धन्य सम्यक् चारित्र महान्।
जिस बिन नहीं जिनराज भी सीझें, नहीं पावे शिवथान।। टेक।।
आप-आप में लीन होय थिर, निश्चय चारित्र सोई,
शुद्धोपयोग रूप आनन्दमय, शिव का कारण होई।
व्रत समिति गुप्ति सहचारी सो व्यवहार सु जान।। 1।।
अंतरंग रागादि मिटे जहँ, सहज व्रतादिक होंय,
पर जीवों को पीड़ित करके, कार्य न साधे कोय।
परम अहिंसा सत्य अचौर्य, हो ब्रह्मचर्य अम्लान।। 2।।
नहीं वासना, नहीं वस्त्र, निर्ग्रन्थ दशा प्रगटाय,
लेश नहीं आडम्बर होवे, परम दिगम्बर काय।
इष्ट-अनिष्ट न भासे कोई, समता भाव प्रधान।। 3।।
चार हाथ भू देख गमन हो, हित-मित वचन सुहाय,
हो आहार दोष छियालीस बिन, जहाँ नहीं अन्तराय।
यत्नाचार पूर्वक ही हो, निक्षेपण आदान।। 4।।
मल मूत्रादिक भी त्यागें, ज्यों जीव घात नहीं होय,
यों निर्दोष समिति पालन, शिवपथ में सहजहिं होय।
निज स्वरूप में गोपन ही सम्यक् गुप्ति पहिचान।। 5।।
अहो ! अचिन्त्य परम प्रभु आतम, पूर्णानन्दमय धाम,
व्यर्थ जगत् में फिरे भटकता, निज में ही विश्राम।
सहज रूप शिव सुख का साधन, निर्मल आतम ध्यान।। 6।।
प्रबल भावना होवे प्रभुवर, धन्य दशा कब पाऊँ,
तोरि सकल जग द्वन्द्व-फन्द, नित ध्येय रूप ही ध्याऊँ।
रत्नत्रय की होय पूर्णता, प्रगटे पद निर्वाण।। 7।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह