॥४ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थ-सीतानद्युत्तरतटे एकशैलवक्षारस्थित-
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
सीता-दक्षिण पूर्व-विदेह सु देवारण्य वेदि दृष्टव्य ॥
चित्रकूट वक्षार मनोरम जिनगृह पूजूँ अद्भुत दिव्य ॥५ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटे त्रिकूटवक्षारस्थित-
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
वैश्रवण वक्षार नदी सीता-दक्षिण रमणीक महान ।
जिनगृह वन्दूँ उपादान निज जगा करूँ अपनाकल्याण ॥६ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थ-सीतासरिदक्षिणतटे वैश्रवणवक्षारस्थित-
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
है अंजन वक्षार सुहाना सीता-दक्षिण जगत प्रसिद्ध ।
पूजूँ मैंजिन-भवन अकृत्रिम एक दिवस हो जाऊँ सिद्ध ॥७ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि पूर्वविदेहस्थ सीतासरितादक्षिणतटे अंजनवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
अनुपम अंजनात्मा है वक्षार नदी सीता दक्षिण ।
पूजूँ मैंजिन-चैत्यालय को निजका ध्यानकरूँप्रतिक्षण ॥८ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पूर्वविदेहस्थ-सीतासरितादक्षिणतटे अंजनात्मावक्षार
स्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
है पश्चिम-विदेह सीतोदा-दक्षिण श्रद्धावान महान ।
चारकूट में एक कूट पर श्रीजिन-भवन मनोहर जान ॥९ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ-सीतोदासरितादक्षिणतटे श्रद्धावानव
क्षार स्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
विजटावान स्वर्णवक्षार नदी सीतोदा-दक्षिण तट ।
चारकूट में सिद्धकूट इक पूजूँ शुद्ध करूँ निजघट ॥१० ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पश्चिमम्विदेहस्थ-सीतोदासरितादक्षिणतटे विजटावानव
क्षार स्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
आशीविष वक्षार स्वर्णमय सीतोदा-दक्षिण तट मान ।
भाव सहित पूजूँ सदैव ही सिद्धायतन महान महान ॥११ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ-सीतोदासरितादक्षिणतटे आशीविषव
क्षार स्थित सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
है वक्षार सुखावह अनुपम सिद्धायतन महान विशाल ।
मिथ्याभ्रम आवरण हटाऊँ प्रभु निजमूर्ति उजाल-उजाल ॥१२ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ-सीतोदानद्युत्तरतटे-सुखावहवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
है विदेह-पश्चिम सीतोदा-उत्तर वेदी देवारण्य ।
चंद्रमाल वक्षाररम्य अतिपूजन कर हो जाऊँ धन्य ॥१३ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ सीतोदानद्युत्तरतटे चन्द्रमालवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन क्रमांक ११
सूर्यमाल वक्षार जिनालय सिद्धकूट शोभाशाली ।
समाधानकारी स्वज्ञान है भव-समुद्र में बलशाली ॥१४ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ-सीतोदानद्युत्तरतटे सूर्यमालवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
नागमाल वक्षार स्वर्णमय पूजूँ भाव, द्रव्य ले आज ।
शाश्वत जिन-मंदिर में इक-शत-वसु प्रतिमायें रहीं विराज ॥१५ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ-सीतोदानद्युत्तरतटे नागमालवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
देवमाल वक्षार सोलवाँ सिद्धकूट शोभित सुविशाल ।
इन्द्रादिक वन्दन करते हैं मैं भी सदा झुकाऊँ भाल ॥
रत्नबिम्ब इक-शत-वसु पूजूँ श्री जिनवर गुण गाऊँगा।
स्याद्वाद-नय ध्वजा चढ़ाऊँ अनेकान्त को पाऊँगा ॥१६ ॥
ॐ ह्रीं श्री विजयमेरुसम्बन्धि-पश्चिमविदेहस्थ-सीतोदानद्युत्तरतटे देवमालवक्षारस्थित
सिद्धकूटजिनालयजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।