वर और कन्या पक्ष के लोगों द्वारा पढा जायें ।
(दोहा)
वन्दों देव युगादि जिन, गुरु गणेश के पाँय ।
सुमरूं देवी शारदा, ऋद्धि सिद्धि वरदाय ।।१।।
अब आदिश्वर कुमर को, सुनियो ब्याह विधान ।
विघन विनाशक पाठ हैं, मंगल मूल महान ।।२।।
इस ही भारत क्षेत्र में, आरज खण्ड मंझार ।
सुख सों बीते तीन युग, शेष समय की वार ।।३।।
चौदह कुलकर अवतरे, अन्तिम नाभि नरेश ।
सब भूपन में तिलक सम, कौशलपुर परवेश ।।४।।
मरुदेवी राणी प्रगट, शुभ लक्षण आधार ।
तिनके तीर्थकर भये, प्रथम ऋषभ अवतार ।।५।।
स्वामि स्वयंभू परम गुरु, वयं बुद्ध भगवान् ।
इन्द्र चन्द्र पूजत चरण, आदि पुरुष परिमान ।।६।।
तीन लोक तारन तरन , नाम विरद विख्यात ।
गुण अनन्त आधार प्रभु, जगनायक जगतात ।।७।।
जनमत ब्याह उछाह में, शुभ कारज की आदि ।
पहिले पूज्य मनाइये, विनशै विघन विनाश ।।८।।
सकल सिद्धि सुख सम्पदा, सब मन-वांछित होय ।
तीन लोक तिहुँकाल में, और न मंगल कोय ।।९।।
इस मंगल को भूलि के, करै और से प्रीति ।
ते अजान समझें नहीं, उत्तम कुल की रीति ।।१०।।
नाभि नरेश्वर एक दिन, कियो मनोरथ सार ।
आदि पुरुष परणाइये, बोले सुबुधि विचार ।।११।।
अहो कुमर तुम जगत गुरु, जगत्पूज्य गुणधाम ।
जन्मे योग त्रिलोक सब, कहें हमें गुरु नाम ।।१२।।
तातें नहीं उल्लंघने मेरे वचन कुमार ।
ब्याह करो आशा भरो, चलै गृहस्थाचार ।।१३।।
सुनके वचन सुतात के, मुसकाये जिन चन्द ।
तब नरेश जानी सही, राजी ऋषभ जिनन्द ।।१४।।
बेटी कच्छ सुकच्छ की, नन्द सुनन्दी नाम ।
अगुण रूप गुण आगरी, मांगी बहु गुण धाम ।।१५।।
उभय पक्ष आनन्द भयो, सब जग बढ्यो उछाह ।
लग्न महूरत शुभ घड़ी, रोप्यो ऋषभ विवाह ।।१६।।
खान- पान सन्मान विधि, उचित नाम प्रकाश ।
सन्तोषे पोषे स्वजन, योग्य वचन मुख भास ।।१७।।
गज तुरंग वाहन विविध, बनी बरात अनूप ।
रथ में राजत ऋषभ जिन, संग बराती भूप ।।१८।।
नाचें देवी अप्सरा, सब रस पोषें सार ।
मंगल गावें किन्नरी, देव करें जयकार ।।१९।।
मंगलीक बाजे बजें, बहु विधि श्रवण सुहाहिं ।
नरनारी कौतुक निरख, हरषैं अंगना मांहि ।।२०।।
आदि देव दूल्हा जहां, पायन इन्द्र महान ।
तिस बरात महिमा कहन, समरथ कौन सुजान ।।२१।।
आगे आये लेन को, कच्छ सुकच्छ नरेश ।
विविध भेट देके मिले, उर आनन्द विशेष ।।२२।।
रतन पौल पहुँचे ऋषभ, तोरण घण्टा द्वार ।
रतन फूल वरषें घने, चित्र विचित्र अपार ।।२३।।
चोरी मण्डप जगमगे, बहुविधि शोभे ऐन ।
चारों दिश चिलकें परे, कंचन कलश रु बैन ।।२४।।
मोती झालर झूमका, झलके हीरा होर ।
मानो आनन्द मेघ की, झरी लगी चहुँ ओर ।।२५।।
वर कन्या बैठे जहां देखत उपजे प्रीत ।
पिक बैनी मृग लोचनी, कामिन गावें गीत ।।२६।।
कन्यादान विधान विधि, और उचित आचार ।
यथायोग्य व्यवहार सब, कीनों कुल अनुसार ।।२७।।
इह विधि विविध उछाह सों, भये मंगलाचार ।
कीनी सज्जन वीनती, शोभा दिपे अपार ।।२८।।
हर्षित नाभि नरेश मन, हर्षित कच्छ- सुकच्छ ।
मरु देवी आनन्द थयो, हर्षे परिजन पच्छ ।।२९।।
यह विवाह मंगल महा, पढ़त बढ़त आनन्द ।
सबको सुख सम्पति करो, नाभिराय कुलचन्द ।।३०।।
वंश बेल बाढ़े सुखद, बढ़ै धर्म मर्याद ।
वर कन्या जीवे सुथिर, ऋषभदेव परसाद ।।३१।।
स्रोत: जैन विधि विधान (सं. पण्डित अभयकुमार जैन, अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन), पृष्ठ १०० से १०१