उद्देश्य
मनुष्य जन्म की सार्थकता सम्यग्दर्शन प्राप्त कर पाँचों पापों का त्याग करके महाव्रत धारण करके मुक्ति की साधना करने मे है । पुरुषार्थ की कमजोरी के कारण जीव महाव्रत अंगीकार नहीं कर पाता, अतः जिनागम में अणुव्रत अंगीकार करने का उपदेश दिया गया है ।
यद्यपि परस्त्रीत्याग तथा स्वस्त्रीसन्तोषपूर्ण जीवन अणुव्रती श्रावक की जीवन पद्धति में आता है तथापि अणुव्रत व सम्यग्दर्शन के पूर्व भी सामाजिक मर्यादाओं के अनुसार स्वदारसन्तोषपूर्वक गृहस्थ जीवन व्यतीत करना आवश्यक है । परस्त्री सेवन को सप्त व्यसन में सम्मिलित किया गया है, जो राजदण्ड, समाज दण्ड, तथा नरकादि कुगतियों का कारण है । अतः सदाचरण पूर्वक वंश परम्परा को चलाने के लिए शास्त्रोक्तविधि से देव-गुरु-शास्त्र की साक्षी से वरण, पाणिग्रहण तथा सप्तपदी पूर्वक विवाह की परम्परा है ।
विवाह योग्य कन्या की आयु १८ वर्ष तथा वर की आयु २० वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए । विवाह समारोह वैभव एवं विलासिता के अनावश्यक प्रदर्शन से बचते हुए सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाज पूर्वक आयोजित करना चाहिए ।
बारात निकासी एवं फेरे आदि की रस्म दिन में ही आयोजित किए जाए तथा रात्रि भोजन एवं अभक्ष्य पदार्थों का प्रयोग न किया जाए तो हमारी संस्कृति की रक्षा होगी तथा समाज का गौरव बढेगा ।
आवश्यक सामग्री
श्री फल ( २ ), विनायक यन्त्र (१), शास्त्र (१), सिंहासन (१), छत्र (३), अष्टमंगल द्रव्य (ठोणा, चमर, छत्र , दर्पण, ध्वजा, झारी, कलश, पंखा ) जलभरा सफेद लोटा, सफेद कपड़ा एक हाथ, लाल चोल एक हाथ, माला (२), तीन कटनी वाली बेदी (१), पक्की नम्बरी ईटें (८), सूखी काली मिट्टी ( १ कि.), कुकंम (२५ ग्राम), हल्दी (५० ग्राम), मेंहदी (२५ ग्राम), लच्छा (२५ ग्रा.), नागरवेलपान (२), सुपारी (४), हल्दी गांठ (४), सरसों (२५ ग्रा.), दीपक (४), रुई माचिस (१), घी (५०० ग्रा.), देशी कपूर (१५ ग्रा.), पूजन द्रव्य (चावल) गिरी (१ कि.), चिटकें (१०० ग्रा.), केशर, (३ग्रा.), बादाम (५० ग्राम), लोंग (१०ग्रा.), पूजन उपकरण खोपरा (२५ ग्राम), पिस्ता (१० ग्रा.), इलायची (१० ग्राम), खारक ( १५ ग्रा.), शक्कर का बूरा (१५ग्रा.), शुद्ध दशांग धूप (७५ ग्रा.), थाली (४), कटोरी (२), शुद्धगादी या गलीचा (१), पाटे
(४), चौकी (२), आसन (२),चवन्नी (२), सूत की माला (१), पंचरत्न पुड़ी (१) ।
नोट - विनायक यन्त्र मन्दिर से लाने और ले जाने में घर पर छुआछूत आदि से अविनय होता है । अतः रकाबी में बना लेना चाहिये । अष्ट मंगल द्रव्य मन्दिर से चांदी पर खुदे हुए मिलते हैं । पक्की नम्बरी आठ ईटों से एक हाथ लम्बा-चौड़ा तथा ४ अंगुल ऊँचा शास्त्रानुसार स्थंड़िल बन जाता है । ईंटें केवल रख देने और ऊपर से मिटटी बिछा देने से काम चल जाता है और कारीगर की आवश्यकता नहीं रहती । चाटू १ हाथ लम्बा होता है ।
वाग्दान
(सगाई) में पंचों के समक्ष वर पक्ष और कन्या पक्ष अपने वंश एवं गोत्रादि का परिचय देकर सम्बन्ध निश्चित करते हैं जिसकी लिखापढ़ी पंचायत के मन्दिर में हो जाती है । पोरवाड़ आदि जातियों में इस समय विनायक यन्त्र की पूजन भी की जाती है । सगाई के समय वर पक्ष की ओर से जो सोना या अन्य नकद रकम का गुप्त रूप से सौदा होने लगा है, उसे बन्द कर दोनों पक्ष के प्रेम को बढ़ाने का खयाल रखने में सबका हित है । समधी की मिलनी में भी अधिक रकम दी जाना उचित नहीं है, इससे गरीब व्यक्ति को मजबूर होना पड़ता है ।
बाना (विनायक) बैठाना
विवाह के दिन प्रात: कन्या और वर अपने-अपने यहाँ के श्री जिन मन्दिर में जाकर शुभ मुहूर्त में पंच परमेष्ठी यानी विनायक यन्त्र की पूजा करें । वहाँ से घर आकर गृहस्थाचार्य से छोटा-बड़ा विनायक का दो बार कंकण बन्धन करावें ।
कंकण बन्धन कन्या के बायें हाथ में और वर के दाहिने हाथ में ५ गांठ और दूसरे में ७ गांठ लगावें ।
कंकण बन्धन मन्त्र
जिनेन्द्र गुरु पूजनम् श्रुतवचः सदा धारणम् ।
स्वशीलयमरक्षणं ददन सत्तपोवृहणम् ।।
इति प्रथितषट्क्रिया, निरतिचारमास्तां तवे-
त्यथ प्रथित कर्मणि विहित रक्षिकाबंधनम् ।।
टीका व लग्न
कन्या पक्ष की ओर से विवाह के पूर्व टीका में वर के लिए वस्त्र व अगूंठी तथा विवाह मुहूर्त लिखा हुआ मांगलिक लग्नपत्र पंचों के समक्ष भेजा जाता है जो वर को पाटे पर बैठा कर फल व पुष्पमाला के साथ गोद में रखा जाता है । इस समय वर की ओर से कोई भी ठहराव (शर्त) नहीं होना चाहिये । यही वर विक्रय का रूप माना जाता है, जबकी सोना व ऊँचा सामान तथा हजारों रुपये नगद दिये जाते हैं । इस समय व आगे भी उक्त सामान के सिवाय कुछ भी नहीं लेना चाहिये-वर को इस समय साहस दिखाना चाहिये ।
मण्डप निर्माण ( स्तंभारोपण)
विवाह के सात या पाँच दिन पूर्व विवाह मण्डप के लिये मण्डप की आवश्यकता हो तो स्तंभारोपण विधि की जाती है । यह स्तंभ ज्योतिषी से पूछकर आग्नेय दिशा में कन्या के यहाँ, कन्या के पिता या जो विवाह हाथ में लेता है उसके द्वारा और वर के यहां वर के पिता या जो विवाह हाथ में ले, उसके हाथ से शुभ मुहूर्त में होता है । कहीं-कहीं स्तम्भारोपण कन्या और वर के हाथ से भी करा लिया जाता है । जहाँ जैसा हो वहाँ वैसा करा लेवें । इसकी विधि में गृहस्थाचार्य स्तम्भारोपण के लिए गड्ढा खुदवा कर वर या कन्या के पिता-माता आदि को जोड़े सहित पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके बैठा कर मंगलाष्टक मंगल कलश, संकल्प, यन्त्र पूजा पूर्वक स्तम्भ का आरोपण करावें । स्तम्भ के ऊपर के हिस्से में लाल चोल में श्रीफल, सुपारी, हल्दी गाँठ, चुअन्नी, सरसों, पान, आम के पत्ते, अमरबेल आदि लच्छे से बाँध दें और गड्ढे के पास स्तम्भ खड़ा कर जल, दूध, दही, पारा, कुंकुम आदि क्षेप कर गड्ढे में स्तम्भ का आरोपण करें । फिर शान्ति पाठ एवं विसर्जन पाठ करें ।
विवाह वेदी
वर के यहां केवल मण्डप की रचना होती है और कन्या के यहाँ मण्डप और भावर ( फेरे ) के लिए विवाह-वेदी की रचना भी होती है । मण्डप में अथवा अन्यत्र जहाँ फेरे कराये जाते है । उस स्थान पर मण्डवा ( चन्देवा ) ताना जाता है और कहीं-कहीं मानस्तम्भ व कलश ( मिटटी का ) भी स्थापित किया जाता है ।
इस जगह वेदी की रचना की जाती है । वेदी बनाने के लिए कम से कम चार हाथ की लम्बी-चौडी जमीन के आस-पास चारों कोनों में चार कुण्डे रख कर चार-चार बाँस तथा ऊपर भी कुल चार बाँस लगाकर उन्हें मूंज की रस्सी और लच्छे से बाँध देना चाहिये । बीच में ऊँचा चन्देवा बाँधना चाहिये जिसके नीचे वर-कन्या खड़े रह सकें । इन वेदी के बिलकुल बीच में एक हाथ लम्बा चौड़ा स्थण्डिल को बनाया जाय । इसी पर हवन होगा, इस स्थण्डिल में पश्चिम या दक्षिण की ओर आधा हाथ छोड़ कर एक हाथ की जगह में तीन कटनी वाली चौकी या उस हिसाब से एक हाथ लम्बाई से ईंटें रख देना चाहिये ।
तोरण व पाणिग्रहण संस्कार विधि
कन्या के यहाँ वर पक्ष बरात लेकर जाता है । यह बरात बाहर गाँव की हो तो सारी विवाह सम्बन्धी कार्यवाही एक दिन में हो जाना चाहिए । बरात की शोभायात्रा में पुरुषों या महिलाओं द्वारा बाजार में भोंडा नृत्य कुलीन परिवार के योग्य नहीं है । वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए एक दिन में तोरन और फेरे होकर दूसरे दिन बरात बिदा कर देना चाहिएं । तोरन में भी बारात का स्वागत होकर तिलक आरती हो जाय तथा बरात का मर्यादा के भीतर जलपान-इत्र-पुष्प आदि से सम्मान कर दिया जावे । इस समय रात्रि को अन्न आदि व सिगरेट, कोकाकोला आदि अनुपसेव्य पदार्थों का उपभोग न किया जाय । दिन में ही पाणिग्रहण संस्कार हो जाना चाहिए ।
तोरण का अभिप्राय है कन्या के यहाँ पर जाना, न कि लकड़ी का तोरण लगाकर छड़ी मारना, यह हिंसा का प्रतीक है । उत्तर प्रदेश में पहले और मध्य भारत में अब यह सुधार होने लगा है । अग्रवाल जाति में बरात जाते समय और कन्या पक्ष के यहाँ आने पर यन्त्र पूजा होती है । आज कल बरात आने पर वर-वधू स्टेज पर परस्पर माला डालते हैं ।
फेरे के आधा घण्टे पहले गृहस्थाचार्य विवाह की सामग्री देखकर उसे वेदी के स्थान पर यथा स्थान जमा दे । पुजारी से पूजन द्रव्य धुलवा कर मंगा लिया जाय । स्थंडिल पर कुंकुम से साथिया बना ले और चारों ओर दीपक रख दे ।
पूर्व या उत्तर मुख लगी हुई तीन कटनी में ऊपर यंत्रजी, बीच में शास्त्र और नीचे गुरुपूजा के निमित्त चौसठ ऋद्धि कागज पर मांडकर रखे तथा वही अष्टमंगल द्रव्य सजावें । वर कन्या के बैठने के लिए यंत्र के दक्षिण की ओर नई गादी बिछवा दें, जिस पर वे उत्तर मुख बैठ सकें ।
विवाह विधि
विवाह में अग्रवालों में कन्या प्रदान और पाणिपीडन (हथलेवा) का मुहर्त मुख्य माना जाता है । ज्योतिषि इन्हीं मुहूर्तों को निकाला करते हैं । परन्तु जैन विधि के अनुसार खण्डेलवालों में जब वर-कन्या विवाह वेदी में आते है तब मंगलाष्टक बोलकर परस्पर वरमाला पहनाई जाती है, उसी का मुहूर्त माना जाता है ।
कन्या को स्नान करा के स्त्रियाँ वर के स्थान (जनिवासा) पर वर को स्नान कराने आवें, और वर, मंदिर में जिन दर्शन कर ठीक मुहूर्त में १५ मिनिट पहले मंडप में आ जाय । दरवाजे पर कन्या की माता चावल का छोटा-सा चौक पूरकर पाटा रखे और उस पर वर के पैर जल से धोवे, फिर आरती करें । कन्या का मामा वर को तिलक कर एक रुपया व श्रीफल भेंट कर साथ में वेदी पर लाकर गादी पर पूर्व मुख खड़ा कर दे । पीछे कन्या को भी गादी पर लाकर वर के सामने पश्चिम मुख खड़ा कर दे । वर और कन्या को एक:एक पुष्पहार दे दे । वर और कन्या के मुँह में इस समय पान-सुपारी न हो और न कन्या चप्पलें पहिने वेदी में न आवे । गृहस्थाचार्य मंगलाष्टक पढे और ठीक मुहूर्त में कन्या वर को और वर कन्या को पुष्पमाला पहना दे । पीछे दोनों पूर्व मुख होकर गादी पर बैठ जावे, कन्या वर के दक्षिण ओर रहे । गृहस्थाचार्य वर से मंगल कलश स्थापन करावे । कलश में शुद्ध जल, सुपारी, हल्दी गाँठ, चुअन्नी और पुष्प डालकर श्रीफल व लाल चोल से ढक कर लच्छे से बाँधे और सूत की माला पहनावें ।
मंगल कलश स्थापन मंत्र
ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादि ब्रह्मणो
मतेऽस्मिन् विधियमान विवाह कर्मणि वीर निर्वाण संवत्सरे . . . . तिथौ . . .. दिने . . . . . . शुभ लग्ने, भूमि शुद्ध्यर्थ, पात्रशुद्ध्यर्थ, क्रियाशुद्ध्यर्थ, शांत्यर्थ, पुण्याहवाचनार्थ शुद्ध प्रासुकतीर्थ जल पूरित मंगलकलशस्थापनम् करोमि भ्वी झ्वीं हं सः स्वाहा ।
नोट :- इसे पुण्याहवाचन कलश भी कहते हैं ।
प्रत्येक छन्द के अन्त में वर-वधू से थाली में पुष्पक्षेपण कराते हुए मंगलाष्टक पढ़ें तथा निम्न अर्घ्य चढ़ाकर नवदेव पूजन करें ।
देव-शास्त्र-गुरु को अर्घ्य
(हरिगीतिका)
जल परम उज्जवल गन्ध अक्षत पुष्प चरु दीपक धरूँ ।
वर धूप निर्मल फल विविध बहु जनम के पातक हरूँ ।।
इह भाँति अर्घ्य चढ़ाय नित भवि करत शिव पंकति मचूँ ।
अरहन्त - श्रुतसिद्धान्त - गुरु निग्रन्थ नित पूजा रचूँ ।।
(दोहा)
वसुविधि अर्घ्य संजोय के अति उछाह मन कीन ।
जासों पूजों परमपद देव-शास्त्र-गुरु तीन ।।
ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वामीति स्वाहा ।
चौबीस तीर्थकरों को अर्घ्य
(अवतार)
जल फल आठों शुचि सार, ताको अर्घ्य करों ।
तुमको अरपों भवतार, भवतरि मोक्ष वरों ।।
चौबीसों श्री जिन चन्द्र आनन्दकन्द सही ।
पद जजत हरत भवफन्द, पावत मोक्ष मही ।।
ॐ ह्रां श्री ऋषभादि चतुर्विंशति तीर्थकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि० ।
बीस तीर्थकरो को अर्घ्य
(रोला/दोहा)
जल फल आठों दर्व अरध कर प्रीति धरी है ।
गणधर इन्द्रनि हूतैं, थुति पूरी न करी है ।।
द्यानत सेवक जानके ( हो ) जगतै लेहु निकार ।
सीमन्धर जिन आदि दे, बीस विदेह मंझार ।।
श्री जिनराज हो, भव तारण तरण जिहाज ।
ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादि विद्यमान विंशति तीर्थकरेभ्योऽर्घ्यम् ।
अकृत्रिम चैत्यालय को अर्घ्य
यावन्ति जिन-चैत्यानि, विद्यन्ते भुवन-त्रये ।
तांवति सततं भक्त्या, त्रिः परीत्य नमाम्यहम् ।।
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोकसंबधि कृत्रिमाकृत्रिर्माजन-बिम्बेभ्योऽर्घ्य नि० स्वाहा ।
नवदेव पूजन (पूरा पाठ यहाँ पढ़ें): नवदेव पूजन (संस्कृत) (जैन विधि विधान) | Navdev Pujan (Sanskrit)
सिद्ध पूजा (पूरा पाठ यहाँ पढ़ें): सिद्ध पूजा (संस्कृत) (जैन विधि विधान) | Siddh Puja (Sanskrit)
प्रदान और वरण
यन्त्र की पूजन के पश्चात् कन्या के पिता और मामा, हो सके तो दोनों ही सपत्नीक, यन्त्र के सामने हाथ जोड़कर खड़े होवें और वर के पिता और मामा भी उनके सामने अर्थात् यन्त्र के पीछे खड़े हो जावें । गृहस्थाचार्य कन्या के पिता से उनके बाद में मामा से, सबके समक्ष कन्या की सम्मतिपूर्वक वर के प्रति इस प्रकार वाक्य बुलवावें:- 'मैं आपको धर्माचरण में और समाज की एवं देश की सेवा में सहयोग देने के लिए अपनी यह कन्या प्रदान करना चाहता हूँ । आप इसे स्वीकार करे ।
कन्या के पिता और मामा के इस प्रकार कहने पर वर भी यन्त्र को नमस्कार कर कहे “मैं आपकी कन्या को स्वीकार करता हूँ, और इसके सहयोग से धर्म, अर्थ, और काम का सेवन करूंगा” ।
इस अवसर पर समस्त स्त्री-पुरुष वर-कन्या पर वृणीत्वं वृणीध्वं ( वरो ) कह कर अपनी अनुमोदना के साथ पुष्प वृष्टि करें । कन्या के पिता झारी या कलशी में जल लेकर वर के सीधे हाथ की कनिष्ठा अंगुली से कन्या की बाँये हाथ की कनिष्ठा अंगुली स्पर्श कराकर उन अंगुलियों पर निम्न प्रकार मन्त्र पढ़ कर जल-धारा छोड़ें ।
गृहस्थाचार्य पिता से यह मन्त्र कहलावे :-
ओमद्य जंबूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे . . . . . . नगरे अस्मिन् स्थाने . . . . . वीर निर्वाण संवत्सरे . . . . मासे . . . . तिथौ. . . . . . वासरे जैन धर्म परिपालकाय . . . . . गोत्रोत्पन्नाय . . . .. पुत्राय . . . . पौत्राय . . . . नाम्ने कुमाराय जैनधर्म परिपालकस्य . . .. गोत्रोत्पन्नस्य . . . . . पुत्री . . . पौत्री . . . . नाम्नी इमां कन्यां प्रददामि । ओं नमोर्हते भगवते श्रीमते वर्धमानाय श्रीबलायुरारोग्य संतानाभिवर्धनं भवतु क्ष्वीं क्ष्वी हं सः स्वाहा ।
उक्त प्रदान और वरण की विधि में प्रदान से कन्यादान का मतलब, जैसा कि अन्य सम्प्रदायों में माना जाता है वैसा यहाँ नहीं है । कन्या अन्य वस्तुओं की भाँति दान की वस्तु नहीं मानी गई है । यहाँ तो सिर्फ सबके सामने विवाह की एक विधि मात्र बतलाई है ।
नोट:- यहाँ दोनों पक्ष के गृहस्थाचार्य शाखोच्चारण पृष्ठ १ का यहाँ दोनो पक्ष के नाम व गोत्र पूर्वक पढ़ सकते हैं ।
सप्तपदी पूजा (पूरा पाठ यहाँ पढ़ें): सप्तपदी पूजा (जैन विधि विधान) | Saptapadi Puja
गठजोड़ा
हवन और सप्तपदी पूजा के बाद जीवनपर्यन्त पति-पत्नी बनने वाले दम्पति में परस्पर प्रेमभाव एवं लौकिक और धार्मिक कार्यों में साथ रहने का सूचक ग्रन्थिबन्धन ( गठजोड़ा ) किसी सौभाग्यवती ( सुहागिनी ) स्त्री के द्वारा कराना चाहिए । कन्या की लुगड़ी ( साड़ी )के पल्ले मे १ चुअननी, १ सुपारी, हल्दी गाँठ , सरसों व पुष्प रख कर उसे बाँध लें और उससे वर के दुपट्टे के पल्ले को बाँध दें ।
ग्रन्थिबन्धन मंत्र
अस्मिन् जन्मन्येष बन्धोर्द्वयोर्वै,कामे धर्मे वा गृहस्थत्वभाजि ।
योगो जातः पंचदेवाग्नि साक्षी, जायापत्त्योरंचलग्रंथिबंधात् ।।
हथलेवा ( पाणिग्रहण )
गठजोड़ा के पश्चात् कन्या के पिता कन्या के बाँये हाथ में और वर के सीधे हाथ में पिसी हुई हल्दी को जल से रकाबी में घोलकर लेपें । लोक में जो पीले हाथ करने की बात कही जाती है यह वही विधि है । फिर वर के सीधे हाथ में थोड़ी-सी गीली मेंहदी और १ चुअन्नी रख कर उस पर कन्या का बाँया हाथ रख कर कन्या का हाथ ऊपर व वर का हाथ नीचे करके वर कन्या के दोनों हाथ जोड़ दें । इस विधि से कन्या का पिता अपनी कन्या को वर के हाथ में सौंपता है । इसे पाणिग्रहण कहते हैं ।
पाणिग्रहण मंत्र
(वसंततिलका)
हारिद्रपंकमवलिप्य सुवासिनीभिर्दत्तं द्वयोर्जनकयोः खलु तौ गृहीत्वा ।
वामं करं निजसुताभवमग्रपाणिम्, लिम्पेद्वरस्य च करद्वययोजनार्थम् ।।
गृहस्थाचार्य प्रत्येक फेरे के बाद नीचे लिख हुआ अर्घ्य क्रमशः चढ़ाते रहें-
१. ॐ ह्रीं सज्जाति परमस्थानाय अर्घ्यम् ।
२. ॐ ह्रीं सद्गृहस्थ परमस्थानाय अर्घ्यम् ।
३. ॐ ह्रीं पारिव्राज्य परमस्थानाय अर्घ्यम् ।
४. ॐ ह्रीं सुरेन्द्र परमस्थानाय अर्घ्यम् ।
५. ॐ ह्रीं साम्राज्य परमस्थानाय अर्घ्यम् ।
६. ॐ ह्रीं आर्हन्त्य परमस्थानाय अर्घ्यम् ।
फेरे और सप्तपदी
हथलेवा के बाद वर-कन्या को खड़ा करा के कन्या को आगे और वर को पीछे रखकर वेदी में चवरी के मध्य में यन्त्र सहित कटनी और हवन की प्रज्ज्वलित अग्नियुक्त स्थंडिल के चारों ओर छः फेरे दिलवावें ।
बुन्देलखण्ड (परवार आदि जातियों) में वर-वधू का हाथ छुड़वा कर छह फेरे दिलाये जाते हैं । इस समय स्त्रियाँ फेरों के मंगल गीत गावें । वर और कन्या के कपड़ों को संभालते हुए फेरे दिलाना चाहिए एक-दो समझदार स्त्री और पुरुष दोनों को संभालते रहें । छः फेरों के बाद दोनों अपने पूर्व स्थान पर पहले के समान बैठ जावें । गृहस्थाचार्य निम्न प्रकार सात-सात वाहनों ( प्रतिज्ञाओं ) को क्रम से पहले वर से और फिर कन्या से कहलावें, साथ ही स्वयं उनको सरल भाषा में समझाता जाय ।
वर की ओर से कन्या के प्रति सात वचन
(१) मेरे कुटुम्बी लोगों का यथायोग्य विनय सत्कार करना होगा ।
(२) मेरी आज्ञा का लोप नहीं करना होगा, ताकि घर में अनुशासन बना रहे ।
(३) कठोर वचन नहीं बोलना होगा, क्योंकि इससे चित्त को क्षोभ होकर पारस्परिक द्वेष हो जाने की संभावना रहती है ।
(४) सत्पात्रों के घर पर आने पर उन्हें आहार आदि प्रदान करने में कलुषित मन नहीं करना होगा ।
(५) मनुष्यों की भीड़ आदि में जहाँ धक्का आदि लगने की सभावना हो, वहां बिना खास कारण के अकेले नहीं जाना होगा ।
(६) दुराचारी और नशा करने वाले लोगों के घर पर नहीं जाना होगा,क्योंकि ऐसे व्यक्तियों द्वारा अपने सम्मान में बाधा आने की संभावना है ।
(७) रात्रि के समय बिना पूछे दूसरों के घर नहीं जाना होगा, ताकि लोगों को व्यर्थ ही टीका-टिप्पणी करने का मौका न मिले ।
ये सात प्रतिज्ञायें तुम्हें स्वीकार करना चाहिए । इन वचनों में मार्हस्थ्य जीवन को सुखद बनाने की बातों का ही उल्लेख है । इनके पालन से घर में और समाज में पत्नी का स्थान आदरणीय बनेगा ।
इन प्रतिज्ञाओं को कन्या अपने मुँह से निःसंकोच हो कर कहे और स्वीकार करे ।
कन्या द्वारा वर के प्रति सात वचन
(१) मेरे सिवाय अन्य स्त्रियों को माता, बहन और पुत्री के समान मानना होगा अर्थात् पर-स्त्री सेवन का त्याग और स्व-स्त्री सन्तोष रखना होगा ।
(२) वेश्या, जो परस्त्री से भिन्न मानी जाती है उसके सेवन का त्याग करना होगा ।
(३) लोक द्वारा निन्दनीय और कानून से निषिद्ध द्यूत ( जुआ ) नहीं खेलना होगा ।
(४) न्यायपूर्वक धन का उपार्जन करते हुए वस्त्र आदि से मेरा रक्षण करना होगा ।
(५) आपने जो मुझ से अपनी आज्ञा मानने की प्रतिज्ञा कराई है उस सम्बन्ध में, धर्म स्थान में जाने और धर्माचरण करने में रुकावट नहीं डालनी होगी ।
(६) मेरे सम्बन्ध में और घर की कोई बात मुझ से नहीं छिपानी होगी क्योंकि मै भी आपकी सच्ची सलाह देने वाली हूँ । कदाचित् उससे आपको लाभ हो जाय और अपना संकट दूर हो जाय, साथ ही इससे परस्पर विश्वास भी बढ़ेगा ।
(७) अपने घर की गुप्त बात दूसरे के याने मित्र आदि के समक्ष प्रकट नहीं करनी होगी । लोगों की मनोवृत्ति प्रायः यह होती है कि वे दूसरे घर की छोटी-सी बात ’ तिल का ताड ’ की उक्ति के समान बड़ी करके अपवाद फैला देते हैं ।
नोटः- उक्त वर-वधू की ७-७ प्रतिज्ञाये प्रचार में आने योग्य हैं ।
वर और वधू द्वारा ली जाने वाली सात प्रतिज्ञायें
(१) जीवन पर्यन्त साथ रहते हुए सहनशील और कर्मवीर बन कर एक-दूसरे के लिए जीवित रहना, जीवन से निराश न होना ।
(२) दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने और गृह जीवन के निर्माण मे भीतर का उत्तरदायित्व नारी को और बाह्य जीवन का उत्तरदायित्व पुरुष पर है ।
(३) एक-दूसरे के परिवार के सदस्य बन कर सबके स्नेह और आदर के पात्र बनना । विनय, सेवा करना एवं सद्व्यवहार से घर और ससुराल को स्वर्ग बनाना ।
(४) परस्पर स्नेह, अभिन्नता, आकर्षण, विश्वास बना रहे - इसके उपाय आचरण में लाना । पति के लिए पत्नी सर्वाधिक सुन्दर व प्रिय और पत्नी के लिए पति परमराध्य रहे ।
(५) वधू को कुल वधू ( सीता, अन्जना, सुलोचना आदि के समान ) और वर को कुल पुत्र ( राम, जयकुमार, सुदर्शन आदि के समान ) बनना, जिनसे घर का सम्मान , गौरव, प्रतिष्ठा, कीर्ति बनी रहे वैसे काम करना । निर्व्यसनी, शीलवान और विवेकी बनना ।
(६) जिनेन्द्र देव, गुरु, शास्त्र की अर्चना एवं साक्षीपूर्वक विवाह सम्पन्न हो रहा है उनमें श्रद्धा बनाये रखें, इससे बुराइयों से बचने में बल मिलता रहे । आत्महित ( वीतरागता) की ओर दृष्टि रखें ।
(७) समाज, जनता और राष्ट्र की सेवा में दोनों परस्पर सहयोग से आगे बढ़ें तथा विलासिता से बचें ।
इन सात प्रतिज्ञाओं को दोनों स्वीकार करें । इनके सिवा और भी कोई खास बात हो तो विवाह के पहले स्पष्ट कर लेना चाहिए, जिससे दाम्पत्य जीवन आजीवन आनन्दपूर्वक व्यतीत हो । सच यह है कि अपने साफ और शुद्ध परिणाम ( नियत) ही से सम्बन्ध अच्छा रह सकता है ।
सप्तपदी के पश्चात् वर को आगे करके सातवाँ फेरा कराया जाये और अपने पहले के स्थान पर जब आवें तब वे पति-पत्नी के रूप में हो कर याने स्त्री पति के बाँये ओर और पति स्त्री के दाहिने ओर बैठे । इस अवसर पर स्त्रियाँ मंगलगीत गावें ।
उक्त सात फेरे या भाँवर सात परम स्थानों की प्राप्ति के द्योतक हैं ।
आगमानुसार संसार में (१) सज्जातित्व (२) सद्रगृहस्थत्व (३) साधुत्व (४) इन्द्रत्व (५)
चक्रवर्तित्व (६) तीर्थकरत्व और (७) निर्वाण ये सात परम स्थान माने गये हैं ।
सातवें फेरे के बाद ’ ॐ ह्रीं निर्वाण परम स्थानाय अर्घ्यम् ’ बोल कर अर्घ्य चढ़ावें ।
सात फेरे होने पर गृहस्थाचार्य नवदम्पति पर निम्न प्रकार मन्त्र द्वारा पुष्प क्षेपण करे ।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसाधवः शान्ति पुष्टिं च कुरुत स्वाहा ।
यहाँ पर संक्षेप में गृहस्थ जीवन के महत्त्व पर उपदेश देकर अच्छी संस्थाओं को यथाशक्ति दोनों पक्ष की ओर से दान की घोषणा करा कर तत्काल यथास्थान भिजवाने का प्रबन्ध करा देना चाहिए ।
इसके बाद कन्या पक्ष की ओर से वर को तिलकपूर्वक १) एक रुपया और श्रीफल भेंट कर हथलेवा छुड़ा देना चाहिए और नवदम्पत्ति खड़े हो कर मंगल-कलश हाथ में ले लें । गृहस्थाचार्य पुण्याहवाचन पाठ पढ़े और सर्वशांतिर्भवतु वाक्य के आने पर नीचे एक पात्र में जलधारा स्वयं छोड़ता जाय और नवदम्पति से धारा छुड़ाता जाय ।
शांतिस्तवनम् (पूरा पाठ यहाँ पढ़ें): शांतिस्तवनम् (जैन विधि विधान) | Shanti Stavanam
इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र व पद्य से विसर्जन करें-
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा अर्हदादिपरमेष्ठिनः संपूजिताः जः जः जः अपराध क्षमापनं भवतु ।
(शार्दूलविक्रीड़ित)
मोहध्वांतविदारणं विशद विश्वोद्भासि श्रियम् ।
सन्मार्ग प्रतिभासकं विबुधसंदोहामृतापादकम् ।।
श्रीपाउं जिनचन्द्रशांति शरणं सद्भक्तिमानेऽपि ते ।
भूयास्तापहरस्य देव भवतो भूयात्पुनर्दर्शनम् ।।
आशीर्वाद
गृहस्थाचार्य निम्नलिखित श्लोक पढ़ कर वर-वधू को पुष्पमाला द्वारा आशीर्वाद दे ।
(वसंततिलका)
आरोग्यमस्तु चिरमायुरथो शचीव,
शक्रस्य शीतकिरणस्य च रोहिणीव ।
मेघेश्वरस्य च सुलोलनका यथैषा,
भूयात्तवेप्सित सुखानुभवादिदात्री ।।
दीर्घायुरस्तु शुभमस्तु सुकीर्तिरस्तु,
सद्बुद्धिरस्तु धनधान्य समृद्धिरस्तु ।
आरोग्यमस्तु विजयोऽस्तु महोऽस्तु पुत्र-
पौत्रोद्भवोऽस्तु तव सिद्धिपतिप्रसादात् ।।
आरती
वर की सास हाथ में दीपक लेकर वर को तिलक करके आरती करे । पलकाचार या पहरावली भी अल्प व्यय में बिना खीचतान सरलता पूर्वक कर दी जाये । पश्चात् वर-वधू को मंगलगीत पूर्वक विदा करे ।
विवाह के दूसरे दिन या उसी दिन वर-वधू जितेन्द्र देव के दर्शन करें । इस समय पंचायत ( गोट)की ओर से जो सोलाणा में ध्वजा आदि के नाम पर रकम ली जाती है वह यथाशक्ति देना चाहिए ।
शाखाचार (पूरा पाठ यहाँ पढ़ें): शाखाचार (विवाह) (जैन विधि विधान) | Shakhachar (Vivah)
नोट:- उक्त शाखाचार कन्या प्रदान की विधि के समय अयदाल आदि जातियों में बोला जाता है । इसके साथ अग्रवालों में दोनों पक्ष की ओर से सात पीढ़ी के नाम बताकर वर कन्या की मंगल-कामना की जाती है ।
विशेष ज्ञातव्य
(१) विवाह के दिन कन्या के रजस्वला हो जाने पर कन्या से पाँचवें दिन पूजन-हवन आदि विवाह की विधि कराना चाहिए । विवाह दिन मे किया जाना चाहिए ।
(२) नवदेव पूजन में अर्हत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्व साधु, जिनधर्म, जिनागम, जिनचैत्य और जिनालय - इन नव देवों की पूजन की जाती है ।
(३) गुरु पूजा में ऋद्धियों की स्थापना के लिए “ओं बुद्धि चारण विक्रियौषधतपोबलरसाक्षीण महानसचतुः षष्ठि ऋद्धिभ्यो नमः” यह मन्त्र कागज पर केसर से लिख कर नीचे की कटनी पर रख देना चाहिए ।
(४) विवाह के मुहूर्त्त निकालने आदि में और अन्य ग्रहादिदोष को दूर करने के लिए जो पीली ( गुरु ग्रह सम्बन्धी ) पूजा, लाल ( रवि ग्रह सम्बन्धी ) पूजा आदि शांति के उपाय अन्य ज्योतिषी बताते हैं उनके उपाय जैनशास्त्रानुसार ही करना चाहिए । नवग्रह विधान के अनुसार विवाह के समय जिनेन्द्र पूजा करा देना चाहिए और विशेष करना हो तो नवग्रह मण्डल मंडवाकर " ओं ह्रीं अर्हम् अ सि आ उ सा सर्वविघ्न शांति कुरु कुरु स्वाहा" इस मन्त्र की ग्रह के हिसाब से यथाशक्ति जाप्य व विवाह के समय आहुति करा देना चाहिए ।
(५) विनायक यन्त्र पूजा आदि के प्रारम्भ में यन्त्राभिषेक और आह्वानन आदि विनय और शुद्धि को ख्याल में रख कर ही नहीं लिखे गये हैं, क्योंकि शुद्ध धोती-दुपटटा पहने बिना पुजा और रात्रि में अभिषेक आदि करना उचित नहीं ।
नव दम्पति को सम्बोधन
आप दोनों गार्हस्थ्य जीवन में प्रविष्ट हुए हैं । अपने मानव जीवन को पवित्र और सफल बनाने के लिए ही आपने यह क्षेत्र चुना है । इसको आनन्दपूर्ण और सुखमय बनाना आपके ही ऊपर निर्भर है । यह केवल इन्द्रिय भोग भोगने के लिए नहीं , वरन् संयमपूर्वक सदाचार और शील की साधना के उददेश्य से आपने अंगीकार किया है । आप दोनों एक-दूसरे के प्रति तो जवाबदार हैं ही, पर स्व-धर्म, स्व-समाज की और स्व-देश की सेवा का दायित्व भी आप पर आ पड़ा है । यह गृहस्थ का भार बहुत बड़ा और अनेक संकटों से युक्त है । गृहस्थ अवस्था में आने वाली अनेक आपत्तियों से घबराकर गृह-विरत हो जाने के बहुत उदाहरण मिलेंगे ।
परन्तु हमें आशा है आप जीवन की हरेक परीक्षा में उत्तीर्ण होंगे । समस्त कठिनाइयों को कर्मयोगी बन कर सहन करते हुए उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर दृढ़ रहना आपका कर्त्तव्य होगा ।
पुराणों में उल्लिखित जयकुमार- सुलोचना, राम-सीता या अन्य किसी के दाम्पत्य जीवन के आदर्श को आप अपने सामने रखें । हमारी यह शुभकामना है कि उन्हीं के समान भावी पीढ़ी आपका भी उदाहरण अपने समक्ष रखे ।
आप दोनों यौवन के वेग में न बह कर अपने कुल के सम्मान का ख्याल रखते हुए गौरवमय यशस्वी जीवन व्यतीत करें । आपका व्यवहार न्याय एवं नैतिकतापूर्ण हो ।
पति का कर्त्तव्य है कि वह अपनी पत्नी को सहयोगिनी मान कर उसे ऊँचा उठाने के साधन सदा जुटाता रहे और पत्नी, पति के हर कार्य को सफल बनाने में पूरा योग देती रहे । दोनों भौतिकता में न लुभा कर आध्यात्मिकता के रहस्य को समझें, इसी में उन्हें यथार्थ सुख और शांति प्राप्त होगी । इसके लिए प्रतिदिन सामायिक और स्वाध्याय आवश्यक है । हमारी हार्दिक मंगल-कामना है कि आपकी यह जोड़ी दीर्घकाल तक बनी रहें ।
स्रोत: जैन विधि विधान (सं. पण्डित अभयकुमार जैन, अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन), पृष्ठ ८० से १०३