तीन लोक में अकृत्रिम चैत्यालय, अरु जिनबिम्ब महा ।
जिनके दर्शन से निज दर्शन, होते हैं सुखदाय अहा ॥
उन सब अकृत्रिम जिनबिम्बों, को मैं अर्घ्य चढ़ाता हूँ ।
निज अकृत्रिम भाव लखूँ, बस यही भावना भाता हूँ ॥
ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिम चैत्य-चैत्यालय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
Artist: ब्र० श्री रवींद्र जी आत्मन्
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह