सम्यक् चारित्र की प्रेरणा | Samyak Charitra ki Prerana

अनादिकाल से भरमा, यहाँ पर व्यर्थ ही चेतन।
दृष्टि पुद्गल पर रखकर, मोह में तू डूबा चेतन।। 1।।

नहीं निज रूप पहिचाना, किया नहीं भेद-विज्ञाना।
विकारों को न छोड़ा है, मोक्ष का मर्म नहीं जाना।। 2।।

दुःख को सुख है समझा, मोह का नशा छाया है।
यही संसार का कारण, इसे नहीं त्याग पाया है।। 3।।

सुनो सत्गुरु की वाणी को, मार्ग सच्चा पिछानो तुम।
निरुपण मोक्ष के दो हैं, भेद उनका श्रद्धानो तुम।। 4।।

प्रवर्तन बाह्य करते भी, लक्ष्य निश्चय का रखना है।
नष्ट कर सब विकल्पों को, अथाह भव सिन्धु तिरना है।। 5।।

सश्रद्धा अणुव्रत पालो, पुनः मुनिधर्म अपना लो।
विनाशो घाति कर्मों को, केवली पदवी को पा लो।। 6।।

यही अविनाशी सुख मारग, यही कर्तव्य है तेरा।
यही दुःखों का हर्ता है, यही प्रभु रूप है तेरा।। 7।।

आत्मा इसको तू पाले, इसी से हो जा तू वे तन।
अनादिकाल से भरमा, यहाँ पर व्यर्थ ही चेतन।। 8।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह