12. मनोवती की कथा
मनोवती का परिचय
किसी समय हस्तिनापुर में राजा यशोधर अपनी रानी यशोधरा के साथ राज्य करते थे। इनके राज्य में महारथ नाम का नगर-सेठ रहता था। इसकी सेठानी का नाम महासेना था। इन दोनों के सौ पुत्रों के बीच एक मनोवती नाम की गुणवान, शीलवान, प्रज्ञावान बेटी थी। इस सेठ का रत्नों, मुक्ताओं का कारोबार देश-विदेश तक होता था।
राजा के खजाने में इस सेठ के कारोबार से समुद्र-समान समृद्धि थी। देश-विदेश में यशोधर राजा एवं महारथ सेठ की ख्याति मानो अमर हो गई थी।
सेठ के परिवाररूपी सरोवर में सैकड़ों कमलों के मध्य कमलिनी समान मनोवती स्वस्थ, सुसंस्कृत, स्वाध्यायी, परम आरोग्य विज्ञान की अध्ययनशीला एवं अभ्यासी, आहार आदि चारों दानों में निष्णात, जिनशासन-प्रभावना को सदा उल्लसित रहती थी। यह तो बाहर में सब ही को दीखता था, परन्तु वह तो अंतर में शुद्धात्मा के स्वानुभव की आस्वादी थी। उसने अपने अंतिम नारी भव के कर्मों को खिपाने की तैयारी अच्छे से कर ली थी। फिर भी आर्यिका दीक्षा लेने में वह अपने को असमर्थ अनुभव रही थी। उसने शील की मर्यादाओं का पालन करने का नियम लिया हुआ था।
आचार्य सुगुप्ति भगवन के सामने उसने इंद्र-इंद्राणी के रूप में जिन-मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह कराने की अपनी अंतर-भावना प्रकट की। तब आचार्य भगवन ने उसे दर्शन-विशुद्धि प्रतिमा प्रदान की और अणुव्रतों का पालन करने की प्रेरणा की। उसने सहर्ष नियम लिया और दिनों-दिन अपने सम्यक्त्व को और भी अधिक निर्मल करने लगी।
वह विषय-भोग के पोषक कुदेवों, कुगुरुओं, कुशास्त्रों एवं उनके आयतनों से दूर रहती; यहाँ तक कि कभी उनकी प्रशंसा तक नहीं करती थी। सदा आत्म-साधकों की सत्संगति में रहती, उनकी ही वैयावृत्ति करती थी। कभी किसी की बुराइयाँ नहीं देखती और न किसी से कहती थी। साथ ही अपने (आत्मा) में भी किसी भी प्रकार की कमी नहीं देखती थी। आत्म-ध्यान के समय उसे अपने में पर्याय-जन्य अनेकों कमियाँ दिखती थीं, परन्तु वह जानती थी कि स्वाश्रय से वे सब स्वतः ही उत्पन्न होना बंद हो जायेंगी। अतः वह सावधान होकर स्वाश्रय का ही उद्यम स्मित-वदन किया करती थी।
विवाह-योग्य वय होने पर पिताजी ने उसके विवाह-योग्य वर की तलाश हेतु एक सुश्रावक श्रीमान सुधर्मप्रकाशजी को नियुक्त किया। वह देश-विदेश में विहार करता था, अणुव्रती होने से बड़ा प्रामाणिक था। वह प्रौढ़ था। कन्या के आचरण एवं व्यक्तित्व से अच्छी तरह अभिज्ञ था, वर-वधू की पात्रता को अच्छे से समझता था, समाज के सुसंगठन के महत्त्व का गंभीर ज्ञाता था, जिनशासन के भविष्य के प्रति गंभीर एवं सचिंत था।
मनोवती का बुधसेन से विवाह
अवन्ती देश के वलभीपुर नगर के धर्मात्माओं की बड़ी ख्याति थी। देश भर के लोग यहाँ आकर बसना चाहते थे; क्योंकि यहाँ आत्महित के योग्य वातावरण सदा बना रहता था। मुनि भगवंतों एवं आर्यिकाओं-साधिकाओं का सदा विहार होता रहता था। देश भर के धर्मात्मा अपनी बेटी का विवाह इस नगर में करके अपने को गौरवान्वित अनुभवते थे।
यहाँ के राजा कर्पूरतिलक अपनी दो रानियों सत्याभा एवं आभा के साथ सुख से राज्य करते थे।
इनके राज्य में एक सोमदत्त नाम का प्रसिद्ध सेठ था, जिसकी पत्नी का नाम हेमश्री था। इनके सात बेटे थे - रविसेन, चन्द्रसेन, मंगलसेन, गुणसेन, मणिसेन, महासेन व बुधसेन। अभी तक बुधसेन का विवाह नहीं हुआ था। विवाहित छह बेटों की पत्नियों के नाम क्रमशः चित्रलेखा, काममाला, गुणमाला, चन्द्रावती, सूर्यावती व मंगलावती था। बुधसेन सारे परिवार की आँखों का तारा था।
नगर के त्रैलोक्य-तिलक समान जिन-मन्दिर में एक दिवस सुधर्म प्रकाश जी विचरण करते हुए पधारे और निमन्त्रण से आहार-विहार करते हुए, अपनी मधुर वाणी से धर्म-प्रभावना करते हुए समाज को हर्षानंद से भर रहे थे।
उनकी प्रवचन सभा में सबसे आगे बुधसेन नाम का युवक बैठता था। वह बड़ा संयमी एवं स्वाध्यायी दिखा। उसकी चर्चा-वार्ता व जिज्ञासा से वे बड़े प्रभावित हुए। वे एक दिन सेठ सोमदत्त के घर पर आहार के लिए आमंत्रित हुए। बुधसेन के आग्रह से ही भोजन करना स्वीकार किया था। …घर आकर आगम-आग्रह युक्त महल एवं व्यवस्था देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई।
सेठजी ने प्रसंग पाकर उनसे अपनी चिंता व्यक्त की -“उन्हें अपने बेटे के योग्य धार्मिक कन्या कैसे मिलेगी? कहाँ मिलेगी?” तो उन्हें मनोवती का स्मरण हो आया। बोले “थोड़ा दूर तो है, परन्तु चाहो तो…”
“दूरी की कोई बात नहीं, … परन्तु धार्मिक विचार नहीं मिलेंगे तो दोनों दुखी होंगे; …और दुखी जीव दुख में ही निमित्त होते हैं।”
“बात तो सही है। एक प्रतिमाधारी कन्या है। …राज्य में उसके भजनों, तत्त्वचर्चा, पूजन एवं वैयावृत्ति की मिशाल नहीं मिलती है। और भोजन की शुद्धता, स्वादिष्टता, आरोग्य-वर्धकता एवं मितव्ययता - इन सबका एक ही भोजन में मिलना तो दुर्लभ ही होता है, परन्तु ये सारे गुण उस कन्या के बनाए भोजन में एक ही स्थान पर दिखते हैं। …ज्यादा क्या कहें? वह तो साक्षात् सरस्वती समान ही है और स्वस्थ भी है।”
“आपके मुँह घी-शक्कर …पंडित जी।” गदगद होकर सेठजी बोले।
“तो …अब मैं आपके घर में पानी भी नहीं पी सकता हूँ …क्योंकि अब मैं कन्या के पिता समान हूँ, …बुधसेन एवं उसकी माँ, भ्राता एवं भावजों को स्वीकार्य हो तो मैं उसका रिश्ता पक्का करके गौरवान्वित होऊँगा। मुझे आनन्द होगा कि इतना सुन्दर सुमेल मेरी नजरों में आज तक नहीं आया है।”
सोमदत्त - (संतुष्टि जताते हुए एक हाथ ठोड़ी पर रखकर जिज्ञासा से अपलक निहारते हुए) “कन्या एवं उसके पिता को कोई आपत्ति न हो तो।”
सुधर्म प्रकाश - (प्रफुल्लित स्वर में दोनों बाहें फैलाकर कहा) “वह तो मेरी ही बेटी समझो।”…अपनी विवाह-वार्ता सुनकर बुधसेन लजाते हुए पृथक् कक्ष में चला गया।
माता-पिता ने बुधसेन के मन की बात का इशारा समझ लिया - “आपको जो श्रेष्ठ लगे वह आप करें, उसे स्वीकार्य है।”
अंततः मनोवती का बुधसेन से सम्बन्ध नक्की हो गया। परिवार के समस्त सदस्यों में प्रसन्नता का वातावरण छा गया। बुधसेन के मन रूपी पक्षी को आशा रूपी पंख मिल गए … वे अपने जीवन-साथी के बारे में एक छवि अंकित करते, फिर ‘नहीं-नहीं’ करते हुए उसे बिगाड़ते। एक एक पल भारी हो रहा था। उसे अपने भाग्य पर भरोसा नहीं हो रहा था कि इतना धार्मिक, इतना पवित्र जीवनसाथी उसे मिलने जा रहा था। वैचारिक तूफ़ान नाना रूप बदलता रहता था। योग्य समय आने पर दोनों वैवाहिक-बंधन में बँध गये। समय पाकर सब सम्बन्धी विदा ले गये।
पिता ने मुक्ता-कोष दहेज में भेंट किये तो उन्हें अवधारण करने के स्थान पर मनोवती को चढ़ाने के भाव आये थे, परन्तु वह संकोच-वश ससुर से कैसे कहे कि जो दहेज के मुक्ता-कोष आपने खजाने में, तिजोरी में रख लिये, वे तो मुझे मेरे संकल्पानुसार जिनदर्शन-पूजन में चढ़ाने हैं।
बुधसेन से तत्त्वचर्चा एवं अपनी प्रतिमा के प्रति उनके आदर से वह कृतार्थ थी, परन्तु अपने मन की दुविधा वह उनसे भी न कह सकी।
तीन दिन तक उपवास का बहाना करके मौन रह ली… परन्तु आखिर कब तक वह यह बात ढँकी रह सकती थी? मन दुविधा में ही रहा। इस ही बीच सबसे छोटे भ्राता को भी बिना बहना के चैन न पड़ रही थी …सो मिलने चला आया।
सबने मनोवती द्वारा भोजन ग्रहण न करने की शिकायत भैया से की। एकांत में प्यारी बहना से कारण ज्ञात होने पर उसने बहन की विदा कराने का विचार सास और ससुर जी के समक्ष बड़े अनमने मन से प्रकट किया।
ससुर बोले - “बेटा! क्या भूखी-प्यासी बहू विदा की जा सकती है?”
वह चुप रह गया…।
“बेटा! ऐसे तो भैया के साथ विदा भी नहीं की जा सकती है …पहला पीहर-दर्शन अकेले भैया के साथ नहीं, इक्कीस अतिथियों के साथ होता है। सारे कुटुम्बी-इष्टजन यहाँ पधारें, …सात दिवस यहाँ रहकर आसपास के जिन-मन्दिरों, तीर्थों के दर्शन करें, …हमारे संबंधी उनका भोजन आदि द्वारा स्वागत, सुमेल घनिष्ठता प्रदर्शन करें; …अंत में जिनेन्द्र देव की महापूजा-अर्चना के बाद ही विदाई होती है। आप हमें इस तरह लज्जित न करें, …नगर में हमें सम्मान से रहने का अधिकार बना रहे, …संबंधियों में हमारी कीर्ति भंग न हो।”
“क्षमस्व …ओह! मुझसे भूल हो गई।”
“कोई बात नहीं, …वह भोजन कब-कैसे करेगी? …उसके नियमों का, शुद्धता का ज्ञान न हो तो हमें बता दो, …हम उसकी प्रतिमाओं का पालन करा देंगे। हमें बड़ा हर्ष होगा। …हमारी चूक का दंड न दो बेटा!” अनुनय की भाषा में सासू बोली।
“माताजी! वह गजमोती द्वारा प्रथम महापूजा करने के बाद ही…।”
(सहर्ष) “अरे!! बस, इतनी-सी बात? …चलो, मैं लेकर आती हूँ। …सुनो जी! कोठार से गजमुक्ता निकाल दो जी।”
सास-ससुर दोनों ने बहू के द्वारा अर्चना-पूजा एवं भोजन करने का हर्ष माना। कुछ दिनों बाद योग्य समय पर, योग्य रीति से मनोवती की विदा हो गई।
मनोवती की विदा के बाद
वल्लभी नगर के राजमहल में एक पुष्पा नाम की मालिन प्रतिदिन रानियों की सेवा के लिए आती थी। उसने जिन-मन्दिर में कीमती गजमोती देखे, परन्तु वह तो उन्हें सामान्य मोती ही समझी; तो उसने सोचा - “क्यों न इनको गजरे में गूँथ कर महारानी जी को प्रसन्न कर दूँ। कुछ पुरस्कार ही मिल जायेगा। रानी की सेवा कितने भाग्य से मिलती है। सदा मेरे परिवार को घर जैसा ही समझती हैं।…मेरी बेटी सरला के विवाह में कितनी कीमती सुनहरी गोटा वाली ओढ़नी एवं घर-गृहस्थी के बर्तन भेंट किये थे। सारी समाज एवं ससुराल उनकी मुक्त-कंठ से प्रशंसा करती रह गई थी। और प्रियम् की बहू को मुँह दिखाई में सोने के लटकन वाले चूड़ामणि दिए थे। …आज भी महिला समाज में मेरी धाक है… आखिर महारानी जी की सेवा बड़े भाग्य से ही तो मिलती है।”
बड़ी रानी सत्याभा पुष्पा के हाथों में गजरा देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। …उसने उसे एक कीमती स्वर्ण-सुराही भेंट में दे दी। पुष्पा के तो मानो भाग्य ही खुल गये …आँखें फटी की फटी रह गईं …गोल-गोल ओष्ठ खुले रह गये।
“…ओ मेरी मैया! इत्ती कीमती चीज! धन्य हैं महारानीजी! आप धन्य हैं। …हम तो आपकी सेविका ही हैं, …चरणों की धूल हैं, …आप तो दया की देवी हैं, … अरे! साक्षात् लक्ष्मीजी ही हैं।” रानी सुनकर प्रसन्न हुई…।
पुरस्कार पाकर वह चली गई, परन्तु उस ही समय चूलिका नाम की दासी, जो आभा रानी की सेविका थी; उसने इस सुन्दर गजरे को देखा। वह सोचने लगी - “मैं तो कभी भी ऐसा गजरा लाकर अपनी रानी को न दे सकूँगी। ओह! वे अवश्य मुझसे नाराज होंगी, …अब क्या करूँ?” अन्यमनस्क-सी वह छोटी रानी के कमरे में जाकर उदास हो गई।
राजा ने सारे जौहरियों को बुलाकर गजमोतियों की माँग की। तब सबने अनभिज्ञता जाहिर की। सोमदत्त भी मना करके तो आ गए, परन्तु अब क्या करें?
बुधसेन को घर से निकालना
सर्वत्र मनोवती के रूप व स्वर-माधुर्य की प्रशंसा सुनते ही ईर्ष्या का साँप जेठानियों की छाती पर लोटने लगा। करें तो क्या करें? एक ही रास्ता है - रात्रि में पतिदेव को आराम न करने देना, …उन्हें भड़काना। …आखिर अनेकों रातें इस तरह बीतीं। छहों जेठानियों ने अपने-अपने पति को रति-सुख से वंचित रखा तो जेठों की अक्ल ठिकाने आ गई। वे रोज रोतीं, …बिलखतीं, …भड़कातीं। आखिर वे यह समझाने में सफल हो ही गईं कि इस घर में मनोवती के चरण पड़ना शुभ नहीं है।
“…आते ही सास-ससुर की अवहेलना, काम कुछ करना नहीं और आते ही मनमानी करना। … भला कोई गजमोती भी चढ़ाता है? …इसने तो आते ही घर की संपत्ति को उलीचना नहीं, लुटाना ही शुरू कर दिया है। कोई कीमत है या नहीं गजमोतियों की? …बुधसेन ने आज तक केवल खाया है, अय्याशी की है, एक पैसा भी कमाया हो तो बोलो? उसे क्या अधिकार है तुम्हारी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से अर्जित गजमोतियों को मन्दिर में चढ़ाने का। एक बात हो तो कहें। …अपने घर से मुट्ठीभर गजमोती लाई है, …यहाँ कौन-से खेतों में उत्पन्न होते हैं?”
ईर्ष्या-वश उन्होंने बहाना करके सास-ससुर की सेवा करने से इनकार कर दिया, …मुस्कराकर भोजन-पानी परोसना बंद कर दिया, मुँह बनाकर देखती रहतीं; प्रसन्नचित्त से सेवा न करतीं।
हेमश्री ने जानना चाहा - “बेटी! क्या बात है? कुछ कहो तो जानें? अचानक क्या हो गया है तुम लोगों को? क्या कोई कष्ट है?”
चित्रलेखा फनक कर बोली - “कुछ नहीं, (तुनकते हुए) अब तो वही रानी सेवा करेगी, …हमें तो कुछ काम आता ही नहीं है। हम तो गरीब घर से आये हैं। हमने तो कभी कोई काम किया ही नहीं है।” (उपालम्भ पर उपालम्भ दागे जा रही थी) सुनते ही हेमश्री सन्न रह गई।
ससुर ने बहू को गजमोती चढ़ाने की अनुमति क्या दी, घर में तूफ़ान मच गया। सभी बहस करने लगे।
सारे पुत्र आक्रोश से भरे हुए थे। सास-ससुर भी आपस में बातें करते हुए तनाव में आ गये…।
हेमश्री - (गम्भीर गहरी भंगिमा सहित आँखें तरेरते हुए) “विवाह-पूर्व ही बताना चाहिए था, …आज गजमोती है; कल को हीरे, रत्न और माणिक्य चढ़ाने की जिद करने लगे तो क्या होगा? सोचा है? इसके देखादेखी अन्य बहुएँ भी ऐसी ही कोई प्रतिज्ञा कर बैठें तो क्या होगा?”
सोमदत्त - “बात तो तुम्हारी सच्ची है। …कितने पुरुषार्थ से धन आता है? …ऐसे तो नहीं खोया जा सकता है। परन्तु …धर्म में खर्च करने से तो पुण्य-बंध होता है, …अचानक कोई बहू कहे तो …मैं क्या करता? आखिर हमारी प्रतिष्ठा भी तो कोई चीज है! यदि घर से बहू बिना भोजन किये पीहर जाती तो हमारी क्या प्रतिष्ठा रह जाती? …परन्तु अब क्या करें?”
हेमश्री - “अब क्या करना है? जो हुआ, सो हुआ, …आगे की सोचो।”
सोमदत्त - (बनियाई दिखाते हुए) प्रतिदिन एक लाख रुपये के गजमोती चढ़ाएगी तो 5600 दिन में सारा धन जाता रहेगा।"
हेमश्री - “सारा परिवार चढ़ाए तो 56 दिन में सारा धन चला जायेगा।”
सोमदत्त - “क्या! लेकिन चढ़ाना ही क्यों?..सारी दुनिया अक्षत-पुंज चढ़ाती है, वही चढ़ाओ न! नयी रीति निकालो ही क्यों?”
हेमश्री - (उपेक्षा से) “ऐसे कैसे साधु जो दूर-दृष्टि बिना ऐसे अटपटे नियम दे देते हैं?”
सोमदत्त - “भले ही किसी के घर में तूफान हो, …इन्हें क्या फर्क पड़ता है?”
हेमश्री - “साधुओं को कुछ न कहो, …उन्हें क्या लेना-देना है किसी से? …यह तो नियम लेने से पूर्व स्वयं सोचने की बात है।”
सोमदत्त - “उनका वश चले तो आपको पूरी तरह परिग्रह-मुक्त ही कर दें।” (उपालंभ देते हुए)
हेमश्री - (मुख-मुद्रा गम्भीर बन गई) “वे तो वीतरागी होते हैं, …आप अपनी सामर्थ्य एवं भक्ति-प्रमाण पुंज चढ़ा सकते हैं, इससे उन्हें क्या लाभ है?”
मणिसेन - “तो फिर अब हम भी अपनी श्रद्धा-भक्ति क्यों न बढ़ावें? …एक ही क्यों? मेरी पत्नी को माणिक्य चढ़ाने से कौन रोकेगा? देखता हूँ।” (आक्रोश से भर गया)
मंगलसेन - “ओह! तुम समझते क्यों नहीं हो? क्या हम अपने को लुटाने की प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं?”
महासेन - “आप ही समझो। …एक की देखा-देखी दूसरी बहुओं को रोका तो नहीं जा सकता है।”
सोमदत्त - (विचार-मग्न हो) “तो फिर क्या करें?”
रविसेन - “एक ही रास्ता है, …वह कमावे और खर्च करे; …हमें कोई उज्र नहीं है।”
चन्द्रसेन - “परन्तु उसने तो आज तक कमाया ही नहीं है, …वह कैसे कमाएगा?”
सूर्यसेन - (उग्रता से) “तो फिर हम भी क्यों कमायें? क्या हम आपकी सन्तान नहीं हैं?”
सोमदत्त - “बेटा! आज कैसी दुविधा में डाल रहे हो? …वह हम सबका लाड़ला है, …सुकुमार है, …हम सम्पन्न हैं; उसे कमाने की क्या आवश्यकता है?”
सूर्यसेन - (लाल आँखें तरेरते हुए) “हाँ, हम सब तो लौह-पुरुष हैं, एक वह ही तो पुष्प है!” (उपालंभ के रूप में क्रोध फूट उठा।)
हेमश्री - (प्रौढ़ आँखों को फैलाते हुए) “बेटा! समझ-बूझकर बात करो, …अभी ही तो उसका विवाह हुआ है। …धीरे-धीरे वह भी सीख जायेगा। वह तुम्हारा सगा भाई है, दुश्मन नहीं।”
मंगलसेन - (सुझाव देते हुए) “तो जब तक वह न कमावे, तब तक उसकी बहू को ससुराल न लाया जाए। …वह आएगी तो गजमोती चढ़ाएगी, …तब राजा को सब ज्ञात हो जायेगा। …राजसभा में आज बोला गया आपका झूठ आपके साथ-साथ हम सबको भी ले डूबेगा।”
सोमदत्त - “राज-हठ एवं त्रिया-हठ को कौन नहीं जानता है? राजा को गुस्सा आ गया तो वह हमें देश-निकाला दे सकता है। छोटी रानी साहिबा अभी तक कोप-भवन में हैं। उन्हें जब तक गजमोतियों का हार नहीं मिलेगा, वे राजा साहब को चैन से नहीं बैठने देंगी।”
हेमश्री - (सलाह आई) “पहले हार में से तोड़ कर दो हार क्यों न बनवा दें?”
सोमदत्त - “कहना आसान है, त्रिया-हठ क्या राज-हठ से कम होता है? बड़ी रानी अपने हार को छूने भी न देंगी।”
हेमश्री - “हाय! एक स्त्री की जिद के कारण क्या से क्या हो गया?”
गुणसेन - “स्त्रियों में बुद्धि तो होती नहीं है, …उलटी-सीधी प्रतिज्ञायें कर बैठती हैं …और मर्द परेशान होते रहते हैं।”
महासेन - “मर्द तो वही होते हैं, जो अपनी बीबी को अपने काबू में रखे…।”
मणिसेन - “जैसे तुम…” (सब हँसते हैं।)
महासेन - “मेरा उपहास न करो, …मेरी पत्नी समझदार है। …उसका कहर तुम सब पर उतरे तो फिर न कहना। उस ही की सलाह है …आज निर्णय होना चाहिए, …नहीं तो हमारा हिस्सा अलग कर दो। …फिर तुम चाहे जो करो।”
सोमदत्त - (दुखी होकर) “अच्छा! बात यहाँ तक पहुँच गई है…।”
मणिसेन ने उलाहना दिया - “उसकी बात कहाँ गलत है? …जब हम सब लुट जायेंगे, फिर हिस्से में क्या आएगा? आप ही कहो, …आप एक बहू को रख लो और हम सबको अलग कर दो। आपको जो प्रिय हो उसकी सेवा लो। …उनसे सेवा करा लो … हमारी सेवा आपको चाहिए ही कहाँ?”
हेमश्री - “बच्चो! आज तुम्हें क्या हो गया है? …परिवार-जन एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते हैं …और तुम …आज पूरा घर बर्बाद करने पर तुले हुए हो। सदियों से हमारा परिवार संयुक्त परिवार रहा है। …हमारी प्रतिष्ठा एवं आन के चर्चे घर-घर में गूँजते रहते हैं।”
सूर्यसेन - “सम्पन्नता दया-दान से नहीं, कमाने से होती है। …अभी तक हम सबने खूब परिश्रम करके कमाया है, …सो चर्चे थे।… अब तो झूठे धर्म, त्याग, दर्शन, पूजन के चर्चे होंगे और एक दिन हम सब भीख माँगेंगे।”
सोमदत्त - “ध्यान रखो बेटा! दान-पूजा से आज तक कोई गरीब नहीं हुआ है। हमारी धर्मात्मा बहू के भाग्य से और हम सबके धनार्जन से घर में कोई कमी न आने पाएगी।”
मंगलसेन - (उद्धत स्वर में) “तो फिर आप हमें जाने की आज्ञा देवें, …पूज्य पिताजी!”
सोमदत्त - “बेटा! कुछ सोचने-समझने को समय दो, …अभी तो विवाह-संगीत गूँजना भी बंद नहीं हुआ है। …पूरा परिवार आनन्द में ही भरा हुआ है, …इतनी जल्दी हम कैसे बेटे को अलग कर सकते हैं?”
हेमश्री - “हल्दी, मेहँदी का रंग भी फीका नहीं हुआ और… अपने भाई के प्रति ऐसे क्रूर न बनो। शांति से सब रास्ता निकल आएगा।”
सूर्यसेन - “ठीक है, …हम सब एक सप्ताह तक शांत हैं, …(चेतावनी का स्वर गूँजा) आगे आपको रास्ता निकालना है।”
परिवार में सारी बहुओं में विवाद गहराता गया। भाई लोग अपनी पत्नी एवं सन्तानों की बातों में आकर और रिश्तेदारों द्वारा भड़काए जाने पर उग्र हो उठे। माहौल बिगड़ता देखकर फिर सभा बैठी।
हेमश्री - (बैचेनीपूर्वक) “बेटा! हम तो अपने कोख-जाए को कुछ कह नहीं सकते हैं।”
सोमदत्त - (सहज संकोच दर्शाते हुए) “हमसे तो अपने खून से कुछ कहते न बनेगा।”
मणिसेन - (व्यंग्य से स्मित स्वर में) “तो हम कह देंगे।”
हेमश्री - (घबराए स्वर में) “क्या कहोगे?”
मणिसेन - (बेलाग बोला) “यही कि बाप-कमाई से गृहस्थी नहीं चलती है, …अपने पैरों पर खड़े होना गृहस्थ की शोभा है।”
गुणसेन - “और यदि वह कहे कि मैं तो धर्म कमा रहा हूँ तो?”
चन्द्रसेन - “धर्म से आत्मा का भला हो सकता है, परन्तु गृहस्थी का क्या करें?”
सोमदत्त - “धन की कमी नहीं है, … जीवन पुण्योदय से चलता है।”
गुणसेन - “धन से पापोदय नहीं आता है, धनार्जन प्रतिभा से दीनता नहीं आती है। अतः कमाना तो आवश्यक ही है। जीवन की कठिन परीक्षा में से एक है धनार्जन, …इसमें भी अब उसे पारंगत होना चाहिए।”
हेमश्री - “कोमल, मासूम, भोला बेटा कहाँ भटकेगा?” माँ बिसूरने लगी।
मणिसेन - “हम उसे धन दे देंगे, …उसे जाने भी दो। …देशाटन से मनुष्य मजबूत होता है।”
गुणसेन - “तुम्हारे तर्क माँ की ममता को समझ में नहीं आते हैं।”
सूर्यसेन - (खीझकर) “न समझो, …(मंद स्वर में) उसे थोड़ा धन दे दो, …जिससे वह व्यापार करेगा।”
चन्द्रसेन - (उपहास करते हुए) "…व्यापार क्या करेगा?
उसे कुछ काम आता ही कहाँ है? …हाँ, कुछ दिनों में खा-पीकर अवश्य घर आ जायेगा।"
महासेन - “फिर देखना! हाथ पसारेगा, …रोयेगा, …तब हम उसे साथ देंगे; …उसे भी हमारा एहसान लगेगा।”
सोमदत्त - “हमसे तो कुछ कहते नहीं बन रहा है।”
मणिसेन - “न कहो, …लिख कर बोल दो।”
हेमश्री - (बिलखते हुए) “हाय! …नियति कैसे दिन दिखा रही है। …प्रभो! ऐसी परीक्षा न लेते, …मैं क्या करूँ? …एक तरफ मेरा धर्मात्मा बेटा एवं फूल-सी बहू है और दूसरी तरफ सारा परिवार।”
मंगलसेन - “अभी किसी को पता न लगेगा। …आप निश्चिन्त रहो, …बेटे को निकाल दो। …समाज में कह दो कि वह व्यवसाय के लिए परदेश गया है। बहू भी घर में नहीं है। … जब वह स्वयं सम्पन्न हो जायेगा, तब लेता आएगा। इस तरह गजमोती भी बच जायेंगे …और हम सब भी सुरक्षित और प्रेम से रहेंगे। जब वह घर आयेगा …तब हम उसका विरोध थोड़े न करेंगे।”
सोमदत्त - “ठीक है।”
हेमश्री - “फिर क्या कहना है?”
मणिसेन - "प्रिय बुधसेन! तुम गजमोती कमाकर अपनी बहू के साथ आओ। इससे तुम परिवार एवं समाज में सम्मान पा सकोगे। तुम सौभाग्यवान हो, इस कार्य में अवश्य सफल होओगे।
- तुम्हारा पिता एवं भ्रातागण।"
बुधसेन मन्दिर से घर आकर, भोजन करके पिता से मिलने कक्ष में आया तो बाहर से ही उसे पत्र थमा दिया गया। पत्र पढ़कर वह बहुत देर तक किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया। …अन्ततोगत्वा उसने अपने पिता से आशीर्वाद लिया, भाइयों से मिलनी करके आशीर्वाद लिया, भौजियों से क्षमा माँग कर, भतीजों को प्रेम करके एक जोड़ी कपड़े लेकर घर से निकल पड़ा।
भैया-भाभियाँ झरोखे से देख रहे थे, …भतीजे हाथ हिलाकर विदा दे रहे थे। …एक मासूम भतीजा दौड़ता हुआ आया और कदमों से लिपट गया…। “चाचा छोड़कर मत जाओ, …नहीं तो मुझे भी ले चलो।”
सबकी आँखों में आँसू भर आये, …तत्काल मंगलसेन आया और अपने बेटे को खींचकर अंदर ले गया।
माता-पिता - (साश्रु विगलित स्वर में) “बेटा! जाओ, ठीक से रहना। जीवित रहे तो मिलना होगा…।”
बेटा अपने माता-पिता के गले से लिपट गया। तीनों की आँखों में आँसुओं का सैलाब था। अहंकार की विजय से गर्वोन्मत्त जेठ-जेठानियों के मस्तक असमंजस मुद्रा में न रो पा रहे थे और न ही हँस पा रहे थे।
नगर से बाहर आने पर रथ पर लदे धन को उसने रथ के साथ लौटा दिया। रथ के वापस आने पर माँ रोने लगी, पिता बिलख उठे।
बुधसेन से मिले पत्र में लिखा था - “पूज्य माताजी-पिताश्री! इस धन की क्या आवश्यकता है? आपका आशीर्वादरूपी धन मुझे कभी रंकपने का अनुभव न करने देगा।”
आप कहेंगे - “आगे कैसे चलेगा?”
“मेरा समाधान यह है कि भवितव्य खचित है तो चिंता क्या? आपके पावन तात्त्विक संस्कार के प्रसाद से अभी तक भी तो मैं अपने पाप-पुण्य के उदय को ही भोग रहा था और आगे भी वही सिद्धांत मुझे निर्भार रखेगा।”
रथ छोड़ा, परन्तु भाग्य-रथ ने बुधसेन का साथ न छोड़ा … एक मित्र ने राह में पूछा - “मैं हस्तिनापुर को जा रहा हूँ … तुम्हें और कहीं न जाना हो तो मेरे साथ तीर्थयात्रा को चले चलो…” और वह सहज ही तीर्थयात्रा करने के पुण्य का भागी बन गया। रास्ते में उसे बड़ा आनन्द था…। स्वाध्याय से प्राप्त भेदविज्ञान उसे आनन्द दे रहा था। कर्मोदय के खेल को वह साक्षी-भाव से देख रहा था। उसे धन कमाना तो आता न था। मन में एक विचार आ रहा था, दूसरा जा रहा था…। कोई भी विचार स्थिर न हो पा रहा था। ऐसे में दुविधा के होने का आश्चर्य भी तो नहीं है।
दुविधा - “आगे क्या करना है?”
शांत मन - “करना क्या, होना है।”
दुविधा - “अब क्या होगा?”
शांत मन - “परिणमन से ज्यादा क्या होगा?” (होठों पर स्मित हो आया।)
दुविधा - “पत्नी को क्या बताऊँ?”
शांत मन - “झूठ बोलने से बात बिगड़ती है, सत्य बोलने-सुनने से साहस का जन्म होता है। झूठ से उत्पन्न माया स्व-पर को दुखदायी होती है।”
दुविधा - “माता-पिता, भ्राताओं के बारे में वह क्या सोचेगी?”
शांत मन - “योग्यता का परिचय ही तो देगी, …यदि अयोग्यता है तो दूर करने लायक है, पोषण करने लायक नहीं।”
दुविधा - “उसे कुछ न बताऊँ तो?”
शांत मन - “जीवन-साथी को उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।”
दुविधा - “उसके माता-पिता को समाचार मिल गया तो?”
शांत मन - “जिस बात की कभी न कभी जानकारी मिलनी ही है, वह आज ही मिल जाये तो उसमें क्या बुराई है?”
दुविधा - “न मिले तो?”
शांत मन - “अनिश्चितता में माता-पिता, भाई-बन्धु सब हैरान होंगे। इससे हम दोनों भी बदनाम होंगे। कुटुंब के साथ राज्य व देश में भी कठिनाई उत्पन्न हो सकती है। कोई भी माता-पिता अपनी बेटी-जमाता के बारे में अनिश्चितता में जीवित कैसे रह सकते हैं? खोज-बीन में अनावश्यक समय, शक्ति एवं उपयोग की बर्बादी होगी।”
रथ पर आरूढ़ होकर वह कुछ दिन में हस्तिनापुर पहुँच गया।
रात्रि में ससुराल पहुँचने पर सभी ने विशेष कुशल-क्षेम पूछी…। अंततः उसने मनोवती को सब कुछ बताते हुए उससे वहीं रहने का आग्रह किया।
मनोवती - “सुख में नहीं, दुख में स्त्री के सतीत्व की परीक्षा होती है। क्या आप मुझे परीक्षा से वंचित रखकर मुझे लोक-धर्म से भी दूर करना पसंद करेंगे? स्त्री काया का नहीं, पति की छाया का नाम होता है। मैं आपके लिए आपके निर्णयों में विघ्न स्वरूप सिद्ध नहीं होऊँगी। देखना! यदि मेरे सतीत्व एवं आपके पुरुषार्थ में पवित्रता है तो शीघ्र ही हमारा दारिद्र्य स्वतः दूर हो जायेगा। माता-पिता, भ्राता सहित मेरी बड़ी जीजियों, भतीजों-भतीजियों सहित सबका मिलन हो जायेगा।”
बुधसेन - “लेकिन तुम संग होती तो मुझे तुम्हारी सुरक्षा एवं आवास-प्रवास का विकल्प सताएगा।”
मनोवती - “यह तो आपको विवाह-पूर्व सोचना था, …अब तो आप ही मेरे पुण्य-प्रमाण रक्षक हैं। …मुझे आपसे कभी कोई शिकायत नहीं होगी। आप जो खायेंगे, उसमें से बचे अंश को मैं प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लूँगी।”
बुधसेन - (उदास आनन, शिथिल मन से) “मुझे असमंजस में न डालती तो अच्छा होता।”
मनोवती - “यह आपकी भद्रता ही है, जो आप मेरे सुख एवं हित के बारे में सोच रहे हैं। मुझे जिन-शासन का पूर्ण विश्वास है। कोई अन्याय करने में समर्थ नहीं है। धैर्य से न्याय के आनन्द में सहभागी होने दीजिए।”
बुधसेन - “आपके माता-पिता को मेरे परिवार द्वारा किया गया छल लगेगा। …विवाह के बाद अचानक इस तरह बेघर होना किसे इष्ट लगेगा?”
मनोवती - “मेरे माता-पिता दिखावटी धर्मात्मा नहीं हैं। उनको हमसे ज्यादा पुण्य-पाप का भरोसा है। मुझे सदा यही शिक्षा दी है कि अंतिम नारी-भव इच्छती हो तो उदय का दोष किसी अन्य के माथे स्वप्न में भी न देना। (पूर्ण आत्मविश्वस्त स्वर में) देखना, वे हमारे निर्णय में सदा साथ देंगे।”
बुधसेन - “मुझे तो संकोच होता है कि कैसे उनके सामने अपने परिवार का सत्य कहूँ?”
मनोवती - “परिवार का नहीं, कर्मोदय का …और वह आपका अकेले का नहीं, उसमें मेरा भी योगदान है।… (स्मित वदन) आओ, हम इस समय आनन्द से कर्मों की निर्जरा करें।”
मनोवती ने बुधसेन का हाथ अपने हाथों में थाम लिया, शेष काम अंक ने किया। …दोनों भावी-स्वप्नों में खो गये।… चन्द्रमा मुस्कराते हुए दोनों पर चाँदनी बिखेर रहा था, जो अब शरमा कर बदली में छिप गया।
अगली प्रातः प्रभाती के साथ प्रभु-स्मरण व आत्म-स्वरूप की प्रतीति का आनन्द करते हुए अपने मन की बात सभी के सामने रख दी। ससुराल में सभी ने थोड़ा समय रुककर जाने का आग्रह अवश्य किया, परन्तु ‘शुभस्य शीघ्रम्’ की उक्ति के अनुसार माता-पिता की आज्ञानुसार व्यापार करने का समर्थन किया। …ससुराल की मदद ठुकराने एवं घर-जमाता बनने के प्रस्ताव के न स्वीकारने से उनका सम्मान और भी बढ़ गया।
दोनों ने प्रातः जिन-दर्शन, पूजन, भोजन के बाद व्यापार हेतु प्रस्थान करने की अनुमति पाई। सबने सहर्ष उनकी विदा की।
बीच रास्ते से ही रथ हस्तिनापुर को लौटा दिया गया था। दोनों सामान्य वस्त्र-आभूषण में थे। …कीमती सामग्री रथ के साथ लौटा दी गई थी। अनमने मन से सारथी रथ लेकर वापस पहुँच गया। वस्त्र-आभूषण लौटाने एवं कमाने के लिए अनिश्चित स्थान की ओर बढ़ने का समाचार माता-पिता को बहुत दिनों तक रुलाता रहा।
इधर वल्लभीपुर के राजा ने गजमोती पाने का उपाय न छोड़ा था… रानी ने भी स्त्री-हठ नहीं छोड़ी थी। गुप्तचर विभाग सतर्क हो गया था। खोज-बीन चल रही थी।
“आखिर यह मोती एक ही दिन क्यों चढ़े?”
“नगर की कोई महिला एक ही दिन क्यों चढ़ाकर शांत हो जाएगी?”
“उस दिन इस नगरी में कौन महिला नई आई थी?”
“उस दिन के बाद किस महिला को नगरी में नहीं देखा गया?”
“सेठ सोमदत्त की बहू एवं बेटा दोनों अब नगरी में नहीं दिख रहे हैं। क्यों?”
मालिन एवं उसके मन्दिर में दर्शन-पूजनार्थ आने वाली महिलाओं से इन सब प्रश्नों के जवाब में यह ज्ञात हो ही गया कि मनोवती के तीन दिन तक भोजन न करने से उनके परिवार में नगर में हलचल मची हुई थी। …फिर उसके भैया के आने पर उसने बड़े ठाठ से पूजा की थी और उस ही दिन वह पीहर को रवाना कर दी गई थी। और उस ही दिन के बाद से गजमोती दिखाई नहीं दिए। …हो न हो, ये गजमोती उस ही ने चढ़ाये होंगे। …उसके बेटे को दहेज में बड़ी कीमती चीजें मिली थीं। हो सकता है गजमोती भी वही दहेज में लेकर आई हो …और उसके न होने से अब कोई गजमोती चढ़ा भी नहीं रहा है।
सेठ सोमदत्त को राजा ने बुलवाया और पूछताछ की। “…सेठ! आपका छोटा बेटा कहाँ गया?”
सोमदत्त - (संकोच से) “व्यापार करने।”
राजा - “उसके साथ कौन-कौन गया?”
सोमदत्त - “अकेला।”
राजा - “यह कैसे सम्भव है? (प्रश्नवाचक मुद्रा में देखते हुए)… हमारे नगर से कोई भी व्यापारी सार्थवाह के बिना नहीं जाता है, ताकि अनुभवियों के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में सभी व्यापारी सुरक्षित रहें।”
सोमदत्त चुप रहा।
राजा - “चुप क्यों हो?”
सोमदत्त - “उसने अकेले ही जाने की जिद की थी।” (झूठ बोलकर बचने का प्रयास किया।)
राजा - “असम्भव। …कुछ न कुछ दाल में काला है। …तुम झूठ बोले थे कि तुम्हारे पास कोई गजमोती नहीं हैं, …परन्तु तुम्हारी बहू ने गजमोती चढ़ाये थे। यह सबको ज्ञात है।” (राजा ने अँधेरे में तीर छोड़ा।)
(तीर सही दिशा में लगा।)
सोमदत्त - (घबराते हुए) “मुझे कुछ ज्ञात नहीं है…।”
राजा - “फिर झूठ? …एक झूठ को छिपाने के लिए कितने झूठ बोलोगे?”
सोमदत्त - (हताश भाव उभरा) “महाराज! आपसे झूठ बोलने का कोई सवाल ही नहीं उठता। …आपके विश्वास से बढ़कर दुनिया में गजमोती नहीं हो सकते हैं।”
राजा - “तुमने गजमोती देने के लिए मुझे इनकार तो कर दिया था, परन्तु तुम्हारे बड़े बेटे की बहू ने समाज को यह बात बताई है कि इस तरह मनोवती के आने एवं प्रतिदिन गजमोती का पुंज चढ़ाने से सारे गजमोती समाप्त हो जायेंगे …तो कंगाली आने के डर से बुधसेन को व्यापार के बहाने घर से निकाल दिया गया है।” (फिर अनुमान से तीर दे मारा और एक बार फिर तीर सही दिशा में लगा।)
सेठ पहले तो खीझ उठा और फिर लगभग बिलखते हुए कहने लगा - “महाराज! क्षमा करें, …इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। …बुढ़ापे में बेटों-बहुओं के सामने मेरी चलती नहीं है। …मैं उसे जाने से रोक न सका।”
राजा - (सारा माजरा समझते ही) “ठीक है, तुमने हमारे राज्य में पहली बार विश्वासघात किया है। …तुम्हें एक ही दंड दिया जा सकता है, …तुम हमें गजमोती दो या नहीं; …परन्तु उस पुण्यशाली बुधसेन एवं उसकी धर्मात्मा मनोवती को लाकर हमारे राज्य की शोभा लौटाओ, अन्यथा एक माह में आप सब भी इस राज्य को छोड़ कर चले जाओ।”
सेठ प्रसन्न हुआ …उसने तत्काल हस्तिनापुर एवं सारे रिश्तेदारों के नगरों में सम्पर्क किया, परन्तु …हाय, उसका कोई पता न लगा।
अब क्या करें?
परिवार के बत्तीस लोग धन लेकर राज्य छोड़कर चल पड़े। …रास्ते में पाप का उदय आ गया। …वे लुटेरों-डाकुओं द्वारा लूट लिये गए। अब तो कीमती वस्त्र तक न बचे। …डाकू धन, गजमोती एवं आभूषण तक उतार कर ले गये।
वे लोग कंगाल हो गये। …अनेक दिनों तक भूखे-प्यासे बैठे रहे, क्योंकि कोई उन पर विश्वास नहीं करता था। …बिना पूँजी, सड़क पर उतर कर कोई व्यापार करने की आदत न थी। मजदूरी ढूँढने लगे। कभी भीख माँगते …अपना देश छोड़कर अन्य देशों में भटकते फिर रहे थे।
उस समय इंद्रप्रस्थ का राजा सुकेतुवाहन था। उसकी रानी सुमुखी थी। इन सबके प्राणों से भी अधिक प्यारी सुनयना नाम की सुन्दर सुशील कन्या थी। राज्य में बड़ा न्याय, धर्म एवं शान्ति का वातावरण था। सर्वत्र भावी-सिद्धों का आहार-विहार हुआ करता था।
चलते-चलते मनोवती एवं बुधसेन इंद्रप्रस्थ पहुँच गए।
…भूख-प्यास से हाल बेहाल थे, परन्तु जिनमन्दिर को देखते ही दोनों ने मन्दिर के किनारे पर स्थित कूप पर स्नान किया एवं श्री जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक-पूजन किया, स्वाध्याय किया।
उस नगरी में एक सुदत्त श्रेष्ठी के घर में मुनि भगवंत के आहार हो रहे थे। …दोनों ने बड़ी भाव-भक्ति से उन्हें आहार दिया। साधर्मी जानकर श्रेष्ठी ने उन दोनों को भोजन करने का आग्रह किया, परन्तु मनोवती ने तो दर्श प्रतिज्ञा होने से अपने उपवास का बहाना किया और बुधसेन को आहार के लिए बैठा दिया; परन्तु बुधसेन ने भी एक शर्त लगा दी कि मैं कुछ कमाने के बाद ही आहार करूँगा, अन्यथा नहीं।
सुदत्त - “ठीक है, ठीक है। …आप भोजन ग्रहण कीजिए।”
सानन्द भोजन ग्रहण किया…।
व्यापार का प्रबंध होने लगा। …बाजार में गये तो एक घर के बाढ़ में बह जाने से उसकी मियार¹ नदी में तैरती हुई आई थी, सो एक 60 वर्षीय वृद्ध लकड़हारा रमुआ काछी उसे बेचने का प्रयास कर रहा था। परन्तु वह पुरानी, गंदी, सड़ी-सी मियार देखकर कोई खरीद ही नहीं रहा था। जलाने वाले भी उसे काटने से डर रहे थे। …जब सीधी (कटी हुई) लकड़ियाँ ही जलाने को मिल रही हों तो श्रम कौन करे? वह रुआँसा होने लगा। …उसका नदी से निकालने एवं बोझ ढोने का मूल्य भी उसे न मिला …अंततः वह उसे सस्ते दामों पर बेचने को तैयार हो गया, मियार फिर भी न बिकी।
रमुआ को उदास देखकर बुधसेन को उसके दारिद्र्य पर दया आ गई। (…उँगली से हीरे की अँगूठी उतारते हुए कहा) “जा तू यह अँगूठी ले जा और यह मियार मेरे जिन-मन्दिर के पास के आँगन में डाल आ।”
रमुआ - “इसका आप क्या करोगे?”
बुधसेन - “करना क्या है? तेरी दरिद्रता दूर करनी है। इसे बेचकर तू अमीर हो जायेगा। …आज के बाद तू मजदूरी न करना। हाँ, धर्म में अवश्य लगना।”
रमुआ - “परन्तु इतनी कीमत इस लकड़ी की नहीं है।…मैं अन्याय का धन कैसे ले सकता हूँ? …आप तो मुझे दो रुपये दे दो, बस! …इससे ज्यादा की मुझे चाह नहीं है।”
बुधसेन - “आप संतोषी हो, इसीलिए तो मैं दे रहा हूँ। …आप भगवान आत्मा हैं। …आप मुझे एवं अपने को देह से मत देखो; …पूर्व में अनंत जन्मों में आप से मेरे अनेकों नाते रहे हैं। भविष्य में आप एवं मैं सिद्धालय में मिलेंगे। …उसकी भेंट दे रहा हूँ। आप अपने बेटे की भेंट समझ कर रख लो।”
“आप इस उम्र में भी चोरी नहीं कर रहे हैं …और मैं आपको धर्मात्मा जानकर ही कुछ कर रहा हूँ।”
रमुआ - “भगवान! तेरी लाख-लाख दया! …मेरी कोई संतान नहीं थी, आज तूने देवता के वेश में मुझे ‘पिता’ शब्द सुना ही दिया।” उसकी आँखों में आँसू तैर रहे थे। “बेटे! अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।” (वह बिना रुपये लिये ही जाने लगा।)
बुधसेन - " अरे! क्या आप मुख से ही मुझे अपना बेटा कहते हो? हृदय से नहीं?"
रमुआ - (उसकी आँखें आँसुओं से तर थीं) “…नहीं बेटा!
…भगवान का दिया मेरे पास सब कुछ था, परन्तु एक संतान की आस से दुखी था। आज वह सुख मुझे मिल गया। …अब मुझे और क्या चाहिए?”
बुधसेन - “आपके घर में और कौन है?”
रमुआ - “कोई नहीं।”
बुधसेन - “तो चलो! आज से मेरे साथ रहोगे।”
रमुआ - “कहाँ?”
बुधसेन - “भगवत्-शरण में। …मेरे पास भी घर नहीं, मात्र उनकी ही पावन शरण है।”
रमुआ - “अरे! फिर यह कीमती अँगूठी आप मुझे क्यों दे रहे थे?”
बुधसेन - "दे नहीं रहा था, …व्यापार करने निकला था।
यदि मेरा पुण्य होगा तो धन सहज, स्वतः मेरे पास आ जायेगा। जैसे अभी-अभी मैंने एक पावन ‘पिता’ कमा लिया। आगे की मुझे क्या चिंता है? चलिए! आपकी बहू आपकी प्रतीक्षा कर रही है।"
दोनों धर्मशाला के आँगन में आये…।
बुधसेन - (आनन्द से पुकारते हुए) "मनो! सुनो! …देखो, आज हमारे धर्म-पिता पधारे हैं।
…सुनते ही मनो ने सिर पर पल्ला रखकर चारों ओर देखा उसे तो लकड़हारे के सिवाय कोई अन्य न दिखाई दिया।
बुधसेन - “ये हमें पिताश्री की याद को विस्मृत कराने वाले धर्म-पिता हैं। इन्हें भगवंत एवं हमारे सिवाय किसी का भरोसा नहीं है… हम इनकी वैयावृत्ति करके अपना मानव भव सार्थक करेंगे।”
उसने रमुआ का परिचय कराया तो वह उनके चरणों में झुक गई। …शीघ्र ही शीतल जल ले आई। इस सबके बीच में रमुआ ने मियार जमीन पर पटक दी। …शीतल जल के आदान-प्रदान में किसी का भी ध्यान मियार पर नहीं गया …परन्तु निवृत्त होने पर तीनों ने देखा …मियार चकनाचूर हो चुकी थी और… अरे! यह क्या? उसमें से विपुल धनराशि सहित गजमोतियों का भंडार एवं एक पत्र निकला। …उसमें लिखा था -
“शाश्वत आत्मज्ञान से भरपूर प्रियात्मन्!
मेरी विनय गंभीरता से पढ़ो,
मैंने अपने खून-पसीने की, ईमानदारी की कमाई को अपने पापी, सप्त व्यसनी पुत्रों को देने से अच्छा नदी में बहाना समझा है। …मुझे मोह न होता तो मैं इसे किसी सत्कार्य, मन्दिर-निर्माण, साधर्मी-स्थितिकरण या धर्म-प्रभावना में खर्च करता, परन्तु अपनी संतान के सुधरने की मोहपूर्ण प्रतीक्षा में मैं धन का सदुपयोग ही न कर सका। आज जिस किसी व्यक्ति को यह धन मिले - यह सब उस ही धर्मात्मा के उपभोगार्थ रहेगा। …मैं उसके सत्कर्मों की अनुमोदना से पुण्य-बंध करके जा रहा हूँ; परन्तु यदि कोई सप्त व्यसनी, भोगी, पापी व्यक्ति इस धन का उपभोग करेगा तो उसे मेरी हाय लगेगी और वह जन्म-जन्मांतरों तक दरिद्र रहेगा।
मैं तुम्हारा मोक्ष-महल में इंतजार करूँगा।”
- सेठ विचक्षण धर्मा
पत्र पढ़ते ही बुधसेन की आँखों में आँसू आ गये …सारा धन सम्हाल लिया। उसने फैसला किया कि यह धन मात्र जिन-मन्दिर बनाने के लिए ही प्रयोग किया जायेगा। उस समस्त धन को लेकर वह राजा के पास पहुँचा।
बुधसेन - (निवेदन किया) “स्वामी! यह पत्र आप पढ़ लीजिए और जैसी आज्ञा हो, सो कीजिए। हमारी इच्छा एक सुन्दर जिन-मन्दिर बनवाने की है …आपकी आज्ञा हो तो आपके राज्य में योग्य स्थान पर भवोद्धारक जिन-शासन की देशना गुंजाने वाले मन्दिर का निर्माण कराना चाहते हैं।”
राजा ने उस भरपूर धन को देखा और वह बुधसेन को देखने लगे …उन्हें बुधसेन के त्याग, उदारता, निःस्पृहता, न्यायशीलता देखकर बड़ा आनन्द हुआ। …बुधसेन का सम्पूर्ण परिचय पाकर मनोवती से मिलकर उसे अत्यंत हर्ष हुआ।
राजा (विनीत स्वर में) - “हे देवानुप्रिय! आपको पाकर आज मुझे बड़ा आनंद हुआ है। यदि आप मुझे अनुमति दें तो मैं आपको आधा राज्य भेंट करना एवं अपनी प्रिय पुत्री सुनयना का विवाह आपसे करना चाहता हूँ।”
बुधसेन - (स्वगत) “रहने का ठौर-ठिकाना नहीं और …विवाह?.. व्यवसाय तक तो है नहीं।” …बुधसेन असहज हो गये। …वे इसके लिए मनोदशा लेकर तो नहीं आये थे।
मनोवती की ओर देखने लगे बुधसेन …मनोवती समझ गई। पुण्यशाली के पुण्योदय को इनकार कौन कर सकता है?
राजा - “इन गजमोतियों पर आपका ही अधिकार है, आपकी भावनानुसार इससे जिनमन्दिर का निर्माण हो सकता है, पर उतना धन मैं स्वयं व्यय करके जिनमन्दिर बनवाऊँगा। …आपके दिशा-निर्देशानुसार जिनमन्दिर बनेगा।”
इतने में सुनयना आकर मनोवती के चरणों में नम गई - “हे दीदी! आपकी छोटी बहन को आप दोनों के चरणों की सेवा करने की आज्ञा प्रदान कीजिए।”
मनोवती ने सुना तो तत्काल उसे गले से लगा लिया और दोनों का हस्त-मिलाप करा दिया। और कोमल हस्त कठोर हस्त से गर्म हो गया।
सभी को महल में चलने का आग्रह किया गया। राजमाता अपनी नई बेटी एवं भावी दामाद को बड़े आग्रह से लिवा ले गईं। वे तो वापस मन्दिर की शरण में ही जाना चाहते थे, …परन्तु पलक झपकते ही उनका नगण्य सामान राजमहल में आ चुका था।
मनोवती ने गजमोती चढ़ाकर दर्शन-पूजन करके अपना नियम निर्वाह किया। तीनों ने महल में सुस्वादु भोजन ग्रहण किया।
कुछ ही दिन में सुनयना और बुधसेन का विवाह हो गया।
जिन-मन्दिर निर्माण
जिन-मन्दिर का निर्माण प्रारम्भ हो गया। सर्व प्रथम कुआँ खोदा गया। …पश्चात् शुभ मुहूर्त में शिलान्यास किया गया। चिनाई में पानी छानकर ही लगाया जा रहा था। दो आदमी सम्पूर्ण समय पानी छानते ही नहीं थे, साथ ही उनके जीवों की बिलछानी इतनी सावधानी से करते थे कि एक भी जीव मरण को प्राप्त न हो।
आदमियों से काम कम कराया जाता था और धन ज्यादा दिया जाता था, परन्तु अहिंसा का पूरा ध्यान रखा जाता था। और जब जलकाय, पृथ्वीकाय का ध्यान रखा जायेगा तो मजदूरों की देह में रहने वाले शुद्धात्मा का ध्यान क्यों न रखा जायेगा?
अल्पकाल में ही इस मन्दिर के निर्माण में वरती जाने वाली उदारता, करुणा व धार्मिकता का यश दशों दिशाओं में गुंजायमान होने लगा।
विराधना का फल
वल्लभीपुर से निकले बत्तीस सदस्यों की दशा अत्यंत शोचनीय थी। कभी एक दिन, में कभी दो दिन में एक बार भोजन की व्यवस्था बनती; यहाँ तक कि झूठन तक खानी पड़ती थी। बच्चे अनाथ की तरह दूसरे बच्चों को खाते हुए देखते थे। किसी दूसरे बच्चे के हाथ से मिठाई, पूरी, रोटी का टुकड़ा जमीन पर गिरता तो वे उसे लपक लेते थे।
सदा भावना भाते - “हे प्रभो! किसी के हाथ से कुछ न कुछ गिर जाए तो उनके पुण्य का उदय आ जाए।”
बच्चों की ऐसी दशा देखकर माता-पिता को रुलाई आ जाती। …अनेक दिनों तक उन्होंने दूध-घी के दर्शन नहीं किये थे। …अग्नि उनके चूल्हे से रूठी हुई थी। …जलती गीली लकड़ी के धुएँ से झोपड़ी के साथ उनके चेहरे भी काले हो जाते थे। सच है, धर्म-धर्मात्मा से द्वेष करने का फल क्या नहीं होता है?
अजीव के प्रेम में निगोद और जीव के प्रेम से मोक्ष स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।
एक दिन आगरा में इन सबने भी इस जिन-मन्दिर के निर्माण की ख्याति सुनी और उनके भाव भी हो गये कि - “चलो, पापियों की सेवा से तो अच्छा है जिन-मन्दिर के निर्माण में अपना पसीना बहाया जाये। जीवन में हमने कुछ भी तो अच्छा नहीं किया, ऊपर से धर्मी-धर्मात्माओं का तिरस्कार और इस अजीव, वेश्या-समान चंचल धन को स्थिर समझकर पाप ही पाप किये। अपने मासूम भाई एवं संतान को ही घर से दूर कर दिया। न जाने वह कहाँ किस हाल में होगा?”
“मन्दिर-निर्माण से ही अपने जीवन में धर्म का उदय हो जाये” - इस आशा से भरे हुए चल पड़े इंद्रप्रस्थ नगरी की ओर। रास्ते में उनके परिणाम उज्ज्वल होते जा रहे थे। सच है, धर्म-मार्ग की अनुमोदना एवं पाक्षिक श्रावक होते ही पाप-कर्म पुण्य में बदलने लगते हैं। असाता कम होने लगती है और साता-पुण्य बढ़ने लगते हैं।
उसी दिन से ही उनके भोजन की अनुकूलता बनने लगी। …वे भजन, कीर्तन, तत्त्व-चर्चा करते हुए चले जा रहे थे। …रास्ते में सब उन्हें साधर्मी समझकर उनकी तीर्थ-राह को आसान बनाने के लिए स्वतः आगे आकर उनके अशन-वसन की व्यवस्था करने लगे।
उनके साथ अन्य दुखी मनुष्य भी भजन, तत्त्व-चर्चा करते हुए मन्दिर-निर्माण में अपना सौभाग्य खोजने चल पड़े। …बड़ा जुलूस-सा जहाँ से गुजरता सबके मन को मोहने लगा।
वे सब जिन-मन्दिर निर्माण के लिए जा रहे थे, सो मार्ग में लोगों ने केशरिया ध्वज उनके हाथों में थमा दिए। वे अपना आनन्द अपने साथ लिये बर्तन और तालियाँ बजा कर प्रकट कर रहे थे। सो मार्ग में खंजरी, मंजीरा व ढोलक बजाने वाले भी संगीत की तान गुंजाने लगे।
जिन-भक्ति का फल
इंद्रप्रस्थ तक आते-आते सबके भाव बदल गये। …सबने मन्दिर-निर्माण में मजदूरी का काम करना स्वीकार कर लिया और बड़ी भाव-भक्ति, लगन और ईमानदारी से काम करने से उनके जीवन में पुण्योदय आने लगा।
माता-पिता को अपनी संतान को दूर करने का बड़ा दुख था। वे निरंतर पश्चात्ताप की आग में जल रहे थे, सो संयोग से उन दोनों को महलों में रहने एवं सेवा करने का अवसर मिला। माताजी प्रतिदिन सुनयना की सेवा करती रहतीं, परन्तु एक दिन मनोवती को पारणा उत्सव के समय सुनयना के महल में आने का काम पड़ा, तब उसने गौर से बुजुर्ग दासी को देखा। …चूँकि मनोवती मात्र तीन दिन ही ससुराल में रही थी, अतः सास से ज्यादा परिचय न हो पाने से स्मरण नहीं हो रहा था। और सासू भी उम्मीद नहीं कर सकती थी कि यह मेरी बहू हो सकती है; …क्योंकि उनके अनुसार तो वह हस्तिनापुर में रहती होगी अथवा तो पति के साथ-साथ कहीं मारी-मारी फिर रही होगी। दोनों को लगा तो कि यह कोई जानी-पहचानी आवाज है, …कहीं देखा है? परन्तु ‘कहाँ देखा’ - यह याद नहीं आया। … मनोवती ने बड़े आदर से उस दासी को बुलाया और परिचय लिया। …एकान्त में बैठे-बैठे उसकी कथा सुनी। …आँखों में आँसू बह रहे थे, …समझ में आ गई सारी बातें।
सास-ससुर का परिचय
मनोवती तत्काल लौट कर अपने महल में आ गई। …रात्रि में बुधसेन के आने पर वार्ता हुई -
बुधसेन - “प्रिये! जिन-मन्दिर निर्माण में कोई कमी दिख रही है क्या? तुम आज उदास क्यों हो? सब ठीक तो चल रहा है न?”
मनोवती - "निर्माण तो ठीक चल रहा है, लेकिन कहीं गलत भी हो रहा है। (व्यथित स्वर में)
बुधसेन - (बेचैनी छा गई) “कहाँ? कब? कैसे? क्या गलत हुआ? किसने गलत किया? कुछ बताओ तो समझ में आये।”
मनोवती - “हम सुख से हैं, परन्तु हमारे माता-पिता, भ्राता-भावजों का स्मरण मुझे सताता है।”
बुधसेन - “तो तुम मिल कर आ सकती हो, हस्तिनापुर निकट ही है। …या फिर रथ भेजकर उन्हें बुलवा भी सकती हो। इसमें परेशान होने की तो कोई बात नहीं है।”
मनोवती - “नहीं स्वामी! आपको माता-पिता का कोई स्मरण नहीं देख कर दुख होता है, आपने उन तक कोई समाचार देने का प्रयास नहीं किया है और न ही उनके समाचार लेने का। …और इसमें मैं भी बराबरी से अपराधिनी हूँ।”
बुधसेन - “ओह! तुम्हारा कहना सही है, …परन्तु वे तो सर्व प्रकार से सुखी ही होंगे; अतः कोई प्रयास नहीं किया। …हाँ, विवाह आदि के प्रसंग में कुछ समाचार देने का अवसर स्मरण में नहीं रहा - यह मेरी चूक है।”
मनोवती - “आपको ज्ञात है, वे इस समय कहाँ हैं?”
बुधसेन - “नहीं!” (जिज्ञासा से देखते हुए)
मनोवती - (बिलखते हुए) “माता-पिता…”
बुधसेन - “क्या हुआ? …आप रोने क्यों लगीं?”
मनोवती - (आँसू पोंछते हुए) “…वे सब पापोदय में लुट गये। राजा के भय से सारी संपत्ति लेकर भागे तो मार्ग में डाकुओं ने सर्वस्व हर लिया। …और अब आपके मन्दिर-निर्माण में मजदूरी कर रहे हैं।”
यह सुनते ही बुधसेन अवाक् रह गये, बोले - “क्या? … यह क्या कह रही हो? …ऐसा कैसे हो सकता है?”
मनोवती - “ऐसा हो चुका है। …माँजी सुनयना की सेवा में लगी हुई हैं, …पिताजी, आपके रथ व घोड़ों आदि की देख-रेख का काम कर रहे हैं और जेठ-जेठानियाँ बच्चों सहित मजदूरी कर रहे हैं।”
बुधसेन - “कब से?”
मनोवती - “दो माह से।”
बुधसेन - "और तुमने आज बताया ?
बुधसेन कक्ष में बैचेनी से चक्कर लगाने लगे। चेहरे पर पसीना उतर आया।
मनोवती - (शांत स्वर में) “मुझे तो यह सब वृत्तान्त आज ही सुनयना के महल में पारणा-उत्सव में जाने पर ज्ञात हुआ।”
बुधसेन - (बाहर जाने को उद्यत होते हुए) “ओह! मैं अभी मिलने जाता हूँ।”
मनोवती - “रुको! ऐसे नहीं, …अभी नहीं। …अभी आप राजा हैं। …राजा के माता-पिता का सम्मान होता है। …प्रजा में माता-पिता की उदय-वश बनी चूक का उपहास न हो, इष्टजनों को दीनता न लगे, ऐसा उपाय करना चाहिए। उनकी प्रतिष्ठा एवं सम्मान ही आपका सम्मान एवं प्रतिष्ठा है।”
बुधसेन - (रो पड़ा) “ओह! समय से पहले मैं उनसे मिल भी नहीं सकता हूँ। धिक्कार है! ऐसे राज-वैभव, झूठे मान-सम्मान को, जिस कारण मैं अपने माता-पिता को देखकर भी चरण-स्पर्श नहीं कर सकता हूँ।”
मनोवती - (पीठ पर सहानुभूति भरा स्पर्श देते हुए) “यह बात आप और हम तक ही रहेगी। …मैंने सुनयना को भी नहीं बताया है।”
बुधसेन - “तुमने अच्छा किया, …परन्तु आगे क्या करूँ? यह समझ में नहीं आता है।”
मनोवती - “उन्हें मजदूरी कराना शोभा नहीं देता है। …सर्व-प्रथम उन्हें वहाँ से निकालना ठीक रहेगा।”
बुधसेन - (चिन्तित हो) “फिर वे जायेंगे कहाँ?”
मनोवती - “उनको मथुरा के महल में पहुँचा दिया जाये, …और वहाँ से दूत आकर उनके समाचार देगा, तब हम उनकी अगवानी करने को जायेंगे और बड़े ठाठ-बाट से उनका नगर-प्रवेश करायेंगे।”
बुधसेन - “उनकी त्रुटि न होने पर भी उन्हें कैसे निकाला जाए?”
मनोवती - “उनकी त्रुटि है - ‘कोमल गात’। …उन्होंने कभी शारीरिक श्रम नहीं किया है, अतः अन्य मजदूरों की तुलना में काम का बोझ उतना नहीं उठा सकते हैं। इस कारण उनको निर्माण कार्य से निकाला जायेगा।”
बुधसेन - “क्या उन्होंने मेरा नाम नहीं सुना…?”
मनोवती - “नाम सुना है, कथा भी सुनी है; परन्तु उनको लगता होगा कि ये कोई समान नाम वाले व्यक्ति होंगे। मोह के कारण अपनी संतान के पुण्य का भरोसा करना कठिन ही होता है।”
बुधसेन - “हो सकता है …एक गलती सिर उठाने में भी असमर्थ बना देती है।”
मनोवती - “यहाँ से निकलते समय उन्हें कष्ट होगा, परन्तु नगर के बाहर सराय में उन्हें निःशुल्क आहार एवं आवास की व्यवस्था मिल जाएगी। और तीन दिन बाद वहाँ से अनपेक्षित व्यक्ति-समुदाय कहकर रथ में बैठाकर मथुरा महल की जेल में भिजवा दिया जाए।”
बुधसेन - “उन पर क्या गुजरेगी? सोचा है तुमने?”
मनोवती - "हाँ …यह सब मज़बूरी है। भेजा तो उन्हें महल में जायेगा, जेल का तो मात्र कथन है। …वहाँ उन्हें राजसी वस्त्र-आभूषण और पूर्ण राजसिक सुविधायें मिलेंगी और हमारा गुप्त पत्र पिताजी के नाम रहेगा। उनके सुव्यवस्थित स्वस्थ होते ही, अलंकृत होते ही उनका दूत हमारे राजा साहब पिताजी के पास समाचार लायेगा, तब हम सब हाथी-घोड़ों व सेना द्वारा उनका सत्कार करेंगे। समधी-भेंट होगी…।
बुधसेन ने आँखों में आँसू भरकर मनोवती के दोनों हथेलियों में अपना मुख छिपा लिया - “तुमने मुझे निर्भार कर दिया, मनो! ऐसा ही होगा।”
मनोवती - “चलो, अब शयन करते हैं। कल प्रातः मुझे बत्तीस सदस्यों की अगवानी हेतु सारी तैयारी करनी है। सारे वस्त्र-आभूषण चुनने हैं।”
बुधसेन - “और उन्हें मथुरा तक पहुँचाना भी तो है।”
(पिताजी-माताजी के स्मरण में डूब गये) “क्षमा करना प्रभु! मैंने ऐसे कौन-से पाप किये थे, जिनके फल में मैंने अपने परिजनों से मजदूरी करवा ली? हाय! ऐसा दिन कभी किसी संतान को न देखना पड़े।”
मनोवती बुधसेन को बिस्तर पर लिटाकर सिर में तेल की मालिश करती है, फिर चरणों की सेवा में निमग्न हो जाती है। आत्मसंतोष-युक्त स्मित उसके मुख को अलंकृत करने लगता है।
माता-पिता आदि कुटुम्ब का मिलन
बुधसेन के परिजनों के नगर-आगमन पूर्व सम्पूर्ण इन्द्रप्रस्थ वंदनवारों से पट गया था। घर-घर में छतों पर, खिड़कियों में, जिज्ञासा एवं उल्लास से भरे नर-नारी एवं बच्चे आनन्द-उत्सव मना रहे थे। रंगोली-चौक पूरे गये। …घर-घर में आरती के थाल सजाये गये थे। …स्वागत-द्वार हर घर को अलंकृत कर रहे थे। कितने ही घरों के बाहर किमिच्छक-दान दिया जा रहा था। शहनाई, भेरी, मृदंग कर्ण को बहरा बना रहे थे।
राजसैनिक सैन्य-परिवेश में घोड़ों पर विचरण कर रहे थे। कोतवाल हर चौराहे पर व्यवस्था बना रहे थे।
नगर-वधुएँ नृत्य द्वारा प्रजा-समूह का मन मोह रही थीं। रहवासियों को लग ही नहीं रहा था कि यह वही इन्द्रप्रस्थ है, जिसमें वे रह रहे थे। आज तो यह नगरी स्वर्ग को भी तिरस्कृत कर रही थी।
सही समय पर समधी गाजते-बाजते दोनों दिशाओं से आगे बढ़ते चले आये। उनकी भेंट हुई। …मनोवती सर्व-प्रथम सास-ससुर के चरणों में नमी रह गई और पश्चात् उसने अपनी जेठानियों के चरण-स्पर्श किए। उसका ही अनुकरण सुनयना ने भी किया। सब गले मिल रहे थे।
सास-ससुर सहित समस्त परिवार ऐसा लग रहा था, मानो स्वर्ग से उतरा हो। सारी प्रजा सभी बहुओं के रूप-सौन्दर्य, धार्मिकता व उदारता के गुण-गान में निमग्न थी। मनोवती एवं बुधसेन के चेहरे पर अतीन्द्रिय आनन्द की-सी आभा छाई हुई थी। माता-पिता एवं वरिष्ठ जनों के सम्मान से किसे न संतोष होगा!
पश्चात्ताप
उत्सव समाप्त होने के बाद महल में भोजन के उपरान्त एकान्त में सारा परिवार एकत्रित होकर बैठा हुआ था।
मंगलसेन - “भाई! हम तुम्हें बुद्धू समझते थे, परन्तु तुम तो बुद्धिमान निकले।”
बुधसेन - “नहीं भाई! यह तो आप सबका दुलार-प्रेम ही था, जिससे मैं धर्म में संलग्न रहा। …मुझे आपने सांसारिक उलझनों से बचाया, तब ही तो मैं धर्म ध्यान व स्वाध्याय में लग सका था। यह सब सम्पन्नता आपकी ही कमाई हुई है।”
गुणसेन (अपराध बोध सहित) - “यह तो तुम्हारा सम्यग्ज्ञान ही है, जो हमें श्रेय दे रहे हो। वरना हमने तो तुम्हारे साथ बुरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।”
बुधसेन - “नहीं भैया! यह तो विधि का विधान था, जो मेरे साथ घटित हुआ। इसने आप सबको धर्म-मार्ग में लगने का अवसर दे दिया। मुझे तो इसका भरपूर आनन्द है।”
गुणसेन (साश्रु) - “हमने पाप किये थे, …उनका ही फल भोगा है। …तुम जैसे देवता को घर से निकाल कर हम ही घर से निकल गये।”
सोमदत्त - “सच है, बेघर करने का फल ही था यह। कंगाली के डर से हमने धन की रक्षा की, धर्म की नहीं। …और उसके फल में ही कंगाली आ गई। सारी चतुराई चालाकी ही नहीं, मूर्खता सिद्ध हुई।”
बुधसेन - “पुरानी बातें याद करने से क्या लाभ? आज हम सबका आत्मा एक है। …चलो स्वाध्याय करें।”
सोमदत्त - “बेटे! अब तो तुम ही हमारे गुरु हो।”
बुधसेन - “पिताजी! गुरु सदा गुरु ही होते हैं और संतान सदा संतान। हम तो आपके चरणों के चेरे हैं।”
हेमश्री - “हमने तो तुम्हें कुछ नहीं दिया…। तुम्हारे साथ-साथ अबोध निर्दोष निरपराध बहू को भी घर से निकाल दिया, क्या आत्मग्लानि नहीं होगी?”
बुधसेन - “कर्मोदय में जीव निमित्त कहलाता है। …आपका इसमें कोई दोष नहीं है। …स्वयं हम आपके चरणों की सेवा से वंचित रह गये। इसमें हमारा भी तो पापोदय था। …हम दोष देने किसे जाएँ?”
हेमश्री - “आज तुम घर पर रहे होते, …हमने षड्यंत्र करके न निकाला होता तो सब कितने सुखी होते? कभी कंगाली न आती… हमारा घर स्वर्ग था …पर हमारी ही करतूत से मुख पर कालिख पुत गई है। आज तुमने उसे अपने सद्व्यवहार से ढँक दिया है, परन्तु स्मृति से तो उसे नहीं निकाल पाओगे।”
बुधसेन - “जो दिखता है वह परम सत्य नहीं है। …परम सत्य है अकर्तृत्व। …कोई किसी को सुख-दुख नहीं देता है और न ही दे सकता है। हमारा अनुभव मिथ्या है। आत्मा अनादि से अनंत अपराध-विराधना करता आया है। उसके फल में एक-दूसरे को निमित्त बनकर सविपाक निर्जरा में निमित्त बनता है। इतनी-सी बात है। हम दोनों को आपसे कभी भी शिकायत नहीं रही।”
हेमश्री - (आत्म-ग्लानि से) “काश! शिकायत होती; तो हमें आज इतना भार न लगता।”
बुधसेन - “अच्छा! …(विनोद करते हुए) इसमें हमारी क्या गलती है? …आपने किसी को दोष न देने के संस्कार डाले हैं, …हम क्या कर सकते हैं? आपके संस्कार के बदले में आज हम सभी के पुण्योदय आया - क्या यह सब बुरा हुआ है?”
सोमदत्त - “यह तो बुरा नहीं हुआ है, …परन्तु इसके पहले तो ठीक नहीं हुआ न।”
बुधसेन - “आपके संस्कार ने ही मुझे नरक-निगोद जाने से बचाया है। …आज जो कुछ हुआ है उसमें आपका ही उपकार है। हम तो भोले-भाले बालक मात्र हैं।”
सोमदत्त - (आत्म-ग्लानि से भर कर) “हम पामर हैं! हमने तुम्हें स्वार्थ से नीचे गिराया और तुमने राजा-प्रजा के सामने सिंहासन दे दिया। इससे हम और भी अपनी नजरों में गिर गये हैं।”
बुधसेन - "आत्मा पाकर भी मरना - यही पामरता है।
आप आत्म-ग्लानि, करके अपराध-बोध करके अपने पापों को धो चुके हो। …आपने परिणाम-विशुद्धि कर ली है। रही मेरी बात, …तो उसमें तो आपका कोई दोष ही नहीं था। …मेरे कर्मोदयानुसार बनाव बना, मेरा भवितव्य था, उसमें तो सर्वज्ञ भी आपको दोषी नहीं कहते हैं। पिताश्री! अब आप मोक्षमार्ग के योग्य हो चुके हैं।"
सोमदत्त - “बेटे! कुछ भी कहो, …हम तो अपराधी हैं। …इस अबोध बिटिया का क्या दोष था, जो हमने इसे दुख दिया है?”
बुधसेन - “चलो, माना आपका अपराध हुआ है। …तो फिर आपको दंड देने का अधिकार किसको है?”
हेमश्री - “आपको।”
बुधसेन - “तो आज से आप सबको सजा भुगतनी है, …आप तैयार हैं न?”
सारा परिवार - (हाथ जोड़कर) “हाँ, हम तैयार हैं।”
मनोवती एवं बुधसेन - (एक साथ) “तो वचन दो कि आज से हम दोनों को अपने चरणों की सेवा एवं छत्रछाया से कभी दूर न करेंगे।”
चित्रलेखा, काममाला, गुणमाला, चन्द्रावती, सूर्यावती, मंगलावती… सभी के चेहरे अपराध-बोध से अधोमुखी हैं। सुनते ही सभी रो पड़ीं।
काममाला - “यह दंड नहीं है, …मैं ही इस कथा की सूत्रधार हूँ। …मैंने ही इनके कान भरकर सब बहनों को तुम्हारे विरुद्ध किया था।”
बुधसेन - “यह तो आपकी विशुद्धि की सूचना है, जो आप अपने दोषों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर रही हैं। …मुझे एवं मनो को तो इस विषय में जानने की स्वप्न में भी जिज्ञासा तक नहीं हुई; क्योंकि हमारे शुभ उदय में इस ही प्रकार की नियति थी। और अब आपका जीवन आत्म-कल्याण की भावना से सज रहा है, …रत्नत्रय से आप सजें, इससे ज्यादा सजा तो कर्म भी नहीं दे सकते हैं।”
सूर्यावती - “तुम लोग बड़े उदार हो, …अतः ऐसा ही सोचोगे…।”
मंगलावती - “अब हम भी प्रभु-भक्ति, स्वाध्याय में उपयोग लगायेंगे।”
बुधसेन - “अनंत काल से विराधना की है, अब तो विराधना के त्याग का अवसर आया है। प्रभु का लाख-लाख उपकार है, जो हमें आत्महित की बात समझ में आ गई।”
मनोवती - “हाँ, दोष बुरे लगना और न होना ही धर्म है। स्व-पर को निर्दोष आत्मा देखना ही संवर है; इससे ही पूर्वकृत पापों की निर्जरा हो जाएगी… और कुछ सविपाक निर्जरा तो स्वतः हो भी गई है। अतः उन्मुक्त होकर आत्मानंद का भोग करो।”
सब मुस्करा रहे थे, परन्तु आँखें नम थीं।
बुधसेन - “भूतकाल तो नहीं बदला जा सकता है, परन्तु आज से निर्दोष आचरण करके, निर्ग्लान जीवन जीकर भविष्य अवश्य सुधारा जा सकता है।”
रात ज्यादा काली थी, परन्तु चतुर्थी का चन्द्र मुस्करा रहा था …मानो इन सबको भविष्य का दर्शन देकर पूनम की प्रतीक्षा करने की ही उमंग भर रहा था। सब शयन करने लगे… प्रातः जागृत होते ही प्रभातियाँ जो गानी थीं।
यथासमय जिन-मन्दिर का निर्माण पूर्णता को प्राप्त हुआ, हर्षोल्लासपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा का उत्सव भी सम्पन्न हुआ। सबको बाह्य उत्सव का आनन्द आ रहा था, परन्तु मनोवती एवं बुधसेन को अन्तरंग आत्म-संतोष शाश्वत हो गया था। उनके निमित्त से नवीन जंगम जिन-देवताओं का सृजन जो प्रारम्भ हो चुका था। अब तो सब अल्प काल में सिद्धालय में अनंत काल तक एक साथ रहेंगे।
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