समझ से स्वर्ग (बाल ब्र. सुमतप्रकाश) | Samajh Se Swarg (Bal Br. Sumatprakash)

समझ से स्वर्ग

इसी पुस्तक से…

कमला (दादी सास) गम्भीरता से - “कही बातों का कोई क्या करें? बुरा तो लग ही जाता है…।”
उर्मिला (आजी सास) - “अरे! सरल-सा गणित है …कही, सुनी, समझी, सीखी और भूली …बस!” - पृष्ठ-225

“अपने घर में सहनशीलता हो, सब का विश्वास जीतने के लिए पारदर्शिता हो, गलतियों को स्मित-वदन सुनने का साहस हो और धैर्य से समाधान दिया जाए तो घर से बाहर कुछ कहने की आवश्यकता ही न पड़े।” - पृष्ठ-22

पीड़ा की अभिव्यक्ति करने से अवसाद नहीं होता, गम्भीर रोग नहीं होते हैं …और आत्महत्या जैसे कृत्य घर में नहीं घटते हैं। अतः बहुओं को भी अपनी पीड़ा व्यक्त करने को मंच मिलता है। वे ‘भड़ास रजिस्टर’ में लिखकर अपना मन हल्का कर सकती हैं…। - पृष्ठ-129

जैसे - यदि बच्चे कहें कि ‘उन्हें कोई प्यार नहीं करता’ तो उसे प्यार की समझ कराने की आवश्यकता है । …जो प्यार करते हैं, वे गलतियाँ बर्दास्त नहीं करते, …हितैषी दंड भी देते हैं। - पृष्ठ-131

छोटे-से छोटे बच्चे का सुझाव भी आदर से सुना जाता है, सही हो तो माना भी जाता है; और इसके बदले में उसकी विचार-शक्ति की प्रशंसा भी की जाती है। इससे बच्चे बड़े विचारशील बनते जाते हैं। - पृष्ठ-129

सम्पत्ति तो धर्मशाला में मिली सुविधा के समान है। जब तक देह में रहना हो रहा है, तब तक इनका सदुपयोग नैतिकता-पूर्वक करते रहो, ईमानदारी से एक परमाणु-मात्र को अपना न मानते हुए जीओ और फिर आनन्द-पूर्वक समाधिमरण कर लो। - पृष्ठ-222 जीवन के यथार्थ को दर्शाती
पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों की कहानियाँ

समझ से स्वर्ग

शब्द-संग्राहक
बाल ब्र. सुमतप्रकाश

: प्रकाशक :
ढाईद्वीपस्थ आत्मन् परिवार संस्करण प्रथम - 5000 प्रतियाँ

प्रकाशन तिथि - 16 सितम्बर 2026
(भादों सुदी पंचमी, वीर निर्वाण संवत् 2552)

शुभ प्रसंग - दशलक्षण महापर्व प्रारंभ

मूल्य - 60/-

भेंट-मूल्य - दिव्यध्वनि से प्राप्त श्रुतज्ञान को रद्दी में बेचकर अनादर न करें। पढ़ें-पढ़ायें, स्थानीय पुस्तकालय/विद्यालय में दे देवें या हमें लौटा दें। याद रखें, श्रुताभ्यास केवलज्ञान की पूजा है। अपने जीवन में केवलज्ञान का आमंत्रण है।

कॉपीराइट - असुरक्षित - इसका या इसके किसी भी भाग का प्रयोग बिना कोई परिवर्तन किये स्व-पर हित में किया जा सकता है।

सावधानी - पुनःप्रकाशन से पूर्व, प्रकाशक से इस संस्करण का अशुद्धि-शोधन पत्रक मँगा लें।

प्राप्ति-स्थान…

  • आचार्य श्री कुन्दकुन्द साधना वसदि
    सम्मेद शिखर जी, जिला-गिरिडीह,
    झारखंड-825329 मो. 94275 86417

  • सर्वोदय अहिंसा
    बी. 180 मंगल मार्ग, बापू नगर, जयपुर-15
    +91 9785 999100

सज्जा/मुद्रण : प्री ऐलविल सन (संजय शास्त्री), जयपुर फोन : + 91 95092 32733

प्रकाशकीय

मनुष्य हमेशा समूह में रहना चाहता है, संबंध बनाना चाहता है; परंतु संबंधों को सहेजने में, उन्हें मधुर बनाए रखने में प्रायः असफल हो जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण है, समझ का अभाव। गलतफहमियाँ कई बार जीवन को नरक से भी बदतर बना देती हैं।

अपने नाम को सार्थक करता हुआ कहानी संग्रह ‘समझ से स्वर्ग’ एक ऐसा संग्रह है, जिसमें पारिवारिक और सामाजिक जीवन की विभिन्न समस्याओं के प्रायोगिक समाधान (Practical solution) चारों अनुयोगों से दिये गये हैं। आज का समय नीरस सिद्धांतों का नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में उनके प्रयोगों का है। Applied अध्यात्म हमेशा से ही समय की माँग रही है, जिसे समय-समय पर महापुरुषों ने जीवंत किया है।

इस संग्रह में अत्यंत मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखी गई 20 कहानियाँ हैं; जो कड़वाहट, तनाव और उलझनों के भंवर में फँसे मानव-मन को भेदविज्ञान के सहारे आसानी से निकलने का मार्ग सुझाती हैं। ये कहानियाँ हमारे ही आसपास के परिवेश को प्रस्तुत करती हैं। पाठकों को इनके पात्र इतने परिचित लगने लगते हैं कि वह उनके साथ तादात्म्य अनुभव करने लगता है, उनकी समस्याओं को अपने साथ जुड़ा हुआ महसूस करता है।

इन कहानियों में सच्ची समझ से लौकिक जीवन को सौहार्दपूर्ण बनाने का मार्ग तो दिखाया ही है, साथ ही भेदविज्ञान के बल पर स्व-पर को भगवान देखते हुए सम्यक्त्व, संयम और समाधि-साधना की शिक्षा भी बड़े ही रोचक और मनोरंजक तरीके से दी गई है।

इन कथाओं को पढ़कर आप समझ पाएँगे - विपरीत उदय के समय शान्ति कैसे रखें? कटु वचनों को सुनकर शब्द सामायिक कैसे करें? प्रत्येक घटना में छिपे हुए सत्य को कैसे पहचानें? सबको निर्दोष देखने का नजरिया कैसे विकसित हो? आदि।

मानव संबंधों में कड़वाहट के मूल कारण अपेक्षाएँ, अहंकार, गलतफहमी, त्वरित-प्रतिक्रिया, शिकायत आदि हैं। सास-बहू, पति-पत्नी के संबंधों में प्रायः ये कारण बहुतायत से पाए जाते हैं। “सुंदर स्वप्न”, “जहरीले लड्डू”, “समझ से समाधान” “सम्यग्ज्ञान का आनंद” जैसी कहानियाँ इनके सार्थक समाधान देती हैं।

भौतिक सुख-सुविधाओं और विषय-भोगों के लिए अंधी दौड़ में हम क्या क्या गँवा रहे हैं - यह हमें ध्यान ही नहीं रहता। “चिंतामणी हारा”, “सौतिया डाह”, “जीवन दर्पण” आदि कहानियाँ इसी विषय को प्रस्तुत करती हैं।

संग्रह में कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं, जिनमें तत्त्वचर्चा के माध्यम से धर्म का स्वरूप, नैतिकता, योग्यता आदि को बड़े ही सरल शब्दों में समझाया गया है। “उत्कृष्ट त्याग धर्म”, “आनंद का हिसाब” “गंदी सुंदरता” आदि कहानियाँ इसके उदाहरण हैं।

संग्रह की एक सुंदर रचना है, “मनोवती की कथा” जिसमें पति-पत्नी के आदर्श संबंध, पारिवारिक मूल्यों का महत्त्व, स्वावलंबन की सुरभि, वस्तुस्वरूप की सच्ची समझ का सुंदर चित्रण पाया जाता है।

संयुक्त परिवार में बच्चों को बड़ों से विभिन्न पीढ़ियों के अनुभव, अपनापन, धैर्य, सामंजस्य और रिश्तों को निभाने की शिक्षा मिलती थी। यह सब अब दुर्लभ होता जा रहा है। टूटते हुए परिवार, बच्चों की सही परवरिश न हो पाना वृद्ध माता-पिता को भावनात्मक अकेलापन और युवा दंपती पर जिम्मेदारियों का बढ़ता दबाव आज के समाज के लिए चिंता के विषय हैं। ऐसे में “विसंवाद का अंत”, “गृहस्थाश्रम”, “जंक्शन दादी” जैसी कहानियाँ संयुक्त परिवार की उपयोगिता, सौहार्दपूर्ण पारिवारिक संबंधों की महिमा और घर के वरिष्ठ सदस्यों की भूमिका को सशक्त रूप से प्रकट करती हैं।

यह कृति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने से पूर्व एवं पश्चात् अवश्य पठनीय है। विवाहोत्सव की यह विशेष भेंट बन सकती है।

हमें आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि पाठक इन कहानियों के माध्यम से आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार के लिए प्रेरित होंगे।

कुशल शोधन-सम्पादन के लिए गुणवृद्ध विद्वान शिखरचन्द्रजी शास्त्री, सागर एवं अन्य प्रत्यक्ष-परोक्ष शोधन-परामर्शदाताओं को साधुवाद।

धन्य भाग्य हैं शुद्ध मुद्रण-कर्ता संजय शास्त्री (सर्वोदय अहिंसा), जयपुर एवं अन्य सभी सहयोगियों के जिनकी प्रतिभा, उपयोग, समय और शक्ति का प्रकाशन-निधि में सदुपयोग होने से विशुद्धि की वृद्धि हुई। हर बार की तरह इस बार भी चित्रों के निर्माण में AI का पूर्ण उपयोग किया गया है।

पाठकों के महत्त्वपूर्ण सुझावों का सदैव स्वागत है।

  • ढाईद्वीपस्थ आत्मन् परिवार

विषय-अनुक्रमणिका

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… मनोरथ …

यह कथासंग्रह एक मूक निर्देश है…। ये कहानियाँ बहुत कुछ कहना चाहती हैं…, पाठकों से सुनने की अपेक्षा है।

जीवन एक संघर्ष का नाम है। यहाँ कोई सुखी नहीं हो सकता है। मोह की चौदह संतानें किसी को भी सुख से नहीं रहने देती हैं। अमीर हो या रंक, रोगी हो या स्वस्थ, विवाहित हो या अविवाहित, पुजारी हो या पापी, स्त्री हो या पुरुष, मनुष्य हो या जानवर, गोरा हो या काला, देशी हो या विदेशी, ज्ञानी हो या बुद्धू, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, मोटा हो या पतला, लम्बा हो या ठिगना… सर्व सुविधाओं में रहने पर भी और यश के होने पर भी जीव संसार में दुखी है।

जीवन दुखद है, इसका आश्चर्य नहीं …परन्तु जैनशासन का आश्रय करने वाले को सुखान्त मिलता ही है। ऐसे भयानक संसार में भी भेदविज्ञान करने वाले ही आश्चर्यजनक रूप से सुखी होते हैं। उनकी विचारधारा को दर्शाने के लिए ही यह कथा-संग्रह लिखा गया है।

“अपरिग्रही नग्न दिगम्बर मुनि भूमि-शयन करने पर भी एवं क्षुधा-तृषा आदि बाईस परीषह सहने पर भी आनन्द में कैसे रह लेते हैं?” - यह जानने लायक है।

“हर परिस्थिति में षडावश्यक नहीं त्यागना एवं जब तक संकट हो, तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करना” - यह बात पुराणों से सीखने लायक है।

विवाह अंधे भोग की अनुज्ञा (अनुमति पत्र) नहीं है, यह तो इच्छा-निरोध हेतु एक नियामक प्रयास है। अमर्यादित इच्छा-पूर्ति में तीव्र असंयम होने से असाता आदि पाप प्रकृतियों का बंध होता है। लेकिन इच्छाओं की मर्यादित पूर्ति साता, शुभ आयु, उच्च गोत्र एवं सुयश आदि शुभ नाम-कर्म प्रकृतियों के आस्रव व बंध का कारण होती है।

स्व-परीक्षित साधना (आत्माश्रय) से होने वाली विशुद्धि में स्व-हस्त से षट् आवश्यक (चार दान) आदि पुण्य करना एवं स्वाश्रय से पुण्य-पाप का अभाव करके मोक्ष-परम धाम पाना ही ‘जैन संस्कृति’ है।

जो सिखाने पर भी छूटना कठिन है एवं जहाँ बिगड़ने के पूर्ण अवसर हैं, ऐसी बातें बच्चों को बिना सिखाये ही हम उनसे सुधरने की आशा करते हैं। जैसे वेद का उदय; यह माता-पिता और समाज के लिए सबसे बड़ी जोखिम की बात है।

अतः आप मुख से बच्चों को नहीं सिखा सकते हैं तो बच्चों-बहुओं को ऐसा सुन्दर साहित्य पढ़ने की प्रेरणा अवश्य करें।

भादों सुदी पंचमी
वीर निर्वाण संवत् 2552
16 सितंबर, 2026
दशलक्षण पर्व प्रारम्भ
स्वर-व्यंजन संग्राहक

  • ब्र. सुमतप्रकाश जैन

सन्नारी स्तवन¹

प्रत्येक युग में सीता भी होती है,
चीर-हरण कराने वाली द्रौपदी भी,
(पर चीर-हरण तो आर्यावर्त की सोच का हुआ था, द्रौपदी का नहीं।)
राज-पाट तज कर दर-दर भटकने वाली अंजना;
सब कुछ चुपचाप सहने वाली चंदना;
स्वाभिमानी, शिक्षिता, पिता का सिर ऊँचा रखने वाली
ब्राह्मी होती है;
तिरस्कार को प्यार मानने वाली राजुल होती है;
जो स्थिति-परिस्थिति का पूर्ण आकलन कर,
अपने मन की कोमलता को तत्काल भस्म कर देती है।
हजारों नारियों की पीड़ा अपने भीतर समेटने वाली,
कुष्ठ रोगी का वरण करने वाली
मैना भी होती है।
ये ऐसे चरित्र हैं,
जो सदैव समय से आगे ही चलते रहे हैं;
और चलते हुए भी कभी अपनी मधुरता नहीं खो सकते हैं।

जब-जब समय का चक्र किसी को निराश, एकाकी, आहत करेगा,
तब-तब इन सन्नारियों की तपस्या राह दिखायेगी;
क्योंकि इन्होंने जीवन के लक्ष्य को भली-भाँति समझकर,
अपना पथ प्रशस्त किया था।
बीत जाएँ कितनी ही सदियाँ
लेकिन विस्मृत नहीं होंगी ये सतियाँ
जीवन की जीवंत प्रतिमूर्तियाँ

इनका कुछ सैद्धान्तिक लक्ष्य रहा है,
जिसे उनके जीवन के परिप्रेक्ष्य में पढ़ना,
पतझर में टूटते पत्तों के नीरव संगीत के बीच,
बसन्त का नृत्य देखना है।
उनकी तपस्या में, त्याग में, बलिदान में,
पतझर के सौरभ की अभिव्यक्ति है।
उनका महाप्रयाण भी संजीवनी है।

इनके उत्सर्ग का आराधनारूप,
उन्नति का भी उन्नयन करता हुआ साक्षात् प्रतीत होता है।
नारी के सम्पूर्णत्व से भाग्य के विरुद्ध
इनका सार्थक संघर्ष प्रेरणा देता है।
नारी की उत्कृष्टता इसमें ही रही
कि उसने सभी युगों में सहिष्णुता, उदारता और धीरज के साथ
जीवन का मूल्यांकन किया;
और अपने शील, संयम और साधना के निर्माण के मध्य, अपनी अस्मिता को सुरक्षित रखा।
जैन नारी ने अन्धविश्वासों और रूढ़ियों को
स्वप्न में भी स्वीकार नहीं किया।
अनूठी है आस्तिकता और भक्ति पद्धति,
महान जैन नारी कभी हाशिये पर नहीं रही।
भाव सत्य और जीवन साम्य से अनुप्राणित होकर,
उसका सच्चा मानवी रूप मुखरित हुआ।
साधना में उनका अटूट विश्वास रहा।

राजकुल एवं उच्च वंश में जन्म लेकर भी;
सामन्ती संस्कृति में पालित-पोषित होने पर भी;
उन्होंने अपने व्यक्तित्व का रूप,
अपने चिंतन-मनन और सोच-समझ से निखारा।
प्रतिष्ठित मानवी बनकर उन्होंने पूरा युग सँवारा।
साहित्यिक गरिमा और सामाजिक दायित्व के साथ-साथ,
स्व-समीक्षण और निरीक्षण द्वारा
व्यक्तित्व की स्थापना की।
इन्होंने असंभव को संभव कर,
भाग्य के समक्ष घुटने नहीं टिकाए हैं,
और न ही जीवन को दुर्बल बनाया है।

सबलता का संबल लेकर,
निजत्व का आलोक प्रकाशित कर,
आस्था और विश्वास को उत्पन्न कर इन वीरांगनाओं ने सम्पूर्ण नारी जाति को,
पूज्या एवं आराध्या बनाकर,
नारी के गौरव की रक्षा की है।
मैं विश्वासपूर्वक कहता हूँ
जिस पल भी जीवन निरर्थक लगे,
समस्याओं का जाल जकड़ने लगे,
अथवा जीवन में कोई राह न दिखे;
तो आप सत्यनिष्ठा व एकाग्रता से
इन सात्त्विक सन्नारियों को स्मरण कर लेना…
अगले ही पल आप
अप्रत्याशित रूप से ऊर्जस्वित हो उठेंगी।
क्योंकि आपके अन्दर भी,
इन साहसशीला नारियों का निवास है।

नारी जाति की मानसिकता से जुड़ी,
परिपाटियों, रूढ़ियों और कुरीतियों से जूझती हुईं
इन महिलाओं के जीवन-चरित्र में हमें आज भी,
नारी से जुड़े समस्त प्रश्नों के उत्तर
और सामाजिक विसंगतियों का सर्वसम्मत प्रतीकार,
दृष्टिगोचर होता है।

सर्जनात्मक जीवन-निर्वाह करने के
इन्होंने सामर्थ्यभर प्रयास किये,
और जीवन को नए वैचारिक बोध से सम्पन्न कर समाधान दिए।

नारी की महानता का प्रतीक,
नारीत्व में अन्तर्निहित गुणों का अतुल वैभव है,
जहाँ अपने पूर्ण विकास की अलस अँगड़ाई है
और अपनी अर्जित महत्ता की
चिरस्पन्दित धड़कन, सिहरन एवं मुस्कान है!
सांस्कृतिक, सामाजिक एवं धार्मिक चेतना को,
अक्षुण्णता प्रदान करने में
इनकी निर्मल गुण-पयस्विनी ने,
दिया है तरंगमय सक्रिय अवदान,
वह अपने आप में है महान
समस्या भले ही रूप बदलकर आ रही है,
किन्तु उनका समाधान जब भी कोई नारी
पौराणिक वीरा से ऊर्जा और मार्गदर्शन लेकर करती है तो
वह स्वयं वीरांगना बन जाती है।
हमें इनके चरित्र में मिलता है
सभी युगीन समस्याओं का समाधान।
जीवन-सृष्टि की रहस्य सूत्र,
निर्मल और नैसर्गिक आलोक से प्रदीप्त,
इन दीपशिखाओं को मेरा प्रणाम!


टिप्पणियाँ

पृष्ठ 9: 1. समाज निर्माण और महिलायें - डॉ. नीलम जैन, आदर्श नगर, गुड़गाँव।
शब्द संयोजन - ब्र. सुमतप्रकाश जी।

1. समझ से स्वर्ग

वटगोहाली¹ ग्राम में विशाल स्वस्तिक के आकार का तीन मंजिला शिखर युक्त सर्वतोभद्र जैन मंदिर है। इसके शिखर ग्राम में प्रवेश करने से पूर्व तीन किलोमीटर दूर से ही दर्शन देने लगते हैं। मंदिर के निकट ही अनेकों जैन सुश्रावकों के निवास थे। दक्षिण में एक विशाल भवन था, जिसके ऊपरी भाग से जिन-मन्दिर के शिखर के नित्य ही दर्शन होते थे। यहाँ कुमारमित्रा एवं उनकी पत्नी जीवनंदा के परिवार में जन्मी कन्या का नाम प्रीतिसुधा था। यह जन्म से ही भद्र परिणामों वाली थी; इसने कभी चींटी तक को नहीं मारा, पानी छानकर ही वापरती थी।

आसपास के घरों में जन्मी हम-उम्र कन्यायें धर्मसोमा, जयदेवी, शिवमित्रा, देवयशा, जिनयशा, सुचित्रा और गोदत्ता उसकी सखियाँ थीं। वे सब घर के आँगन एवं छत पर जिन-मन्दिर की छाया में खेला करती थीं।

एक बार गुहनंदी¹ मुनिराज के प्रवचन सुनकर प्रबोधित हुई कन्या प्रीतिसुधा ने ‘प्रेमामृत-पान’ का नियम लिया, जिससे ‘यथा नाम तथा काम’ कहावत भी उसके जीवन में चरितार्थ हो रही थी।

संयोग से सारी सखियों के विवाह राज्य के ही अनेक नगरों में हो गए। प्रीतिसुधा का विवाह कोटिवर्ष² शहर में हो गया। अंतिम श्रुत-केवली आचार्य भद्रबाहु का जन्म कोटिवर्ष के पास के एक गाँव देवकोट में हुआ था। अतः यह नगर बड़ा प्रसिद्ध था।

प्रीतिसुधा के पति का नाम प्रीतिवर्धन था। पत्नी के रूप में उसे एक ऐसे अनुपम रत्न की प्राप्ति हुई थी, जिसके अन्तरंग और बहिरंग दोनों ही रूप सुन्दर, आकर्षक व निर्दोष थे। जब वह बोलती तो उसकी वाणी से जैसे फूल झड़ते थे। आभिजात्य की आचरण-संहिता से वह पूर्व-परिचित थी ही; साथ ही कोई नवीन अच्छी परम्परायें दिखाई दीं तो उसने बिना संकोच द्विगुणित उत्साह से अपना लीं।

सासू के प्रति आवश्यक आदर-मान का भाव, दास-दासियों के प्रति सहज कृपा और सहानुभूति, छोटों के प्रति आत्मीय वात्सल्य, प्रत्येक स्थिति की मर्यादा को समझना, प्रत्येक कार्य में संतुलन जैसे गुणों से नव वधू को सर्वत्र प्रशंसा प्राप्त हो रही थी। वस्तुतः उसके माता-पिता ने ही उसे बहिर्मुखी के साथ ही साथ अन्तर्मुखी बनना भी सिखाया था। वे सोचते थे कि यदि वह भ्रमणशील ही बनी रहती या तोता-रटंत विद्या तक ही सीमित रह जाती तो आज बड़ी असुविधाओं का सामना करना पड़ जाता।

वर वधू के लिए कामदेव बन गया था, मन से भी और तन से भी। उनकी पारस्परिक प्रीति उत्तरोत्तर दृढ़, गहन, सघन और संवेदना-पूर्ण होती जा रही थी। प्रकृति के समस्त उपादान उन्हें, उनके स्नेह-संसार को अधिकाधिक सजाने-सँवारने की प्रेरणा दे रहे थे। काल का प्रत्येक क्षण उन्हें आशा के अभिनव संदेश का उपहार लिए आता था। लेकिन…

सासू सुकांता का बातूनी स्वभाव सारे परिवार का सिरदर्द बना हुआ था। उसकी दरयानी नाम की एक पड़ोसिन थी, जिससे रोज सुबह-सुबह क्लेश होता था। प्रीतिसुधा जैसी सुन्दर, सुशील, सुभाषिणी बहू घर में आने पर भी सुकांता का चेहरा उतरा-उतरा रहता था। कुछ दिनों में ही प्रीतिसुधा को इसका विशेष आभास मिलने लगा। एक दिन जब प्रातः माँजी का आशीर्वाद लेने गई तो उसने चरणों में माथा रखकर पैर ही पकड़ लिये।

प्रीतिसुधा - माँजी! मुझे क्षमा कर दीजिए… मुझसे क्या भूल हुई है, जो आप मुझसे सदा नाराज़ रहती हो… क्या आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है?"
सुकांता - “नहीं बेटे! कोई बात नहीं है।” (माँ ने दुलार दिखाने का भरसक प्रयास किया)
प्रीतिसुधा - “कुछ तो बात है, जो माँ-बेटे मुझसे छिपाने का असफल प्रयास कर रहे हैं।”
सुकांता - (सकुचाते हुए) “नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है। भला चाँद-सी बहू घर में आये और मैं प्रसन्न न होऊँ? ऐसा कैसे हो सकता है?” (ठोड़ी पर हाथ रखते हुए बोली)
प्रीतिसुधा - “तो कैसी बात है? वही बताइए।”
आखिर जिद न छोड़ने पर सासू को मन की व्यथा बतानी ही पड़ी।
सुकांता - “बेटे! दरयानी अपनी पड़ोसिन है। पहले वह मेरी अच्छी सखी हुआ करती थी। हम सारे सुख-दुख की बातें किया करते थे… परन्तु इस बीच ही मुझे दूसरों की निंदा एवं स्वयं की प्रशंसा करने की आदत लग गई। इससे मेरे पाप का उदय आने लगा। वह मेरी कही बातों को नमक-मिर्च लगाकर दूसरी महिलाओं को सुनाने लगी, जिससे पूरे नगर में मेरी बुराइयाँ होने लगीं… और अब तो वह बात-बात पर मुझसे लड़ने लगी है।”

“मैं तेरे आने के पहले दिन से भयभीत थी कि तेरे सामने उससे झगड़ा होगा तो तुझे कैसा लगेगा?.. कल शाम ही वह मायके से आई है। (घड़ी देखकर घबराते हुए) उसके आने का समय हो गया है। वह आते ही मुझसे चिल्ला-चिल्ला कर झगड़ेगी; तेरे सामने नरक का दृश्य आएगा… तू मेरे बारे में क्या सोचेगी?.. बस, इसी कल्पना से मैं मुरझाई हुई हूँ।”

(गहरी साँस लेकर) “मैं उसे सफाई देने जाती हूँ तो और लड़ती है… चाहती हूँ, वह फिर पहले जैसे प्रेम से रहे… मेरे घर की खुशियों में शामिल हो, परन्तु वह तो तेरे विवाह की ख़ुशी से भी खार खाए बैठी है। अब आएगी तो क्या होगा?” - ऐसा कहकर माँजी रोने लगीं।"

प्रीतिसुधा - “बस इतनी-सी बात है?.. तो आज से उसे जीतना मेरा काम रहा। आप जाइये मन्दिर जी। चौके का काम मैं सँभालूँगी, ध्यान रखना… आप दस बजे से पहले मत आइयेगा।”

सुकांता - "तू क्या करेगी?.. "

प्रीतिसुधा - “अभी इसे रहस्य ही रहने दीजिए। आवश्यकता होगी तो मैं आपसे मदद लूँगी। वह पहले जैसी ही बन जाएगी, इसका विश्वास कीजिए। आप जल्दी कीजिए।”

उसने माँजी को मन्दिर जी पूजा-स्वाध्याय के लिए भेज दिया और स्वयं घर के काम-काज में लग गई।
थोड़ी ही देर में बाहर से आवाज आई - “अरी सुकांता! कहाँ मर गई? निकल कर तो आ।”
बहू प्रीति तत्काल निकल कर बाहर आई। सिर पर घूँघट था। चरणों में नम कर बोली - “माताजी! आशीर्वाद दीजिए। आइये! घर में पधारिए।” उनका हाथ थामकर वह उन्हें घर में ले आई।
सुन्दर बहू का सुन्दर व्यवहार देखकर दरयानी पानी-पानी हो गई। उन्हें सकुचाते देख आदर से पीढ़े पर बैठाकर बोली - “माताजी मंदिर गई हैं, वे आनेवाली ही होंगी। तब तक आप जलपान कीजिए।”
लड़ने आई दरयानी असमंजस में पड़ गई और मन ही मन सोचने लगी - “सुकांता आते ही लड़ेगी… हो सकता है, बहू को ही दो-चार सुना दे… वह तो मुझे फूटी आँख से भी न देख सकेगी…।”
प्रीतिसुधा - “माँजी आपकी प्रशंसा करती रहती थीं। मुझे आपके दर्शन करने की अभिलाषा थी। आप कल ही तो पधारी हो अपने पीहर से; आपकी माता जी का स्वास्थ्य सुना है, कुछ नरम-गरम चल रहा है? अब कैसी हैं मातुश्री?”
दरयानी - “स्वस्थ… हैं, उम्र का हिसाब है… 98 की उम्र में खा-पी तो सकती नहीं, पचता नहीं न! हाँ, भगवद्-भजन ही करती रहती हैं, सो जी को शान्ति है।”
प्रीतिसुधा ने चन्द्रकला और अंगूरपाक का नाश्ता परोसा।

गर्म दूध में केसर-इलायची डालकर पिलाया। अब तक वह भी अच्छे व्यवहार से सब कटुता भूल गई।

बड़ी देर तक सुकांता नहीं आई तो उसे भी घर के काम की चिंता सताने लगी - “अब चलती हूँ बेटा, घर आना।” चलते-चलते दरयानी बोली।।

प्रीतिसुधा - “अवश्य माँजी। आपकी सेवा का अवसर मिलेगा तो मेरे बड़े भाग्य होंगे।”

दरयानी प्रसन्नवदन चली गई।

दस बजे सुकांता डरते-डरते मन्दिर से आई…।

(स्वगत) “न जाने क्या हो रहा होगा… घर पर न जाने क्या हालात होंगे… बहू को मेरे बारे में कैसा लगता होगा… वह मुझे भी बुरा जानकर मेरी बुराई पीहर में करेगी, रिश्तेदारों में कहेगी… सब मुझे बुरा समझेंगे। वह इस आधार पर पति को लेकर अलग भी हो सकती है… मेरे क्लेश से पिंटू (प्रीतिवर्धन) भी परेशान रहता है। वह कितनी ही बार कह चुका है - 'शादी होते से ही मैं नहीं रह सकता तुम्हारे साथ…। तुम जानो, तुम्हारी पड़ोसिन जाने… मैं अपने स्वर्ग की रचना में रोज का क्लेश नहीं चाहता…, ओह भगवान! अब क्या होगा? सचमुच बहू दुनिया की अन्य बहुओं जैसी हुई तो… (हृदय काँप उठा) प्रभु! शुभ-शुभ हो।”

विचारती, चिंता-सागर में गोते लगाती, डूबती-उतराती घर आ पहुँची। चेहरे से साफ़ लग रहा था कि मन्दिर में आज पूजा रोज की तरह नकली न कर सकी थी। पर असली पूजा प्रारम्भ होने के लक्षण कुछ-कुछ प्रकटने लगे थे। अपने दोष भासने लगना एवं क्षमा, शान्ति व समता का आदर आना ही प्रथम पूजन जो है।

घर आते ही बहू ने प्रसन्नता से स्वागत किया - “माँजी! आज पड़ोसिन मुझे निमंत्रण देकर गई हैं… आपकी आज्ञा हो तो मैं उनके घर चली जाऊँ?” (चेहरे पर उल्लास दिख रहा था।)

सुकांता - “नहीं-नहीं… बेटा! नहीं। (घबराते हुए) वह न जाने क्या पट्टी पढ़ा देगी तुझे…? मैं जानती हूँ… वह तेरे कान भरकर मेरे खिलाफ भड़काने का कोई भी अवसर हाथ से न जाने देगी। उसने कितने ही घरों में आग लगाई है। तू क्या जाने बेटा! तू अभी भोली है, नादान है… दुनिया के दाँव-पेच का तुझे अनुमान भी नहीं है।”

प्रीतिसुधा - “आप पूरी बात तो सुनिए… मेरा भरोसा कीजिए। मैं उनका हृदय जीतने का अवसर नहीं छोड़ना चाहती हूँ।”

सुकांता - (उपेक्षापूर्वक) “उससे हमें क्या लाभ होगा?”

प्रीतिसुधा (आत्मविश्वासपूर्वक) - “सदा की शान्ति… एवं आपकी पुरानी सहेली का सिद्धालय तक साथ।”

सुकांता - “वह… डायन… आग-लगाऊ…! वह और मेरा साथ देगी?.. वह तो निगोद जाएगी। (रोते हुए) मैं भोली-भाली स्त्री हूँ… उसकी बातों में आकर मैंने मन की बातें उसे बता दीं… और उसने नमक-मिर्च लगाकर… सब में भुरक दिया। (आँखें मिचमिचाते हुए) यहाँ से कहीं चली जाऊँ तो ही शान्ति मिलेगी।”

प्रीतिसुधा - (निकट आकर) “माताजी! ऐसी महिलाएँ तो सर्वत्र ही पाई जाती हैं। हर महिला अपने मन की बातों को हल्का करने के लिए किसी न किसी का सहारा लेती ही है और इसका फल भी वही है, जो रोज हमारे सामने आकर हमें आशंकित करके दुखी करता है।”
सुकांता - (उदास स्वर) “तो फिर मैं क्या करती, जिससे कलेजा हल्का हो जाता?”
प्रीतिसुधा - “अपने घर में सहनशीलता हो, सबका विश्वास जीतने के लिए पारदर्शिता हो, गलतियों को स्मित-वदन सुनने का साहस हो और धैर्य से समाधान दिया जाए तो घर से बाहर कुछ कहने की आवश्यकता ही न पड़े।”
माँ उसका मुख ताकती रह गई। ऐसी प्रौढ़ बातें सुनकर किसे अचम्भा न होगा!
सुकांता - “परन्तु ऐसा कैसे सम्भव है?”
प्रीतिसुधा - “प्राणी जगत में भगवान के सिवाय कोई भी पूर्ण नहीं होता है; अतः दोष, दुख होने का अचम्भा नहीं है। दुखी जीव के चार कषायों के होने का अचम्भा भी नहीं है… अतः किसी को भी अपराधी न माना जाए। हाँ, वह अनुभवहीन अवश्य हो सकता है, जिसे मार्गदर्शन देकर दूर किया जा सकता है।”
सुकांता - “जान-बूझ कर भी तो कोई कर सकता है?”
प्रीतिसुधा - “जान-बूझ कर कोई भी दुखी होना पसंद नहीं करता है। हो सकता है इन्द्रिय-ज्ञान से हमें ऐसा लगे, परन्तु विश्व में दुखी व्यक्ति ही दुख में निमित्त होता है।”
सुकांता - “इसका कारण क्या है कि कोई हमें दुख देने के बारे में सोचता रहता है?”

प्रीतिसुधा - “जो हमें अप्रिय लगता है, हम उसके दोषों के बारे में सतत सोचते रहते हैं और कहते भी रहते हैं… इस कारण बँधे हुए कर्मों के उदय के समय हमें अपना दोष दिखाई नहीं देता है, परन्तु हम किसी के कृत्य या वाणी के शिकार बनते रहते हैं।”
सुकांता - “तो फिर उदय के समय शान्ति कैसे रखें?”
प्रीतिसुधा - “उस समय उसको दोष न दें और न किसी से उसके बर्ताव की बुराई करें। इससे हमारे सत्ता स्थित पाप-कर्मों की स्थिति एवं अनुभाग में अपकर्षण होगा एवं पाप का पुण्य में संक्रमण होगा। हमारे प्रसन्न रहने से नवीन पाप बंध भी नहीं होगा। इस तरह हमारे कर्मों की सविपाक-अविपाक निर्जरा होने से हम मुक्ति-पथ के राही बन सकेंगे।”
सुनकर कुछ क्षण को सुकांता आश्चर्य में पड़ गई। अपनी भूल समझ में आते ही लघुतापूर्वक बोली -
सुकांता - “आज से मैं भी अपने दोषों की निंदा करती हूँ… कभी किसी में दोष न देखूँगी। सभी निर्दोष हैं, फिर मैं क्यों उदय में शिकायत करती रहूँ?.. बेटे! तेरा प्रथम दिवस ही मेरे लिए आनन्दकारी हो गया …आज मेरा मन मन्दिर में तो नहीं लगा, परन्तु आज घर में ही मन्दिर-सा आनन्द आ गया।”
प्रीतिसुधा - “तो फिर माँजी! …आज मैं जाऊँ?”
सुकांता - “अवश्य बेटे! अवश्य।” (मुदित मन से मोदन छलक ही पड़ा।)


प्रीतिसुधा घर से सारे परिवार के लिए मिष्टान्न लेकर गई और हाँ, दरयानी के लिए एक साड़ी-ब्लाउज ले जाना भी न भूली। दरयानी को सुकांता एवं उसकी बहू से ऐसी आशा न थी कि औपचारिकता में आदत-वश कहे गये आवकार (आमंत्रण) को सहज स्वीकृति मिल जाएगी। परन्तु द्वार पर लक्ष्मी-समान बहूरानी को हाथ में पूजा की थाल-समान भेंट लिये, अपने सम्मुख देखकर उसे विश्वास न हुआ।

अचकचाते हुए बोल पड़ी- “…आओ बिटिया! आओ… बाहर धूप में क्यों खड़ी हो? (अनायास आँखों में आँसू आ गए) अरे! रुक तो… (शीघ्रता से बेटी को पुकारा) अरे! लच्छो!.. अरे! घृतदीप और जल-कुम्भ तो ला। थोड़े अक्षत के दाने भी रख ला… देख! द्वार पर कौन आया है? (घबराकर) ओह! देर कर रही है री…!”

लच्छो सुनते एवं देखते ही - “साँची कहूँ तोरे आवन से हमरे, अँगना में आई बहार भौजी”…फुदकते हुए गाती है।

प्रीतिसुधा (देखकर मुस्कुराती है) - “माँजी! आप औपचारिकता में समय न लगाइए… मुझे आने की अनुमति दीजिए न!”

दरयानी - “अनुमति की क्या जरूरत बेटी! बस, थोड़ा मर्यादा का सम्मान तो करना पड़ेगा न! हमारे घर की प्रतिष्ठा नष्ट नहीं की जा सकती है।”

मोहल्ले की महिलाएँ इस घर की ओर जिज्ञासा से देखने लगती हैं। घर के बच्चे-बच्चियाँ और महिलाएँ भी एकत्रित हो आती हैं।

(लच्छो आँखों में अनोखी चमक लिये एक थाली में घृत-दीप, अक्षत, बताशे एवं जलकुम्भ लेकर आती है।)

लच्छो - “लो माँ!.. आज म्हारे आँगने सोने का सूरज ऊगा रे… घर में आये पाहुने… रतन लुटाओ रे…आज म्हारे …।” गाने लगती है।

दरयानी बड़े उत्साह से आँखों से काजल निकाल कर प्रीतिसुधा के कान के पीछे लगाकर बलैयाँ लेती है, आरती उतारती है, तिलक करती है, अक्षत लगाती है, जल-कुम्भ से बलाएँ दूर करते हुए उसके दोनों ओर तीन-तीन बार जलधारा गिराती है, बताशे फेंकती है।

दरयानी - आ मेरी बिटिया! आ। …मेरी कुटिया में प्रवेश करके, मेरे घर-आँगन को पवित्र कर। यह घर संस्कृति से सदा भरा-पूरा रहे… इस घर में भी रत्नत्रय की छाया में स्व-पर का कल्याण होता रहे… अतिथि-संविभाग से घर संपन्न रहे। जड़-सम्पदा में सुख-बुद्धि न रहे, समता न छूटे, सभी जन आत्मानन्द से सदा भरपूर जीवन जियें।"

दरयानी (लगभग नाचती-सी) - “…द्वारे खड़ा है चाँद… सब मिल आकर देखो री…।”

प्रीतिसुधा सस्मित-विस्मित-सी ताकती रह जाती है। मन ही मन विचारती है - “आत्मीयता की संस्कृति देखकर मुग्ध हो जाने का किसका मन न करेगा?”

दरयानी (एक हाथ काँधे से, दूसरा भुजा से पकड़ कर गृह-प्रवेश कराती है) - “आओ बेटे! आओ।”

प्रीतिसुधा (चरण छूती है, फिर लच्छो के मुख में मिठाई का टुकड़ा डालती है) - “…प्यारी गुड़िया-सी मेरी ननद रानी!..” (कपड़े भेंट करती है।)

दरयानी - (लच्छो से) “बैठक में ले चल।”

(शान्ति से सब बैठ जाते हैं। कुछ समय बाद…)

प्रीतिसुधा - (स्मित स्वर में) “अब मैं चलूँ … आपकी देवरानी जी घर पर मेरी प्रतीक्षा कर रही होंगी।”

दरयानी - “वह तो करेगी ही… (स्वर में कटाक्ष अनुभव में आया) उस जैसी औरत नहीं देखी… ज़रा बच कर रहना।” वह सलाह देने लगी।

प्रीतिसुधा - (स्मित हो) “आप दोनों गहरी सखी रही हो… उन्हीं ने मुझे दोषों से बचाने के लिए आपके चरणों में भेजा है। आप समय-समय पर आगे भी मार्गदर्शन देते रहना।”

दरयानी - “अच्छाऽऽऽ (आश्चर्य से) …वह और मेरे प्रति प्रेम… दिल की तो अच्छी है… परन्तु वाणी की…”
प्रीतिसुधा - “अपनों के बीच खुलकर बोलना बुरा तो नहीं होता न?”
दरयानी - “परन्तु बोलती ही क्यों है?”
प्रीतिसुधा - “मानव की कमजोरी है… दिल का दुखड़ा सहा जाता नहीं, अपात्र को कहा जाता नहीं… दिल हल्का करने के लिए कोई तो चाहिए न?”
दरयानी - “मैं सुनकर क्या कर लूँगी? मैं नहीं सुन सकती किसी की बुराई-भलाई… मेरे पास समय नहीं इन सब बातों के लिये।” (मन की कुंठा खोल बैठी।)
प्रीतिसुधा - “कर तो कुछ नहीं सकते, परन्तु दिल हल्का करने से रोगों से बचाव हो जाता है… प्रियजन इससे वैद्य-समान उपकार करते हैं। आपके उपकार के कारण ही माँजी प्रौढ़ हुई हैं। अवसाद एवं तनावपूर्ण सम्बन्धों के बिगाड़ से बची हैं; अन्यथा घर-गृहस्थी की आग में कब की जल चुकी होतीं।”
दरयानी - “मैंने किया ही क्या है?”
प्रीतिसुधा - “किया कुछ नहीं, सुना है…। बस, यही बड़ा उपकार है। सुनाने मात्र से जी को चैन मिल जाता है। और आप उनको औरों से न कहकर उपगूहन का आत्म-संतोष पाती हैं, योग्यता एवं आवश्यकतानुसार स्थितिकरण भी कर देती हैं। यह अनंत उपकार है।”
दरयानी - (आँखों में आँसू भरकर) “नहीं बिटिया! मैं इतनी पवित्र नारी नहीं हूँ… सही कहूँ, आज तो तूने मुझे मेरे कर्तव्य का बोध कराया है। मैं तो इधर की उधर करती रही। तब ही तो उसके एवं मेरे बीच झगड़ा रोज सुबह से ही प्रारम्भ हो जाता था।” (आँसू पोंछती है।)
प्रीतिसुधा - “काश! हम सब भगवान होते… तो आज मानव-मन वाली कमजोरियाँ नहीं होतीं। माँजी! मानव तो गलतियों का समूह ही कहा गया है; इनको जानते हुए भी स्व-पर के दोषों को दूर करते हुए ही हम भगवान-समान शान्ति का अनुभव कर सकते हैं और सुखी रह सकते हैं।”
दरयानी - (प्रसन्न-वदन) “…कोशिश करूँगी… (सुकांता को याद कर) चलो, मैं ही उससे क्षमा माँग लूँगी।”
प्रीतिसुधा (मधुर मुस्कान के साथ) - “अच्छा, अब चलने की आज्ञा दीजिए।”
खड़ी होकर विदा लेती है। दरयानी बहू के पल्ले में एक चाँदी का सिक्का बाँधती है। प्रीतिसुधा दरयानी के पैर छूती है, जेठानियों के पैर छूती है और लच्छो को गले लगाती है।

सुकांता ने आखिर मान लिया - “मधुर सम्बोधन से मधुर सम्बन्ध इस ही प्रकार बनते हैं।”

दरयानी भी कह उठी - “सच है, स्याद्वाद से सच्ची समझ होती है और ‘समझ से स्वर्ग’।”

तब से यह कहावत विश्व भर में प्रसिद्ध हो गई।

हमारी संस्कृति

नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले।
नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्।।

लक्ष्मण - मैं माता सीता के भुजबंध को नहीं जानता, मैं कुण्डलों को नहीं पहचानता। हाँ, मैं माता के प्रतिदिन चरण वंदन करता था, अतः उनकी बिछिया को अवश्य पहचानता हूँ।

  • महर्षि बाल्मीकि, रामायण : किष्किन्धा काण्ड 4.6.22

पति या पत्नी को रिझाने से अनंतगुना सरल है स्वयं के स्वरूप को जानकार स्वयं पर रीझना। इतनी सामर्थ्य न हो तो प्रभु-भक्ति में उपयोग लगाओ। जो भी सामर्थ्य हो, वह करो; परन्तु आत्मघात भूलकर भी न करना; क्योंकि यह जीवन, देव-शास्त्र-गुरु और आत्मा की रुचि अनंत जन्मों के फल में मिली है।


टिप्पणियाँ

पृष्ठ 14: 1. यह वर्तमान बांग्लादेश के राजशाही जिले के पहाड़पुर नामक स्थान से पश्चिम की ओर गोआलभीटा ग्राम है। वटगोहाली (वट गुफावली) गाँव में एक एक जैन विहार (मंदिर) था, जिसमें 5000 जैन मुनि ध्यान-अध्ययन करते थे। यह पंचस्तूपान्वय निर्ग्रंथ श्रमणाचार्य गुहनन्दी का जैन विहार कहलाता था। यह विशाल आकार का था। एक हजार वर्गगज के परकोटे में चारों ओर 175 से भी अधिक गुहाकार प्रकोष्ठ थे तथा उनके मध्य स्वस्तिक के आकार का तीन मंजिला शिखर युक्त सर्वतोभद्र जैन मंदिर था। मंदिर 350 फुट लम्बा-चौड़ा था, जिसमें चारों ओर परिक्रमा बनी हुई थी। - विदेशों में जैन धर्म, पृ. 101

1947 से पूर्व के भारत और आज के बांग्लादेश में भगवान पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के युग से ही खूब जैन धर्म की प्रभावना रही। 1023 ई. में चोल नरेश राजेन्द्र देव ने बंगाल नरेश के राजा महीपाल को हराया और उसके बाद राजेन्द्र देव की लौटती फौज ने बहुत जैन मंदिर नष्ट कर दिये। इसके बाद शेष जैन मंदिरों को पांड्य नरेश ने लिंगायत/शैव संप्रदाय के उन्माद में नष्ट कर दिया।

  • विदेशों में जैन धर्म, पृ. 100

पृष्ठ 15: 1. यह पंचस्तूपान्वय के प्रमुख आचार्य थे। इस आम्नाय की स्थापना आचार्य अर्हद्बली ने की थी। आचार्य वीरसेन व आचार्य जिनसेन भी इसी आम्नाय में हुए।

पृष्ठ 15: 2. यह वर्तमान में वानगढ़ कहलाता है। पौंड्रवर्धन (महास्थान) एवं कोटि-वर्ष आचार्य अर्हद्बली और आचार्य भद्रबाहु जैसे जैनाचार्यों के प्रधान पट्ट-स्थान थे।

  • विदेशों में जैन धर्म, पृ. 101

2. चंदना को वंदना

चंदनबाला सेठजी के घर आ तो गई, परन्तु पापोदय तो अभी भी साथ ही था…।

सुभद्रा कब अभद्रा बन गई, किसी को ज्ञात न हो सका। धर्मात्मा, लोक-पूज्य स्त्री… स्वाध्यायी, व्रत-उपवास करने वाली… महाश्रमण महावीर की उपासिका… साधु-साध्वियों को नित प्रति आहार दान देने वाली नारी, कब नारी से आरी बन गई, किसी को भान ही नहीं हुआ।

सेठानी को जबसे शंका हुई है, उसी दिन से उसे एक पल को चैन नहीं था। जब देखो, तभी अभिमानी वचनों के द्वारा चंदनबाला की परीक्षा लेती रहती और अनजाने में ही उसके कर्मों की सविपाक निर्जरा का हेतु बन जाती। चंदनबाला को कुछ न समझना और अपने आपको सब कुछ… उसे नीचा दिखाने का कोई भी अवसर हाथ से न जाने देती। और कोई हो तो घर छोड़कर भाग जाए और यदि क्रीत-दासी हो तो अपने दुर्भाग्य पर रो ही पड़े।
नौकरानियों के सामने अपने कुल-जाति आदि का मद दर्शाती रहती…।
“न जाने किस कुल की है?.. मैं तो इसके हाथ का पानी तक न पीऊँ… मुझे इसके हाथ का कुछ मत खिलाना… इससे साफ़-सफाई कराओ… नीचे के कक्ष में रखो… ओह! क्या करूँ?.. इनके सामने मेरी चलती ही कहाँ है?”
चंदनबाला सुनती, मुसकाती रहती…। वह सोचती - “आत्मा को जाने बिना देह-मात्र ही तो अपना परिचय एवं अस्तित्व लगता है। जब इनको अपने सत्स्वरूप की खबर होगी, तब इनके कर्मबंधनों का भुक्का उड़¹ जायेगा… अपने मन की पीड़ा अभिव्यक्त कर रही हैं…। यह तो प्रत्येक संसारी का नैसर्गिक अधिकार है।”
“दूसरों को नीचा दिखाने के वचन अभिमानी वचन कहलाते हैं। ध्रुव को कौन नीचा दिखा सकता है?.. पर्याय से ऊँचा कौन हो सकता है?.. इस देह को खूब नीचा दिखाओ… मुझे तो खुद यह आत्मा से बहुत नीचे दीखता है।”
वह सोचने लगी - मान अर्थात् दमनीय सोच एवं वचनों से आनन्द ही करो, जैसे - “हे माता! इस तुच्छा को शरण देकर आपने अनंत उपकार किया है। आप तो शरण-दाता हैं… आप मुझसे जैसे चाहो, काम कराओ। आपकी ही है यह देह… आपने मुझे कुशील-मार्गियों से बचाया है; इसका उपकार मैं कभी न भुला सकूँगी।”

सेठानी कभी-कभी कर्णों को कर्कश लगने वाले वचन बोलती, जिसे सुनकर अन्य दासियाँ कान बंद कर लेतीं। वह चंदनबाला के माता-पिता को कोसती रहती - "हे मूर्खे! तेरे माँ-बाप मर गये… मुझे तड़पाने को ही तो तू जीवित रह गई… तू क्यों न मर गई?.. “हीन स्त्री कहीं की…।”

चंदनबाला को हीनता का बोध कराने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ती थी।

दासियाँ कहतीं - “सेठानी कैसी कर्कशा है? साँचे-झूठे की परीक्षा किये बिना एकांत दुख देते जाना, यह कौन-सी मानवता है? यह कैसी महाश्रमण महावीर की उपासिका है, जो रोज बोलती तो है कि एकेंद्रिय जीव की भी यदि मैंने हिंसा की हो… तो मिथ्या हो, और संज्ञी पंचेद्रिय पर.. बे-रहम कहीं की।”

चंदनबाला उन्हें समझाती - “वर्तमान परिणाम का फल वर्तमान में मिले - ऐसा न्याय नहीं है। माता अंजना एवं सीता वर्तमान पर्याय में निर्दोष होने पर भी कर्मोदय की सविपाक निर्जरा करती हैं, खीझ कर नवीन कर्म-बंध नहीं। अंतिम स्त्री भव करने का यही सरल उपाय है। इसी ‘मूर्खता’ का स्मरण करा कर वे मुझे सावधान करती रहती हैं। … मैं तो उनकी आभारी हूँ…।”

“मेरी वजह से माता-पिता को अपयश न झेलना पड़े इसीलिए मैं जन्म ही नहीं लेना चाहती हूँ… स्त्री-पर्याय ही हीन है। …मैं तो आत्मा की आराधना करके महानतम पद सिद्ध दशा को पा जाना चाहती हूँ।”

दासियाँ बगावत पर उतर आने को उद्यत हो जातीं, परन्तु चंदनबाला उनके विरोध का विरोध करके उनको कर्म-बंध से बचा लेती और कर्म-बंध की निर्जरा करने का सहज, सरल उपाय भी तो सिखला देती।

उसकी सरलता, कोमलता व सजगता देखकर कभी-कभी सेठानी को भी तरस आ जाता; परन्तु नारी-स्वभाव का वह भी क्या करे? मन है कि मानता ही नहीं। जब-तब ‘पर-कोपिनी’ भाषा निकलती रहती…।

“तेरे नाम-श्रवण मात्र से लज्जा आती है… न जाने किस छिनाल की औलाद है?.. तब ही तो परिचय देने में कतराती है… जरूर किसी वेश्या की सन्तान होगी, तब ही सुन्दरता, जादू-टोना सब कुछ सीख कर आई है…। तुम क्या जानो कुलीन स्त्रियों का सतीत्व?.. ये हवेली, स्वर्ण, रूप्य, हीरे, माणिक्य, मोती… सच बता! इन पर ही नज़र है न तेरी…?”

“माता जी! मैं…” चंदनबाला ने साहस से बोलने का प्रयास किया तो सुनते ही सेठानी बिफर उठी…भूखी शेरनी-सी। “चुप कर… मैं तेरे मुख से ‘माँ’ जैसा पवित्र शब्द सुनने में समर्थ नहीं हूँ।”

"मैंने कहाँ से इसका नाम रख दिया ‘चंदनबाला’… बड़ी आई! तुझे देखकर मेरी क्रोधाग्नि ज्वाला-सी दहकती है,तन-मन में आग लग जाती है… तुझे मेरा पति ही मिला था? डाकन कहीं की!

मैं सब समझती हूँ। तेरा तप-ध्यान, भक्ति-पूजा सब ढोंग है…। तू भगवान को खुश करके मुझे मरवा देना चाहती है, ताकि तू इनके हृदय पर राज कर सके। तूने आते ही इन पर जादू-टोना किया हुआ है, परन्तु मैं जीते जी तेरी दाल न गलने दूँगी।"
चंदनबाला सोचती - "न जाने कौन-सी दाल? कैसी दाल? हे प्रभु! इसमें इनका दोष नहीं है…। अपने सुहाग के लिए तो नारी प्राण दे भी सकती है और ले भी…। ओह! भ्रम में पड़ा जीव दया का अधिकारी है। सदा शुद्ध परमात्म तत्त्व एक भ्रम के कारण ही तो अनादि काल से सुख से वंचित रह जाता है। शीघ्र ही इनका भ्रम दूर होगा। इनके वचनों से मेरे परिणमन का कोई सम्बन्ध तो है नहीं, फिर मैं क्यों दुखी होऊँ?
“वेश्या कहीं की! कुशीलता-बोधक शब्द सुनकर कोई भी नारी तड़प उठे, परन्तु इस निर्लज्ज को देखो, आँखों में एक आँसू तक नहीं। दुख का नामो-निशान तक नहीं दिखता है इसके चेहरे पर… जरूर अत्यंत ही दक्ष लुटेरी है। हाय भगवान! अब मैं क्या करूँ?”
चंदनबाला विचारती - “अनादिकाल से यह आत्मा सुख की आशा से विषयों में वेश्यावत् ही तो झपट्टे मारता रहा है… परन्तु अब निज में सुख-सरोवर मिल गया। त्रिकाल सत्-स्वरूप सुरक्षित आत्मा… अहा! अंतिम नारी देह के दिन पूरे हो रहे हैं, शीघ्र ही मंगल घड़ी आने वाली है। ऐसा कौन-सा जीव है, जो पूर्व भवों में वेश्या न बना हो? उदय बुरा होने से आत्मा तो बुरा नहीं हो जाता है। अहा! भूत नैगम नय! तुम्हारा अनंत उपकार है।”
सेठानी जो मुख में आता; वही कहती नहीं, बकती थी।

“अरी कलंकिनी! तेरा तो नाम लेना भी पाप है। भागजली… कर्मजली… तेरा नाश हो जाए… तुझे कभी सुख नहीं मिलेगा; तेरे संसार में आग लग जाए… तेरे मुख में कीड़े पड़े… तू कभी कहीं न दिखना।”
यह बड़े ही पौरुष का काम है, जो ऐसे जीवों को भी सद्भावना से ही देखा जाए। चंदनबाला शांतचित्त से विचारती…।
“सचमुच मेरे भाग्य जल रहे हैं…। अब तो यह अपूर्व अवसर है, जो मैं कर्मों को जला रही हूँ। इस भव का ही नहीं, भव-भव की शृंखला का ही नाश होगा। आपकी शुभकामनाओं का स्वागत है माँ!”
“सच है, इस संसार में कभी सुख नहीं मिलेगा… होता तो मिलता न! भ्रान्ति के अभाव से खुश हूँ मेरी माँ! संसार के नाश की भावना कितनी सुन्दर लगती है…। यदि यह आप दुखी होकर न कहती तो मैं आपको मिष्टान्न खिलाती…।”
“मोक्ष जाने के बाद मैं संसार में कहीं भी और कभी नहीं दिखूँगी; और मैं तो चाहती हूँ, आप भी मुझे चार गति में कहीं न दिखना। हम सब मोक्ष-महल में साथ रहेंगे… अनंत समाधि-सुख में।”
“मरने के बाद इस मुख में ही क्या, सारे शरीर में ही कीड़े पड़ जाते हैं, सो आपका कहना सही ही है; और अंत में इस देह को जला ही दिया जाता है। सो मैं भी यही चाहती हूँ कि समाधि के अंतर्मुहूर्त में इसका दाह-संस्कार करा दिया जाए।”
सेठानी - (झल्ला कर) “मैं कितना ऊल-जलूल बके जा रही हूँ, परन्तु तुझे थोड़े न कष्ट होता है। बंड-बेशरम कहीं की…।”
चंदनबाला - “मुझे भी दुख होता है, माता जी! आप मेरे कारण सदा दुखी रहती हैं…। काश! मैं आपके सुख के लिए कुछ कर सकती होती…। मेरा विश्वास करने की प्रार्थना ही मैं कर सकती हूँ। मैं भगवान को साक्षी करके कहती हूँ… मैं आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करूँगी, दशों दिशाएँ मेरे संकल्प की साक्षी रहेंगी। मैं आज से रहा-सहा शृंगार भी नहीं करूँगी…।”
सुनते ही सेठानी के मन के एक कोने में कुछ ठंडी लहर-सी उठी, परन्तु तत्काल शंका ने उसे दबा दिया। सच है! शंका के ज्वलनशील ईंधन (पेट्रोल) के रहते क्रोध-अग्नि शांत कब हुई है? कभी नहीं।
सेठानी - “अरी बदचलन! तेरे सारे अभिनय देख रही हूँ… वे क्यों घर आते ही तेरा नाम लेते हैं, बता? तुझे देखे बिना भोजन तक नहीं करते हैं… जाने से पहले तुझे ही देखते हैं… तेरे लिए न जाने क्या-क्या लाते हैं। कुछ तो गड़बड़ है… नहीं तो कोई भी पुरुष सगी सन्तान के लिए भी इतना नहीं करता, फिर तू इतनी बड़ी हो गई।”
चंदनबाला - “स्वाध्याय से सब कुछ ठीक हो जायेगा… आप तो निर्दोष भगवान हैं।”
इस तरह चंदनबाला सेठानी में छिपी प्रभुता को देखकर प्रभुता-सूचक वचनों से उत्साह-वर्धन करने का प्रयास करती रहती। भगवान-तत्त्व को कुशील वचन बोलना अयोग्य ही है, सो बोलने की तो कौन कहे? विचारती तक नहीं थी। इससे उसके कर्मों की सदा गुणश्रेणी निर्जरा होती रहती थी।

सेठजी के घर से प्रवास पर निकलते ही सेठानी की क्रोध-ज्वाला अपने तीव्र उत्कर्ष पर उतर आती और गूँजने लगते मध्य कृशा वचन¹… शीत ऋतु की मध्य रात्रि का नीरव वातावरण…।

“तू कहीं भी जा, मर… परन्तु हमारे घर से जा… निकल… पाँच हजार स्वर्ण मुद्रायें लगी हैं… फिर भी मैं बिना मोल लिये छोड़ रही हूँ… मैं तुझे मुक्त कर रही हूँ। और कोई दासी होती तो ख़ुशी से भाग जाती, परन्तु तू …दुष्ट है, ढीठ है। तैयार रह! तुझे फाँसी दूँगी… सुनहरे अवसर की तलाश में हूँ… तुझ जैसी स्त्री के भाग्य में पति सुख नहीं है… भूत-पलीत सतावें तुझे…” ऐसे ही अभिशाप के कई वचन, खूब बद्-दुआएँ उसे मिलती रहतीं।

यह सब सुनने पर भी भेद-विज्ञानी चंदनबाला को कष्ट नहीं हुआ। उसने मध्य कृशा भाषा को कर्म-कृशा वचनों में बदल डाला। अर्थात् जिनसे कर्म कटें, गलें, झरें - निर्जरा हो। सेठानी के वचनों को वह ऐसे वचन ही समझ रही थी।

“आत्मा अनंत बलशाली व प्रभुतावान है… संकट में भी समाधि कर सकता है। अनुकूल संयोगों में भी दुखों से मुक्त-सुखी हुआ ही कौन है? अतः संकटों में भी आत्म-कल्याण से सदा सौभाग्यशाली बनो… निज घर में जाओ, वहाँ से निकलने की व्यवस्था ही नहीं है…। मेरे पति तो त्रैलोक्य-नाथ हैं, जिनके बाद किसी को भी अपना पति बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। मेरी परिणति का स्वामी मेरा ध्रुव ही है… अहा! आनन्द आ गया।”

सेठानी - “लगता है, इसे भूत लग गये हैं… जब ही तो इसे सुनाई नहीं पड़ रहा है; नहीं तो कोई इस तरह शांत कैसे रह सकता है? इसको झाड़-फूँक कराओ, नहीं तो इसे कहीं भी फूँक आओ… कहीं मेरे स्वामी को न खा जाए… मुझे रात को भी नींद नहीं आ रही है।”

चंदनबाला - “सच है! भूताविष्ट तो स्वयं थी… उदय रूपी भूत की सताई, भ्रमरूपी भूत की सताई… परन्तु इसके उतारने का मन्त्र तो आत्मभान ही है, श्रीजिन की वाणी-रूपी औषधि का पान करना ही इसके दूर करने की विधि है। कर्मोदय को भोगना मजबूरी तो नहीं; हाँ अज्ञानता अवश्य हो सकती है।”

“कटुक-कड़वा लगने वाला वचन यदि सत्य घटित हो गया… तो क्या होगा?” एक दिन विचार आ ही गया… “सेठानी यदि आँखों को फोड़ ही दे तो… अरे! फिर क्या होगा?.. ओह! अंधी होकर कैसे रहूँगी?”

तब ही उसने एक सिद्धांत के स्मरण-स्वरूप अमृत का घूँट पी लिया। “…अरे! विकल्प निरर्थक ही है। आयु-क्षय से पहले मरण एवं असाता के उदय से ज्यादा कभी न कुछ हुआ है और न कुछ होगा। मैं अप्रिय नहीं बोलूँगी तो मेरे साथ अप्रिय क्यों होगा? फिर भी होवे तो… आनन्द ही होगा… आँखें नहीं होंगी तो क्या हुआ? प्रज्ञा-चक्षु तो रहेंगे न… इनका स्पर्श कौन कर सकता है? श्रद्धान-ज्ञान-आनन्द में न अंधे हैं, और न कोई कर सकेगा…”

“अभी भी पाप-वार्ता सुनने को तो बहरी ही हूँ, जिन-वचन श्रवण को नहीं… जड़-सम्पदा किसी की भी न हुई, परन्तु आत्मिक आनन्द की सम्पदा से सदा अमीर हूँ… उदय में नीच कहो तो कहो, इसमें मेरा क्या दोष है? हाँ, त्रिलोकीनाथ एवं आत्मज्ञानी साधुओं के सामने सदा नीचे देखने से नीच हूँ; संसार में नासमझ हों तो भले हों, आत्मज्ञान की समझ तो है न?”
इस तरह स्व-पर का विशुद्धि-वर्धक विचार उसे सत्-सुख देने लगा। कटुका-वचन को पटुका (चतुराई पूर्ण) वचन में बदल कर चंदनबाला कितना आनन्द कर रही है!
सेठानी परुषा भाषा - हृदयभेदी वाणी बोलने से भी नहीं चूकी - “…बेचारी …अनाथ …मेरे रोटी के टुकड़ों पर पल रही है… मेरी दया न होती तो अब तक कब की मर जाती।”
चंदनबाला सोचती - “आत्मभान के बिना बेचारापन तो रहा ही है, स्वरूप-प्रतिष्ठा बिना अनाथ ही हूँ, रोटी के टुकड़ों पर यह देह पल रही है, सो सही ही कह रही हैं। कर्मों की मार के बीच जो भी शरण दे और स्वरूप-पतित होने से बचा ले, अनाचारियों-कुशील पुरुषों से रक्षा करे, यह सचमुच दया का फल है; मैं उनके प्रति कृतज्ञ हूँ।”
‘दारी’, ‘रखैल’, ‘वेश्या’, ‘पापिनी’ - ऐसे वचन सुनकर भी शीतलमति चंदनबाला अपने नाम को सार्थक कर रही थी।
“कर्मों को रखने से रखैल हूँ… विविध विषयों में सुख मानती-फिरती थी, सो परिणति वेश्या ही थी… अब तो एक ध्रुव-स्वभाव मिल गया, सो निज-स्वरूप की रखैल हूँ…। पाप होते रहे हैं, सो पापिनी कहने का बुरा क्यों मानना? …भले ही अब पाप नहीं तो क्या हुआ, पापोदय तो है न! सो उनका कहना सर्वथा सत्य ही है।”
वह हितैषी वचनों द्वारा उन परुष वचनों को पुरुषा (पुरुषार्थ के) वचनों में बदल लेती थी। “आत्मज्ञान होने पर सहज शिष्टाचार होता ही है… ब्रह्मचारी ही व्यभिचार से बचते हैं… पापोदय क्षणिक है, परन्तु आत्म-सम्पदा तो शाश्वत है।”

चंदनबाला धैर्य बढ़ाती जा रही थी और सेठानी का अधैर्य सीमा लाँघता जा रहा था। दिन-रात बदले की कामना में डूबी रहती। अंततः वह और भी निष्ठुर वचनों पर उतर आई… -

“कब इसके नाक-कान काटूँ?.. बाल काट दूँ?.. हाथों की उँगलियाँ काट दूँ या गला दूँ?.. खाने-पीने को कम देकर दुर्बल तो कर दिया है… मार-पीट का भी इस पर कोई असर नहीं हो रहा है… यह किसी तरह स्वयं आत्मघात कर ले तो मुझे हत्या का पाप न लगे… परन्तु यह दुष्ट स्त्री मरती भी नहीं है…। मेरे दयालु, धार्मिक हृदय में उसे जहर देने की हिम्मत नहीं पड़ती है… सो जीवित है।”

इन सबको भी ज्ञानी चंदनबाला मृदुल चिंतन में बदल लेती थी।

“जब अनुवीचि भाषण से काम न चले तो भेदविज्ञान से तो कौन रोक सकता है? आत्मा को तो कौन मार सका है? और आयु से पहले देह छूटने की कोई व्यवस्था नहीं है। सबको आत्मभान हो, सभी स्वाध्याय करके सत्य मार्ग में आगे बढ़े - ऐसी भावनाएँ भाने योग्य हैं। अपमान सहने के भाव से स्वयं ही यश के पात्र बन जाते हैं, ऐसे भावों से शुभ-नामकर्म का बंध होगा। खोटे भावों से सदा अशुभ बंध होता है, सो योग्य ही है।”

प्रायः ही दासियाँ जब-तब मिलतीं तो सेठानी की ही बातें करतीं। वह वार्ता एवं भेदविज्ञान भी सुनने लायक है।
उर्मिला - “लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं। (झुँझलाकर) सेठानी को पापों का डर दिखाना उचित होगा। स्वर्ग-मोक्ष का लोभ लग जाए तो लगाना चाहिए। जैसे बने, वैसे पाप तो छूटना ही चाहिए।”
चंदनबाला - (शांत स्वर में) “वस्तु-स्वरूप समझने के बाद, समझाने का हठ न होने से क्रोधपूर्वक क्यों समझाया जाए? गुस्से में सत्य समझ में भी नहीं आता है। गुस्सा करने वाले का पुण्य अपकर्षित होने से वह लोकमान्य कैसे होगा? अतः क्रोधपूर्वक सत्य समझाने का प्रयास न किया जाए। ऐसे समय सत्य भी असत्य-सा भासता है; वह भी ‘उभय सत्य’ बन जाता है। वह अपनी पसंद अनुसार उसे सत्य या असत्य मान सकता है।”
“स्वर्ग-मोक्ष का लोभ भी क्यों दिखाया जाए?.. ऐसे लोभ से वस्तु-स्वरूप की प्रतीति असम्भव है। परन्तु सुख-स्वरूप आत्मा का भान होने पर सुख बाहर खोजने की वृत्ति ही रुक जाती है तो लोभ बिना ही शुद्धात्म सुख सहज समुत्पन्न होता है।”
“नरक-निगोद एवं पंच परावर्तन के भय से भी आत्मा का भान नहीं होता है, पाप नहीं छूटते हैं। अतः ज्ञानी भय का प्रयोग करने के स्थान पर वस्तु-स्वरूप के ज्ञान को ही सहज एवं सुखदाता सिद्ध करते हैं। भय से वस्तु-स्वरूप एवं मार्ग दोनों ही समझ में नहीं आते हैं। अंध-विश्वास से संसार-मार्ग की ही वृद्धि हो सकती है।”
“जिनाज्ञा भंग करके सत्य का निरूपण करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। एक अंग का घात करके दूसरे का पोषण नहीं किया जाता। शुद्ध-स्वरूप उपादेय होते ही ग्रहण होने योग्य शुद्ध भाव प्रकट हो जाते हैं और छूटने योग्य हेय भाव छूटते जाते हैं।”

विमला - “चावल को भात कहती है… उनके सामने कोई चावल नहीं कह सकता है…, अन्यथा पारा चढ़ जाता है। यह भी कोई बात है?..आप अपनी भाषा बोलो, हम अपनी। (…हँसी उड़ाती हुई) …अब तुम्हें आटा कहना हो तो कहो, हमारे गुर्जर देश में उसे लोट कहते हैं। …इतनी-सी बात पर मिर्ची लग जाती है। …एक दिन तो इतनी-सी बात पर झरिया दे मारी थी।”

चंदनबाला - “जिस देश में जाओ वहाँ की भाषा या बोली को अपना लेना चाहिए। ‘जनपद सत्य’ में देश-काल के योग्य वचन कहने से कष्ट नहीं होता है। वस्तु-स्वरूप को किसी भी भाषा में कहा जा सकता है। अच्छा हो कि हम दूसरों के सुख-दुख का ध्यान रखें।”

कमली - (आँखें मिचमिचाकर…हाथ मटका कर) “…सेठानी जब देखो, तब कहती रहती हैं - ‘इन्होंने सिर पर चढ़ा रखा है। इसे देखकर मेरे कलेजे पर साँप लोटते हैं, न जाने कब तक मेरे सीने पर मूँग दलेगी?’ … मुझे तो उनकी बातें समझ में ही नहीं आती हैं। मैंने तो एक दिन भी सेठजी के सिर पर चंदनबाला को चढ़ते नहीं देखा! …कलेजे पर साँप लोटते मैंने तो नहीं देखे…।”

चंदनबाला - (हँसते हुए) “… अरे! यह तो ‘संवृत्ति सत्य’¹ (नाम, रूढ़ि) कहलाता है। इसका मर्म समझे बिना उन्हें गलत कहकर उपहास करके पाप बंध न करें। इन्हें स्वार्थी या गलत सिद्ध करने से कोई लाभ नहीं होगा। ये वाक्य बतलाते हैं कि उन्हें लगता है कि सेठजी मुझे बहुत ज्यादा मानते हैं। मेरी गलत-सही बात का विवेक नहीं करते हैं। मेरे रहने से उन्हें हृदय में चैन नहीं मिल रहा है, मेरा रहना ही उन्हें सदा खटकता है; अतः वे इसे ‘छाती पर मूँग दलने’ जैसी बातों से कह रही हैं।”
निर्मला - “तो आप क्या करेंगी?”
चंदनबाला - “करना कुछ नहीं है… भ्रम के बादल छँटते ही सब ठीक हो जायेगा।”
कमली - “जब सब आत्मा ही हैं तो सेठानी, मालकिन, नौकरानी किसने बनाये? …सबको समान हक़ मिलना चाहिए।”
चंदनबाला - “व्यवहार में जैसे सबको पाषाण नहीं कह सकते हैं, उस ही प्रकार सभी जीवों के उदय को एक-सा व्यवहार देना असम्भव होता है। स्थापना का आदर कीजिए। ‘मालकिन’, ‘नौकरानी’ - ये सब ‘स्थापना सत्य’ हैं। हमें उसकी गरिमा बनाये रखना चाहिए। जिस थाली में खायें, उस ही में छेद करें - यह तो अनंत पाप है। साम्यता का उपाय स्थापना ही तो है, ऐसा विचार कर न स्वयं परेशान हों और न दूसरों को करें। पति-पत्नी स्थापना सत्य के विषय हैं। जीव स्वतंत्र होने पर भी लोक में दायित्व का निर्वाह करते हैं।”
“नौकर, माता-पिता, पति-पत्नी, धर्म-बेटा, देशी-विदेशी, गुरु-शिष्य, साधर्मी - इसमें भी स्थापना निक्षेप ही है। लेकिन नाम निक्षेप के अनुसार गुण हो नहीं जाते हैं। इनको भगवान अवश्य ही समझिए। …मूल वस्तु तो नहीं बदली है न?”

मालती - “नाम सुभद्रा है, परन्तु ज़रा-सी भी भद्रता नहीं दिखती है। …चंदनबाला तो सचमुच चंदनबाला जैसी होने पर भी उन्हें बुरी लगती है।”
चंदनबाला - “यह तो ‘नाम सत्य’ कहलाता है …मेरा नाम बदल कर अग्नि रख दिया जाए तो भी मैं नहीं बदलूँगी। नाम वस्तु-स्वरूप के विपरीत लगने पर भी आदर से पुकारना चाहिए। घड़ा फूटने को ‘कल्याण होना’, दुकान बंद करने को ‘मंगल करना’, मरण को स्वर्गवास, पाया को खोया (दूध का मावा), करुणा-सागर को ‘अरिहंत’ कहते हैं। ऐसे में नाम का अर्थ विचारना योग्य नहीं है।”
उर्मिला - “सेठानी कहती है - ‘तू सदा गंदे कपड़े पहनती है।’ …ऐसा क्यों करती हो?”
चंदनबाला - तो इसमें दुखी होने की कौन-सी बात है? …यह तो ‘रूप सत्य’ है …और वह भी वस्त्रों का, न कि मेरा। मैं तो अरूपी महापदार्थ हूँ। देखो, शृंगार एवं वस्त्र-गहने आदि कई बार शील पर आक्रमण के कारण बन जाते हैं। यदि शील न लुटाना हो तो सादा जीवन अपनाना चाहिए। फिर घर के सारे कार्य करने पर तो वस्त्रों एवं देह के मलीन होने का क्या अचम्भा है?"
निर्मला - “रूप सत्य? …समझ में नहीं आया।”
चंदनबाला - “देखो! रूप देखकर कुछ कहना। जैसे कौआ काला है, आकाश नीला है, सोलह तीर्थंकर कंचन वर्ण के थे…। यह सब ‘रूप सत्य’ है।”
“इसी तरह तुम गरीब हो, दुखी हो, चोर हो, बुरे हो, अच्छे हो, काले हो, अनुभवहीन हो - यह सब ‘अपेक्षा सत्य’ है। इसका बुरा नहीं माना जा सकता है।”
कम्मो - हम सब एक हैं, तो फिर यह सब अंतर क्यों है?"
चंदनबाला - “यह ‘व्यवहार सत्य’ है। आत्मा सब एक समान होने पर भी पर्याय के स्थान पर पर्याय आधारित ही न्याय मिलता है। अतः बाहर में अंतर हो जाता है। दृष्टि में समानता रखकर हम सबसे समानता का व्यवहार करें - यही इस कथन का आशय है।”
निम्मो - “जब भी तुम सेठानी के बंधन से मुक्त हो जाओगी, तब तुम कहाँ जाओगी?”
चंदनबाला - "मैं तो मोक्ष जा रही हूँ…।
विमला - “यह बात तो एकदम गलत है …तुम तो स्त्री-पर्याय में हो। पता नहीं, जाओगी भी कि नहीं?”
चंदनबाला - “यह ‘सम्भावना सत्य’ कहलाता है। इस भव में नहीं तो अगले भव में, परन्तु जाऊँगी अवश्य।”
“लोक में सम्भावना के रूप में बोला गया आत्मविश्वास सत्य ही माना जाता है। ‘कल इससे आगे समझाऊँगा’, ‘तुम कभी पास नहीं हो सकोगे’ ‘तुम कभी नहीं सुधरोगे’ ‘जल्द ही मोक्ष जा रहा हूँ’, ‘तुम्हारा मोक्ष कभी नहीं होगा’ - ये सब सम्भावना सत्य हैं। अतः इसे ‘भविष्य-वाणी’ न माना जाए। यह किसी को जगाने-स्फूर्ति भरने के लिए कहा जा सकता है।”
निर्मला - “तुम देवी हो! और कोई होता तो क्या से क्या हो जाता …आज तक इतिहास में किसी दुष्ट से दुष्ट स्त्री ने भी ऐसे दुख अपनी दासियों को न दिए होंगे, जैसे तुम्हें भोगने पड़े हैं।”

चंदनबाला - “यह ‘भाव सत्य’ है। भले ही मैं देह से स्त्री हूँ, परन्तु लड़ाकू-झगड़ालू स्वभाव न होने से तुम मुझे इस तरह पुकारती हो। लेकिन मैं तो सत् रहने वाला आत्मा हूँ। मैं देवी नहीं हुई, यह तो तुम भी जानती हो। मैं यह सुनकर खुश कैसे हो सकती हूँ?”

“कंजूस, उदार-चित्त, पाप-चित्त, दिल की बड़ी - ये सब क्षणिक भाव सत्य हैं, आत्मा के स्वभाव नहीं। अपने-अपने देखने का नजरिया मात्र है।”

“गुण को भी ‘भाव’ कहते हैं। धैर्य का फल ‘मीठा’ होता है; इस अर्थ में करेला एवं नीम भी ‘मीठे’ होते हैं; क्योंकि इनका फल मधुर होता है।”

सुमंगला - “सेठानी सबसे यही कहती है कि ‘तुम नागिन बनी बैठी हो…’ तुम्हें बुरा क्यों न लगेगा भला?.. मेरी क्या, समस्त दासियों की सहानुभूति तुम्हारे साथ है।”

चंदनबाला - “यह ‘उपमा सत्य’ है। पति एवं संपदा रूपी धन के ऊपर कब्जा करने की कामना वाली को ‘नागिन’ कहते हैं, जो न तो भोगती है और न भोगने देती है। उनके भाव को समझो तो आपको कष्ट नहीं होगा। माताजी के भ्रम के साथ यह उपमा भी चली जाएगी। हम दोनों फिर एक जैसे हो जायेंगे। घबराओ नहीं, देर है अंधेर नहीं।”

“मेरी सहानुभूति तो माताजी के साथ है। …काश! मैं उन्हें विश्वास दिला पाती कि मैं ही उनकी सच्ची बेटी हूँ …उनके सुख-दुख में कभी साथ न छोड़ूँगी…मेरा वश चले तो उन्हें भी मोक्षमार्ग में ले चलूँ।”
मंगला - “इतना आसान नहीं है, इतनी पापिन नारी का तरना…।”
चंदनबाला - “आसान है …सच में …इन सब पापों ने, विकारों ने, उदयों ने शुद्धात्म-तत्त्व को छुआ भी नहीं है। ऐसा जानते ही पल भर में विकार ध्वस्त हो जायेंगे। समस्त विकार, चाहे वे कितने ही बढ़-चढ़ कर देखे-सुने गये हों …व्यय-शील होने से वे आत्मा में एक समय से ज्यादा टिकते ही नहीं हैं तो आत्मा का परमात्मा बनना सरल ही हुआ न?”


पैशून्य से शून्य चंदना सेठजी से कभी भी सेठानी के बारे में कुछ भी नहीं कहती थी। सेठानी के जुल्म सेठजी के कान में जब-तब आते ही रहते थे। वे उसका स्पष्टीकरण चंदनबाला से पूछते, परन्तु वह सेठानी जी के ही पक्ष में स्पष्ट कर देती थी।
चंदनबाला कहती- “माताश्री बड़ी दयालु, दीर्घदृष्टि हैं। वे मुझे आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं, …हर कार्य में दक्ष बनाना चाहती हैं। … इससे मुझे चरणानुयोग में विवेक एवं अहिंसा का सहज स्वाध्याय मिल रहा है।”
फिर चहकती हुई कहती - “पिताश्री! …अब तो मेरी रोटियाँ भी फूलने लगी हैं।”
सेठजी - “क्या? …तू रोटी बनाती है? (आश्चर्य से) …परन्तु कंचना तो रसोई बनाने को ही नियुक्त की गई है…।”

चंदनबाला - (भोलेपन से) “…पिताश्री! उसको ज्वर था, …अतः मैंने उसे अवकाश दे दिया…।”

सेठजी - “तेरी करुणा के फल में सारी दासियाँ काम से जी चुराने लगेंगी। पहले ही पानी वाली सिरदर्द के कारण नहीं आ रही है, …उर्मिला झाड़ू-पोंछा को आती थी, सो वह पेट से हो गई, …कपड़े धोने का काम भी तू ही करेगी तो कम्मो पीहर चली गई। …अब रसोई वाली निम्मो भी गई। …धान कूटने का तुझे बड़ा शौक है, इसलिए मंगला को भगा दिया। …क्या बात है? …ससुराल में किया जाता है इतना काम। …वहाँ भी ऐसा घर देखूँगा, जहाँ मेरी लाड़ली को रोटियाँ न बनाना पड़े। (…हाथों में हाथ लेकर देखने लगे) …देख तो! तेरे हाथ में कितने छाले हो गये हैं; …और यह जलने का निशान …?”

चंदनबाला - “जब काम सीखा जाता है तो सभी जल ही जाते हैं। अब मुझे बहुत सारे काम आने लगे हैं …इससे मेरी भूख भी बढ़ गई है, …पिताश्री! अब मैं छह रोटियाँ खाने-पचाने लगी हूँ। (…हँसती हुई) …और ताकत तो देखो? …थकने के कारण निद्रा देवी मुझे शीघ्र ही गोदी में सुला लेती है। …जमीन पर भी लेटूँ तो निद्रा देवी कब्जे में ले लेती है।”
सेठजी (आश्चर्य से)- “तू जमीन पर लेटती है…? ऐसा कभी न करना बेटी! मेरी जान ही चली जाएगी। …मेरी फूल-सी सुकुमार बेटी, कोमल कली-सी। (…उनकी आँखों में आँसू आ गये।)
चंदनबाला - ( …हाथ जल्दी से छुड़ाकर) नहीं पिताजी! मैं तो आर्यिका बनूँगी। तब भू-शयन ही तो करना होगा। …मेरे महाश्रमण महावीर भू-शयन करें और मैं स्वर्ण-पर्यंक पर शयन करूँ? ऐसा कैसे हो सकता है?”
करुणाशील आत्मज्ञानी चंदनबाला किसी के भी दोष को पीठ पीछे नहीं कहती थी। किसी को कष्ट उत्पन्न हो, जिससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाए, विसंवाद हो जाए, विश्वास का धन लुट जाए, किसी के प्राण चले जाएँ, किसी की निंदा हो जाए; ऐसे वचन स्वतः सहज ही नहीं बोलती थी।
मन्दिर में महिलाएँ सेठानी का उपहास करतीं, …नयी-नयी बात बनाकर हास्य करती रहती थीं।
चंदनबाला - “आत्मज्ञान से चूकने का भाव ही हास्यास्पद है। दूसरों के औदयिक भाव का क्या हास्य करें? …उदय-प्रमाण बनाव बनते-बिगड़ते रहते हैं। …सामने कोई न कोई जीव दिखाई देता है। प्रभुता-वाचक शब्द के स्थान पर दीनता या हीनता-बोधक शब्द, जिनसे अशुभ राग पैदा हो, ऐसे वचन कैसे बोले जा सकते हैं?”

उसके वदन (मुख) पर गम्भीरता ही छाई रहती थी। माताजी का उपहास करने या कटाक्ष करते हुए सत्य कहने से वस्तु-स्वरूप की गम्भीरता समाप्त हो जाएगी; तब सत्य का भान कैसे होगा? सत्य का भान तो करुणा एवं प्रकट आत्मीयतापूर्वक ही होगा। अतः धैर्य से अवसर आने की प्रतीक्षा करती रही।

आखिर सेठानी का एक दिन दाँव लग ही गया। …

हमें लगता है कि यह चंदनबाला के विरुद्ध सेठानी का अंतिम दाँव था। …और जो हुआ, सो सबको ज्ञात ही है। …आखिर सती की विजय हुई, …स्त्री-लिंग छिद ही गया।

पौने छह मास के बाद… आज जब अतिशय हुआ, …चंदनबाला के हाथों महाश्रमण महावीर का पारणा हुआ; तब अभद्रा सुभद्रा बन गई, …केश-राशि पुनर्जीवित हो गई, …लौह-बंधन के साथ भव-बंधन खुलने का रास्ता भी खुल गया। …शोषित नारी भवताप-शोषक बन गई, …उसने अपनी तपस्या से नारी नाम सार्थक कर दिया था। …वह किसी की भी शत्रु नहीं थी, …यह सिद्ध हो गया था।

अंतिम तीर्थंकर का निरन्तराय पारणा होने से सारे कौशाम्बी में ही नहीं, स्वर्गों में भी आज मंगल गान हो रहे थे; …रत्न-वृष्टि तो आज इस ही घर पर हुई थी, फिर भी आँसुओं की बरसात इस ही घर में क्यों हो रही है?

जिसे पर-पदार्थों में सुख-बुद्धि है, वह पतित हो जावे -इसमें अचम्भा कौन-सा? सुभद्रा आज स्वयं को पतिता अनुभव कर रही थी।

“ओह! एक भावी सिद्ध के साथ मैंने यह क्या व्यवहार किया?.. एक आत्मज्ञानी जीव मानो मुझे तारने को ही आया था; …और मैंने उसके साथ कैसा दुर्व्यवहार किया? हाय! आज पृथ्वी फट जाए …और मैं उसमें समा जाऊँ।” …वह बेभान होकर गिर पड़ी।

चंदनबाला का अंतिम कार्य अपनी पालिका सेठानी का उद्धार करना था, …सो वह शीतल जल-सिंचन करके सेठानी के सिर को अपनी गोद में लेकर सहलाने लगी… सेठानी को चेत आया, …उसके कर्णों ने सुना एक मधुर गीत…, नेत्रों ने देखा आँखों से बरसती ममता को, …कोमल हाथों से हाथों को सहलाती चंदनबाला को। …आँखों से मात्र अश्रु ही निकल सके …मरण तो उसका हो ही चुका था। …किस तरह उस ममतामयी गोद को तजे, उसे समझ में ही नहीं आ रहा था। न वह विरोध कर पा रही थी और न ही अनुरोध।…ओह! ऐसी विपत्ति का सामना उसने कभी नहीं किया था।

सेठानी - “चंदनबाला! मुझे सज़ा दो, … सज़ा; …मैं इस पृथ्वी पर भार हूँ…!”

चंदनबाला - “माँजी, आपके कारण ही तो आज अपूर्व आहारदान होने का अवसर मिला है, …आप अकर्ता हो, …प्रकृति के रहस्यों को मात्र केवलज्ञानी ही जानता है; …हम सब तो भवितव्य के सहज ज्ञाता मात्र हैं।”

चंदनबाला - “अवश्य ही अब आपको सम्यक्त्व से सजना है, मेरी माँ! यही अनंत गुणों से आपको सजायेगा। …दोष इस पृथ्वी पर सदा भार रहे हैं, …अब तो आपने अश्रुओं के माध्यम से उन दोषों का भी वमन कर दिया है। …अब आप मेरी एकदम पवित्र माँ हो, …महाश्रमण महावीर मात्र मुझे ही नहीं, आपको भी श्रमण-संघ में शामिल होकर आत्म-उद्धार करने का आमंत्रण देने आये थे। चलो माँ! …चलो न, …देर न करो।”
चंदनबाला ने सुभद्र रीति से सुभद्रा को गले से लगा लिया …और वह निरंतर उसके आँचल को आँसुओं से भिगोती रही …तब तक, जब तक मन का संताप दूर न हो गया।
सेठजी की आँखों से भी अश्रुपात हो रहा था। …सेठानी पर आये घनघोर क्रोध के बादल गरजे बिना ही बरस गये। सारी दासियाँ अश्रुपात कर रही थीं। …वे किससे राग करें और किससे द्वेष? …कल तक जिससे घृणा कर रही थीं, आज वह श्रद्धा की श्रद्धेय व पूज्य बन गई। …कल तक जिस पर दया कर रही थीं वह तो एक क्षण में इन्द्रों से भी पूज्य हो गई। …ओह! ‘किंकर्तव्यविमूढ़’ होकर सारी दासियाँ मात्र आँखों से ही अपना कर्तव्य पूरा कर रही थीं …और सोच रही थीं कि अब तो चंदनबाला के साथ ही अपना नारी-भव सार्थक करना है। …अनेकों सेठों की क्रीत-दासियाँ भी आज मुक्त कर दी गई थीं… वेश्यालयों में क्रीत-दासियाँ भी पश्चात्ताप से अपने को पवित्र करती हुई श्रमण संघ का अंग बनने को मचलने लगी थीं। …आज यह कैसा अद्भुत अतिशय हुआ है? …चंदनबाला के सम्मुख एक साथ करबद्ध दशा में वचनों से मौन, आँखों से मुक्ति की ख़ुशी के अश्रुपात से सजी सहस्रों नारियाँ खड़ीं थीं। बहिन मृगावती एवं जीजाजी-कौशाम्बी के राजा शतानीक करबद्ध खड़े थे…।

चंदनबाला मुस्करा रही थी। …कर्मों पर उसकी अद्भुत विजय आज सबको शिक्षा दे रही थी। …समाचार आए - ‘महाश्रमण महावीर को सम्मेदशिखरजी की ऋजुकूला नदी के तट पर केवलज्ञान हुआ है’ …और चल पड़ीं सारी नारियाँ चंदनबाला के पीछे-पीछे मुक्ति के मार्ग में।

सारा जगत आज तक कह रहा है - “ऐसी पावन नारी चंदनबाला की विशुद्धि एवं पुरुषार्थ को वन्दना।”


टिप्पणियाँ

पृष्ठ 31: 1. चूर्ण हो जाना।

पृष्ठ 37: 1. जिसके सुनते ही हड्डियों का बल खत्म हो जावे - ऐसे वचन।

पृष्ठ 42: 1. जो वचन लोक रूढ़ि में सुना जाता है, वह संवृत्ति सत्य है। जैसे पृथिवी आदि अनेक कारणों के होने पर भी पंक अर्थात् कीचड़ में उत्पन्न होने से ‘पंकज’ इत्यादि वचन-प्रयोग।

3. सुन्दर स्वप्न

महाराष्ट्र में मनफल नाम का ग्राम है। वहाँ रामदुलारे नामक व्यक्ति का परिवार रहता था। उसकी पत्नी सीताप्यारी थी। कहने को घर-परिवार में चार बेटे थे, पुत्रियाँ भी चार थीं; परन्तु ससुराल जा चुकी थीं। सीताप्यारी हर बेटे के जन्म पर गर्व से फूली न समाती थी।

यूँ तो सब ठीक था, परन्तु वह बड़ी कलहकारिणी थी। अपनी बहुओं से हर रोज उसका क्लेश होता था, इस कारण लोग उसे ‘मार्या’ कहकर पुकारने लगे थे।

विडंबना यह थी कि, जिन बहुओं से उसका क्लेश होता था, उनका स्मरण उनकी माताओं से भी पहले उसने तब किया था, जब-जब उसने उनके पतियों को जन्म दिया था। जबकि उन बहुओं के जन्म होते ही उनकी अपनी माताओं के मुख का स्वाद कड़वा हो गया था।

एक-एक बहू के लिए सप्त व्यसन-रहित, सुन्दर, शिक्षित, धार्मिक, प्रेमी, दयालु, धनी बेटा तैयार करने में उसने भी अपने पुत्रों से कम उपेक्षा नहीं भोगी थी, परन्तु इस सब का लाभ तो बहुओं को ही हुआ, उसे क्या मिला…? बहुयें आनन्द कर रही हैं, उसे तो कोई पूछता तक नहीं है। काम भी तो नहीं करने देती हैं। हाँ, सब काम ठीक प्रकार से हो रहा था, परन्तु अपना स्थान खोने का मिथ्या भय लगा रहता था।

बात कुछ भी न थी… जो हो रहा था, वह तो सभी घरों में आम बात है; वह तो पहले मार्या के द्वारा भी होता था… वह भी जब अपनी सास के प्रति शिकायतों से भर जाती थी तो रात्रि को जब तक अपने पति को न सुना लेती, तब तक उसे चैन से न सोने देती थी। परन्तु अब तो वह भी सास बन चुकी थी… अतः बड़ी दुखी रहती थी।

योग्य बहुओं के आ जाने से भी वह इसलिए दुखी रहती थी कि उन्हें सिखाने के लिए अवसर नहीं मिलता था। कुछ सिखाये बिना मन में शांति नहीं मिलती थी। न सिखाये तो रोटी खाना ऐसा लगता था, जैसे - “हराम का खा रही हूँ… बहुओं को अखरने लगेगा… फिर मुझे इस घर में कौन रखेगा? कोई नहीं। आज तो पति है… कल न हुए तो मेरा क्या होगा?”

अतः कुछ न कुछ टोकने के अवसर ढूँढती रहती और उसके मिलने का अचम्भा भी नहीं…। बहुएँ काम करेंगी तो उनसे कुछ न कुछ गड़बड़ भी तो होगी ही।

कुछ भी घटित हो जाने पर सारी बहुओं-पोतों के इतिहास स्मृति-पटल पर तैरने लगते और वे शुरू कर देतीं बखान… जो चलता-रहता एक घंटे तक मुखर रूप से और अंतर्धारा रूप से तो महीनों-वर्षों पर्यन्त… हर मेहमान के सामने उन्हें कोसने लगतीं; परन्तु बहुयें तो होशियार थीं, सो उपेक्षा करके काम में मग्न रहतीं। जब कोई जवाब नहीं देतीं, बुरा नहीं मानतीं तो उन्हें और द्वेष-रूप वैराग्य आता और वे कोप-भवन में जाकर भावना भातीं - ‘हे भगवान! इससे तो आत्मकल्याण ही कर लूँ।’

“क्या करें, क्या न करें…? सुधरने की तो छोड़ो, कोई सुनने को भी तैयार नहीं है। बताओ! पंद्रह रुपये का दूध ढुल गया…” - बैठे-बैठे अन्य बहुओं, बेटों एवं पतिदेव को सुनाती रहतीं। कुल मिलाकर पूरा घर इस आग में जलने लगता। बहुएँ बेचारी… सोच-सोच कर परेशान हो जाती।

लेकिन एक दिन वह मार्या से वापस सीताप्यारी बन गई … कैसे? इसकी बड़ी ही अद्भुत सुंदर दास्ताँ है -

एक दिन की बात है …

मझली बहू रमिया के देखते-देखते 200-250 ग्राम दूध उफन गया…। बस, अब क्या था? सास दुखी हो गई। ‘दुखी चित्त में कुछ शांत विचार नहीं आते’। दूध उबल कर बाहर आ पड़ा, यह देख वे भी उबल पड़ीं और चीख कर घर को सिर पर उठाने लगीं। ससुर ने शांत करने की कोशिश की, परन्तु वे उन्हें ही सिखाने लगीं-“देखो जी! प्रतिदिन दस-बीस रुपयों की हानि का मतलब समझते हो…? लाखों रुपयों की हानि!”
‘ऐसे कैसे?’
‘एक दिन में बीस रुपये मान लो।’
हाँ, तो? (ससुर ने सहमति में सिर हिलाया)
‘तो 1 माह में हुआ 30 x 20 = 600 रुपये’
‘1 साल में 365 x 20 = 7300 रुपये’
‘100 साल में 7300 x 100 = 7,30,000 रुपये’
‘बात तो सही है, हम कैसे कमाते हैं? ससुर जी ने साथ दिया…।
धीरे-धीरे सारा परिवार इस अग्नि में तपने लगा… विसंवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा था।
आखिर दुखी-हताश बहू घर से भाग गई और नहर में डूब मरी। बहू के पीहर वालों ने हत्या का आरोप लगाया। पुलिस आई, उसने रिश्वत माँगी। अब 10 लाख रुपये की रिश्वत देनी पड़ेगी, तब कहीं जाकर मामला थमेगा। अन्यथा बहू की हत्या के केस में सारे परिवार को गिरफ्तार करके ले जाने लगे… न जाने कितनों को फाँसी होगी और कितनों को आजीवन कैद…।
सासू सोच रही थी - “इससे तो 100 साल में 7,30,000 रुपये का ही व्यय होता। अब तो एक ही दिन में 10 लाख रुपये लग गये और सारा घर जेल में न भी जाए तो भी हत्या के कलंक का भार कैसे सहूँगी … और उसके फल में अन्य जन्मों में कष्ट भुगतना होगा।”

“हे भगवान! यह तो मेरी बड़ी भूल हो गई। काश…बहू बच जाए तो मैं अब कभी नहीं लड़ूँगी।”

तब ही खबर आई कि… “बहू बच गई है और अस्पताल में है”। सासू ने ख़ुशी मनाई, स्वयं अस्पताल गई और बहू की सेवा करने लगी।

“हे भगवान! तेरा लाख-लाख शुक्र…मैं अब कभी भी अपनी बहू से नहीं लड़ूँगी।”

तभी आवाज आई…

‘माँजी! जागो… क्या हुआ…?"

सुबह के पाँच बजे थे। सब सासू के मुख से बरोटी¹ सुन कर हँस रहे थे।

जागते ही सास अपनी बहू रमिया को खोजने लगीं; उसे देखते ही गले लगा लिया। सासूजी पसीने-पसीने हो रही थीं, बहुयें पंखा झल रही थीं।

बड़े बेटे ने पूछा ‘बात क्या हुई माँ? आपका स्वास्थ्य तो ठीक है न…? आपके दिल की धड़कन बढ़ी हुई है?’

सास की स्वप्न-वार्ता सुनकर सभी आनन्द करने लगे।

ससुर - “वाह भगवान! आपने किशन की मम्मी को स्वप्न में ही सही, सच्चा मार्ग तो दिखा दिया।”

रात्रि में सारा परिवार शान्तिपूर्वक बैठा।

‘माताजी! आप डाँटना बंद नहीं करना…आपका हक है।

हम लोग सीखेंगे कैसे?’ बहुओं ने नम्रता से कहा।
'नहीं बेटा! योग्य बहुओं को सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। योग्य लोग देख-देख कर सीख जाते हैं, अयोग्य लोग सिखाने पर भी नहीं सीखते और हम जैसी सासें सिखाने के नाम पर नाहक ही खीझती रहती हैं। ’
“कहीं ज्यादा हानि हो गई तो आप कैसे शांत रहेंगी?” किशन ने मन की बात रखी।
'बेटे! असाता के उदय से ज्यादा हानि नहीं होती है, पर संक्लेश परिणामों से बंध होता है… सम्बन्ध खराब होने से बड़ी हानि और दूसरी कौन-सी होगी? यदि इसके कारण कोई दुखी हताश हो जाए, बीमार-घायल हो जाये तो उससे भी ज्यादा हानि हो जाती है।"

“बेटे! धन तो हाथ का मैल है… मेरी गलती से क्षणिक कषाय को विस्तार मिल गया था, लेकिन मैं अपनी समाधि नहीं खोना चाहती हूँ… मरते समय सारी बहुओं के हाथ से पानी पी सकूँ…” कहते हुए आँखों में आँसू भर आये, भावुक हो गईं माताजी।

सब बहुओं ने सासू जी के चरण दबाये। ससुर जी की आँखों से भी हर्ष के अश्रु छलक आये। सासू की बाहों में आज सारी बहुयें मुस्कुरा रही थीं।

समय बीतता गया…।

माँ अब निवृत्त हो चुकी थीं। धर्म-ध्यान व तीर्थ-यात्रा में समय लगाने लगीं। पूजा-स्वाध्याय के अलावा एक समय भोजन करतीं और सबसे राग-द्वेष की वार्ता का त्याग कर ‘अनुमति-त्याग प्रतिमा’ का पालन करने लगीं। अंतर में समाधि की तैयारी करने लगीं।

एक दिवस उनकी सुन्दर समाधि हुई… सारी बहुयें आज अपने को लुटा हुआ अनुभव कर रही थीं।

घर में आज भी सप्त व्यसनों में से कोई व्यसन नहीं है। धन-संपत्ति पहले से भी कई गुना बढ़ चुकी है, परन्तु अभिमान नहीं बढ़ा है। परिवार में सदस्य 73 हो गये, परन्तु प्रेम-वात्सल्य अद्वितीय है।

इस घर में आने वालों को अनेकों सूक्तियाँ आज भी शिक्षा देती हैं।

रसोई में लिखा था - “भोग छूटे, भगवान न रूठे।”

“मौन की हार, मुक्ति की हार।”
दुकान और ऑफिस में लिखा था - “पैसा बिगड़े, परिणाम न बिगड़े।”
स्वाध्याय कक्ष में लिखा था -
“रत्नत्रय जीव का अनुपम शृंगार।”
“धन-संपदा पुण्य की चेरी है, मुक्ति पुरुषार्थ की चेरी है।”
“संपदा हमारे लिए है; हम उसके लिए नहीं, आत्मानंद के लिए हैं।”
“कषाय करने वाला छोटा और क्षमा माँगने वाला सदा बड़ा होता है।”
बच्चों के कक्ष में लिखा था - “हर काम समय पर करो, भेदविज्ञान प्रति समय करो।”
ऐसी अनेकों सूक्तियाँ माताजी के दिमाग एवं अनुभव की ही उपज थीं।
घर का कोई भी सदस्य घर-ग्राम छोड़कर जाने को तैयार नहीं है। पढ़-लिखकर सभी ग्राम की उन्नति में काम कर रहे हैं। इंटरनेट एवं अन्य आधुनिक सुविधाओं के कारण अनेकों लोग भी यहीं रहकर काम कर रहे हैं। राज्य एवं केंद्र शासन की सारी सुविधाओं का लाभ ग्राम उठा रहा है। देश-विदेश से आयात-निर्यात करने के कारण यह ग्राम केंद्र सरकार एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुका है।


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पृष्ठ 58: 1. स्वप्न

4. जीवन दर्पण

हिम्मतनगर (गुजरात)
दिनांक : 8 सितम्बर, 2025
मास भाद्रपद शुक्ल पंचमी, उत्तम क्षमा पर्व

मैं सिद्धान्त शाह…।

जीवन के अंतिम पलों में डायरी लिखने का मन हो आया…।

मैं यादों में खोया हुआ था। स्मृति-पट पर पूर्व जीवन की खट्टी-मीठी यादों की मिश्रित सुरभि फैल रही थी। यदि आपको इसे पढ़ने से कोई लाभ हो सका तो मैं अपनी जीवन-कथा कहने के श्रम को सार्थक समझूँगा।

मेरा शैशव

इस उम्र में पूर्णतया पराधीन जीवन, बेभान दशा… प्रतिरोध के नाम पर मात्र रुदन ही भाषा थी; परन्तु माँ न समझ पाती। उसे तो मात्र झंझट लगती। वह मुझे डाँटती रहती और कभी-कभी तो हाथ भी उठा देती। तब मैं और बुक्का फाड़कर विरोध करता -
“मुझे क्यों मारा…? मेरी क्या गलती है…? मुझे भूख लगी है, मैं कैसे बताऊँ? मुझे मच्छर काट रहे हैं। मैं मल-मूत्र में पड़ा हूँ…” परन्तु मुझे समझने की ताकत एवं धैर्य ही न हो तो… समझने का अवसर भी चला जाता और मैं ही सज़ा पाता रहता… फिर क्रंदन के सिवाय मैं क्या कर सकता था?

जब रोता रहता तो मजबूरी में या प्यार से मुझे फिर चुप कराती, अंक में भर लेती - “चुप हो जा बेटे! तुम रोते क्यों हो? राजा बेटा… ओऽओऽओऽ … सो जा बेटा! सो जा ना …।”

तुतलाना बंद भी नहीं हुआ था कि निर्देशों की भरमार - “पढ़ो…”, “यहाँ सू-सू की तो समझना… हो!” “मर जा… यहीं लैट्रिन कर दी… तेरा बाप उठाएगा…?” “हाय राम! बिस्तर खराब कर दिया…।”

खैर, जो भी हुआ होगा, वह तो मेरा ही कर्मोदय था; माँ का क्या दोष? बेचारी! अपने विवाह का दंड कितना भोगे? कहाँ तक भोगे? सारा जीवन सब ओर से अपेक्षायें ही अपेक्षायें… उसे क्या मिलता है? नाम का संतान-सुख।

आज मैं स्वस्थ हूँ। माँ! यह आपका ही उपकार है।

मेरा बालपन

ओह! मैं बहुत कुछ सीखना चाहता था, परन्तु मेरी रुचि की कीमत ही क्या थी…? मुझे बलात् वह पढ़ाया जा रहा था, जिसे समझने में पूरी ताकत लगाने के बाद भी कुछ समझ में नहीं आता था, जबकि मैं कितना-कुछ बिना सिखाए ही सीख गया था। जैसे क्रिया, वचन, विवेक, लिंग की पहचान, रिश्ते… मैं बिलकुल माता-पिता की शुद्ध भाषा कब सीख गया था, मुझे खुद याद नहीं; शायद माँ को भी याद न होगा कि उन्होंने मुझे यह सब कब सिखा दिया था!

परन्तु… मैं इस समय कुछ गलत भी सीख रहा था, हालाँकि मैं तो उसे सही ही समझ रहा था; जैसे शक्कर की मिठास, नमक का खारापन, सीधे कोई वस्तु नहीं खानी… नमक, शक्कर, तेल, मिर्च… मानो स्वाद का नशा जगा दिया गया था। अब तो फीका दूध, जिसे मैंने बड़े चाव से महीनों पिया, वह अब मुझे नहीं भाता था।

मुझे बाज़ार के बिस्किट एवं टॉफ़ी बड़े प्यार से खिलाकर उन्हें खाने की लत लगा दी गई थी। मेरे दाँतों में कीड़े लग गए… अब मुझे गंदी आदत के लिए डाँट पड़ने लगी, रिश्तेदारों के बीच में मुझे नीचा दिखाया जाता। मैं कुंठित होने लगा। “आखिर इस स्वाद की गंदी आदत को मैं कहाँ से सीखकर आया? निश्चित है, पिछले जन्म या पेट से तो नहीं ही!” मुझे अपमान की कुंठा आक्रोश से भर देती। धीरे-धीरे मेहमानों के सामने आने से मैं कतराने लगा। परदे की आड़ में छुपा रहता, मेहमानों के साथ आए बच्चों को टुकुर-टुकुर देखता रहता। वो बड़े खुश दिखते तो मुझे लगता - “इनकी मम्मी कितनी अच्छी है!”

जब-जब मैं रोता, खाना नहीं खाता तो मुझे चुप कराने, खाना खिलाने मोबाइल और टीवी देखने की धीरे-धीरे आदत डाल दी गई। जब मैं उसके बिना खाना नहीं खाता, तब मुझे सबके सामने लज्जित किया जाता… इसमें मेरी क्या गलती? कोई और रास्ता भी तो हो सकता था… कभी-कभी मोबाइल पर आने वाले अश्लील दृश्यों ने मेरे पवित्र मन को बड़ा अपवित्र किया, जिसके लिए मन आज तक लज्जित होता है।

अब तो खूब पिटाई होने लगी थी। सुन्दर लेखन मेरे चेहरे को असुन्दर बनाता फिर रहा था। विद्यालय में डाँट और दंड, कोचिंग में डाँट और दंड, घर पर माँ की डाँट और दंड… ओह! क्या हर जन्म में यही होता है…? कितना दर्दनाक! क्या इससे बचने का कोई उपाय नहीं है…? मैंने जन्म ही क्यों लिया…? क्या लाभ ऐसे जन्म से…?

मेरी किशोर दशा

बारह वर्ष के होते-होते कुछ-कुछ होने लगा… क्या? पता नहीं…। नग्न होने पर प्रतिबंध लगने लगा। मोहल्ले में अभी तक लड़के-लड़कियों का कोई भेद नहीं था; परन्तु अब लड़कियाँ मिलने में, खेलने में स्वतंत्र नहीं थीं। बताया किसी ने नहीं। क्यों…? हमने तो कोई अपराध किया नहीं, फिर बताता क्यों नहीं कोई? अब तो दिमाग में प्रश्नों की दिशा एवं गति दोनों बढ़ गई थीं - "पक्षी, पक्षी के ऊपर क्यों बैठते हैं? मक्खी, मक्खी के ऊपर ही क्यों बैठती है? बकरा, बकरी पर ही क्यों चढ़ता है? बैल, गाय का पीछा क्यों करता है और उस समय उसकी सु-सु ऐसी गाजर जैसी क्यों दिखती है? कुत्ते-कुतिया को चिपका देखकर दोस्त हँसने लगे और माँ से पूछने पर खींचकर घर के अंदर ले गई; क्यों?"¹

  1. वेदोदय में मन का अतिक्रम।

प्रश्न अनेक थे, परन्तु समाधान कहीं से भी नहीं मिलता था। उत्तर के बदले - “शर्म करो…”, “आगे से ऐसी बात न करना”, “क्या सोचते रहते हो?” फिर गुस्से में - “क्या-क्या पढ़ते-देखते रहते हो?” “कैरियर पर ध्यान दो।” “गंदी बातें न सोचा कर।” “किसने सिखाई ये बातें?” समय-समय पर शील की नौ बाड़ें सिखाई जाने लगीं।

इस उम्र में बोलने-पूछने का मन होने पर भी मुख गंभीर होने लगा, अकेलापन बढ़ने लगा। खोजने की राह में फोन के साथ-साथ बहुत कुछ दोस्तों ने सिखाया। जिन्हें सुनकर घृणा, भय, आशंका, अविश्वास… आदि से मिश्रित न जाने कैसे-कैसे भाव हो रहे थे। दोस्तों की हरकतें बढ़ती जा रही थीं। वे लड़के-लड़कियों संबंधी बातें किया करते। मेरे दिमाग से लेकर चड्डी में भी कुछ-कुछ फील होने लगता। मैं इसे गंदा समझकर घबराता। मन को बदलने का प्रयास करता, परन्तु अब तो तूफ़ान और भी ज्यादा होने लगा…। रात को सोते समय उत्तेजना में अंग को बड़ा देखकर छुपाने का प्रयास करता। एक रात तो हद ही हो गई… मेरा निजी अंग रो रहा था। जागने पर देखा - तीखी गंध सहित चिकना पदार्थ… “यह क्या है…? किसने डाला मेरी चड्डी में …?” मैं रो रहा था… माँ ने देखा तो चुप कराया। उन्होंने बहुत पूछा, परन्तु मैं बता न सका - “माँ मारेगी… पिताजी से कह देगी… इतनी गंदी बात!”

ओह! अब न चाहने पर भी सेक्स दिमाग में चलने लगा… हर स्त्री-पुरुष को देखकर कुछ-कुछ चलने लगा। पिक्चर, समाचार-पत्र, मैग्ज़ीन में दिखने वाले फ़ोटो ने अभी तक ध्यान आकर्षित नहीं किया था, परन्तु अब उन्हें देखते ही शरीर में फुरहरी दौड़ने लगती…और अब शुरू हो गई वह बात जो शायद सही रास्ते से आती तो न होती; सेक्स की दुर्वासना। बाड़ें टूटने लगीं … गलत सलाहें सही लग रही थीं। दोस्तों से ही सारा भ्रामक ज्ञान मिल रहा था, फिर वही भ्रामक ज्ञान मोबाइल, फ़िल्मों, मैग्ज़ीन से मिलता चला गया। मैं न चाहकर भी अनंगक्रीड़ा¹ का प्रेमी हो गया… अब मंदिर जाने का मन नहीं करता था, भगवान की फ़ोटो देखने से भी कतराता था, ग्रंथ पढ़ने और साधु-संतों से भी दूर रहने का मन करता; क्योंकि मैं विश्व का सबसे गंदा बालक जो था! वस्तुतः था नहीं, था तो मैं ‘भगवान आत्मा’, निर्दोष बालक; परन्तु अनुभव तो वही था। आज सोचता हूँ, काश…! उस समय मैं सम्यग्ज्ञान एवं सुसंगति को प्राप्त होता तो मेरा शरीर एवं ज्ञान की सामर्थ्य और अधिक खिली होती।

पढ़ाई हो रही थी। एकाग्रता घटने पर भी अच्छे नंबर आ रहे थे… पर अंदर से खोखलापन साफ था। अनुभव-शून्य, अंधकार की दिशा में बढ़ता किताबी ज्ञान भविष्य का भय पैदा कर रहा था।

बाद में ज्ञात हुआ - “सही बात की सही समझ नहीं थी। सही समय पर सही बात समझा दी जाये तो ज्ञान-ध्यान कितना आसान हो जाये!”

मेरी युवानी

बाईस वर्ष के होते न होते अध्ययन पूरा हो गया… परन्तु जॉब कहीं नहीं दिखाई दे रही थी। महँगी पढ़ाई ने पिता को कर्ज में धकेल दिया था। शिक्षण-संस्थाओं ने मोटी कमाई की थी। अच्छी डिग्री का मतलब अब समझ में आ रहा था… इस डिग्री को कोई देखने को भी तैयार नहीं था। नौकरी देने वाले सब नये सिरे से ज़माने की आवश्यकतानुसार परीक्षा ले रहे थे, अनुभव माँग रहे थे। नए समय के अनुसार अपडेटेड नॉलेज की माँग कर रहे थे… कॉलेज में यह सब कुछ समझ में नहीं आया था।

लड़कियों पर लुटाया पैसा आज रुला रहा था…। माँ के गहने बिक गए और मैंने लड़कियों को फ़ोन, वींटी-अँगूठी, वस्त्र गिफ्ट किए। ओह! मैंने माँ को आभूषण-रहित करके प्रेमिका का नहीं, बल्कि अय्याशी का मज़ा लिया।

वह लड़की किसी अन्य धनी लड़के को लिफ्ट देने लगी… कॉलेज में उसे लेकर भयंकर झगड़ा हुआ। लड़की ने पुलिस में रिपोर्ट कर दी। समाचार-पत्र, प्रोफेसर एवं मित्रों की सहानुभूति लड़की के साथ थी; मैं जेल में था। दिन-रात अंधकार के सिवाय सामने कुछ न था… कोई राह सूझती न थी। मर जाने की इच्छा प्रबल हो रही थी।

इस घटना ने माता-पिता को और भी कर्ज में दबा दिया। पिताजी ने दस लाख रुपये खर्च करके केस लड़ा, पुलिस को पैसे खिलाए…, फिर भी दो साल की जेल हो ही गई। कलंक का दाग लग गया; समाज में सिर उठाकर चलना भारी हो गया। नौकरी… अब और भी दूर हो गई।¹

माता-पिता दिलासा देते रहे, लेकिन… कुछ करने का मन नहीं हो रहा था। इसी बीच मोबाइल गेम खेलकर मैंने उनतीस हजार

  1. अनाचार का फल भोग रहा था।

कमा लिये। आशा की किरण फिर जागने लगी, शायद इसी विधि से मेरी प्रतिभा का लाभ मिलना होगा। भगवान की इच्छा मानकर मैं आगे बढ़ गया।

कभी धन जाता तो कभी धन आता भी। जीतने पर लगता - “काश! मैंने ज़्यादा बड़ी रकम लगाई होती तो अभी मैं एक लाख रुपये जीत सकता था।” एक ही चाल थी… जीता तो था, परन्तु रकम कम होने से मात्र 10,000/- ही जीता।

आखिरकार मैंने हिम्मत करके अब तक की जीती सारी धनराशि लगा दी… अरे!! यह क्या? इस बार मैं हार गया… माथा झनझना गया! इसी तरह की चाल मैंने कई बार जीती थी, परंतु इस बार ऐसा क्यों हुआ?

मेरा विश्वास डगमगा गया… परंतु ‘लक’ के भरोसे एक बार फिर खेलने के लिए मित्र से धन लिया। इस बार मैं जीत गया! मित्र का धन लौटा दिया। इस बार तो मैं पाँच लाख रुपये तक जीत गया था। अब तो मित्रों में मेरी धाक जम गई थी। रिश्तेदारों में भी पिताजी ने मेरी प्रशंसा करनी शुरू कर दी थी।

मेरे भरोसे उन्होंने अपनी धन राशियाँ दाँव पर लगाना शुरू कर दी… वे भी जीतने लगे! उनकी मोटी कमाई हो रही थी; अतः अब उनकी भी मोटी रकम दाँव पर लगाने को मिलने लगी। मैं भी उनके धन से लाभ कमा रहा था और अनेक रिश्तेदार मुझ पर विश्वास करने लगे थे।

इस बीच मेरा विवाह हो गया, दो बच्चे भी हो गए…। सब कुछ ठीक चलता दिख रहा था।

और एक दिन, मित्रगण ही नहीं, अन्य सबका धन लेकर मैंने लगाया… - 5,00,000/- का घाटा हो गया! उसके बाद तो हर बार हारता ही गया…। छोटी-मोटी रकम कभी जीतता भी, परंतु उतना धन अब लौटा नहीं पा रहा था; नतीजा यह हुआ कि लोगों ने मुझे बेईमान समझकर बदनाम करना शुरू कर दिया। दूसरों से उधार लेकर, उन्हें लाभ देकर किसी तरह अपनी इज़्ज़त बचाता रहा… परंतु अब तो करोड़ रुपये का घाटा हो चुका था और एक दिन इसी उठापटक में… मैं अवसाद (Depression) का शिकार हो गया।

मुझे सामने मौत दिखने लगी। शादी हो चुकी थी, प्यारा-सा एक बच्चा और एक बच्ची थी… जीवन-स्तर ‘हाई क्लास’ तक उठ चुका था। लेकिन अचानक सब बदल गया… बैंक ने घर छीन लिया, कार छीन ली और बैंक अकाउंट सीज़ हो गया! मैं एक बार फिर जेल चला गया।

हाय री तृष्णा! हाय रे अज्ञान! काश… कोई यह सब मुझे पहले ही समझा देता। लाभ लेने को तो सब साथ होते हैं, लेकिन हानि में मैं अकेला खड़ा था। हर्षद मेहता भरी जवानी में भगवान को प्यारे हो गए; उन जैसे कितने ही हवा में उड़ने वाले लोग आज देश से बाहर भाग गए हैं… कितनों ने आत्मघात कर लिया!

हाय! प्यारे-प्यारे फूल-से बच्चे… मैं उन्हें एक पिता के रूप में अच्छा जीवन तो छोड़ो, एक सामान्य-सा जीवन तक न दे सका।

अब एक बार फिर सब कुछ खो चुका था… समाचार-पत्रों में बदनाम हो चुका था। पत्नी पीहर में जाकर नौकरी कर रही थी, उसे भैया-भाभी के सामने नीचे देखकर जीना पड़ रहा था। समाज में उसे सभी दया की नज़रों से देख रहे थे। बच्चे मानो दुआ की भीख पर पल रहे हों…।

मैं जेल में साहित्य पढ़कर जी रहा था - गाँधी जी के माध्यम से महावीर स्वामी को पढ़ने, सुनने, समझने का अवसर मिला।

पंद्रह साल बाद जेल से निकला, तब तक पिताजी धन के अभाव से भी ज़्यादा अपमान, घुटन व अवसाद से रोगी होकर विदा ले चुके थे… जिन्होंने कभी नीची नज़र न की थी, वे अपने मित्रों, परिवार-जन एवं कर्जदारों के ताने सुनते-सुनते तंग आकर आत्मघात कर बैठे थे। माँ भी पिता के विरह में एवं मेरी चिंता में शीघ्र ही बूढ़ी हो गई… उसके मुखचंद्र पर अब सैकड़ों झुर्रियाँ थीं। मुझे देखते ही उसके भी प्राण निकल गए। पत्नी, बच्चों को लेकर कब की पीहर जा चुकी थी। घर बिक चुका था। जेल से आते ही मेरी लेनदारों से पिटाई हो गई… मैं घर छोड़कर भटकने लगा। कब तक रोऊँ? आँसू तो जेल में ही सूख चुके थे। मेरी दाढ़ी बढ़ी हुई थी…।
काश, मेरी जीवन-कथा से कोई शिक्षा ले सके।

मेरी प्रौढ़ दशा

मैं पैतालीस वर्ष का हो गया, परन्तु दिखता पैंसठ का… न कोई उमंग, न कोई मुस्कान; मात्र ‘डेड बॉडी’ की तरह आयु-अंत की प्रतीक्षा रह गई… दाढ़ी सफेद हो गई। केश-राशि श्वेत होने में प्रतिस्पर्धा करने लगी। दाँत पीले हो गए।
एक बार… भादों का महीना आया। दशलक्षण पर्व के उत्सव में सारे जैन नर-नारियाँ, बाल-वृद्ध - सब ही धोती-दुपट्टे पहनकर, हाथ में अष्ट द्रव्य की थाली लेकर जिनमंदिर जाते दिखे। मन में मुझे भी बचपन की यादें उभरने लगीं …। "दादी-दादाजी मुझे हमेशा धर्म के संस्कार देते थे… (वर्षों बाद पहली बार होठों पर स्मित आ गया) मैं भी तो दादाजी के साथ जिनमंदिर गया था… मुझसे चाँदी के कलश से अभिषेक करवाया था। वह घटना आज भी नजरों के सामने तैरने लगी। सब मेरी ओर ही देख रहे थे… सब ताली बजा रहे थे… उस दिन दादाजी ने मुझे बहुत प्यार किया था, घर में रबड़ी बनवाई गई थी - “मेरा इन्द्र बेटा! भगवान बनेगा बेटा…।”
उस समय तो इन शब्दों की कोई समझ नहीं थी, परन्तु आज लगता है - मेरे दादाजी कितने धर्मात्मा थे! परन्तु… मम्मी को यह सब अच्छा नहीं लगता था। उन्हें मेरे कैरियर की चिंता थी। वे पापाजी से कहकर मुझे अपने पास बुलवा लेती थीं और किसी न किसी बहाने मुझे मंदिर, प्रवचन, पाठशाला से दूर करती रहती थीं।

दादाजी उदास रहने लगे थे… मुझसे भी अब कम ही बात होती थी। उनकी गोद में रहना, कहानियाँ सुनना मुझे बहुत आनंद देता था। ओह! परन्तु उसी समय मम्मी मुझे मोबाइल-गेम के बहाने बुला लेतीं और उलझा देतीं।

अब तो मुझे… चलो, अब याद करने से क्या? चलो, आज मंदिर ही चलते हैं।

मैं भी जिनमंदिर गया। कुछ लोगों ने संशय से देखा होगा, उपेक्षा भी की होगी, लेकिन आज मेरा नया जन्म हो रहा था। वहाँ पधारे विद्वान मणिभाई से मैंने पहली बार अपने मन की ग्लानि व्यक्त की। वे मुस्कुराए… उठे… और मुझे गले से लगा लिया। मैं रोता रहा… कुछ बोलना शक्य न था।

“मुझ पापी का भी उद्धार हो सकता है…? मेरे पास धन नहीं है। मैं बोलियाँ नहीं ले सकता, प्रतिमा विराजमान नहीं कर सकता हूँ। मेरे पास कोई घर-द्वार भी नहीं है।”
“चलो मेरे साथ… तुम आज से मेरे छोटे भाई हुए।”
“क्या?” (आश्चर्य से) “आप मुझे अपना लोगे? कोई क्या कहेगा?”
“आप भगवान हो। अपराध अब नहीं है… जो हुआ था, उसकी सज़ा कर्मोदय आपको दे चुका है। आप आज ही सम्यक्त्व के अधिकारी हो गए हो। अज्ञानता में अपराध होते हैं, सम्यग्ज्ञान से धर्म होता है। अनादि से सभी जीव पापी ही होते हैं, फिर भी पाप का प्रवेश आत्मा में एक क्षण को भी नहीं होता; अन्यथा जीव भगवान ही न बन सकता। दोषों की ग्लानि ही बता रही है कि तुम्हें उनमें रुचि नहीं रही…। आत्म-कल्याण का मार्ग प्रत्येक पापी को सदा ही खुला रहता है।”
उसी दिन से मेरा पुनरुद्धार हो गया।

मेरी वृद्ध दशा

आज मैं अस्सी वर्ष का हो गया हूँ…। सच्ची समझ होते ही मैंने अपनी कथा युवा पीढ़ी को सुनानी प्रारंभ कर दी। अब गृहस्थ लोगों व श्रावकों को योग्य पेरेंटिंग समझाता हूँ। अनेक युवा सुधरे ही नहीं, वरन् उन्होंने मेरे साथ क्लब बनाकर संगठन खड़ा किया है। आज हमारी “First contact me, before suicide” नाम के एक चैनल से हजारों-लाखों युवक संपर्क में हैं…। वे शील की परंपरा सीख रहे हैं। कोई कर्ज नहीं ले रहा है, बच्चे वीडियो-गेम छोड़ रहे हैं। लड़कियाँ लड़कों के चंगुल से बच रही हैं, विवाह की मर्यादायें समझपूर्वक बढ़ रही हैं। गर्भपात रुक रहे हैं। कोई भी विधवा दूसरा विवाह नहीं कर रही है। आज ऐसी चार सौ चौंतीस विधवा बहनें एक साथ, एक परिवार की तरह रह रही हैं। आप समझ गए होंगे - एक विशाल जिनमंदिर के साथ-साथ महिलाश्रम भी चल रहा है। ब्रह्मचारी बहनें भी साधना करती हैं और इन विधवा बहनों की पढ़ाई-लिखाई, रक्षा का कार्य ममता व अपनत्वपूर्वक कर रही हैं।

अब तक मेरी आत्मकथा छप चुकी थी। टीवी-रेडियो पर मेरी चर्चाएँ-वार्ताएँ प्रसारित होती रहने से मैं एक बार फिर जानी-मानी हस्ती बन गया था।

एक दिन एक संदीप नामक युवक मेरे पास आया, बोला - “आपने मुझे पहचाना?”

“नहीं बेटा! आप कौन हो?”

“मैं महेंद्रन शाह का बेटा हूँ।”

कहीं यह मेरा ही बेटा महेंद्रन शाह तो नहीं? फिर भी सुनिश्चित करने को पूछा - “कौन महेंद्रन शाह?” ज्ञात हुआ, वह मेरा बेटा ही था और यह मेरा पोता था। थोड़ी देर में चौपन वर्षीय महेंद्रन शाह आ गया… संदीप की उम्र यही कोई अट्ठाईस वर्ष की होगी, उसकी गोद में एक दो वर्षीय बालक ‘जिनम्’ भी था गौर वर्ण, सुन्दर नीली-सी आँखें, लाल-लाल कान, लाल नाक, एकदम गुलाबी होंठ… ओह! मेरी आँखों से आँसू झर गए। तीन पीढ़ियाँ मेरी बाहों में थीं… सामने बहुएँ सास-बहू के रूप में खड़ी थीं। सबकी आँखों में आँसुओं का सैलाब था, परन्तु होंठों पर सुकून झर रहा था।

इस समय मैं लखनऊ में था…। ये सब भी समय की मार खाकर, संघर्ष करते हुए संपन्न हो गए थे। मेरी कथा से सबने शिक्षा ले ली थी; सबने पढ़ाई पर ध्यान दिया था, उधार लेना पाप समझते थे, शेयर-मार्केट, वीडियो-गेम आदि से दूर रहते थे।

मैं एक बार फिर सोच रहा था - मेरी पत्नी एक महान नारी साबित हुई। उसने संघर्ष किया, बच्चों को पाला… मैं उसके सामने नत-मस्तक था। वह आज भी पचहत्तर वर्ष की शांत, संभ्रांत नारी दिख रही थी। वह ‘समयसारजी’ ग्रंथ की अच्छी अध्येता थी, अध्यापन भी करती थी। सारी बहुएँ शिक्षित, धार्मिक-संस्कारों वाली थीं।

काश, मेरी माँ ने मुझे दादाजी से दूर न किया होता। मेरे पिताजी अफसर थे और माताजी धार्मिक संस्कार से शून्य…। दोनों ने ही अय्याशी करने को सुख मानकर मुझे पढ़ना-लिखना सिखाया था। आज उसका ही दुष्फल साफ दिखाई दे रहा था।

मैं उनके साथ घर नहीं गया…। हालाँकि पत्नी एवं बहुओं ने बहुत आग्रह किया। जिनम् ने तोतली बोली में उँगली पकड़कर कहा था - “तलो न घल…।”

जाता भी कैसे और क्यों?

जब मैं मृत-तुल्य हो गया था, तब मेरा उद्धार जिनशासन ने किया था। यदि पंडित मणिभाईजी न मिले होते तो आज मैं कहाँ होता? किस हाल में होता? कल्पना करना भी भारी पड़ रहा है। अब मेरा जीवन आत्मा के लिए ही है…, घर जाकर वापस मोह-माया में नहीं फँसना चाहता था। फिर जब तक स्वस्थ हूँ, तब तक समाज की संपदा बनकर जीने में जो आनंद है, वही मेरा प्रायश्चित्त भी तो है।

अनंतकाल की भूलों का प्रायश्चित्त करने का अवसर अब नहीं खोना चाहता हूँ; इसका फल है… अनंतकाल का अतीन्द्रिय, अनंत सुख।

अशक्य दशा

90 वर्ष की उम्र में देह अत्यंत अशक्त हो गई थी; परन्तु दवा की आवश्यकता नहीं पड़ रही थी। पेय से ताकत मिल रही थी…। मणिभाई अब नहीं रहे थे… मेरे आसपास मेरे ही प्रशंसक सेवा में सन्नद्ध रह रहे थे।

दिन में समाज की बहुयें-बिटियाँ रहतीं, जो मंद-मंद स्वर में लयबद्ध ‘स्वरूप-स्मरण’ भजन गातीं, ध्रुव-स्वभाव का भान करातीं, संबोधन करती थीं। एक बेटा मुझे “बापू!” कहता था, वह मुझे लघु-शंका, दीर्घ-शंका आदि निर्विकल्प-निर्विचिकित्स-भाव से कराता था। कोई भी मुझे अँग्रेज़ी दवाई नहीं देने देता था। रात्रि को दो-चार सज्जन सदा मेरे साथ ही रहते थे। विधुर लोग ऐसे में मेरे नित्य के साथी थे। उनकी तात्त्विक वार्तायें मुझे अनुकूल पड़ती थीं।
मेरा चिंतन ग्रंथ-आधारित नहीं, हेय-उपादेय आधारित चलता रहता था। उपादेय के मिलने का बड़ा संतोष था; इसीलिए मैं प्रायः निर्विकल्प रहता था। आनंद-धारा खेद, वितृष्णा आदि विकारों को कहाँ का कहाँ बहा ले गई? कब बहा ले गई? कुछ खबर ही नहीं पड़ी। परिवार ‘ढाई-द्वीप’ का था… ध्रुव-आश्रय से परिवार में बड़े जन अर्थात् अनंत सिद्धों एवं अरहंतों, पंच-परमेष्ठी भगवंतों का साथ सदा अनुभव में आने से प्रभुता-सम्पन्नता का वेदन चल रहा था।

मेरा मृत्यु महोत्सव

बारह वर्षीय ‘समाधि’ ले ली गई थी अर्थात् देह को अपनी दृष्टि से तो पहले ही छोड़ दिया था और अब तो उसके प्रति अंतिम औपचारिकता भी संपन्न कर दी थी।
जीवन-यात्रा 93 वर्ष की उम्र में अंतिम पड़ाव पर आ चुकी थी… बोलना प्रायः बंद था। …आँखें खोलने में भी कष्ट-सा होता था। अब भी मन शांत था। प्रायः ही जीवन की कहानी, उतार-चढ़ाव, लाभ-हानि, काले-सफेद पृष्ठ रह-रह कर उपयोग की स्वच्छता में झलक रहे थे… उनसे राग-द्वेष नहीं रहा। चित्त शांत था; क्योंकि अनंतकाल में बहुत कुछ हुआ था। जब उनका भान एवं खेद नहीं है तो इस भव की पीड़ा के लिए भी क्यों खेद करके जीवन का एक-एक स्वर्णिम पल व्यतीत करूँ?

मैंने हिम्मत करके अपनी संतान को पत्र लिखा - जिसका सार था -

प्रिय महेंद्रन!

जीवन में तुम्हें कुछ न दे सका। आज इकलौता अनुभव ही तुम्हें दे सकता हूँ…। तुम्हारी माँ ने तुम्हें ‘समयसारजी’ का अभ्यास कराया, यह ज्ञान उनका अमृत-उपहार है; उसे सहेजकर रखना। जीवन के अंत में समाधि हेतु मेरे आनंद को मैंने निम्न शब्दों में अंकित किया है, सो समझना -

"खिन्नता से लेकर भेद तक का सफर,
क्रोधादि भावों का बिखराव है,
मान-भंग, किये गये अंतरंग मनो-मालिन्य का कारण है;
जो दिखता नहीं, जीवन के पड़ाव में,
रिश्तों के बहाव में कुशल पूछते हैं, चेहरे पर मुस्कराहट लिये,
गले भी मिल लेते हैं, मात्र कृत्रिमता के साथ,
ऐसा दिखाते हैं हम और आप कितने ख़ास हैं।
ठहराव बिना की रफ्तार ‘स्व’ से अनजान रहती है,
जो प्रगति-सी दिखने पर भी खुद को छलती है।
विपरीत भावों का गंदा जल
‘स्व’ का छल -
एक एहसास था, अश्रुपातों से हुआ पछतावा था;
गति थमी, झाँका हुआ निर्मल-नीर से अंतर-प्रक्षालन।
विशुद्ध भावों से मन पावन, ‘क्षमा’ शब्द नहीं,
करने-कराने का व्यवहार भी नहीं;
यूँ तो ये सब होता है, होना भी चाहिए, जीवन की अनुभूति है, आराधना के पश्चात् मिलने वाली विभूति है,
जिसे सहेजकर रखना।
हम और आप सिद्धालय में मिलेंगे…
अनंत सिद्धों के परिवार में मिलने को सदा उत्सुक।"¹

सारे जीवन का प्रतिक्रमण करने के बाद मात्र शुद्ध भाव शेष रहे, …वस्त्र त्याग कर दिए…। भू-शयन करते हुए मात्र ‘ज्ञाता-भाव’ शेष रहा। न कोई शिकायत, न कोई ग्लानि… न आशा, न उपेक्षा…। कष्ट था? नहीं-नहीं, परिणमन… और हो रहा है, ज्ञान में ज्ञान का परिणमन।

देह समय से छूटी… नहीं - छूटी तो पहले से ही थी; अब तो देह ने छूटने की औपचारिकता पूरी की।

  1. अखिल जैन, अमायन

“बुजुर्ग अनुभव-ज्ञान के भण्डार होते हैं। उन पर अविश्वास करने से हम संसार का अद्भुत खजाना ठुकरा देते हैं। अतः उनका सन्मान करके प्रति समय आनंद करना चाहिए। जो बेटे बहुएँ माँ-बाप से दूर रहते हैं, वे ही अश्लील पुरुषों द्वारा ठगे जाते हैं, स्वास्थ्य खोते हैं। जो चीजें आप गूगल से सीखने की कोशिश करते हैं और फिर भी उसमें दक्ष नहीं हो पाते हैं, वे आपको सहज ही बड़ों के समीप मिल जाती हैं। साथ ही आप पाते हैं ज्ञान, अनुभव, ढेर सारा प्यार-विश्वास और यश के साथ सुरक्षा चक्र भी, जो जीवन के प्रत्येक कदम पर आपके काम आएगा।”


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पृष्ठ 68: 1. अतिचार लगने लगे

5. कर्तृत्व का रोग

महाराष्ट्र के अकोला नगर में सुकेश नाम के एक भद्रपुरुष रहते थे। उनके भरे-पूरे परिवार में 19 सदस्य थे। 20वाँ सदस्य आने वाला था। बड़ी-सी कॉलोनी बनाकर अपने निजी जिनमंदिर में सारे सदस्य आराधना-प्रभावना करते रहते थे।

एक दिन भद्राणी बहू बोल उठी - विश्व के सभी जीव सुधर जायें तो आनन्द आ जाये!

सुकेश - यह भावना कोरी है। सुनने में अच्छी है, परन्तु है आगम विरुद्ध। वस्तु-स्वरूप के विरुद्ध होने से अविचारित-रम्य है।

भद्राणी - (अचंभित स्वर में) - ऐसे कैसे?.. ऐसी भावना तो भाने को कही गई है।

सुकेश - हाँ, कही तो गई है, क्योंकि सुभाषित होते ही कहने के लिए हैं; परन्तु जरा सोचो… पापों का सर्वथा अभाव हो जाये तो संसार ही न रहे। सभी सिद्ध न हो जायेंगे?

भद्राणी - हो जाने दो… इससे अपने को क्या? सब सुखी तो हो जायेंगे न?

सुकेश - भोली देवी! तुम्हारी कल्पना सही हो जाए… भले ही इससे आगम का विरोध हो… सर्वज्ञ का विरोध हो!

भद्राणी - नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा (सफाई देते हुए बोली)।

सुकेश - संसार एवं मोक्षमार्ग अनादि-अनंत हैं या नहीं?

भद्राणी - हैं।

सुकेश - तो फिर अनादि-अनंत रहना चाहिए या नहीं?

भद्राणी - रहना चाहिए।

सुकेश - तो तुम तो संसार को अनादि-सांत करना चाहती हो! फिर आगे मोक्षमार्ग कैसे चलेगा?

(भद्राणी सोचती रह गई…)

सुकेश - फिर सात तत्त्व का स्वरूप भी झूठा सिद्ध हो जायेगा, फिर तो संसार में दो ही तत्त्व रह जायेंगे।

भद्राणी - रह जाने दो!

सुकेश - फिर भी विसंवाद रहेगा… ‘यह पहले ही क्यों नहीं समाप्त हो गया …’ ‘हम अब तक दुखी क्यों हो रहे हैं?’

यदि दो ही तत्त्व होते जीव, अजीव …फिर तो धर्म-अधर्म की भी आवश्यकता नहीं पड़ती …मात्र चार ही द्रव्य रह जाते?

भद्राणी - रह जाने दो।

सुकेश - ‘रहने या नहीं रहने’ की बात नहीं है … ‘है’ की बात है। छह द्रव्य एवं सात तत्त्व की व्यवस्था अनादि-अनंत है, सो है, उसे जानना सम्यग्ज्ञान है।

भद्राणी - इससे लाभ क्या हुआ? और मेरे गलत मानने से हानि क्या होती?

सुकेश - देखो, यदि सबका परिणमन एक साथ एक जैसा हो जाता तो क्या होता, जानती हो?

भद्राणी - नहीं।

सुकेश - प्रकृति में सबके परिणाम भिन्न-भिन्न हैं, इसका लाभ सबको मिलता है। कोई किसी के आधीन नहीं है।

भद्राणी - मुझे कुछ समझ में नहीं आया, जैसे?

सुकेश - सोचो, आम के वृक्ष की उम्र तो एक-सी है, परन्तु चार माह तक आम कैसे मिलते रहते हैं? यदि सारे आम एक साथ पक जाएँ तो?

भद्राणी - (हँसते हुए) …सारे आम खा लेंगे और क्या!

सुकेश - परन्तु विश्व में एक वृक्ष ही तो नहीं है। असंख्य वृक्षों के आम एक साथ पक जायें तो रखने को जगह न मिलेगी… एक दिन में सारी जनता एवं पशु खा भी न सकेंगे। और फिर मात्र एक दिन ही तो खा सकेंगे, शेष दिनों में खाने को या तो मिलेंगे नहीं अथवा तो कुछ दिन तक बासे खाने के बाद कुछ न रहेगा… फिर केवल आम ही नहीं, उसी दिन सारी सब्जियाँ, नींबू, फल, अनाज, मेवे भी आ जाएँ तो क्या होगा? …और अब आदमी खायेगा या फसल काटेगा या सफाई करेगा? …रखने को स्थान ही नहीं होगा तो कचरा कहाँ फेंकेगा? फिर सड़ते हुए कचरे की दुर्गन्ध का क्या होगा? इसके बाद तो कुछ पैदा होगा ही नहीं, तब दुनिया का क्या होगा?
भद्राणी - ओह! (ठंडी श्वास छोड़ते हुए) …तो जो होता है, वह ही सुन्दर व्यवस्था है। हर ऋतु में उस ऋतु के अनुसार फल, सब्जियाँ, अनाज मिलते रहते हैं। इसकी व्यवस्था भी नहीं करनी पड़ती है।
सुकेश - अन्यथा नीम के पेड़ कौन लगाता? …करेला कौन बोता? इतने बड़े समुद्र को स्वच्छ कौन करता? इतने विशाल पर्वतों को कौन साफ़ करता? कौन पानी बरसाता?
सूरज-चाँद की व्यवस्था स्वतः संचालित है। …शक्कर का स्वाद समझा जा सकता है, बदला नहीं। उस ही प्रकार विश्व की व्यवस्था समझी जा सकती है, बदली नहीं।
अहा! विश्व में सर्वत्र सभी का सही परिणमन प्रति समय हो रहा है। - ऐसा निर्णय करते ही आकुलता मिट जाती है।
सुकेश - (बात आगे बढ़ाते हुए) संसार अणुव्रत चाहता है, …इससे संसार भली प्रकार चलता है।
भद्राणी - कैसे?
सुकेश - पापों से संसार चलता है …संसार को हरा-भरा बनाने की विधि है पाप। …निष्पाप सुखी जीव तो सिद्धालय में चले जाते हैं और हिंसा आदि पाँचों पाप करने वालों से संसार में प्रगति दिखती है।

भद्राणी - (साश्चर्य) यह कैसी बेढंगी बात कह रहे हैं?

सुकेश - देखो! जब पाँच पाप होते हैं तो उन्हें रोकने को पुलिस लगती है, इससे उन्हें रोजगार मिलता है। जेल, कोर्ट, थाने, स्टाफ रखने को ऑफिस व क्वार्टर बनाने से मजदूरों, मिस्त्रियों और इंजीनियरों को रोजगार मिलता है। वकील, जज, चपरासी, क्लर्क, टाइपिस्ट तथा बिजली विभाग, नल विभाग के सारे उप-विभागों को काम मिलता है।

अपराध के नये-नये तरीके खोजने से CCTV कैमरा, कम्प्यूटर आदि बनाने वालों तथा चलाने वालों को रोजगार मिलता है। वे भी जब अपने वे ऑफिस तैयार करते हैं, तब उनको निर्माण के लिए मजदूर व इंजीनियर चाहिए होते हैं।

नये-नये पाठ्यक्रम तैयार होते हैं… नयी-नयी किताबें छपती हैं… नये-नये शिक्षकों को प्रशिक्षण मिलता है… नये-नये छात्रों को नये-नये कोर्स मिलते हैं। इंजीनियर, सी.ए., पुलिस, वकील व जज की पढ़ाई के लिए सरकार स्कूल-कॉलेज बनाती है। इससे शिक्षक से लेकर प्राध्यापक, प्राचार्य व डीन तक को रोजगार मिलता है। इन सबके कारण फर्नीचर बनाने वालों को काम मिलता है, ईंट बनाने वालों को काम मिलता है। सीमेंट व लोहे आदि की फैक्ट्रियों में रोजगार मिलता है। इन्हें खाने-पीने के लिए अनाज, फल आदि चाहिए तो सारे कृषकों एवं बागवानों को काम मिलता है, संग्रह करने के लिए गोदामों में काम करने वालों को रोजगार मिलता है। यातायात के लिए वाहन-निर्माताओं व वाहन चलाने वालों को रोजगार मिलता है। सूचना संचार के कारण फोन बनाने वाली कम्पनी व फोन बेचने वालों को काम मिलता है। देखने को घड़ी चाहिए तो घड़ी उद्योग में रोजगार मिलता है, नयी-नयी तकनीक को खोजने में विशेषज्ञ लगे रहते हैं, वैज्ञानिक बनते हैं…।

इस तरह सारे विश्व में सृजन को जन्म मिलता है, अपराधों से…।

हाँ, असीमित पापों को छूट नहीं दी जा सकती है, इसीलिए संविधान पाँच पापों को नियमित करता है। यही तो अणुव्रतों का स्वरूप है। आप नियमानुसार व्यापार, गृह-निर्माण, कृषि, मनोरंजन आदि कर सकते हो। लेकिन असीमित धन रखने की अनुमति नहीं दे सकते।

भद्राणी (हामी भरकर) - पाँच पापों से असाता वेदनीय होती है, जिससे लोग रोगी होते हैं… इससे अस्पताल बनते हैं, उनमें काम करने के लिए डॉक्टर, सर्जन, प्रोफेसर आदि बनते हैं। इसी तरह क्रम-क्रम से सारा संसार काम में लगा रहता है।

जो हो रहा है, सो सही हो रहा है।

कड़वा सच

शादी के समय महकते हैं, कुछ समय बाद बहकते हैं
और फिर सारे जीवन दहकते हैं;

इसके बाद मात्र इन कर्मों का फल भुगतते हैं ।
यह क्या अजीब पहेली है? बूझो तो आत्मा जानें।

6. उत्कृष्ट त्याग धर्म : “त्याग एवं छोड़ने में अंतर”

भरत क्षेत्र की मिथिला नगरी हरे-भरे खेत-खलिहानों एवं पशुधन से शोभित थी। यहाँ पशुओं की भी समाधि होती थी तो फिर मानवों की तो बात ही क्या करना!

मनुष्य घर में जन्मते अवश्य थे, परन्तु मरते नहीं थे…। अकाल-मृत्यु नहीं सुनी जाती थी। आठ-आठ वर्ष तक के बालक मुनि-दीक्षा लेकर आत्म-साधना में सफल हो गये थे अर्थात् सिद्धालय की शोभा बढ़ा रहे थे।

एक बार नगर के बाह्य भाग में आचार्य उद्धारसागरजी विराज रहे थे, जिनकी पीत दंत-पंक्तियाँ तत्त्वों का धवल प्रकाश बिखेर रही थीं। त्याग धर्म की व्याख्या भव्य जीवों के आत्मा को अमृत वर्षा से सिंचित कर रही थी, जिसे सुनकर बाल-बुद्धि जीवों की भी भावना उत्तम त्याग-धर्मरूप परिणमन हेतु व्यापार आदि का त्याग कर आत्म-स्वरूप में मग्नता की ही हो रही थी।

आचार्य - "जो उत्तम त्याग न कर सको तो मध्यम त्याग धर्म-पूर्वक न्यायोपार्जित धन का सदुपयोग करके स्व-पर की निवृत्ति में सहायक होना चाहिए। जघन्य त्यागधर्म में न्याय से कमाने, विवेक से खर्च करने और संतोष से रहने का प्रयास करना चाहिए।

अधम से अधम व्यक्ति वह माना जाता है, जो न्याय-अन्याय का विवेक किये बिना, मात्र कमाता और जोड़ता है; योग्य रीति से न स्वयं भोगता है और न अन्यों को भोगने देता है। मात्र पापाचारियों की भोग-विलासिता के लिए प्रयोग करता है और छोड़ता है। इसका धन पापों में ही प्रयुक्त होता है।"
पूज्यश्री के मुखारविंद से भवतापहारी उपदेश सुनकर मिथिला नगरी के राजा सुनमि को वैराग्य हो आया और उन्होंने अणुव्रत धारण कर लिये। रानी सुव्रता ने भी पर्व के दिनों में उपवास और अन्य दिनों में रस-परित्याग करने का नियम लिया।
रानी सुव्रता भी बड़ी धर्मात्मा थी। वह अन्य भी अनेकों नियमों का पालन करती थी; परन्तु संक्लेश एवं गर्व उसका पीछा नहीं छोड़ते थे…।
राजा आत्मज्ञानी थे, परन्तु रानी आत्मज्ञान से रहित थी। दोनों में तत्त्वचर्चा भी चलती रहती थी। रानी को कई बार राजा स्वच्छन्दी लगते थे। वह सोचती रहती थी कि ‘चाहे जैसे भी हो, नियम तो पालना ही चाहिए।’ इधर राजा का कहना था - ‘आत्मा का अनुभव, स्वतन्त्रता का वेदन मर-पच कर करना चाहिए।’ और रानी का तो आप समझ ही गये न…?

रानी रस-परित्याग करती तो दूसरे प्रकार से स्वादिष्ट रसोई का रस जाग जाता…। इसके लिए धन, समय एवं शक्ति खूब लगाती और फिर भी किसी चूक के कारण यदि अंतराय आ जाये तो बहुत क्लेश करती। प्रायः वह दास-दासियों से कहा करती- “तुम सब मुझे भ्रष्ट करने पर तुले हो।”

प्रसंग पाकर एक दिन राजा ने समझाया - “प्रिये! धर्म तो आत्मा में अनुरक्त होने का नाम है।”

सुव्रता - ‘अच्छा, तो पर से विरक्त न हों?’

सुनमि - ‘आत्म-अनुरक्ति व स्वाभाविक तृप्ति के काल में पर-द्रव्यों एवं विषयों की आसक्ति-रुचि या रस नहीं रह जाता है, यही विरक्ति कहलाती है। इसके बिना किया गया अनशन मात्र लंघन माना गया है। इसमें जीव के स्वाश्रयरूप धर्म तो किंचित् मात्र भी नहीं होता है।’

अज्ञानियों को भी भोगान्तराय के उदय में आहार, जल आदि का भोग नहीं हो पाता है। इसलिए उपवास तो आत्मज्ञानियों के ही कहा गया है।

सुव्रता - “सभी आप जैसे हो जायें तो कोई व्रत-उपवास करे ही नहीं…” - रानी ने उलाहना दिया।

सुनमि - “अच्छा, तो तुम बताओ …आदिनाथ भगवान को मुनिदशा में कितने महीनों का उपवास कहा गया है?”

सुव्रता - ‘छह मास का।…शेष तो आहार का विकल्प होने पर भी 7 माह 9 दिन तक आहार की विधि नहीं मिली थी।’

सुनमि - “जब आहार के एक क्षणिक विकल्प मात्र से उनको उपवास नहीं कहा, …तो हमारे क्लेश, वांछा, आहार-योजना आदि के होने पर भी क्या उपवास कहा जा सकता है?”

सुव्रता (विचारकर) - “नहीं, …परन्तु पुण्य-बंध तो होता है; … यदि सावधानी से क्रिया करो तो …।”

सुनमि - "पापों से विमुख होना ही तो पुण्य-बंध है, परंतु जैनधर्म पुण्य-बंध के लिए नहीं, वीतरागता के लिए मिला है। जब तक पूर्ण वीतरागता न हो, तब तक सातिशय पुण्य-बंध होता ही है। …परन्तु यह गौरव-गरिमा की नहीं, मजबूरी की चीज है।

उपयोग की सावधानी करो अर्थात् परिणाम एवं मन-वचन-काय की प्रवृत्ति सदा एक-सी नहीं होती है, अतः उनमें अपनी चलाने के भाव से मुक्त होकर, ज्ञाता रहकर उपयोग में सावधान रहो। पूर्ण प्रयत्न करने पर भी अंतराय के उदय में यदि भोजन योग्य नहीं हो पाए तो भेदविज्ञान करो, न कि क्लेश।"

सुव्रता (सफाई देते हुए) - “कहती भर हूँ, …शान्ति तो रखती ही हूँ।”

सुनमि (मुस्कराकर) - “पर में न चले …तब भड़ास निकालने के सिवाय बचता भी क्या है?” …टोडरमलजी ने इस सन्दर्भ में कहा है - “अज्ञानी मूढ़ होकर भवितव्य को मानता है।”

सुव्रता - “जब देखो, तब मेरा ही दोष बताते हो।” …वह रुआँसी हो गई।

सुनमि - “इसमें रोने की क्या बात है?.. ‘रोना’ तो समझने से बचने का उपाय है। ठीक है, आप चाहती हैं तो आगे से मैं आपको कुछ नहीं कहूँगा।”
सुव्रता - (और जोर से रोने लगी) “…आप तो नाराज़ हो गये।”
सुनमि - “ओफ्फो! बोलो तो आफत, न बोलो तो आफत…।” राजा ने सिर पकड़ लिया।
सुव्रता - “मात्र क्लेश दिखाई देता है …आपको मेरा अभिप्राय दिखाई नहीं देता है। सारी दुनिया पापों में लगी हुई है, …कम से कम मैं कर तो रही हूँ।”
सुनमि - “अवश्य! इतना किया तो शाबाश! परन्तु फल तो परिणाम के पीछे छुपे अभिप्राय का लगता है। ध्रुव-स्वभाव का रस लगे बिना, एक का रस छोड़ा और दूसरे रस से पेट भर लिया, …इसमें अभिप्राय तो पेट भरने का ही रहा न? विशुद्धि का फल कैसे मिल सकेगा?”
सुव्रता - “धीरे-धीरे मैं समता भी रख लूँगी; …अभी जितना कर रही हूँ, यह क्या कम है?”
सुनमि - “आप प्रवृत्ति करो, या न भी करो; परन्तु फल तो अभिप्राय की वासना का ही लगता है। हाँ, बाह्य प्रतिज्ञाओं से संस्कृति चलती हुई दिखती है, परन्तु वह भी दूषित… परिणामस्वरूप बच्चे जो देखते हैं, वही सीखते हैं। बहुओं को धर्म से अश्रद्धा भी हो सकती है। …अतः सम्यक् प्रकार से ही आचरण करना चाहिए, …जिसमें किंचित् मात्र भी क्लेश न हो।”

“सम्यग्ज्ञानी होय बहुरि दृढ़ चारित लीजे।” - इससे ही पुण्य-बंध होगा।

सुव्रता - “ठीक है, तो आज से मैं क्लेश नहीं करूँगी।”

सुनमि - (स्मित वदन) “परन्तु अंतर में तो होगा न? फल तो उस ही का होगा। अतः आत्महित में सावधान हो कर, उदय अनुसार जो प्रसंग बने, उसमें शांत रहकर, मात्र ज्ञाता भाव अनुभवना ही एक मार्ग है।”

अब से रानी ऊपर से शांत पर अंदर से कुंठित रहने लगी। …वह पित्तज रोगों की शिकार होने लगी। अंतर में शान्ति न थी और क्रियाओं में से शांति मिल नहीं रही थी। गर्व-वश क्रियायें तजने का तो प्रश्न ही नहीं था।

एक दिन राजा ने पुनः समझाया - “आप व्रत-उपवास का अभ्यास कर लो, …यम मत बनाओ।”

परन्तु अज्ञान-वश अभ्यास को ही यम मान लिया गया था …और उसमें परिवर्तन करना स्वच्छंदता या प्रतिज्ञा तोड़ने से भी भयंकर पाप दिख रहा था। उसे आगम की अपेक्षा “अज्ञानी जगत क्या कहेगा” - इसकी चिंता थी।

राजा - “आप रोगी की भाँति काल गँवा रही हैं …या किसी तरह प्रतिज्ञा का निर्वाह कर रही हैं। इससे क्या लाभ होगा?”

रानी चुप रह गईं …सोचती रह गईं - “इनसे तो बहस करना ही पाप है।”

वह हर अष्टमी-चतुर्दशी दुखी होती। …अंतर में चलता -“हे भगवान! इतना कठिन धर्म क्यों बनाया? मैं ही धर्म कर रही हूँ, …और मुझे ही रोग हो रहे हैं, …मुझे ही शांति नहीं मिल रही है। …जो धर्म नहीं कर रहे हैं, वे मजे कर रहे हैं। कितनी जल्दी-जल्दी अष्टमी आदि पर्व आ जाते हैं” - इत्यादि अनेकों विचार उसके चित्त में क्षोभ पैदा कर रहे थे। वह विक्षेप से परेशान थी, …परन्तु राजा के सामने सहज दिखने का प्रयास करती थी।

जब अच्छे से व्रत आदि हो जाते …तो गर्व से भर जाती थी। …प्रतिकूल प्रसंगों में क्रुद्ध होती, परन्तु मान-वश किसी को दिखती नहीं थी। अंतर में तिर्यंच गति का बंध चल रहा था, …परन्तु वह शास्त्र-अभ्यासी तो थी नहीं और धर्मात्माओं की उसे माननी नहीं थी।

सुनमि - “एक बात कहूँ …?”

सुव्रता - “मैं सुनने को उत्सुक हूँ, स्वामी।”

सुनमि - “आप बड़े कठोर व्रत आदि करती हो…।”

सुव्रता - (गर्व से) “…आखिर आपको लगा न? इतने कठिन-कठिन व्रत आदि मैं ही कर सकती हूँ।”

सुनमि - “परन्तु आनन्द में नहीं दिखती हो, …रोगी की भाँति काल गँवाती हो, …अनेक प्रकार से समय काटने का उद्यम दिखाई देता है।”

सुव्रता - “मन नहीं लगता तो क्या करूँ? …पाप करने से तो अच्छा है पुण्य करो।”

सुनमि - “विश्व में समस्त सामान्य प्राणी पाप करते हुए सकुचाते हैं और पुण्य की इच्छा करते हैं।”

सुव्रता - “वही, … वही तो मैं कह रही हूँ; …कर भी रही हूँ।” (प्रफुल्लित होते हुए)
सुनमि (गंभीरतापूर्वक) - “परन्तु जैनधर्म रूढ़ियों का नाम नहीं, आत्मानुभूति का नाम है।” यहाँ तो संक्लेश के त्याग का नाम ‘व्रत’ है और तुमने तो व्रत के नाम पर ही संक्लेश के प्रति ही प्रतिबद्धता कर ली।
सुव्रता - “मैं समझी नहीं।”
सुनमि - “सारे धर्म पुण्य की प्रेरणा करते हैं, फिर भी लोग चाहकर भी पुण्य में प्रवृत्त हो नहीं पाते हैं। …अतः पुण्य करनेवालों की महिमा आती है और स्वयं भी जड़-क्रियाओं को करके संतुष्ट होकर मिथ्या आत्म-संतोषी बन जाते हैं।”
सुव्रता - “मैं अभी भी नहीं समझी।”
सुनमि - "देखो, जब बलात् पुण्य क्रियायें करते हैं तो इससे असाता का बंध होता है। पापों से सहज विमुख होने का नाम पुण्य है।… यह बात कितनी आसान है? राग एवं वैराग्य में से किसी एक को चुनना है, …राग प्रिय नहीं है और वैराग्य हुआ नहीं है। ..इस बीच की दशा में जो भाव आते हैं उन ही का नाम पुण्य है और यह प्रचुर मात्रा में होता है। इसमें संवर-निर्जरा रूप आनन्द होता है, न कि क्लेशरूप आस्रव-बंध।’
सुव्रता समझने के प्रयास से भरी आँखों से देखती है।
सुनमि - “देखो, तुम मुझे भोजन कराती हो या कराना पड़ता है?”
सुव्रता - (लजाती हुई) “कैसे हो? ऐसा पूछते हुए आपको लाज न आई? …मुझे अपने प्रीतम, अपने स्वामी को भोजन कराने में कष्ट कैसा?”

सुनमि - "बस, सोचो! …जब भोजन सहज आनन्दपूर्वक हो सकता है तो व्रतादि का पालन एवं देवभक्ति-दान आदि का उत्साह सहज क्यों नहीं हो सकता है? तीन लोक के नाथ तो मेरे से अनंतगुणे महान हैं। …उनके मार्ग की सेवना में क्लेश कैसे हो सकता है? रही बात बाह्य त्याग की तो वह तो अनावश्यक का त्याग करो, आवश्यक क्रियायें तो होंगी ही; जैसे भूख-प्यास, संज्ञाएँ आदि और भी नियमित कार्य - जैसे बच्चे की देखभाल, वस्त्र धोना आदि। हम क्रियायें नहीं रोक सकते हैं। हाँ, उनमें आसक्ति या कर्तृत्व-बुद्धि का त्याग अवश्य कर सकते हैं।’

सच की स्वीकृति में सुव्रता की आँखें झुक गईं, नीर बहने लगे।

सुनमि - (बाँहों में भर कर) “…वाह मेरी सरल रानी! तुम कितनी अच्छी हो …!”

सुव्रता - “राग से विमुख कैसे होऊँ?” उत्साह एवं जिज्ञासा से भरी रानी का स्वर उभरा।

सुनमि - “ध्रुव-स्वभाव सदा पर-निरपेक्षरूप से परिणमता है - ऐसा श्रद्धान करते ही जीव राग से विमुख हो जाता है और इससे उसे 99% बंध का अभाव होने लगता है। …तीन कषाय चौकड़ी के सद्भाव के बंध को ‘जली जेवरीवत्’ कहा गया है।”

सुव्रता - “इससे क्या होगा?”

सुनमि - “भगवान बनने की रुचि वाले को संसार-वर्धक राग में आनन्द-बुद्धि रहित प्रवर्तन होने से, पाप घट कर एवं पुण्य बढ़ कर मिटता है। अतः बाह्य जीवन में स्वच्छंदता नहीं देखी जाती है।”

सुव्रता - “तो फिर जैसा मन में आये, वैसा आचरण करना चाहिए? …यह स्वच्छंदता नहीं कहलाएगी?”

सुनमि - “मन ही मर जायेगा, तब चाहे जैसा आचरण सम्भव ही नहीं है। आत्मलीनता की ओर बढ़ता उपयोग शुभ भाव से भरा रहता है। रही बात आचरण की, वह तो कषाय चौकड़ी के अभाव-प्रमाण सदा आनन्दरूप ही रहेगा; …और प्रवृत्ति उदय अनुसार बदलती रहेगी। ज्ञानी उदय की जिम्मेदारी नहीं लेता, उसे भिन्न देखकर आनन्द की जिम्मेदारी लेता है।”

सुव्रता आँखों में आँसू लिये चरणों में झुक जाती है।

सुव्रता - “…आज समझ में आया सच्चा त्याग क्या होता है। विषय-सेवन अथवा प्रवृत्ति छोड़ने में मायाचारी है, दर्द है, क्लेश है, आस्रव-बंध हैं। अनुकूलता में सम्पन्न क्रिया का मान एवं प्रतिकूलता में क्रोध उत्पन्न होता है, दोनों ही द्वेष की पर्यायें हैं; जबकि त्याग में संवर-निर्जरा है, आनन्द है। त्यागे हुए विषय का स्मरण तक नहीं होता है।”

राजा विस्मित अपलक निहारता रह गया।

सच है, प्रत्येक जीव ज्ञान से ही तो बना है …आखिर सच्ची समझ हो ही गई तो इसमें विस्मय की क्या बात है!

7. आनन्द का हिसाब

हमीदिया महाविद्यालय, भोपाल

5 नवम्बर, बुधवार।

आज तनाव-जागरुकता दिवस था।

सभागार में समस्त संकायों के विभागाध्यक्ष एवं छात्र उपस्थित हैं। एक सुंदर व्याख्यानमाला चल रही थी। …वाणिज्य संकाय के डीन डॉ. नरेन्द्र जैन व्याख्यान दे रहे थे -

"जिन्हें हिसाब लगाना नहीं आता है वे ही दुखी होते हैं।

आप यूँ भी कह सकते हैं कि दुखी लोग हिसाब लगाने में कच्चे होते हैं। हिसाब लगाना सीखो और आनन्द करो।"
रोमेश - (जिज्ञासा करते हुए पूछा) “क्या हिसाब से भी कोई सुखी होता है? बे-हिसाब जिन्दगी का मज़ा ही अलग है…।”
नरेन्द्र जैन - (सहज-सरल, उन्मुक्त हो) “बिलकुल सही। …आप करोड़ रुपये जेब में रखिये और हिसाब मत रखिये। …दिल्ली से मुंबई तक हाईवे पर जाइए। रास्ते में नियम तोड़ते जाइए, …हर स्थान पर मुँहमाँगी रिश्वत देते जाइए, …कहीं नहीं फँसेंगे। …कोई जेल नहीं। …परन्तु अंत में पूरे करोड़ रुपये ख़त्म हो गये। …अब मुंबई में कैसे घूमेंगे? और वहाँ भी फँस गये तो धन के अभाव में क्या करेंगे?”
विद्यार्थी सोच में पड़ गये… “फिर जेल से कौन बचाएगा?”
नरेन्द्र जैन - “इसका मतलब है …फास्ट टेग लगवा लेना, …बीमा करवा लेना, …अन्य कागज तैयार करवाना, …सीट बेल्ट लगाना …। इसमें कितने पैसे लगते?..परन्तु धन की अकड़ में सारा धन चला गया, पर आदत नहीं सुधारी। पिछले दिनों एक समाचार मिला था। एक धनी युवक का, जो इस ही प्रकार की गलती करते हुए आज यरवदा जेल में है। अब बोलो? समझदारी किसमें है?”
विद्यार्थियों ने स्वीकार किया कि हिसाब से सुखी होते हैं।
नरेन्द्र जैन - “परन्तु …घर में एक लाख की हानि हो जाये तो? (मुस्कराते हुए …) बोलो क्या होगा?”

रोहित - “सभी को दुख होगा। …आखिर कमाया बड़े परिश्रम से हो तो दुख तो होगा ही। … एक साल की कमाई एक दिन में चली गई, …न भोग सके, न दान दे सके। …सदुपयोग न कर सको तो कष्ट तो होगा ही।”
(रामेश्वर ने सहमति में सिर हिलाया)
नरेन्द्र जैन - “किस-किस को दुख होगा?”
रोहित - “जिसने खोया, उसको दुख होगा।”
नरेन्द्र जैन - “नहीं, जिसे अज्ञान होगा, उसे दुख होगा।… मान लो - खोने वाला समझदार है तो वह सोच सकता है कि मैं तो साठ साल का हो गया हूँ; …मरते समय सौ लाख नहीं तो निन्यानवे लाख छोड़कर जाना होगा। …हमें क्या फर्क पड़ा? …हानि हुई है तो संतान को हुई, …उसे कुछ कम मिलेगा। यदि चार बेटे हों तो हर बेटे को 25 हजार हानि होगी। …परन्तु उन्हें भी क्या हानि होगी? …एक लाख की हानि होने पर भी उन्हें चौबीस लाख पचहत्तर हजार तो मिलेंगे ही; वह भी बिना कमाये। …और गजब बात तो यह है कि वे भी इसे भोगे बिना अपनी संतान को मय ब्याज के एक करोड़ करके दे जायेंगे। …जब संतान को हानि नहीं हुई तो उनकी संतान को तो और भी कम हानि कहलायेगी। और वे भी अपनी संतान को दे जायेंगे। …इस तरह किसी के भी भोग में कमी नहीं आई।”
एक और मजे की बात…
“उसी परिवार में मासूम, नासमझ बच्चे को कोई भी दुख नहीं होता है। वह तो किलकारी मारकर आनन्द कर रहा है; क्योंकि उसे एक लाख रुपयों की समझ ही नहीं है। (व्यंग्य से) इसका अर्थ तो यह हुआ कि दुखी होना समझदार लोगों का काम है।”
सभागार हास्य से गूँज गया, कुछ लोगों ने तालियाँ बजाकर चटकारे लिये…।
वीरेन्द्र - (बीच में बात काटते हुए) “और यदि उन्हें बीच में ही घाटा हो जाए तो? वे ब्याज सहित नहीं दे पाए तो?”
नरेन्द्र जैन - “घाटा हो जायेगा तो भी यदि मरते समय 25 लाख बचा रहा, उस हाल में पिताजी का दिया हुआ तो फिर भी नहीं भोगा गया न! और एक पैसा भी नहीं दिया तो जब चौबीस लाख पचहत्तर हजार ही नहीं बचे तो 25000 रु. भी तो नहीं बचेंगे। …अतः दुख हर हाल में निरर्थक ही सिद्ध हुआ।”
वीरेन्द्र - (पुलकित हो) “तो फिर तो दुखी होने का तो कोई काम ही नहीं बचेगा।”
नरेन्द्र जैन - “बचेगा न, …यदि तात्त्विक अज्ञान हो तो …वह सोच सकता है कितने दिन में कमाया था? हाय! क्यों न भोगा? किसने लूट लिये? कौन बेईमान है? नरक में जाये, …मर जाये, …मुझे ज्ञात हो जाये तो ज़िंदा न छोडूँ। …मैंने ऐसे क्या पाप किये? …काश! कुछ भोगा होता… ऐसा ज्ञान पहले से होता तो दान ही दे देता! मेरा मन तो था, …परन्तु अब धन ही नहीं बचा। …अब भगवान को हानि हुई, …मेरा क्या गया? - ऐसे निरर्थक विचार करके संक्लेश करते हुए भवान्तर तक फल भोग सकता है।”
सुरेन्द्र - “ठीक है …यदि उसे ज्ञान हो जाये कि वह धन मेरे अभिन्न मित्र ही ने खा लिया तो?”

नरेन्द्र जैन - “खाता कौन है? खाने की चीज थोड़े ही होती है कोई …।”
विजय - “अरे! लोग दुकान-मकान खा जाते हैं, …सोना खा जाते हैं न!”
नरेन्द्र जैन - “खाते नहीं हैं, …लोक की वस्तु लोक में ही रहती है; …बस, ज्ञान में से खो जाती है। …अर्थात् सही से हिसाब नहीं लगाया जाता है। …हो सकता है यह सोच रहा है कि वह खा गया, …परन्तु उसके हिसाब से उसने सही हिस्सा लिया हो।”
रोमेश - “ऐसा कैसे हो सकता है?”
नरेन्द्र जैन - “देखो! एक व्यक्ति किसी के खेत या परिश्रम को गिनना नहीं चाहता हो और दूसरा उसको हिसाब में ले रहा हो, …उसने किसी अन्य स्थान पर ज्यादा धन दे दिया हो तो अब वह उसे वसूलना चाहता हो। …उसके पास माता-पिता एवं अधिक संतान का भार हो तो वह ज्यादा लेना चाहता हो, …कम उपजाऊ जमीन होने से मात्रा में ज्यादा ले रहा हो, …रोड के पास होने से कम देना चाहता हो। आपने पूर्व में कोई लाभ ज्यादा ले लिया हो और उसे आप गिन ही नहीं रहे हों - ऐसे अनेक कारण हो सकते हैं। … अतः दूसरे का अभिप्राय जाने बिना अन्याय नहीं कहा जा सकता है।”
रोमेश - सही में खा ले तो? हजम नहीं होगा!"
नरेन्द्र जैन - “मान लो, ऐसा हो भी गया और दोनों दानी हों तो …वह दान दे तो आप मत दो, …उसके दान की अनुमोदना करके ही दान का पुण्य ले लो। …ताली बजाओ, …समझ लो मैंने ही दान दिया। आपने उसके माध्यम से दान दे दिया। …आनंद करो, …संक्लेश करने से तो अच्छा है, दान ही मत दो। …आप दान भी दे रहे हैं …करोड़ों छोड़ कर भी मर रहे हैं, …संक्लेश भी कर रहे हैं …तो गत्यन्तरों में आप पाप-बंध का फल भोगते समय दुखी ही होंगे।”
“अन्याय नहीं हो सकता है। …आपने कभी किसी से दगा किया होगा …अथवा तो भविष्य में आपको अच्छा मिलना होगा। …कुल मिलकर शांत रहने वाला सदा फायदे में रहता है।”
“बदला लेने की भावना होगी तो उसके पीछे-पीछे नरक-निगोद की सैर करनी पड़ेगी …और समता-भाव हुआ तो रत्नत्रय सहित स्वर्ग-मोक्ष का लाभ; …अब सोचो, संक्लेश करने वाला लाभ में रहेगा या हानि में?”
विजयेश - “कोई धन का दुरुपयोग करे तो आग तो लगती है।”
नरेन्द्र जैन - “जिस जीव को अपने पुण्य को भोगने का भाग्य नहीं होता है, वही अपने हिस्से का धन खो देता है। उसके दुर्भाग्य को देखकर दया आनी चाहिए, न कि क्रोध। कोई भी जीव दूसरे के भाग्य का धन-भोजन खा नहीं सकता है।”
विजयेश - “कोई जान-बूझकर हानि करे तो?”
नरेन्द्र जैन - “जान-बूझकर हानि कोई नहीं करता है, …तत्समय की योग्यता-वश गलती होने से तो कोई भी हानि कर सकता है। हानि का भान होने पर उसे दुख भी होता है …और उस गलती से सीखता भी है। कभी-कभी दुर्भाग्य से पापोदय में अच्छे-अच्छे लोगों से भी गलती हो जाती है।”

“ऐसा भी हो सकता है …हम गलती करते हैं तो लगता है कि मुझसे अनजाने में गलती हुई …और दूसरे से गलती होने पर भी हम उस पर जान-बूझकर हानि करने का आरोप लगा कर दुखी होते रहते हैं।”

रोमेश - “हाँ, ऐसा तो प्रायः ही अनुभूत होता रहता है।”

मुरली बोल उठा - “परन्तु कहने पर भी कोई न माने तो क्या करें?”

नरेन्द्र जैन - “कहने से योग्यता तो नहीं आ जाती है न, …वह तो कार्य करते-करते समय से ही आती है। अतः हमें धैर्य रखना चाहिए। एक अधिकृत डॉक्टर भी ऑपरेशन करते-करते ही अनुभवी होता है।”

सुरेन्द्र - “सही है, परन्तु कोई कम खर्च के स्थान पर अधिक खर्च करे तो?”

नरेन्द्र जैन - “समझने की कोशिश करो, …हो सकता है सामने वाला समझदार हो, …सस्ता रोवे बार-बार…। असली घी, तेल, नमक, मसाले महँगे मिल सकते हैं। नकली, दिखावटी चीजें सुन्दर होने पर भी घटिया हो सकती हैं।”

बाजार का पिसा आटा खाने के स्थान पर घर की आटा-चक्की एवं मिक्सर से पीसा गया आटा, घानी का तेल, घर के मसाले, सामने निकाला गया दूध तथा घर में बना घी भले ही महँगे पड़ें एवं इनको तैयार करने या शोधन में समय लगे, परन्तु ये शुद्ध एवं स्वास्थ्य-प्रद होने के साथ-साथ अहिंसक भी होते हैं, जिससे घर में मोक्षमार्गी संतों के आहार-दान का सौभाग्य सहज मिलता है।"
“हाँ …हमें ब्लाइंड फॉलोअर नहीं होना चाहिए …जैसे दूसरों को देखकर जींस पहनना, दूसरों को देखकर कटिंग कराना, महँगे मोबाइल रखना, विवाह करना, महिला संगीत करना, अशोभन या अश्लील वस्त्र पहनना, विरुद्ध-लिंगी मैत्री, व्यापार-सट्टा, जुआ, शेयर आदि करना और बिना टिकट यात्रा करना। अधिक लाभ के प्रलोभन में फँसकर हिंसक व अनैतिक व्यापार नहीं करना चाहिए।”
वीरेन्द्र - “बिना टिकिट यात्रा मिल रही हो तो टिकिट लेना तो मूर्खता ही कही जाएगी।”
नरेन्द्र जैन - “मूर्खता नहीं, समझदारी है। ‘सौ दिन सुनारे की तो एक दिन लुहार की’ भी तो होती है। जिस दिन पकड़े जायेंगे, उस दिन बचाया गया या उससे भी अधिक धन चला जाएगा एवं प्रतिष्ठा भी धूमिल हो जाएगी। माता-पिता, दादा के जमाने से बनी प्रतिष्ठा खो जाती है। फिर संतान के विवाह-सम्बन्ध आदि में नीचा देखना पड़ता है। ससुराल में बेटी को सदा ताने सुनने पड़ते हैं। फिर जब धन छोड़कर ही मरना है तो ज्यादा छोड़कर क्यों मरें?”
रमेश - (हँसते हुए) “…ज्यादा नहीं सर! …जब सारे जीवन ईमानदारी से पैसे खर्च करेंगे तो …धन तो कम ही छोड़ कर मरेंगे न?”
नरेन्द्र जैन - "नहीं, यही तो अलौकिक गणित है। …जब हम न्याय से रहते हैं, विवेक से खर्च करते हैं एवं सत्संग में धन का सदुपयोग करते हैं तो पाप-बंध नहीं होता है, …साता का बंध होता है, …तनाव नहीं होता, जिससे किसी भी तरह की बीमारी नहीं होती है। तो व्यय बचा न? पुलिस द्वारा पकड़े नहीं जाने से वकील-कोर्ट का खर्च बचता है। बच्चों में सत्संग से सुसंस्कार पड़ने से सब स्वर्ग की तरह हिल-मिल कर रहते हैं। …सम्यक्त्व, समाधि, स्वर्ग मिलने से लाभ ही लाभ हुआ, …साथ ही प्रतिष्ठा-यश पृथक् से आनन्द देता है। निंद्य होकर जिये तो क्या जिये ? "

छात्रा रीता ने अकुलाते हुए कहा - “सर, समय कहाँ है आज के समय में?”

नरेन्द्र जैन - “आज तो पहले से भी ज्यादा समय है हमारे पास …पहले पानी भरने में, आटा पीसने में, मसाले तैयार करने में, चूल्हा जलाने में, कपड़े धोने में बहुत समय लगता था; परन्तु आज तो समय ही समय है। हाँ, आज समय मोबाइल, चैटिंग, टीवी में लग जाता है अथवा तो मनोरंजन के नाम पर किटी पार्टी या होटल में समय लग जाता है और बाकी बचा समय अस्पताल में लग जाता है।”

दर्शन विभागाध्यक्ष डॉ. रतनचंद जैन बीच में बोल पड़े - “अरे! आज तो स्वाध्याय, तत्त्व-चर्चा, निर्णय व स्वानुभव के लिए और भी अधिक निमित्त हाजिर हैं। पहले जब प्रवचन होते थे या भगवान की दिव्यध्वनि खिरती थी तो उसे सारे देश में एक साथ नहीं सुना जा सकता था, परन्तु आज तो यह सुविधा भी है कि पुराने प्रवचन, शास्त्र आदि कभी भी, कहीं भी सुने-पढ़े जा सकते हैं।”

“अच्छा होगा कि बहाना छोड़कर आनन्द का हिसाब करें… हिसाब लगाकर सदा आनन्द करें।”

8. गंदी सुन्दरता

पुराने समय की बात है। …बंगाल के चन्द्र नगर में एक सेठ था भानुदत्त। उसकी स्त्री का नाम था चन्द्रमुखी। वह ‘यथा नाम तथा गुण’ की कहावत को चरितार्थ करती थी। वह नगरसेठ की पत्नी होने से सब की आँखों में शोभा पाती थी।

परन्तु …समाज की स्त्रियाँ उसे देखकर उस पर दया करती थीं। ऐसा क्यों?

वह बाजार में छोटी-छोटी-सी बात पर धन बचाती, दरिद्र से दरिद्र तक का शोषण करने का अवसर न चूकती। उसे दो पैसे का धनिया भी लेना होता तो उसमें भी मोलभाव करती… चाहती कि एक सेर टमाटर के साथ धनिया तो निःशुल्क ही मिलना चाहिए न!

घर में अतिथियों के भोजन ग्रहण करते समय खीसें निपोरती। दिखा-दिखा कर खाती-खिलाती। दूसरों के घरों से माँग कर खाना जैसे उसका जन्म-सिद्ध अधिकार था। उसे लगता वह बड़ी भाग्यशाली, सुन्दर पति की हृदयवासिनी है। पति की नित बाहुशायिनी होने से वह अपने को स्वर्ग की रम्भा से कम न अनुभवती थी।

इन परिणामों के कारण घर-घर सेठानी की निंदा होने लगी…।

एक रात पड़ोसी भोगीलाल से न रहा गया। वह पड़ोसी नगरसेठ के भाग्य के गीत गा रहा था, तब राधिका घृणा से नाक सिकोड़ती हुई अपने पति से बोली - “वह बड़ी घिनऊँ है।”

भोगीलाल - “तुम स्त्रियों को तो दूसरी भाग्यवती स्त्रियों को देखकर मात्र ईर्ष्या ही होती है। वह सुन्दर है, नज़ाकत से भरपूर है। उसकी आँखें साक्षात् स्वर्ग की झील हैं… सेठजी तो उनमें ही डूबे रहते हैं। तुम्हारी आँखें तो गड्ढे जैसी हैं, जिनमें कीचड़ भरा हुआ है।”

राधिका - “तुम पुरुषों को तो स्पर्श में चमड़ा ही तो चाहिए होता है, …तुम लोग अंतर का व्यक्तित्व क्या जानो!” राधिका ने उपालंभ दिया। “जिन आँखों में पराई वस्तुएँ अपनी दिखाई देती हों, वे आँखें सुन्दर कैसे हो सकती हैं?”

भोगीलाल - “उसके हाथ, अहा! कल्पवृक्ष के श्वेत फूलों की माला-समान हैं।” …भोगीलाल प्रशंसा में खो गये।

राधिका - “उससे एक काम करवा के देखो तो जाने? …जहाँ देखो, वहीं गंदगी कर देती है। …वह पर-पुरुषों से कैसे हाथ मटका-मटका कर बातें करती है!” (मन की व्यथा ने आकार लिया।)
भोगीलाल - “उसकी नुकीली लम्बी नाक की सुन्दरता तो वेद-पुराण में भी नहीं मिलेगी और चरण तो साक्षात् पद्म ही हैं।”
राधिका - “जो साधर्मी की गंध से दूर रहती हो, …सदा इत्र की सुगंध में डूबी रहती हो, …दूसरों को भगवान न देख सकती हो, …उनका सदा अनादर करती हो - ऐसी स्त्री सुन्दर कैसे हो सकती है? वह एक दिन भी अपने सास-ससुर की सेवा नहीं करती है। उसे आप सुन्दर कहते हो? आश्चर्य है आप मर्दों की बुद्धि पर, जो ऐसी स्त्री की प्रशंसा करते हो।”
भोगीलाल - “उसका कंठ, वक्षःस्थल रूपी लघु पर्वतों पर बना सुन्दर शिखर ही हो और झूलता हार, मानो उन पर्वतों पर विहार करने के लिए सेतु ही हो एवं कटिभाग पर शोभती मणि-मेखला मानो शील सरोवर का तट-बंध-समान हो। नयनों के लिए इससे सुन्दर दृश्य और क्या हो सकता है? उसके झीने वस्त्रों में स्वर्ग की संपदा समाई हुई है।”
राधिका - "जिस कंठ में वासना के गीत बसे हों, उन्हें आप सुन्दर कहते हैं? …वह एक दिन भी भगवंतों के गुण-स्मरण या कथन के लिए नहीं जानी जाती। …अश्लील वस्त्र से दूसरों की स्त्रियाँ ही सुन्दर दिखती हैं; …ऐसे वस्त्र एवं गहने पहन कर आप मुझे पराये मर्दों में एक दिन भी जाने दोगे? "

भोगीलाल - “तुम लोगों का मन सदा जल-जल कर काला बना रहता है, …दूसरों की अच्छाई तुम्हें कैसे दिख सकती है?”

राधिका - “उसका मन… जिसमें दूसरों की वस्तुओं की चाह बैठी रहती हो, उसे आप कैसे सुन्दर कहते हैं?”

भोगीलाल - “उसे चाह कैसे हो सकती है? वह तो सदा महलों में रहती है, उसके घर में भोग-विलास की सामग्री की क्या कमी है?”

राधिका - “हम स्त्रियाँ, स्त्रियों के संग रहती हैं, …हम उन्हें अच्छे से परख सकती हैं, आप नहीं। …आप लोगों को तो दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। हम लड़की देखने जाते हैं तो चौक में नहीं, चौके में जाकर देखती हैं; …उसके काम करने का ढंग, …खाने का ढंग, …पहनने का ढंग, …बातचीत करने का ढंग सब देखती हैं। …इन सबके बिना देह की कोमल, खर्चीले स्वभाव की कन्या पति को सदा दुखी करने में निमित्त होती है।”

भोगीलाल - “बात तुम्हारी सही है। बहुत बेकार स्त्री है, आज ज्ञात हुआ।”

राधिका - “नहीं! कोई भी स्त्री खराब-अच्छी नहीं होती है; मात्र कही जाती है। आज दिखने वाली योग्यता अनुसार ही वह व्यवहार में प्रवर्तती है, परन्तु दोषों की योग्यता सदा नहीं रहती है। अतः कोई भी घृणा करने लायक नहीं होता है।”

भोगीलाल - “फिर हम क्या करें?”

राधिका - “हमें पर द्रव्य की निंदा-प्रशंसा से बचना चाहिए।”

भोगीलाल - वह तो लोक में सदा चलती ही रहती है?

राधिका - “चलती है’ कहने से मोक्षमार्ग तो विकसित नहीं हो जाता है। लोक में निंदा के पात्र बन जाने का भी आश्चर्य नहीं है।”

भोगीलाल - “निंदा क्यों होगी? भला।”

राधिका - “पर-स्त्री की प्रशंसा उसका पति सुनेगा तो उसे बुरा लगेगा कि नहीं? जैसे कोई पड़ोसी आपके सामने मेरी प्रशंसा करे तो आपको कैसा लगेगा? और कोई भी स्त्री पर-पुरुषों से अपनी निंदा नहीं सुन सकती है।”

भोगीलाल - सही बात है!

राधिका - “शील-विरुद्ध वातावरण से सभी दुखी होते हैं। जगत में हर कोई हर किसी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन नहीं कर सकता है।”

भोगीलाल - “सत्य है! अब से मैं सावधान रहूँगा।”

राधिका - “गुण-दोष देखना बुरा नहीं है। उनसे हमें सावधानीपूर्वक प्रवर्तने की सीख मिलती है, परन्तु दोषों के बल पर किसी को भी सदा के लिए दोषी अनुभवना बुरा है। सभी जीव अपनी भूल सुधारने के लिए स्वतंत्र हैं। सभी जीव समय से योग्यता का कारण पाकर दोष घटाकर मिटाने में समर्थ हो जाते हैं।”

इसके बाद भोगीलाल स्व-पर के दोष देखकर सदा प्रसन्न रहने लगे; क्योंकि प्रत्येक पर्याय से अप्रभावी आत्मा उस समय भी विद्यमान दिखाई दे रहा था। स्व-पर की भगवान आत्मा को देखकर आनन्द ही आएगा न।

9. जहरीले लड्डू

हेमांग देश में मृदांग नाम का राजा राज्य करता था। उसकी स्वर्णलता नाम की रानी थी। उसके पास महल के नाम पर एक साधारण घर ही था। उसका जीवन बड़ा संयमी एवं सादगीपूर्ण था। उसकी माँ प्रतिमाधारी श्राविका थी। वह सारे राज्य में देवी-तुल्य पूजी जाती थी। चूँकि उसके घर में नौकर-नौकरानी रसोई का काम नहीं कर सकते थे, अतः स्वर्णलता को भी रसोई में राजमाता का साथ देना पड़ता था। अब उम्र एवं अनुभव का अंतर तो होना ही था, सो दोनों के बीच में कोमल अनबन हो ही जाया करती थी।

राजमाता समझाती - “बेटी! हर काम समझ कर, धीरे से, अहिंसापूर्वक करो।” और यह संस्कार उसके न था, सो वह अंदर से दुखी हो जाती थी।

दिन भर का सारा गुस्सा रात को राजा को सुनाती तो वह भी सुनते-सुनते एक दिन ऊब गया। …अब उसके मन की बात को कोई सुनना-समझना पसंद नहीं करता था। अब तो उसके रातों की नींद उड़ गई …अनिद्रा, अपच की बीमारी हो गई।

राजमाता बड़े दुलार से उसका ध्यान रखती थी, परन्तु वह तो उनके स्पर्श एवं दर्शन मात्र से ज्वर को प्राप्त हो जाती थी। सोचती - “काश! यह मर जाए तो मुझे चैन मिले।”

“यहाँ कोई अपना नहीं है… इनको भी मुझसे कोई मतलब नहीं है। …मात्र काम करो और रात को उनके काम की पूर्ति; क्या इसी के लिए ही मेरा जन्म हुआ है?”

वह रोती जाती… कभी बिलख उठती। …किसी से कुछ कह भी नहीं सकती थी। उसका चाँद-सा चेहरा कुम्हलाते हुए मिट्टी के लोंदे-सा होता जा रहा था। कोई उसके रोग को समझ नहीं पा रहा था। राजवैद्य उसकी चिकित्सा करके हार चुके थे। राजमाता एवं सारे इष्टजन अनुमान लगाकर थक गये थे।

भला इस घर में कमी ही क्या है? …मात्र रसोई ही तो बनाने में सहायता करनी होती है। विषय-भोग सामग्री की कोई कमी नहीं है। दास-दासियों की भी कमी नहीं है। पति भी सर्वगुण-सम्पन्न है। सासू …वह तो पूज्य नारी है, …धर्मात्मा है।

स्वर्णभद्रा देश के राजा मृणालसेन एवं उनकी भार्या श्रीरत्ना से स्वर्णलता का जन्म हुआ था। उनको अपनी बेटी के स्वास्थ्य-समाचार मिले तो वे उसे देखने आ गये। …स्वर्णलता माता के वक्षःस्थल से लगकर फूट-फूट कर रोने लगी और बोली - “जीवन जीने की आशा भी नहीं रही …अच्छा हुआ आप मिलने आ गये।”

उन्होंने सारा सर्वेक्षण किया …आखिर दुख एवं रोग का कारण क्या हो सकता है?

राजमाता से अनुमति लेकर वे अपनी बेटी को अपने स्वर्णभद्रा देश ले गये। अपनी प्यारी बेटी के नाम पर ही तो उन्होंने अपने देश का नाम रखा था …उसके दुख को देखकर सारी नगरी की प्रजा दुखी हो गई।

कुछ दिनों में उसने अपने दुखड़े सुनाने शुरू कर दिए …इससे उसका हृदय कुछ हल्का हुआ। …मन की पीड़ा माँ के सामने निकल गई। अब वह स्वस्थ होने लगी।

माँ समझ गई …बीमारी का नाम एवं कारण …।

श्रीरत्ना ने समझाया- “बेटी! तेरे घर में दुख का कोई कारण नहीं है, …तुझे भेद-विज्ञान की कमी का दुख है।”

स्वर्णलता - “क्या?” (साश्चर्य माँ की ओर ताकती रह गई।)

श्रीरत्ना - “हाँ! भेद-विज्ञान ही जीव को सुखी करता है …किसी का कोई दोष नहीं है। …जो बनाव तेरे घर में बन रहा है, वह तो हर नारी के साथ ही नहीं, हर मनुष्य के साथ बनता है। बुजुर्ग अपने अनुभव से टोक कर ही तो बच्चों को सिखाते हैं। तेरे सामने कोई गलतियाँ करे तो तू सिखाएगी या नहीं?” (प्रेम से समझाती हुई बोली।)

स्वर्णलता - “सिखाऊँगी, …पर प्यार से।”

श्रीरत्ना - “बस, इस ही तरह तेरी सासू माँ भी तुझे प्यार से सिखाती हैं।”

स्वर्णलता - “प्यार से? मुझे तो उसकी शक्ल ही अच्छी नहीं लगती है। …दूर से ही अच्छी लगती है वह, …अंदर से पापिन है, पापिन! …पानी के जीवों पर दया दिखाती है और मुझ संज्ञी पंचेंद्रिय जीव पर निर्दयी है…।” उखड़ गई स्वर्णलता।

वह कहने लगी - “आदमी अपने आपको समझते क्या हैं? मुझे ‘दो कोड़ी’ की औरत कहते हैं।”

श्रीरत्ना - “कितनी बार कहा?”

स्वर्णलता - “एक बार, …परन्तु दिल की बात कभी-कभी ही तो निकलती है…। जरूर मन में पाप होगा। (रुआँसी हो गई) मैं कहीं आ-जा नहीं सकती, …खुद कहीं भी आयेंगे-जायेंगे।”

श्रीरत्ना - “पुरुषों की जिम्मेदारी पृथक् प्रकार की होती है, बेटी! …हमारा प्रयोजन तो घर-परिवार देखने का ही है न? …इसमें पुरुषगण हस्तक्षेप नहीं करते हैं। विवाह के समय हमने वचन दिया था कि गुरुजन की आज्ञा के बिना मेले-ठेले या भीड़-भाड़ के स्थान पर आना-जाना नहीं है।”

स्वर्णलता - मेरी बात कोई नहीं सुनता है …।"

श्रीरत्ना - “हमें बड़ों की बात सुननी चाहिए बेटी!”

स्वर्णलता - “आप ही सुनो …मेरी ताकत नहीं है।” स्वर्णलता झुँझलाई।

बहुत समझाने पर भी स्वर्णलता को समझ में नहीं आया कि टोकना भारत की सबसे सुन्दर संस्कृति है।
“आखिर घर तो तुम्हारा वही है, …तुम्हें वहीं जाना होगा।”
स्वर्णलता - “मैं नहीं जाऊँगी…।” वह मचलने लगी।
श्रीरत्ना - “अच्छा ठीक है, ठीक है …मेरी राजदुलारी! …तुम्हें ससुराल से कष्ट है या सासू से?”
स्वर्णलता - (सोचने लगी) “सासू से।”
श्रीरत्ना - “ठीक है! न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी…।”
स्वर्णलता - “क्या मतलब?” वह दीनता से माँ की ओर देखने लगी।
श्रीरत्ना - (रहस्यमयी मुद्रा में) "मैं तुझे जादुई जड़ी-बूटी वाले लड्डू दूँगी; …उनके सेवन से तेरी सासू धीरे-धीरे गल जाएगी …और मर जाएगी। …और तेरा नाम भी नहीं आयेगा। सब समझेंगे कि तेरी सासू सहज मौत की शिकार हो गई है। (स्वर्णलता का चेहरा खिल गया।)
श्रीरत्ना (सचेत करते हुए) - “बस, एक बात का ध्यान रखना…।”
स्वर्णलता - (उत्सुकता से) “क्या माँ?”
श्रीरत्ना - “तू उन्हें प्रसन्न करके खिलाना; …दुखी चित्त से खाने पर वह दवा काम नहीं करती है, बल्कि वह अमर हो जाएगी।”
स्वास्थ्य ठीक होने पर एक दिन माँ उसे विशिष्ट मीठे-मीठे लड्डू देकर विदा करने लगी। माँ-बेटी गले मिलीं।

श्रीरत्ना - “ध्यान रखना बेटी!” …इशारा करते हुए…
“वह बात गुप्त रहे।”
स्वर्णलता - अच्छा माँ! मैं ध्यान रखूँगी।" ..आज वह
बड़ी प्रसन्न थी।
ससुराल पहुँचने पर स्वर्णलता ने सासू के चरण छुए …आँखों
में आँसू भरकर बोली - “…माँजी! आपकी सेवा सच्चे दिल से
नहीं की, इसीलिए बीमार हो गई। …मुझे क्षमा कर दो।”
चन्द्रकान्ता - (बच्ची की तरह बहू को अंक में भर कर)
“नहीं बेटी! तेरी अभी उम्र ही क्या है? …फूल-सी कली है, …
चलो …सदा खुश रहो।”
स्वर्णलता - “माँजी! आपके लिए घर के शुद्ध लड्डू
बनाकर भेजे हैं मेरी माँ ने।” कहकर उसने सासू माँ को साथ में श्वेत
साड़ी, स्वर्ण-रत्न आदि भेंट किये।

चन्द्रकान्ता - “बेटी! मेरा तो अब सब त्याग है। तू ही अपने पास रख। हाँ, लड्डू अवश्य ग्रहण कर लूँगी। …किसी के स्नेह को ठुकरा नहीं सकती हूँ। मेरी बहन को कहना संयम-वृद्धि में सावधान रहें …हम दोनों आर्यिका-समूह के अंग बनें - ऐसी भावना सदा रहती है।”
अब रसोई घर में कमियों पर टोके जाने पर वह बुरा नहीं मानती थी। हँसकर जबाब देती, …प्रेम से भोजन कराती, …शयन-समय वैयावृत्ति करती। सासू भी उस पर विश्वास करके धीरे-धीरे उसके ही भरोसे रसोई सौंप कर निश्चिन्त हो गई। अब वह दसवीं प्रतिमा का पालन करने लगी थी।
और बहू; वह तो अब पूर्णतः निष्णात होकर पात्रों को आहारदान आदि करती। उसकी प्रसन्नता से सारे नौकर-चाकर भी उससे खुश रहने लगे। पति से बुराई करनी भी बंद हो गई …सब ओर प्रसन्नता का वातावरण बन गया। अब सब सासू को भूल गये… सब ओर बहू के आचरण की प्रशंसा होने लगी।
अचानक उसे याद आया… उसने तो सासू को मारने के लिये लड्डू दिए हैं…। “हाय!अब क्या होगा?”
वह रोने लगी… वह इस बात को किसी से कह भी नहीं सकती थी। उसने सासू को लड्डू देने बंद कर दिए। …भगवान से भावना भाने लगी …मेरी इतनी बढ़िया सासू माँ, …कभी भी उनका विरह न हो, परन्तु अब क्या होगा?
उन ही दिनों उसकी माँ उससे मिलने आई…।
श्रीरत्ना - “बेटी! तेरा स्वास्थ्य कैसा है?”

स्वर्णलता - “माँ! मैं तो ठीक हूँ, परन्तु मेरी सासू माँ?”

श्रीरत्ना - “क्या हुआ उन्हें? (घबरा कर) …क्या वह अब भी तंग करती है?”

स्वर्णलता - “नहीं माँ! वे तो देवी हैं, …अंतिम स्त्री-भव की धारिणी हैं …आपने उन्हें धीमी मौत के लड्डू देने को कहा था …अब क्या होगा? …मैं नहीं चाहती हूँ कि …उनकी देह छूट जाए।”

श्रीरत्ना - (हँसते हुए बोली)…" बेटी! चिंता न कर, …वह तो तुझे शिक्षा देने की युक्ति मात्र थी।"

स्वर्णलता - (विस्मित स्वर में, वह हाथ जोड़कर बोली)… “सच? ओह! निर्भार हुई।”

उसकी आँखों में आँसू भर आये। वह सासू के चरणों में गिर गई…।

“माँजी! मुझे आशीर्वाद दो, मैं सदा धर्मात्माओं की सेवा कर सकूँ …और मेरा भी आप जैसा अंतिम स्त्री-भव हो।”

सब ओर प्रसन्नता का वातावरण छा गया।

10. सम्यग्ज्ञान का आनन्द - खुशहाल परिवार

जगतपुरा-जयपुर में एक धार्मिक परिवार रहता था। वह संयुक्त परिवार था …परन्तु उसमें सुख ही सुख था, …दुख का नामो-निशान न था।…

ऐसा कैसे हो सकता है? भला संसार में कोई सुखी कैसे हो सकता है? फिर क्या यह बात गलत लिखी है -

“जो संसार विषैं सुख हो तो तीर्थंकर क्यों त्यागे?”…

बात तो सही है, परन्तु स्याद्वाद से…।

तीर्थंकर दुखी होकर दीक्षा कभी नहीं लेते हैं, वे पुण्य के उदय में अटके बिना, आत्म-सुख की प्रचुरता का काल पा कर, दीक्षा ले कर जाते हैं। छोड़ कर नहीं, वरन् सहज ही छूटते हुए मोक्ष में जाते हैं।

इस परिवार में संक्लेश नहीं था, …क्योंकि उनके दादाजी को चारों अनुयोगों का ज्ञान था और सबको उनका सम्मान था। …उनकी बात अर्थात् अटल रूप से विश्वसनीय, मननीय और माननीय। साता-असाता की उदयजन्य दशाओं में संक्लेश न हो, …यश-अपयश में, गरीबी-अमीरी में, मान-अमान में संक्लेश न हो, बस! इतना ही सुख यहाँ अभीष्ट है।

सच में! इतना भी कैसे सम्भव है? तो सुनिए इस परिवार की कथा। जगत कर्मोदय में कुछ भी कहे, परन्तु आत्मज्ञानी को कष्ट नहीं हो सकता है।

भिन्न बहुओं के दो बच्चे लड़ते हुए आये …दोनों रो रहे थे, …दोनों एक-दूसरे की शिकायत कर रहे थे -

“इसने मुझे धक्का दिया…।”

“इसने मुझे मारा…।”

“पहले इसने धक्का दिया…।”

“नहीं, पहले इसने मुझे मारा, …मुझे क्या धक्का देने का शौक था?”

“तो क्या मुझे मारने का शौक था?..।”

दोनों रोये जा रहे थे। दोनों को दादाजी ने गोद में बिठा लिया, …दोनों के आँसू पोंछ दिए।

“…अच्छा तुम्हें धक्का देने से कहाँ लगा? जरा बताओ तो? …तुम्हें कहाँ मारा? …ज़रा देखें तो?”

“मैं गिर जाता तो …?”

“मुझे जोर की लग जाती तो?”

…झगड़ा रुक ही नहीं रहा था।

“अच्छा, बात कुछ भी नहीं हुई। … ज़रा सोचो, …तुम दोनों एक साथ आज के बाद न खेलो तो? बात भी नहीं करो तो? ठीक रहेगा…?”

“ऐसा कैसे हो सकता है? भैया के बिना मुझे होमवर्क कौन कराएगा?”

“और मुझे गली के लड़कों से पिटने से कौन बचाएगा?”

“मैं किसके साथ खेलूँगा?..बाकी तो सब बड़े भाई-बहन हैं…।”

दादा जी - “तुम दोनों एक-दूसरे की मम्मी के पास भी नहीं जाओगे। …साथ में सोना, उठना-बैठना नहीं करोगे तो अपने आप ही कभी भी धक्का-मुक्की नहीं होगी, …फिर गिरने-लगने का डर भी नहीं रहेगा …और रोओगे भी नहीं।”

“नहीं, चाची जी मुझे मिठाई खिलाती हैं, …सुलाती हैं, …मेरी मम्मी पीटती हैं तो वे पिटने से बचाती हैं।”

“ताई जी मुझे बहुत प्यार करती हैं। …पापा जब भी मुझे डाँटते हैं तो ताईजी ही मुझे उनसे बचाती हैं।”

“फिर आगे से झगड़ा होगा तो?” दादाजी ने बच्चे बनते हुए पूछा।

“संग खेलेंगे तो झगड़ा तो होगा ही, …परन्तु हम दोनों एक-दूसरे का बुरा नहीं मानेंगे।”
“और गिर गये, …लग गई तो?” बाल सुलभ शैली में दादाजी बोले।
“अरे! लग गई तो लग गई, …ठीक हो जाएगी; …परन्तु हम एक-दूसरे के बिना थोड़े ही रह सकते हैं?”
“गिर गये तो उठ जायेंगे, …खेलना भी तो जरूरी है; …चल खेलते हैं…।”
“नहीं, …तुम फिर रोते हुए आओगे…।”
(दोनों एक साथ बोले) “तो आप हैं न, …चुप कराने के लिए।”
“और जब मैं न रहूँगा तब?”
“तब तक हम समझदार हो जायेंगे, …बड़े हो जायेंगे।… परन्तु आप कहाँ जाने वाले हैं? (प्रसन्न होकर) आप तो सदा रहेंगे।”
“सदा तो कोई नहीं रहता है।… देखो तुम्हारी दादी चली गईं मुझे छोड़ कर।”
“तो क्या हुआ? आप तो बहुत बड़े हो …आपके लिए तो मम्मी हैं, पापा हैं …और हम बच्चे भी तो हैं।”
“पता है? जब हम आपस में ही लड़ते हैं तो …हम कमज़ोर होते जाते हैं …बाहर में गंदे बच्चों के साथ खेलने पर गाली सुननी पड़ती है। वे गंदी चीजें खाते हैं, …गंदी बातें करते हैं।”

“हाँ, …चिंटू बहुत गंदी गाली बकता है। …मिंटू …लड़कियों की बातें करता है, …मुझे तो ज़रा भी अच्छा नहीं लगता है।”

“तो सोचो! …आपस में प्रेम करना अच्छी बात है या गली के बच्चों की संगति?”

“प्रेम, दादाजी! प्रेम।” …बच्चे किलक कर बोले।

“परन्तु जमाने से काम तो पड़ेगा ही न, …अतः उनको गंदा कहने की बजाय उनसे बचकर अपना काम करना चाहिए; अन्यथा वे लड़ेंगे, …मारेंगे। सबके संग रहना हमारी मजबूरी है, परन्तु हम उन जैसे बनने या करने को मजबूर नहीं हैं; …शान्ति सदा जरूरी है।”

“सही है दादाजी! आज से हम नहीं लड़ेंगे, …भैया मेरे हितैषी हैं …परन्तु एक-दूसरे को तंग करने, चिढ़ाने में मज़ा भी तो आता है, इसीलिए झगड़ा हो जाता है। मैं इनका बुरा नहीं मानूँगा।”

“मैं भी तेरा बुरा नहीं मानूँगा। …अपन संग स्कूल जाते हैं, …संग खाते हैं, …संग प्यार से खेलते भी हैं; …परन्तु कुछ न कुछ तो हो ही जाता है।”

“दादाजी! आप बचपन में नहीं झगड़ते-रोते थे?”

“खूब झगड़ते, खूब रोते थे। …हम भी दौड़ कर अपने दादाजी की गोद में चले जाते थे। उनकी गोद में जाते ही हम अभय हो जाते, फिर तो मम्मी-पापा कोई भी नहीं डाँट पाता था, मारने की तो बात ही क्या होती?..और मिलती थी मिठाई, …मीठी सौंफ।”

“अरे! …तो आप भी हमारी तरह ही, …तब ही आप भी हमें मीठी सौंफ देते हैं…।”

“लो, भाई लो।”

“क्या?” दोनों बच्चे जिज्ञासा से पूछने लगे।

“अरे! वही, दादाजी की मीठी सौंफ।”

दोनों बच्चे नन्ही हथेली आगे बढ़ाकर - “…लाओ दादाजी।”

…सब हँसने लगे …और खाते हुए खेलने चले गये।

अब आपको समझ में आया? दोनों बच्चों के मम्मी-पापा तक तो बात ही नहीं गई। जिस घर में दादाजी नहीं होते हैं, वहाँ …मम्मियों और पापाओं में झगड़े हो जाते हैं …या वे दूसरे के बच्चों को पीट देते हैं। अपने बच्चे के पक्ष में बोलने से बात बिगड़ती जाती है। यहाँ तक कि न्यारे हो जाते हैं। …और फिर बच्चे गैरों के बच्चों के बीच गलियों में खेल-कूद कर बिगड़ते जाते हैं।

एक बार की बात है…

विरले की नई-नई शादी हुई थी। बहू ने आते ही पूरा चौका सम्हाल लिया और सासू माँ को धर्मध्यान हेतु निश्चिंत कर दिया। लेकिन सास अपना प्रभुत्व मिटता देखकर कुंठित रहने लगी।

एक दिन किसी बात पर सास उखड़ गईं - “मुझे इस घर में काम करने की आजादी नहीं है…।” और रोने लगी। …कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं …और रूठकर एक कमरे में बंद हो गई।

सारे परिवार के लोग एकत्रित हो गये। …सबने स्वीकार किया…, “आइये बाहर …और आज से आपकी ही चलेगी …सब आपसे पूछकर काम करेंगे। …इतनी-सी बात है? …इसमें क्या बुरा मानने का…?”

सासू कमरे से प्रसन्न होकर बाहर निकलीं। बहू ने चरण छुए, "…चलिए मम्मीजी! आइये, आप क्या करना चाहती हैं? बताइए।

“तुमने मुझे खीर में शक्कर डालने से मना क्यों किया? मैं खीर में शक्कर डालूँगी।”

“नहीं।”…बहू अकड़ गई।

ससुर ने कहा - “…क्यों नहीं डाल सकती? …आखिर घर उनका है, …उन्होंने कैसे गृहस्थी जोड़ी है, तुम्हें पता है? …बारात के बर्तन सेंत-सम्हाल के रखे और चटके गिलास में पानी पीती रही, हर धनतेरस के दिन बिलिया, कलछी, चम्मच खरीदी हैं; तब जाकर आज घर सम्पन्न हुआ है। …25 वर्ष तक साड़ी तक नहीं खरीदी, ताकि जब बहू आये, तब सम्पन्नता हो जाए। स्वयं ने गहने नहीं पहने, ताकि तुम्हें शादी में चढ़ा सके।”

(सासू प्रसन्न हो रही थी …वह गदगद हो रही थी… कोई तो है जो उसे घर का श्रेय दे रहा है।)

विरले बोला - “तुम मना क्यों कर रही हो?..इतनी-सी बात पर मम्मी फिर रूठ जायेंगी।”

उत्तर में एक कटोरी में खीर लेकर आ गई बहू, “…लीजिए मम्मी जी, आप इसे चखियेगा…।”

सासू ने खीर चखी - “… अरे! यह तो मीठी है।”

बहू ने शक्कर दी और खीर की तपेली। “…लीजिए, अब डालिए शक्कर।”

“नहीं …बेटा! …यह तो बढ़िया खीर बनी है।”

“तो किशमिश डाल दीजिए।”

“नहीं …पर्याप्त है। …घर का बजट थोड़े न बिगाड़ना है।”
ससुर बोले - “भाई! कुछ तो डाल दो…, आपका घर है …अब आपकी चल रही है तो आप चला नहीं रही हैं।”
“क्या डाल दूँ?..केसर, ड्राई फ्रूट, इलायची सब कुछ ठीक डाला गया है; …विश्वास न हो तो चख कर देखो।” सासू ने भोलेपन से कहा।
“तो आज से तुम्हारी घर में कैसे चलेगी?”
“अब मुझे चलाने की जरूरत नहीं है; …इस घर में श्रेष्ठ की चलेगी …वह मैं भी हो सकती हूँ और बहू भी। अब मैं निश्चिंत होकर धर्म-ध्यान करूँगी। …बहू होशियार है …और मुझे इस पर गर्व है…।”
ससुर बीच में टोककर - (कृत्रिम रूप से चिढ़कर) “खामख्वा घर को सिर पर उठाने से क्या मिला?”

बहू - (मुस्कुराते हुए) …मिला न, …मम्मी का प्यार भरा विश्वास।"
सासू - “यह सब मैं अकेले में रात को आप को ही नहीं सुनाना चाहती थी, …अतः सबके सामने मेरा निर्णय सुना दिया…। अब मैं शांति से धर्मध्यान… समाधि करूँगी।”
ससुर मुस्कुराये - “…अशांति के रास्ते से शांति की वार्ता …वाह! क्या बात है। …मैं तो तुम्हें देखते ही समाधि में चला जाता हूँ।”
सब ही खिलखिला कर हँस पड़े।
कहो …कैसा लगा इस घर का माहौल?
गुस्से में बोलने वाले से बात नहीं करना - यह इस घर का नियम ही बन गया है। थोड़ी देर में गुस्सा शांत होने के बाद उससे सभी हँसकर बातें करते हैं, …उसे गले लगा लेते हैं, …उसके खाने-पीने का विशेष ध्यान रखते हैं। …ऐसी आत्मीयता पाकर वह शर्मिंदा हो जाता है, …क्षमा माँग लेता है …अथवा तो स्पष्टीकरण कर देता है। सत्य का आदर सभी करते हैं।
वचन तो उसके बोलने वाले की योग्यता के परिचायक होते हैं। अतः जिसके बारे में कहा गया हो, उसका प्रमाण-पत्र न माना जाए। क्रोध अंधा होता है अर्थात् उसमें हेय-उपादेय को समझने की ताकत नहीं होती है। वह उस समय जो कुछ भी बोलता है, वह एक नंबर का झूठ ही होता है। अतः उस वचन को सच्चा मानकर दुखी होने की आवश्यकता नहीं हैं। इससे बात का बतंगड़ नहीं बनता है।
सत्य बात समझ में आने पर सारा परिवार सहजता से स्वीकार कर लेता है …किसी भी प्रकार का दुराग्रह, हठाग्रह नहीं रहने से सभी आनन्द में रहते हैं। छोटे-से-छोटे बच्चे का सुझाव भी आदर से सुना जाता है, सही हो तो माना भी जाता है; और इसके बदले में उसकी विचार-शक्ति की प्रशंसा भी की जाती है। इससे बच्चे बड़े विचारशील बनते जाते हैं। उनकी युक्ति, शक्ति, विचार-शैली का कमजोर होने पर भी स्वागत किया जाता है। इससे उसे बुरा नहीं लगता। वह नये अंदाज सीखता है। मानसिक उन्नति का यह सबसे सस्ता, सरल साधन है।

क्रोधावस्था की योग्यता सत्य बोलने की न होने पर भी, वह झूठ नहीं कह रहा है; क्योंकि वह स्वयं की दुखरूप योग्यता का परिचय दे रहा है। और उसकी पीड़ा को समझने की सभी लोग आत्मीयतापूर्वक कोशिश करते हैं। …करुणा से अच्छे वचन ही निकलेंगे; इससे सम्बन्ध बिगड़ने नहीं पाते हैं। पीड़ा की अभिव्यक्ति करने से अवसाद नहीं होता, गम्भीर रोग नहीं होते हैं …और आत्महत्या जैसे कृत्य घर में नहीं घटते हैं। अतः बहुओं को भी अपनी पीड़ा व्यक्त करने को मंच मिलता है। वे भड़ास रजिस्टर में लिखकर अपना मन हल्का कर सकती हैं, …उसका बुरा कोई नहीं मानता है। सब उस पर अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं।

एक बार विरले की बहू ने बड़े गुस्से में लिखा था - “… यह घर नरक है, …मैं यहाँ नहीं जी सकती हूँ। …यहाँ कोई किसी की नहीं सुनता है …।”

देवर चंचल ने लिखा - “…आप सबकी सुनकर आज ही स्वर्ग का उद्घाटन कर दीजिएगा।”

ससुर ने लिखा - “मैं तो सुनने तैयार हूँ, …यदि न सुना हो तो सॉरी…।”

आठ वर्षीय टिंकू ने लिखा - “…आत्मा के मरने की व्यवस्था ही नहीं है… हा हा हा…आप ही तो घर की आत्मा हो।”

बारह वर्षीय पिंकी लिखती है - ‘जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि’…मैं तो इस घर को छोड़कर ससुराल भी नहीं जाऊँगी, …मैं तो आपकी गोद में मरना भी पसंद करूँगी। मेरी प्यारी आंटी…।"

जेठानी सुशीला ने लिखा - “सारे घर की जान हो…।”

पति विरले ने लिखा - “परिवार फूल है तो आप खुशबू।”

अंत में विरले की बहू ने लिखा- “…क्षमा कीजिए, …मैं तीव्र क्रोध में थी। …मेरा प्यारा स्वर्ग! …लाख-लाख धन्यवाद।”

अब आप बताइए, …झगड़ा बढ़ा भी नहीं …और प्यार को सिंचन मिल गया।

परिवार में सबको अपनी समझ एवं भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए। यही पारदर्शिता बड़ी हितकारी होती है।

वचन किसी की अज्ञानता का परिचय भी दे सकता है। अतः वचन सुनते ही क्रोध करना या विश्वास करना नादानी है। ऐसी दशा में करुणापूर्वक उसकी अज्ञानता दूर करने लायक है। इस समय धैर्य ही एक मात्र उपचार है, अवलम्बन है। समय पाकर अज्ञानता दूर होते ही सम्बन्ध में मधुरता बढ़ जाती है।

जैसे - यदि बच्चे कहें कि ‘उन्हें कोई प्यार नहीं करता’ तो उसे प्यार की समझ कराने की आवश्यकता है। …जो प्यार करते हैं, वे गलतियाँ बर्दाश्त नहीं करते, …हितैषी दंड भी देते हैं। …गलती या दंड से प्यार नहीं, तुम्हारे हित से प्यार किया जाता है। …सुधरने का रास्ता टोकना ही है, …टोकने का बुरा मानना ही हमारा अहित है। …देखो, हम भी टोके जाते हैं, …पापा-दादा भी तो कल टोके गये थे। …कोई घर से बाहर का टोके, …उससे तो अच्छा है कि घर के अंदर ही टोक दिए जायें। …जो कभी नहीं टोके जाते, वे अत्यंत रोगी होते हैं, …दुखी होते हैं, …दरिद्र होते हैं, …या फिर मरण को प्राप्त हो जाते हैं, …घायल हो जाते हैं या जेल चले जाते हैं। …टोकने से जीवन में सप्त व्यसन नहीं आ पाते हैं। …सोचो, पड़ोसी जैसे पापा होते जो दारू पीकर अपनी पत्नी एवं बच्चों को गुस्से में पीटता है तो कैसा लगता? …ओह! सच है, मेरे अच्छे पापा! गालियाँ नहीं देने वाले पेरेंट्स किसे अच्छे नहीं लगेंगे?

कई बार हमें झूठ अच्छा भी लगता है… खासतौर से तब, जब वह हमारी प्रशंसा के गीत गा रहा हो और वह भी वह बढ़ा-चढ़ाकर। बुराई यदि द्वेष पैदा करती है तो प्रशंसा राग। दोनों दशाओं में अज्ञान दुखदायक होता है। नाव में छिद्र होने पर डूबने जैसा है …साम्य भाव का तो एकदम अभाव ही है।
अतः कोई दानी या कंजूस कह दे तो घबराओ नहीं, …उसके कहने मात्र से हम दानी या कंजूस नहीं हो सकते हैं। उसके सोचने का ढंग किसी को भी दुखी नहीं कर सकता है। वह दुखी है, इसलिए इस तरह कह रहा है।
आपसे धन-दान की आशा होगी, …ऐसे लोग एकांत में मिलते हैं, …क्योंकि हो सकता है - अन्य के सामने, जिनमें आपका बेटा या बहू अथवा तो पत्नी भी हो सकती है, उनकी दाल न गले। …ऐसे लोग आपको कर्ण कह सकते हैं, …दानवीर कह सकते हैं, …भामाशाह कह सकते हैं। ‘…अपने हाथों पुण्य कमा लो’, ‘…खून-पसीने की गाढ़ी कमाई बच्चे भोगों में उड़ा देंगे तो पाप का फल तो आपको नरक में अकेले भोगना पड़ेगा’, ‘…दान का इतिहास बनेगा’, ‘…लोग सदियों तक याद करेंगे’ - ऐसे उपदेश विविध प्रकार के हो सकते हैं…।
ऐसे लोग दान न पाकर असलीयत पर भी उतर आते हैं, …कंजूस, मक्खीचूस कह सकते हैं। …और भी बहुत कुछ हो सकता है उनके खजाने में, जो वे कह सकते हैं …।
एक विद्वान दादाजी के पास आकर उनकी प्रशंसा करने लगा - “आप तो देवता हैं।”
“नहीं, …मैं तो गलतियों का पिंड आदमी ही हूँ।”
“अरे! यही सरलता तो आपको देवता सिद्ध कर देती है, …इतनी अधिक …सर …।”

“भाई! सरल कहाँ हूँ?..सरल होता तो दीक्षा ही न ले लेता?”

“समाज में सभी आपकी बात मानते हैं, …सब जगह आपकी ही चलती है।”

“मेरे परिणामों में मेरे ज्ञान की ही नहीं चलती है।”

“आप उदार हैं।”

“उनसे पूछो जिनके काम मैं नहीं कर सका, न ही करा सका।”

“आप बड़े शांत है।”

“संत बिना शांत कौन? भव के अंत बिना शान्ति कैसी।”

“आपके परिवार को लोग आदर्श कहते हैं।”

“पुण्य के उदय में अंतर होने से ऐसा कहे जाने का आश्चर्य नहीं है। हैं तो सब संसारी ही न! हिलमिल कर रहना तो मानवता है; …परन्तु धार्मिकता की तो बात ही अलग है। धर्म तो व्यक्तिगत चीज है।”

“आपकी दूर-दृष्टि समाज में प्रसिद्ध है, …सब आपके गुणों के कायल हैं।”

“सुभग नामकर्म के उदय में ऐसा होता है। …दुर्भग नामकर्म का उदय हो तो पुराण पुरुषों के पवित्र होने पर भी निंदा हो सकती है। मैं तो अपने दोष देख सकूँ और सिद्ध भगवान का लक्ष्य याद रख सकूँ …इतनी ही भावना से अपने को सफल मानूँगा।”

“आपसे बात करके अच्छा लगता है।”

“आप अपने-आपसे बात करो तो मौन आपको सर्वोत्तम आनन्द देगा।”

“तो मैं अब निकलता हूँ।”

“निकले तो अभी थे, …अब तो वापस फँस रहे हो। …निकलने वाले तो मोक्ष में चले गये।”

“आपसे कोई जीत नहीं सकता है।”

“वस्तु-स्वभाव में हार को स्थान नहीं है।”

“यह बात आप सब को समझा दो न?”

“जो समझना चाहेंगे उनको निमित्त हो सकता हूँ।”

“अपन तो कुछ नहीं समझते।”

(मुस्कुराते हुए) “मुझे क्यों लपेट रहे हो?”

“हाँ, मेरा आशय था - मैं कुछ नहीं समझता।”

“समझ के (ज्ञान के) पिंड होकर भी?.. नासमझी भ्रान्ति मात्र है। …शान्ति से अपना मूल्यांकन करो, …भगवान आत्मा का किसी ने कुछ भी नहीं बिगाड़ा है। …मिथ्यात्व में भी दम नहीं कि वह आत्मा के स्वरूप को विपरीत कर दे।”

“आपको कैसे प्रसन्न करें?”

“सम्यग्ज्ञान से प्रसन्न जीव को प्रसन्न करने की आवश्यकता क्या है?”

“आप तो श्रावकोत्तम हैं।”

“श्रावकोत्तम तो पूज्य ऐलक महाराज हैं।”

“आप तो दान-शिरोमणि हैं।”

“दान-शिरोमणि तो अर्हन्त परमात्मा हैं।”

“आप अवश्य ही भगवान बनेंगे।”

“आत्म-भगवान पर मुग्ध परिणति को अब क्या शेष रहा?”

“अब तो कुछ बोलने को शेष ही न रहा।”

“और सुनने को भी, …मौन ही मार्ग है।”

(प्रणाम करते हुए) “…आभार; …आपकी तो हर बात से आनन्द बरसता है।”

अब आप समझ गये होंगे - स्याद्वाद-युक्त ज्ञान कैसे सुख देने में समर्थ है। अतः स्याद्वाद का अभ्यास करो और जग में जब तक रहने का योग है, सुख-शान्ति से रहो, क्लेश से नहीं; यही सतत समाधि है।

सबसे पहले मन खुश होना चाहिए

शादी के बाद एकदम से अपेक्षाएँ न रखें, बल्कि एक-दूसरे को समझने का प्रयास करते रहें। व्यवहार देखने से अच्छा है कि उसके हृदय को देखो। यदि वह प्रसन्न नहीं है तो सबसे पहले उसकी अप्रसन्नता का समाधान करो; अन्यथा उसके आचरण से आपको कष्ट होता ही रहेगा और क्रिया-प्रतिक्रिया का एक लंबा सिलसिला चल पड़ेगा, जिससे सभी के मन दुखी होंगे। यह बात केवल जीवनसाथी ही नहीं, बल्कि माता-पिता, भाई-बहन और मित्र - सभी के संदर्भ में समझनी चाहिए। अप्रसन्नता ही तो शोषण है अर्थात् सबसे पहले मन खुश होना चाहिए।

11. समझ से समाधान - दश हजार में

सेठानी मनफूला एक दिन वन में श्री गुणाकर मुनिराज के चरणों में दर्शनार्थ गई। …वन्दन-श्रवण के बाद उसने अपनी होने वाली पुत्रवधू के लिए आशीर्वाद माँगा।

उसके बेटे सुकांत का विवाह एक सुकोमल कन्या कमला से होने वाला था। …उसे घर का काम-काज बिलकुल नहीं आता था। हर घर में सास-बहू का क्लेश उसने सुन रखा था, अतः डरती थी।

मुनिराज उसके मन की पीड़ा को समझ गये - “तुम सदा प्रसन्न रहना।”

मनफूला के मन की बात मुख पर निकल ही आई - “कैसे प्रसन्न रहूँ? …उसे कुछ काम-धाम आता ही नहीं है। उसने मेरी नहीं सुनी तो? उसकी सुन्दरता के कारण घर में नातेदारों का आना-जाना भी बढ़ेगा …मेरा काम भी बढ़ेगा…।”

गुणाकर मुनि - “उसे सिखाना नहीं, प्यार ही करना।”

मनफूला - “परन्तु मैं उसे नहीं सिखाऊँगी तो वह काम कैसे सीखेगी? मैं ही दासी बनकर रह जाऊँगी।”

गुणाकर मुनि - “यदि दश हजार रुपयों में वह सब कुछ सीख जाए तो? …तुम्हारी प्रशंसक बन जाए तो? …तुम्हारी प्रेम से सेवा-समाधि कराये तो?” …गुणाकर मुनि ने उत्सुकता जगाते हुए कहा।

मनफूला - “मैं तैयार हूँ …सस्ता सौदा है। दश हजार रुपयों के व्यय से करोड़ों की सम्पदा सुरक्षित रहेगी एवं भवों-भव सुधर जायेंगे। मुझे क्या करना है स्वामी? आज्ञा कीजिए …।”

गुणाकर मुनि - “एक नियम ले लो …कि वह दश हजार रुपयों तक हानि कर दे, तब तक तुम मुस्कुराओगी।”

मनफूला (प्रसन्नतापूर्वक) - “…प्रणाम प्रभो! मैं आपकी बात का ध्यान रखूँगी। …मैं उसे तब तक बिलकुल भी नहीं डाँटूँगी।”

समय पर सुकांत का कमला से विवाह हुआ। …वह पढ़ी-लिखी थी, …व्यवहार-कुशल थी, …सबका हृदय जीतने में समर्थ थी। सासू माँ से वह डरती थी। …उसने डरते-डरते कहा - “माँ जी, …मुझे कुछ काम नहीं आता है।”

मनफूला - “कोई बात नहीं बेटा!” (प्रेम से अंक में भरते हुए) भला इस भोलेपन पर कौन न रीझ जायेगा। “तुझे कुछ करने की क्या आवश्यकता है? …मैं हूँ न! तू तो बस शान्ति से देखा कर।”
माँ सारे काम करती, …उसे संकोच होता तो वह भी कराने का प्रयास करने लगी।
मनफूला - “ठहरो बेटा! आप ससुरजी को भोजन परोस दो, …सब तैयार रखा है; लो…।”
कमला - “हाँ, यह काम तो सरल है; …यह तो मैं कर सकती हूँ।” प्रसन्न हो कर बहू बोली।
"जैसे ही उसने दाल परोसी …कलछी से कटोरी में डालते समय …थाली के बाहर एवं तपेली के बीच रास्ते में ढुलती गई…। यह देखकर एक पल को तो सासू को गुस्सा आ गया, फिर प्रतिज्ञा की याद आई। उसने एक कागज रसोई घर में चिपका लिया। उस पर दिनांक 5 जून के सामने लिख दिया - 25 पैसे। … दाल के छींटे से ससुर की धोती पर हल्दी के निशाना बन गये। वे प्रसन्न होकर बोले… “देखो! मेरी बिटिया ने मुझे हल्दी लगा दी। …इससे मेरा हृदय का रिश्ता पक्का हो गया।”
…सब हँसने लगे। बहू झेंप गई, …उसने क्षमा माँगी। …ससुर ने कहा - “कोई बात नहीं बेटा!”
बहू को लगा - वह स्वर्ग में आ गई है, …यहाँ कोई डाँटता नहीं है …कोई टोकता नहीं है।
वह परिवार में धड़कते दिल से रहती… दिनों-दिन उसे अपने आप में जो गर्व था, वह जाता रहा…।

एक दिन की बात है - कमला मन ही मन सोच रही थी - “एक भी तो काम नहीं सीखा मैंने …बातों के काम से तो पेट नहीं भरता ? …और पेट नहीं भरता तो सम्बन्ध मधुर कैसे हो सकते हैं ?”

…इतने में ही उसने क्रॉकरी सैट उठाकर रखने की कोशिश की। जमीन पर पानी पड़ा था। जल्दबाजी उम्र की विशेषता थी, सो फिसलने में देर न लगी। …धड़ाम से गिरी तो जापानी गोल्डन पॉलिश वाला, पाँच सौ मूल्य का सैट चूर-चूर हो गया। …सासू को गुस्सा आ गया, …परन्तु प्रतिज्ञा ने बचा लिया। “…बेटे! चोट तो नहीं लगी ? …ज़रा दिखा तो ? घबराओ नहीं, जाकर थोड़ा आराम करो।” थोड़ी देर बाद …हल्दी का दूध घी डालकर पिलाया।

कमला - “माँजी! मुझे माफ़ करो …मेरी नादानी से कितनी हानि हो रही है …।” (रोने लगी)

मनफूला - “बेटे! हानि तो तब होती, जब तेरा दिल टूट जाता। …तू सुकोमल कली है, …तू स्वस्थ है तो सब धन है, हमारे
घर में पैसे की नहीं, परिणामों की या कहो प्रसन्नता की रक्षा की
जाती है।”

कमला आँखें फाड़ कर सुनती रह गई… “आप को क्रोध
नहीं आता, माँजी?”

मनफूला - “गलत बात पर आता है न, जब तेरी उसमें
कोई गलती ही नहीं है तो गुस्सा कैसे आएगा? तेरे स्थान पर मैं
होती तो मैं भी तो गिर सकती थी। …तुझे चोट नहीं आई, इसकी
प्रसन्नता है। तुम्हें देखकर मेरी बेटी चंचला की याद आ जाती है।
बड़ी प्यारी-सी गुड़िया थी… ससुराल वालों ने उसे… (आँखों में
आँसू भरकर) किसी का कोई दोष नहीं…। सब होनहार में ही
निमित्त होते हैं… इतनी-सी ही आयु लेकर आई थी वह।”

कमला - “(सहानुभूति से) दीदी कैसी लगती थीं?”

मनफूला - “बिलकुल तेरे जैसी अल्हड़… मन की साफ़…
अब अनुभव तो समय से ही आता है न।”

कमला - “मुझे भले ही चोट लग जाती, परन्तु क्रॉकरी सैट
नहीं टूटना चाहिए था…। आप कितने जतन से, कितने चाव से
जापान से लाई थीं।”

मनफूला - पगली! (चुहल करते हुए) “अच्छा! तो मुझे
परेशान करने में तुझे मज़ा आता है।”

कमला - “नहीं माँजी!”

मनफूला - “तो बता …हड्डी टूट जाती तो तीन माह को
प्लास्टर लगता, पाँच हजार रुपये लगते। …घर में सब तुम्हें देखने आते …सो और बीस हजार खर्च होते। आने वालों का व्यय होता, वह अलग। मैं अकेले ही परेशान होती रहती, …कहाँ-कहाँ न दौड़ना पड़ता? तुझे सारे जीवन भर को कष्ट होता, …बरसात में बिजली चमकते समय तुझे दर्द होता। …अब बता, पाँच सौ रुपयों का वह क्रॉकरी सैट टूटा उसमें क्या हानि हुई, जिसमें हम स्वयं कभी खाते-पीते नहीं हैं। …मात्र दूसरों को खिलाते-पिलाते थे, दिखावे के लिए… और हम तो मात्र मान का ही भोग करते थे। उनके भाग्य से भी इसका क्या लेना-देना? …वे तो खाते-पीते हैं …बर्तन थोड़े न देखते हैं? …हमारी झूठी कल्पना अस्त हुई। …मुझे तो लाभ ही लाभ हुआ। चल, आराम कर ले …कुछ दुर्विकल्प की आवश्यकता नहीं है।”

आराम करते समय उसे निद्रा नहीं, शर्म आ रही थी।

“अन्य किसी से तो कोई हानि नहीं हो रही है! मुझसे ही क्यों हो रही है?..देखकर काम क्यों नहीं कर पा रही हूँ?..ओह! अभ्यास नहीं है…।”

सासू माँ ने दीवार पर लगे कागज पर लिखा -18 जुलाई 500 रुपये।

डेढ़ माह में मात्र 500.25 रु. की हानि…।

परन्तु इस समय तक वह बहुत सावधानी सीख चुकी थी। …कपड़े निचोड़ना देखने एवं सहयोग की भावना के कारण उसे भी कपड़े कस कर निचोड़ना आ गया था। इससे उसकी कलाइयाँ, हड्डियों के जोड़ व मांसपेशियाँ मजबूत हो गयीं। …हालाँकि शुरुआत में तो उसकी हथेलियों में खून उभर आया था …हस्त-कमल लाल-गुलाबी कमल की उपमा को सार्थक कर रहे थे।

पीहर में सब उत्सव मनाने लगे थे। …सासू माँ अच्छी मिली, मानो सारा संसार हरा-भरा। …घर-घर प्रशंसा के गीत गाये जाने लगे। …मोबाइल पर मैसेज उनके सम्मान को बढ़ा रहे थे।

बहू ने पहली बार हलवे के लिए आटा सेंका …थोड़ा कच्चा …फिर थोड़ा खैरा… फिर शक्कर ज्यादा… आखिर एक दिन हलवा बनाने में महारत हासिल हो ही गई…।

रोटियाँ भी सुधरने लगी थीं। …अब मिलने वाली प्रशंसा उसे सक्रिय कर रही थी…।

एक दिन प्रेस करते समय कपड़ा जल गया। सासू ने लिखा - 75 रुपये। …एक साबुन पानी में रखी रह जाने से गल गई। …सासू ने लिखा - 10 रुपये। …दूध उफन गया - 15 रुपये दूध के। …इस तरह दश हजार व्यय तो होने ही थे, …परन्तु सबसे आनन्द की बात यह थी कि सारे परिवार में एकजुटता बनी रही, …प्यार-विश्वास किंचित् भी कम नहीं हुए।

मोबाइल पर सासू की तारीफ़ के कसीदे काढ़े जा रहे थे।

इस बीच उसकी सखी सुरेखा के समाचार उसे विह्वल कर रहे थे। …वह सासू के ताने सुन-सुन कर तंग आ चुकी थी।

“…तुझे कुछ लाज-हया है या नहीं? तेरी माँ ने कुछ नहीं सिखाया? तुम्हारी उम्र में हम तो सुबह तीन बजे जागकर हाथ-चक्की से आटा-बेसन पीसते थे, घर की दालें दलते थे।”

…इधर पति उसका साथ नहीं देता था। वह माँ के खिलाफ सुनने को भी तैयार नहीं था। …वह सिरदर्द व पाचन के अभाव से, पेट खराब होने से अवसाद में चली गई। …उसे पति के सुख से अच्छा फंदे का सुख लगने लगा। …वह अपघात करने का विचार करके नदी की तरफ चली, …परन्तु बच्चे का मासूम मुख देखकर उस पर दया आ गई, …किसी तरह मरने से बची। …जैसे-तैसे पति के साथ रहने को अलग हो गई, …तो भी रोजाना बच्चे तंग कर रहे थे। …अब उन्हें चुप कराने वाला, उनके साथ खेलने वाला कोई नहीं था। …पहले चचेरों (कजिंस) के साथ खूब धमा-चौकड़ी करते थे; …तब उसे अपनी देवरानी-जेठानी के बच्चों में खोट ही खोट दिखती थी, …परन्तु अब वे ही बच्चे उन्हीं बच्चों की याद में दुबले हो रहे थे।

एक दिन उसने सुना - उसकी सासू सुरेखा की सासू को समझा रही थी -

मनफूला - “…देखो, जीव स्वभाव से ही सीखना-ग्रहण करना चाहता है …आजकल के बच्चे पढ़ाई में व्यस्त होते हैं …अतः उन्हें घर के अनुभव नहीं होते हैं …परन्तु प्यार से सब सीख जाते हैं। मैं भी नहीं सिखाती हूँ …वह अच्छे से सीख रही है …उसे बहुत काम आने लगे हैं …रोटी, हलवा, कढ़ी तो ऐसे बनाती है, जैसे मैं अपनी दादी के हाथ की खा रही होऊँ। …सफाई तो देखते ही रह जाओ। …अपन तो ठहरे बूढ़े आदमी …इन पढ़े-लिखे लोगों की बात ही अलग है। …क्या सलीका है? गजब है …!”

सुरेखा की सासू (नाक चढ़ाते हुए) - “ज्यादा तारीफ़ मत किया करो …आजकल की बहुयें सिर पर चढ़ जाती हैं”

मनफूला - “ज्यादा नहीं, मैं तो ना-कुछ कह रही हूँ …।”

सुरेखा की सासू - “ऐसे कैसे सीख गई?” तुनक कर पूछा सुरेखा की सासू ने।
मनफूला - " अरे! अपने छोटे-छोटे बच्चों को क्या हमने कभी भाषा की बारीकियाँ बताई हैं? नहीं न? …फिर वे कैसे सीख गये? …मैं खाता हूँ, मम्मी खाती हैं, बहन लड़ती है… पापा प्यार करते हैं… सूर्य निकलता है… हवा चलती है… बिना सिखाये लिंग, क्रिया, वचन सीख जाता है बच्चा। …और स्कूल की पढ़ाई-लिखाई के बिना ही वह हमारी तरह निर्दोष बोलने लगता है।"
सुरेखा की सासू - (आश्चर्य से) “हाँ, सो तो है…” “परन्तु आजकल की बहुएँ तो सीखना ही नहीं चाहती हैं।”
मनफूला - “सीखना चाहती हैं …धैर्य रखकर सिखायें तो। …हम सही आचरण करते रहें, …करुणा कम न हो, …प्रेम, विश्वास, अपनत्व बनाये रखें; …उसके हितैषी बने रहें तो वे बिना सिखाये ही सीखती जाएँगी। सिखाने में धैर्य नहीं रहता है, …यह हमारी कमजोरी है।”
सुरेखा की सासू - (अधीर होते हुए) “आखिर, कब तक धैर्य रखें?”
मनफूला - (शांत एवं गंभीर स्वर में) “जब तक उसकी योग्यता न जागे, तब तक।”
सुरेखा की सासू - (अधीर स्वर उभरा) “लेकिन इसमें तो उम्र ही निकल जाएगी?”
मनफूला - (स्मित वदन) “तो हमें करना ही क्या है? मात्र आनन्द! …सो सदा प्रसन्न रहो। …उसे एक काम सीखना होता तो सीख लेती, …जीवन पर्यन्त नये-नये कार्यों से उसे गुजरना होगा। और हाँ! समय सबसे अच्छा शिक्षक होता है। …हम भी तो एक दिन में सब कुछ नहीं सीख गये थे … और हाँ, डाँट भी तो सुनी थी सासू की।”
सुरेखा की सासू - “…मैंने तो मार तक खाई है।” (स्मृतियों में खोया स्वर उभरा।)
मनफूला - “और सासू से प्यार भी तो मिला था …दश तोला सोना चढ़ाया था, …आरती उतारी थी घर के बाहर दरवाजे पर। …बलैयाँ ली थीं, …कितना गुण-गान किया था सब रिश्तेदारों से। अपने हाथों से मैसूर-पाक बनाकर खिलाया था …गोद में लिया था।”
सुरेखा की सासू - “सही कह रही हो …मैं भी अपने को बदलने की कोशिश करूँगी… लेकिन मन नहीं मानता है।”
मनफूला - “देखो, हम तो प्रयत्न ही कर सकते हैं, उनके उदय-प्रमाण ही व्यवहार कर सकेंगे; …परन्तु उनको एवं स्वयं को निर्दोष भगवान आत्मा तो देख ही सकते हैं। जो हो रहा है, वह तो उदय-प्रमाण ही होगा।”
सुनते ही बहू की आँखों में आनन्द-समुद्र उलस आया और आँखों से अश्रुधारा बह निकली, पहली बार उसे सासू माँ का विशाल दृष्टिकोण कुछ कुछ समझ आ रहा था; क्योंकि वह तो जानती थी कि वह कितने पानी में है।
इस घटना से उसकी नजरों में सासू माँ का सम्मान पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गया।

एक बार बहू से खीर थोड़ी जल गई…।"

सब मुस्कुरा रहे थे, बोले - “खीर ही तो जली है, दिल तो नहीं।” सबने आनन्द ले-ले कर खीर खायी।

सासू बोली - “मेरे से भी तो जल सकती थी, …वस्तु की योग्यता है, उसमें कोई क्या कर सकता है?”

ससुर बोले - “जिन्हें कर्म-बंधन करना हो, वे ही खीर रूपी ज्ञेय से एवं बहू से द्वेष करें। …कर्म काटना है तो अभोक्ता-स्वभाव का आनन्द लो।”

एक बार दूध फिर उफन गया - “कोई बात नहीं बेटा! 100 ग्राम पानी मिला दे…।”

“एक किलो घी ढुल गया, …कोई बात नहीं बेटा! रोटी में थोड़ा-थोड़ा घी कम लगायेंगे, …छोंक में कम कर देंगे …घी समायोजित हो जायेगा।”

ऐसे अनेकों प्रसंग याद आते हैं, जिनमें किसी को खबर भी नहीं पड़ी …और सासू माँ ने अपनी सूझ-बूझ से सभी को संतुष्ट कर दिया। माँ क्या थी साक्षात् ढाल - सुरक्षा-कवच थीं।

परंतु एक बार खिचड़ी जलने पर पिताजी नाराज़ हो गये। …ससुर को क्रोधित होते पहली बार देखा था। …बहू भय से थर-थर काँप रही थी, …अब न जाने क्या होगा?"

उसे घबराया देखकर सासूजी बहू के पास आईं और हँसने लगीं - “…अरे!, पिताजी का प्यार नहीं समझेगी क्या?” और उनसे कहने लगीं - “अच्छा, इस घर में किसी को रहने का क्या हक है? सब घर छोड़ कर चले जायेंगे …कोई किसी की सेवा क्यों करेगा? रोबोट बुलवा लो, उससे ही गलती नहीं होगी।”

ससुर जी घबरा गये - (असमंजस में) “ऐसा क्यों बोल रही हो?”

मनफूला - "जब कोई सही काम करता है, तब कितनी प्रशंसा करते हैं सब लोग, …बोलो? …अब बोलती क्यों बंद हो गई? अरे! कर्ता से एकाध त्रुटि भी होगी, …परिवार केवल सुख में ही नहीं, दुख में भी सहभागी होता है। सब चुपचाप जली खिचड़ी-खीर भी खायेंगे… हाँ या नहीं? बोलो। "

ससुर - “जैसी आपकी आज्ञा!”

मनफूला - “मेरी नहीं, यही आगम आज्ञा है। …बाह्य वस्तुओं के आश्रय से असाता-साता का उदय नहीं कहा है, …हम जैसे परिणाम करते हैं, वैसा उदय आता है। सब भेदविज्ञान करेंगे। साधुवाद!”

सबने शांत भाव से स्वीकार किया, …यहाँ तक कि आठ वर्षीय बच्चे ने भी… वह जोर से बोला - “आप लोग वृथा ही झगड़ रहे थे …यह खिचड़ी जली कहाँ है?”

उसे सबसे ऊपर का भाग दिया गया था, अतः उसका उत्तर सही था। …सबसे नीचे का भाग सासू खाने लगी …तो बहुओं ने झपट लिया -

“…नहीं माताजी! आपको हम सारा पुण्य-बंध नहीं करने देंगे।” …और छुपाकर रखी गई, सबसे बढ़िया खिचड़ी, जो ससुर जी को दी गई थी, उसका ही अंश माँ की थाली में दिया गया।

“इस घर में पुण्य का भी अतिथि-संविभाग होता है …अकेले पुण्य-बंध करने की व्यवस्था नहीं है।”

सच पूछो तो इस घर में दश हजार रुपयों की हानि आज तक नहीं हुई…क्योंकि भेदविज्ञान की कृपा से शान्त रहने से, बीमारियाँ नहीं हुईं। सब प्रसन्न जो थे। … मुकदमा नहीं हुआ, …वकील, कोर्ट, पुलिस को एक भी पैसा नहीं देना पड़ा। फिर उस कागज का क्या हुआ, जो दीवार पर चिपकाया गया था? …उस पर हानि की एंट्री लिखना बंद कब हो गई, …खबर ही नहीं पड़ी। …कागज कब उखड़ कर उड़ गया… जब नौकरानी ने भी ध्यान नहीं दिया, तब सेठानी या अन्य किसी सदस्य को तो कैसे ज्ञात होता?

इस घर में पढ़ी-लिखी सासें अपनी बहुओं की एवं बहुयें अपनी सासों की अच्छाइयों की वीडियो वायरल करती रहती हैं। रिश्तेदारों को कभी समझौता कराने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।


प्रश्न - पति या सासू से प्यार नहीं मिलता?

समाधान - ऐसा होता नहीं है, लगता जरूर है। उसका कारण विचारो… परिवार में समय बीतने के साथ-साथ औपचारिक भाषा समाप्त होने लगती है। इसे आप प्यार की कमी नहीं, प्यार की गहराई समझें। कोई अब आपको पराया नहीं समझता है, इसलिए अच्छी-बुरी सारी बातें आपसे शेयर की जाने लगती हैं। खाने-पीने में आपको पूछा या कहा नहीं जाता है तो इसका अन्यथा अर्थ न निकालें। आपको कोई विकल्प हो तो अनुमति लेकर काम करें या खायें-पीयें-पहनें- इससे आपको मन में स्वछंदता नहीं होगी और उन्हें अच्छा भी लगेगा।

12. मनोवती की कथा

मनोवती का परिचय

किसी समय हस्तिनापुर में राजा यशोधर अपनी रानी यशोधरा के साथ राज्य करते थे। इनके राज्य में महारथ नाम का नगर-सेठ रहता था। इसकी सेठानी का नाम महासेना था। इन दोनों के सौ पुत्रों के बीच एक मनोवती नाम की गुणवान, शीलवान, प्रज्ञावान बेटी थी। इस सेठ का रत्नों, मुक्ताओं का कारोबार देश-विदेश तक होता था।

राजा के खजाने में इस सेठ के कारोबार से समुद्र-समान समृद्धि थी। देश-विदेश में यशोधर राजा एवं महारथ सेठ की ख्याति मानो अमर हो गई थी।

सेठ के परिवाररूपी सरोवर में सैकड़ों कमलों के मध्य कमलिनी समान मनोवती स्वस्थ, सुसंस्कृत, स्वाध्यायी, परम आरोग्य विज्ञान की अध्ययनशीला एवं अभ्यासी, आहार आदि चारों दानों में निष्णात, जिनशासन-प्रभावना को सदा उल्लसित रहती थी। यह तो बाहर में सब ही को दीखता था, परन्तु वह तो अंतर में शुद्धात्मा के स्वानुभव की आस्वादी थी। उसने अपने अंतिम नारी भव के कर्मों को खिपाने की तैयारी अच्छे से कर ली थी। फिर भी आर्यिका दीक्षा लेने में वह अपने को असमर्थ अनुभव रही थी। उसने शील की मर्यादाओं का पालन करने का नियम लिया हुआ था।

आचार्य सुगुप्ति भगवन के सामने उसने इंद्र-इंद्राणी के रूप में जिन-मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह कराने की अपनी अंतर-भावना प्रकट की। तब आचार्य भगवन ने उसे दर्शन-विशुद्धि प्रतिमा प्रदान की और अणुव्रतों का पालन करने की प्रेरणा की। उसने सहर्ष नियम लिया और दिनों-दिन अपने सम्यक्त्व को और भी अधिक निर्मल करने लगी।
वह विषय-भोग के पोषक कुदेवों, कुगुरुओं, कुशास्त्रों एवं उनके आयतनों से दूर रहती; यहाँ तक कि कभी उनकी प्रशंसा तक नहीं करती थी। सदा आत्म-साधकों की सत्संगति में रहती, उनकी ही वैयावृत्ति करती थी। कभी किसी की बुराइयाँ नहीं देखती और न किसी से कहती थी। साथ ही अपने (आत्मा) में भी किसी भी प्रकार की कमी नहीं देखती थी। आत्म-ध्यान के समय उसे अपने में पर्याय-जन्य अनेकों कमियाँ दिखती थीं, परन्तु वह जानती थी कि स्वाश्रय से वे सब स्वतः ही उत्पन्न होना बंद हो जायेंगी। अतः वह सावधान होकर स्वाश्रय का ही उद्यम स्मित-वदन किया करती थी।
विवाह-योग्य वय होने पर पिताजी ने उसके विवाह-योग्य वर की तलाश हेतु एक सुश्रावक श्रीमान सुधर्मप्रकाशजी को नियुक्त किया। वह देश-विदेश में विहार करता था, अणुव्रती होने से बड़ा प्रामाणिक था। वह प्रौढ़ था। कन्या के आचरण एवं व्यक्तित्व से अच्छी तरह अभिज्ञ था, वर-वधू की पात्रता को अच्छे से समझता था, समाज के सुसंगठन के महत्त्व का गंभीर ज्ञाता था, जिनशासन के भविष्य के प्रति गंभीर एवं सचिंत था।

मनोवती का बुधसेन से विवाह

अवन्ती देश के वलभीपुर नगर के धर्मात्माओं की बड़ी ख्याति थी। देश भर के लोग यहाँ आकर बसना चाहते थे; क्योंकि यहाँ आत्महित के योग्य वातावरण सदा बना रहता था। मुनि भगवंतों एवं आर्यिकाओं-साधिकाओं का सदा विहार होता रहता था। देश भर के धर्मात्मा अपनी बेटी का विवाह इस नगर में करके अपने को गौरवान्वित अनुभवते थे।

यहाँ के राजा कर्पूरतिलक अपनी दो रानियों सत्याभा एवं आभा के साथ सुख से राज्य करते थे।

इनके राज्य में एक सोमदत्त नाम का प्रसिद्ध सेठ था, जिसकी पत्नी का नाम हेमश्री था। इनके सात बेटे थे - रविसेन, चन्द्रसेन, मंगलसेन, गुणसेन, मणिसेन, महासेन व बुधसेन। अभी तक बुधसेन का विवाह नहीं हुआ था। विवाहित छह बेटों की पत्नियों के नाम क्रमशः चित्रलेखा, काममाला, गुणमाला, चन्द्रावती, सूर्यावती व मंगलावती था। बुधसेन सारे परिवार की आँखों का तारा था।

नगर के त्रैलोक्य-तिलक समान जिन-मन्दिर में एक दिवस सुधर्म प्रकाश जी विचरण करते हुए पधारे और निमन्त्रण से आहार-विहार करते हुए, अपनी मधुर वाणी से धर्म-प्रभावना करते हुए समाज को हर्षानंद से भर रहे थे।

उनकी प्रवचन सभा में सबसे आगे बुधसेन नाम का युवक बैठता था। वह बड़ा संयमी एवं स्वाध्यायी दिखा। उसकी चर्चा-वार्ता व जिज्ञासा से वे बड़े प्रभावित हुए। वे एक दिन सेठ सोमदत्त के घर पर आहार के लिए आमंत्रित हुए। बुधसेन के आग्रह से ही भोजन करना स्वीकार किया था। …घर आकर आगम-आग्रह युक्त महल एवं व्यवस्था देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई।

सेठजी ने प्रसंग पाकर उनसे अपनी चिंता व्यक्त की -“उन्हें अपने बेटे के योग्य धार्मिक कन्या कैसे मिलेगी? कहाँ मिलेगी?” तो उन्हें मनोवती का स्मरण हो आया। बोले “थोड़ा दूर तो है, परन्तु चाहो तो…”

“दूरी की कोई बात नहीं, … परन्तु धार्मिक विचार नहीं मिलेंगे तो दोनों दुखी होंगे; …और दुखी जीव दुख में ही निमित्त होते हैं।”

“बात तो सही है। एक प्रतिमाधारी कन्या है। …राज्य में उसके भजनों, तत्त्वचर्चा, पूजन एवं वैयावृत्ति की मिशाल नहीं मिलती है। और भोजन की शुद्धता, स्वादिष्टता, आरोग्य-वर्धकता एवं मितव्ययता - इन सबका एक ही भोजन में मिलना तो दुर्लभ ही होता है, परन्तु ये सारे गुण उस कन्या के बनाए भोजन में एक ही स्थान पर दिखते हैं। …ज्यादा क्या कहें? वह तो साक्षात् सरस्वती समान ही है और स्वस्थ भी है।”

“आपके मुँह घी-शक्कर …पंडित जी।” गदगद होकर सेठजी बोले।
“तो …अब मैं आपके घर में पानी भी नहीं पी सकता हूँ …क्योंकि अब मैं कन्या के पिता समान हूँ, …बुधसेन एवं उसकी माँ, भ्राता एवं भावजों को स्वीकार्य हो तो मैं उसका रिश्ता पक्का करके गौरवान्वित होऊँगा। मुझे आनन्द होगा कि इतना सुन्दर सुमेल मेरी नजरों में आज तक नहीं आया है।”
सोमदत्त - (संतुष्टि जताते हुए एक हाथ ठोड़ी पर रखकर जिज्ञासा से अपलक निहारते हुए) “कन्या एवं उसके पिता को कोई आपत्ति न हो तो।”
सुधर्म प्रकाश - (प्रफुल्लित स्वर में दोनों बाहें फैलाकर कहा) “वह तो मेरी ही बेटी समझो।”…अपनी विवाह-वार्ता सुनकर बुधसेन लजाते हुए पृथक् कक्ष में चला गया।
माता-पिता ने बुधसेन के मन की बात का इशारा समझ लिया - “आपको जो श्रेष्ठ लगे वह आप करें, उसे स्वीकार्य है।”
अंततः मनोवती का बुधसेन से सम्बन्ध नक्की हो गया। परिवार के समस्त सदस्यों में प्रसन्नता का वातावरण छा गया। बुधसेन के मन रूपी पक्षी को आशा रूपी पंख मिल गए … वे अपने जीवन-साथी के बारे में एक छवि अंकित करते, फिर ‘नहीं-नहीं’ करते हुए उसे बिगाड़ते। एक एक पल भारी हो रहा था। उसे अपने भाग्य पर भरोसा नहीं हो रहा था कि इतना धार्मिक, इतना पवित्र जीवनसाथी उसे मिलने जा रहा था। वैचारिक तूफ़ान नाना रूप बदलता रहता था। योग्य समय आने पर दोनों वैवाहिक-बंधन में बँध गये। समय पाकर सब सम्बन्धी विदा ले गये।

पिता ने मुक्ता-कोष दहेज में भेंट किये तो उन्हें अवधारण करने के स्थान पर मनोवती को चढ़ाने के भाव आये थे, परन्तु वह संकोच-वश ससुर से कैसे कहे कि जो दहेज के मुक्ता-कोष आपने खजाने में, तिजोरी में रख लिये, वे तो मुझे मेरे संकल्पानुसार जिनदर्शन-पूजन में चढ़ाने हैं।

बुधसेन से तत्त्वचर्चा एवं अपनी प्रतिमा के प्रति उनके आदर से वह कृतार्थ थी, परन्तु अपने मन की दुविधा वह उनसे भी न कह सकी।

तीन दिन तक उपवास का बहाना करके मौन रह ली… परन्तु आखिर कब तक वह यह बात ढँकी रह सकती थी? मन दुविधा में ही रहा। इस ही बीच सबसे छोटे भ्राता को भी बिना बहना के चैन न पड़ रही थी …सो मिलने चला आया।

सबने मनोवती द्वारा भोजन ग्रहण न करने की शिकायत भैया से की। एकांत में प्यारी बहना से कारण ज्ञात होने पर उसने बहन की विदा कराने का विचार सास और ससुर जी के समक्ष बड़े अनमने मन से प्रकट किया।

ससुर बोले - “बेटा! क्या भूखी-प्यासी बहू विदा की जा सकती है?”

वह चुप रह गया…।

“बेटा! ऐसे तो भैया के साथ विदा भी नहीं की जा सकती है …पहला पीहर-दर्शन अकेले भैया के साथ नहीं, इक्कीस अतिथियों के साथ होता है। सारे कुटुम्बी-इष्टजन यहाँ पधारें, …सात दिवस यहाँ रहकर आसपास के जिन-मन्दिरों, तीर्थों के दर्शन करें, …हमारे संबंधी उनका भोजन आदि द्वारा स्वागत, सुमेल घनिष्ठता प्रदर्शन करें; …अंत में जिनेन्द्र देव की महापूजा-अर्चना के बाद ही विदाई होती है। आप हमें इस तरह लज्जित न करें, …नगर में हमें सम्मान से रहने का अधिकार बना रहे, …संबंधियों में हमारी कीर्ति भंग न हो।”
“क्षमस्व …ओह! मुझसे भूल हो गई।”
“कोई बात नहीं, …वह भोजन कब-कैसे करेगी? …उसके नियमों का, शुद्धता का ज्ञान न हो तो हमें बता दो, …हम उसकी प्रतिमाओं का पालन करा देंगे। हमें बड़ा हर्ष होगा। …हमारी चूक का दंड न दो बेटा!” अनुनय की भाषा में सासू बोली।
“माताजी! वह गजमोती द्वारा प्रथम महापूजा करने के बाद ही…।”
(सहर्ष) “अरे!! बस, इतनी-सी बात? …चलो, मैं लेकर आती हूँ। …सुनो जी! कोठार से गजमुक्ता निकाल दो जी।”
सास-ससुर दोनों ने बहू के द्वारा अर्चना-पूजा एवं भोजन करने का हर्ष माना। कुछ दिनों बाद योग्य समय पर, योग्य रीति से मनोवती की विदा हो गई।

मनोवती की विदा के बाद

वल्लभी नगर के राजमहल में एक पुष्पा नाम की मालिन प्रतिदिन रानियों की सेवा के लिए आती थी। उसने जिन-मन्दिर में कीमती गजमोती देखे, परन्तु वह तो उन्हें सामान्य मोती ही समझी; तो उसने सोचा - “क्यों न इनको गजरे में गूँथ कर महारानी जी को प्रसन्न कर दूँ। कुछ पुरस्कार ही मिल जायेगा। रानी की सेवा कितने भाग्य से मिलती है। सदा मेरे परिवार को घर जैसा ही समझती हैं।…मेरी बेटी सरला के विवाह में कितनी कीमती सुनहरी गोटा वाली ओढ़नी एवं घर-गृहस्थी के बर्तन भेंट किये थे। सारी समाज एवं ससुराल उनकी मुक्त-कंठ से प्रशंसा करती रह गई थी। और प्रियम् की बहू को मुँह दिखाई में सोने के लटकन वाले चूड़ामणि दिए थे। …आज भी महिला समाज में मेरी धाक है… आखिर महारानी जी की सेवा बड़े भाग्य से ही तो मिलती है।”
बड़ी रानी सत्याभा पुष्पा के हाथों में गजरा देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। …उसने उसे एक कीमती स्वर्ण-सुराही भेंट में दे दी। पुष्पा के तो मानो भाग्य ही खुल गये …आँखें फटी की फटी रह गईं …गोल-गोल ओष्ठ खुले रह गये।
“…ओ मेरी मैया! इत्ती कीमती चीज! धन्य हैं महारानीजी! आप धन्य हैं। …हम तो आपकी सेविका ही हैं, …चरणों की धूल हैं, …आप तो दया की देवी हैं, … अरे! साक्षात् लक्ष्मीजी ही हैं।” रानी सुनकर प्रसन्न हुई…।
पुरस्कार पाकर वह चली गई, परन्तु उस ही समय चूलिका नाम की दासी, जो आभा रानी की सेविका थी; उसने इस सुन्दर गजरे को देखा। वह सोचने लगी - “मैं तो कभी भी ऐसा गजरा लाकर अपनी रानी को न दे सकूँगी। ओह! वे अवश्य मुझसे नाराज होंगी, …अब क्या करूँ?” अन्यमनस्क-सी वह छोटी रानी के कमरे में जाकर उदास हो गई।
राजा ने सारे जौहरियों को बुलाकर गजमोतियों की माँग की। तब सबने अनभिज्ञता जाहिर की। सोमदत्त भी मना करके तो आ गए, परन्तु अब क्या करें?

बुधसेन को घर से निकालना

सर्वत्र मनोवती के रूप व स्वर-माधुर्य की प्रशंसा सुनते ही ईर्ष्या का साँप जेठानियों की छाती पर लोटने लगा। करें तो क्या करें? एक ही रास्ता है - रात्रि में पतिदेव को आराम न करने देना, …उन्हें भड़काना। …आखिर अनेकों रातें इस तरह बीतीं। छहों जेठानियों ने अपने-अपने पति को रति-सुख से वंचित रखा तो जेठों की अक्ल ठिकाने आ गई। वे रोज रोतीं, …बिलखतीं, …भड़कातीं। आखिर वे यह समझाने में सफल हो ही गईं कि इस घर में मनोवती के चरण पड़ना शुभ नहीं है।

“…आते ही सास-ससुर की अवहेलना, काम कुछ करना नहीं और आते ही मनमानी करना। … भला कोई गजमोती भी चढ़ाता है? …इसने तो आते ही घर की संपत्ति को उलीचना नहीं, लुटाना ही शुरू कर दिया है। कोई कीमत है या नहीं गजमोतियों की? …बुधसेन ने आज तक केवल खाया है, अय्याशी की है, एक पैसा भी कमाया हो तो बोलो? उसे क्या अधिकार है तुम्हारी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से अर्जित गजमोतियों को मन्दिर में चढ़ाने का। एक बात हो तो कहें। …अपने घर से मुट्ठीभर गजमोती लाई है, …यहाँ कौन-से खेतों में उत्पन्न होते हैं?”

ईर्ष्या-वश उन्होंने बहाना करके सास-ससुर की सेवा करने से इनकार कर दिया, …मुस्कराकर भोजन-पानी परोसना बंद कर दिया, मुँह बनाकर देखती रहतीं; प्रसन्नचित्त से सेवा न करतीं।

हेमश्री ने जानना चाहा - “बेटी! क्या बात है? कुछ कहो तो जानें? अचानक क्या हो गया है तुम लोगों को? क्या कोई कष्ट है?”

चित्रलेखा फनक कर बोली - “कुछ नहीं, (तुनकते हुए) अब तो वही रानी सेवा करेगी, …हमें तो कुछ काम आता ही नहीं है। हम तो गरीब घर से आये हैं। हमने तो कभी कोई काम किया ही नहीं है।” (उपालम्भ पर उपालम्भ दागे जा रही थी) सुनते ही हेमश्री सन्न रह गई।

ससुर ने बहू को गजमोती चढ़ाने की अनुमति क्या दी, घर में तूफ़ान मच गया। सभी बहस करने लगे।

सारे पुत्र आक्रोश से भरे हुए थे। सास-ससुर भी आपस में बातें करते हुए तनाव में आ गये…।

हेमश्री - (गम्भीर गहरी भंगिमा सहित आँखें तरेरते हुए) “विवाह-पूर्व ही बताना चाहिए था, …आज गजमोती है; कल को हीरे, रत्न और माणिक्य चढ़ाने की जिद करने लगे तो क्या होगा? सोचा है? इसके देखादेखी अन्य बहुएँ भी ऐसी ही कोई प्रतिज्ञा कर बैठें तो क्या होगा?”

सोमदत्त - “बात तो तुम्हारी सच्ची है। …कितने पुरुषार्थ से धन आता है? …ऐसे तो नहीं खोया जा सकता है। परन्तु …धर्म में खर्च करने से तो पुण्य-बंध होता है, …अचानक कोई बहू कहे तो …मैं क्या करता? आखिर हमारी प्रतिष्ठा भी तो कोई चीज है! यदि घर से बहू बिना भोजन किये पीहर जाती तो हमारी क्या प्रतिष्ठा रह जाती? …परन्तु अब क्या करें?”

हेमश्री - “अब क्या करना है? जो हुआ, सो हुआ, …आगे की सोचो।”

सोमदत्त - (बनियाई दिखाते हुए) प्रतिदिन एक लाख रुपये के गजमोती चढ़ाएगी तो 5600 दिन में सारा धन जाता रहेगा।"

हेमश्री - “सारा परिवार चढ़ाए तो 56 दिन में सारा धन चला जायेगा।”

सोमदत्त - “क्या! लेकिन चढ़ाना ही क्यों?..सारी दुनिया अक्षत-पुंज चढ़ाती है, वही चढ़ाओ न! नयी रीति निकालो ही क्यों?”

हेमश्री - (उपेक्षा से) “ऐसे कैसे साधु जो दूर-दृष्टि बिना ऐसे अटपटे नियम दे देते हैं?”

सोमदत्त - “भले ही किसी के घर में तूफान हो, …इन्हें क्या फर्क पड़ता है?”

हेमश्री - “साधुओं को कुछ न कहो, …उन्हें क्या लेना-देना है किसी से? …यह तो नियम लेने से पूर्व स्वयं सोचने की बात है।”

सोमदत्त - “उनका वश चले तो आपको पूरी तरह परिग्रह-मुक्त ही कर दें।” (उपालंभ देते हुए)

हेमश्री - (मुख-मुद्रा गम्भीर बन गई) “वे तो वीतरागी होते हैं, …आप अपनी सामर्थ्य एवं भक्ति-प्रमाण पुंज चढ़ा सकते हैं, इससे उन्हें क्या लाभ है?”

मणिसेन - “तो फिर अब हम भी अपनी श्रद्धा-भक्ति क्यों न बढ़ावें? …एक ही क्यों? मेरी पत्नी को माणिक्य चढ़ाने से कौन रोकेगा? देखता हूँ।” (आक्रोश से भर गया)

मंगलसेन - “ओह! तुम समझते क्यों नहीं हो? क्या हम अपने को लुटाने की प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं?”
महासेन - “आप ही समझो। …एक की देखा-देखी दूसरी बहुओं को रोका तो नहीं जा सकता है।”
सोमदत्त - (विचार-मग्न हो) “तो फिर क्या करें?”
रविसेन - “एक ही रास्ता है, …वह कमावे और खर्च करे; …हमें कोई उज्र नहीं है।”
चन्द्रसेन - “परन्तु उसने तो आज तक कमाया ही नहीं है, …वह कैसे कमाएगा?”
सूर्यसेन - (उग्रता से) “तो फिर हम भी क्यों कमायें? क्या हम आपकी सन्तान नहीं हैं?”
सोमदत्त - “बेटा! आज कैसी दुविधा में डाल रहे हो? …वह हम सबका लाड़ला है, …सुकुमार है, …हम सम्पन्न हैं; उसे कमाने की क्या आवश्यकता है?”
सूर्यसेन - (लाल आँखें तरेरते हुए) “हाँ, हम सब तो लौह-पुरुष हैं, एक वह ही तो पुष्प है!” (उपालंभ के रूप में क्रोध फूट उठा।)
हेमश्री - (प्रौढ़ आँखों को फैलाते हुए) “बेटा! समझ-बूझकर बात करो, …अभी ही तो उसका विवाह हुआ है। …धीरे-धीरे वह भी सीख जायेगा। वह तुम्हारा सगा भाई है, दुश्मन नहीं।”
मंगलसेन - (सुझाव देते हुए) “तो जब तक वह न कमावे, तब तक उसकी बहू को ससुराल न लाया जाए। …वह आएगी तो गजमोती चढ़ाएगी, …तब राजा को सब ज्ञात हो जायेगा। …राजसभा में आज बोला गया आपका झूठ आपके साथ-साथ हम सबको भी ले डूबेगा।”
सोमदत्त - “राज-हठ एवं त्रिया-हठ को कौन नहीं जानता है? राजा को गुस्सा आ गया तो वह हमें देश-निकाला दे सकता है। छोटी रानी साहिबा अभी तक कोप-भवन में हैं। उन्हें जब तक गजमोतियों का हार नहीं मिलेगा, वे राजा साहब को चैन से नहीं बैठने देंगी।”
हेमश्री - (सलाह आई) “पहले हार में से तोड़ कर दो हार क्यों न बनवा दें?”
सोमदत्त - “कहना आसान है, त्रिया-हठ क्या राज-हठ से कम होता है? बड़ी रानी अपने हार को छूने भी न देंगी।”
हेमश्री - “हाय! एक स्त्री की जिद के कारण क्या से क्या हो गया?”
गुणसेन - “स्त्रियों में बुद्धि तो होती नहीं है, …उलटी-सीधी प्रतिज्ञायें कर बैठती हैं …और मर्द परेशान होते रहते हैं।”
महासेन - “मर्द तो वही होते हैं, जो अपनी बीबी को अपने काबू में रखे…।”
मणिसेन - “जैसे तुम…” (सब हँसते हैं।)
महासेन - “मेरा उपहास न करो, …मेरी पत्नी समझदार है। …उसका कहर तुम सब पर उतरे तो फिर न कहना। उस ही की सलाह है …आज निर्णय होना चाहिए, …नहीं तो हमारा हिस्सा अलग कर दो। …फिर तुम चाहे जो करो।”
सोमदत्त - (दुखी होकर) “अच्छा! बात यहाँ तक पहुँच गई है…।”

मणिसेन ने उलाहना दिया - “उसकी बात कहाँ गलत है? …जब हम सब लुट जायेंगे, फिर हिस्से में क्या आएगा? आप ही कहो, …आप एक बहू को रख लो और हम सबको अलग कर दो। आपको जो प्रिय हो उसकी सेवा लो। …उनसे सेवा करा लो … हमारी सेवा आपको चाहिए ही कहाँ?”

हेमश्री - “बच्चो! आज तुम्हें क्या हो गया है? …परिवार-जन एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते हैं …और तुम …आज पूरा घर बर्बाद करने पर तुले हुए हो। सदियों से हमारा परिवार संयुक्त परिवार रहा है। …हमारी प्रतिष्ठा एवं आन के चर्चे घर-घर में गूँजते रहते हैं।”

सूर्यसेन - “सम्पन्नता दया-दान से नहीं, कमाने से होती है। …अभी तक हम सबने खूब परिश्रम करके कमाया है, …सो चर्चे थे।… अब तो झूठे धर्म, त्याग, दर्शन, पूजन के चर्चे होंगे और एक दिन हम सब भीख माँगेंगे।”

सोमदत्त - “ध्यान रखो बेटा! दान-पूजा से आज तक कोई गरीब नहीं हुआ है। हमारी धर्मात्मा बहू के भाग्य से और हम सबके धनार्जन से घर में कोई कमी न आने पाएगी।”

मंगलसेन - (उद्धत स्वर में) “तो फिर आप हमें जाने की आज्ञा देवें, …पूज्य पिताजी!”

सोमदत्त - “बेटा! कुछ सोचने-समझने को समय दो, …अभी तो विवाह-संगीत गूँजना भी बंद नहीं हुआ है। …पूरा परिवार आनन्द में ही भरा हुआ है, …इतनी जल्दी हम कैसे बेटे को अलग कर सकते हैं?”

हेमश्री - “हल्दी, मेहँदी का रंग भी फीका नहीं हुआ और… अपने भाई के प्रति ऐसे क्रूर न बनो। शांति से सब रास्ता निकल आएगा।”

सूर्यसेन - “ठीक है, …हम सब एक सप्ताह तक शांत हैं, …(चेतावनी का स्वर गूँजा) आगे आपको रास्ता निकालना है।”

परिवार में सारी बहुओं में विवाद गहराता गया। भाई लोग अपनी पत्नी एवं सन्तानों की बातों में आकर और रिश्तेदारों द्वारा भड़काए जाने पर उग्र हो उठे। माहौल बिगड़ता देखकर फिर सभा बैठी।

हेमश्री - (बैचेनीपूर्वक) “बेटा! हम तो अपने कोख-जाए को कुछ कह नहीं सकते हैं।”

सोमदत्त - (सहज संकोच दर्शाते हुए) “हमसे तो अपने खून से कुछ कहते न बनेगा।”

मणिसेन - (व्यंग्य से स्मित स्वर में) “तो हम कह देंगे।”

हेमश्री - (घबराए स्वर में) “क्या कहोगे?”
मणिसेन - (बेलाग बोला) “यही कि बाप-कमाई से गृहस्थी नहीं चलती है, …अपने पैरों पर खड़े होना गृहस्थ की शोभा है।”
गुणसेन - “और यदि वह कहे कि मैं तो धर्म कमा रहा हूँ तो?”
चन्द्रसेन - “धर्म से आत्मा का भला हो सकता है, परन्तु गृहस्थी का क्या करें?”
सोमदत्त - “धन की कमी नहीं है, … जीवन पुण्योदय से चलता है।”
गुणसेन - “धन से पापोदय नहीं आता है, धनार्जन प्रतिभा से दीनता नहीं आती है। अतः कमाना तो आवश्यक ही है। जीवन की कठिन परीक्षा में से एक है धनार्जन, …इसमें भी अब उसे पारंगत होना चाहिए।”
हेमश्री - “कोमल, मासूम, भोला बेटा कहाँ भटकेगा?” माँ बिसूरने लगी।
मणिसेन - “हम उसे धन दे देंगे, …उसे जाने भी दो। …देशाटन से मनुष्य मजबूत होता है।”
गुणसेन - “तुम्हारे तर्क माँ की ममता को समझ में नहीं आते हैं।”
सूर्यसेन - (खीझकर) “न समझो, …(मंद स्वर में) उसे थोड़ा धन दे दो, …जिससे वह व्यापार करेगा।”
चन्द्रसेन - (उपहास करते हुए) "…व्यापार क्या करेगा?

उसे कुछ काम आता ही कहाँ है? …हाँ, कुछ दिनों में खा-पीकर अवश्य घर आ जायेगा।"
महासेन - “फिर देखना! हाथ पसारेगा, …रोयेगा, …तब हम उसे साथ देंगे; …उसे भी हमारा एहसान लगेगा।”
सोमदत्त - “हमसे तो कुछ कहते नहीं बन रहा है।”
मणिसेन - “न कहो, …लिख कर बोल दो।”
हेमश्री - (बिलखते हुए) “हाय! …नियति कैसे दिन दिखा रही है। …प्रभो! ऐसी परीक्षा न लेते, …मैं क्या करूँ? …एक तरफ मेरा धर्मात्मा बेटा एवं फूल-सी बहू है और दूसरी तरफ सारा परिवार।”
मंगलसेन - “अभी किसी को पता न लगेगा। …आप निश्चिन्त रहो, …बेटे को निकाल दो। …समाज में कह दो कि वह व्यवसाय के लिए परदेश गया है। बहू भी घर में नहीं है। … जब वह स्वयं सम्पन्न हो जायेगा, तब लेता आएगा। इस तरह गजमोती भी बच जायेंगे …और हम सब भी सुरक्षित और प्रेम से रहेंगे। जब वह घर आयेगा …तब हम उसका विरोध थोड़े न करेंगे।”
सोमदत्त - “ठीक है।”
हेमश्री - “फिर क्या कहना है?”
मणिसेन - "प्रिय बुधसेन! तुम गजमोती कमाकर अपनी बहू के साथ आओ। इससे तुम परिवार एवं समाज में सम्मान पा सकोगे। तुम सौभाग्यवान हो, इस कार्य में अवश्य सफल होओगे।

  • तुम्हारा पिता एवं भ्रातागण।"
    बुधसेन मन्दिर से घर आकर, भोजन करके पिता से मिलने कक्ष में आया तो बाहर से ही उसे पत्र थमा दिया गया। पत्र पढ़कर वह बहुत देर तक किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया। …अन्ततोगत्वा उसने अपने पिता से आशीर्वाद लिया, भाइयों से मिलनी करके आशीर्वाद लिया, भौजियों से क्षमा माँग कर, भतीजों को प्रेम करके एक जोड़ी कपड़े लेकर घर से निकल पड़ा।

भैया-भाभियाँ झरोखे से देख रहे थे, …भतीजे हाथ हिलाकर विदा दे रहे थे। …एक मासूम भतीजा दौड़ता हुआ आया और कदमों से लिपट गया…। “चाचा छोड़कर मत जाओ, …नहीं तो मुझे भी ले चलो।”

सबकी आँखों में आँसू भर आये, …तत्काल मंगलसेन आया और अपने बेटे को खींचकर अंदर ले गया।

माता-पिता - (साश्रु विगलित स्वर में) “बेटा! जाओ, ठीक से रहना। जीवित रहे तो मिलना होगा…।”

बेटा अपने माता-पिता के गले से लिपट गया। तीनों की आँखों में आँसुओं का सैलाब था। अहंकार की विजय से गर्वोन्मत्त जेठ-जेठानियों के मस्तक असमंजस मुद्रा में न रो पा रहे थे और न ही हँस पा रहे थे।
नगर से बाहर आने पर रथ पर लदे धन को उसने रथ के साथ लौटा दिया। रथ के वापस आने पर माँ रोने लगी, पिता बिलख उठे।
बुधसेन से मिले पत्र में लिखा था - “पूज्य माताजी-पिताश्री! इस धन की क्या आवश्यकता है? आपका आशीर्वादरूपी धन मुझे कभी रंकपने का अनुभव न करने देगा।”
आप कहेंगे - “आगे कैसे चलेगा?”
“मेरा समाधान यह है कि भवितव्य खचित है तो चिंता क्या? आपके पावन तात्त्विक संस्कार के प्रसाद से अभी तक भी तो मैं अपने पाप-पुण्य के उदय को ही भोग रहा था और आगे भी वही सिद्धांत मुझे निर्भार रखेगा।”
रथ छोड़ा, परन्तु भाग्य-रथ ने बुधसेन का साथ न छोड़ा … एक मित्र ने राह में पूछा - “मैं हस्तिनापुर को जा रहा हूँ … तुम्हें और कहीं न जाना हो तो मेरे साथ तीर्थयात्रा को चले चलो…” और वह सहज ही तीर्थयात्रा करने के पुण्य का भागी बन गया। रास्ते में उसे बड़ा आनन्द था…। स्वाध्याय से प्राप्त भेदविज्ञान उसे आनन्द दे रहा था। कर्मोदय के खेल को वह साक्षी-भाव से देख रहा था। उसे धन कमाना तो आता न था। मन में एक विचार आ रहा था, दूसरा जा रहा था…। कोई भी विचार स्थिर न हो पा रहा था। ऐसे में दुविधा के होने का आश्चर्य भी तो नहीं है।

दुविधा - “आगे क्या करना है?”
शांत मन - “करना क्या, होना है।”
दुविधा - “अब क्या होगा?”
शांत मन - “परिणमन से ज्यादा क्या होगा?” (होठों पर स्मित हो आया।)
दुविधा - “पत्नी को क्या बताऊँ?”
शांत मन - “झूठ बोलने से बात बिगड़ती है, सत्य बोलने-सुनने से साहस का जन्म होता है। झूठ से उत्पन्न माया स्व-पर को दुखदायी होती है।”
दुविधा - “माता-पिता, भ्राताओं के बारे में वह क्या सोचेगी?”
शांत मन - “योग्यता का परिचय ही तो देगी, …यदि अयोग्यता है तो दूर करने लायक है, पोषण करने लायक नहीं।”
दुविधा - “उसे कुछ न बताऊँ तो?”
शांत मन - “जीवन-साथी को उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।”
दुविधा - “उसके माता-पिता को समाचार मिल गया तो?”
शांत मन - “जिस बात की कभी न कभी जानकारी मिलनी ही है, वह आज ही मिल जाये तो उसमें क्या बुराई है?”
दुविधा - “न मिले तो?”
शांत मन - “अनिश्चितता में माता-पिता, भाई-बन्धु सब हैरान होंगे। इससे हम दोनों भी बदनाम होंगे। कुटुंब के साथ राज्य व देश में भी कठिनाई उत्पन्न हो सकती है। कोई भी माता-पिता अपनी बेटी-जमाता के बारे में अनिश्चितता में जीवित कैसे रह सकते हैं? खोज-बीन में अनावश्यक समय, शक्ति एवं उपयोग की बर्बादी होगी।”
रथ पर आरूढ़ होकर वह कुछ दिन में हस्तिनापुर पहुँच गया।
रात्रि में ससुराल पहुँचने पर सभी ने विशेष कुशल-क्षेम पूछी…। अंततः उसने मनोवती को सब कुछ बताते हुए उससे वहीं रहने का आग्रह किया।
मनोवती - “सुख में नहीं, दुख में स्त्री के सतीत्व की परीक्षा होती है। क्या आप मुझे परीक्षा से वंचित रखकर मुझे लोक-धर्म से भी दूर करना पसंद करेंगे? स्त्री काया का नहीं, पति की छाया का नाम होता है। मैं आपके लिए आपके निर्णयों में विघ्न स्वरूप सिद्ध नहीं होऊँगी। देखना! यदि मेरे सतीत्व एवं आपके पुरुषार्थ में पवित्रता है तो शीघ्र ही हमारा दारिद्र्य स्वतः दूर हो जायेगा। माता-पिता, भ्राता सहित मेरी बड़ी जीजियों, भतीजों-भतीजियों सहित सबका मिलन हो जायेगा।”
बुधसेन - “लेकिन तुम संग होती तो मुझे तुम्हारी सुरक्षा एवं आवास-प्रवास का विकल्प सताएगा।”
मनोवती - “यह तो आपको विवाह-पूर्व सोचना था, …अब तो आप ही मेरे पुण्य-प्रमाण रक्षक हैं। …मुझे आपसे कभी कोई शिकायत नहीं होगी। आप जो खायेंगे, उसमें से बचे अंश को मैं प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लूँगी।”

बुधसेन - (उदास आनन, शिथिल मन से) “मुझे असमंजस में न डालती तो अच्छा होता।”
मनोवती - “यह आपकी भद्रता ही है, जो आप मेरे सुख एवं हित के बारे में सोच रहे हैं। मुझे जिन-शासन का पूर्ण विश्वास है। कोई अन्याय करने में समर्थ नहीं है। धैर्य से न्याय के आनन्द में सहभागी होने दीजिए।”
बुधसेन - “आपके माता-पिता को मेरे परिवार द्वारा किया गया छल लगेगा। …विवाह के बाद अचानक इस तरह बेघर होना किसे इष्ट लगेगा?”
मनोवती - “मेरे माता-पिता दिखावटी धर्मात्मा नहीं हैं। उनको हमसे ज्यादा पुण्य-पाप का भरोसा है। मुझे सदा यही शिक्षा दी है कि अंतिम नारी-भव इच्छती हो तो उदय का दोष किसी अन्य के माथे स्वप्न में भी न देना। (पूर्ण आत्मविश्वस्त स्वर में) देखना, वे हमारे निर्णय में सदा साथ देंगे।”

बुधसेन - “मुझे तो संकोच होता है कि कैसे उनके सामने अपने परिवार का सत्य कहूँ?”

मनोवती - “परिवार का नहीं, कर्मोदय का …और वह आपका अकेले का नहीं, उसमें मेरा भी योगदान है।… (स्मित वदन) आओ, हम इस समय आनन्द से कर्मों की निर्जरा करें।”

मनोवती ने बुधसेन का हाथ अपने हाथों में थाम लिया, शेष काम अंक ने किया। …दोनों भावी-स्वप्नों में खो गये।… चन्द्रमा मुस्कराते हुए दोनों पर चाँदनी बिखेर रहा था, जो अब शरमा कर बदली में छिप गया।

अगली प्रातः प्रभाती के साथ प्रभु-स्मरण व आत्म-स्वरूप की प्रतीति का आनन्द करते हुए अपने मन की बात सभी के सामने रख दी। ससुराल में सभी ने थोड़ा समय रुककर जाने का आग्रह अवश्य किया, परन्तु ‘शुभस्य शीघ्रम्’ की उक्ति के अनुसार माता-पिता की आज्ञानुसार व्यापार करने का समर्थन किया। …ससुराल की मदद ठुकराने एवं घर-जमाता बनने के प्रस्ताव के न स्वीकारने से उनका सम्मान और भी बढ़ गया।

दोनों ने प्रातः जिन-दर्शन, पूजन, भोजन के बाद व्यापार हेतु प्रस्थान करने की अनुमति पाई। सबने सहर्ष उनकी विदा की।

बीच रास्ते से ही रथ हस्तिनापुर को लौटा दिया गया था। दोनों सामान्य वस्त्र-आभूषण में थे। …कीमती सामग्री रथ के साथ लौटा दी गई थी। अनमने मन से सारथी रथ लेकर वापस पहुँच गया। वस्त्र-आभूषण लौटाने एवं कमाने के लिए अनिश्चित स्थान की ओर बढ़ने का समाचार माता-पिता को बहुत दिनों तक रुलाता रहा।

इधर वल्लभीपुर के राजा ने गजमोती पाने का उपाय न छोड़ा था… रानी ने भी स्त्री-हठ नहीं छोड़ी थी। गुप्तचर विभाग सतर्क हो गया था। खोज-बीन चल रही थी।

“आखिर यह मोती एक ही दिन क्यों चढ़े?”

“नगर की कोई महिला एक ही दिन क्यों चढ़ाकर शांत हो जाएगी?”

“उस दिन इस नगरी में कौन महिला नई आई थी?”

“उस दिन के बाद किस महिला को नगरी में नहीं देखा गया?”

“सेठ सोमदत्त की बहू एवं बेटा दोनों अब नगरी में नहीं दिख रहे हैं। क्यों?”

मालिन एवं उसके मन्दिर में दर्शन-पूजनार्थ आने वाली महिलाओं से इन सब प्रश्नों के जवाब में यह ज्ञात हो ही गया कि मनोवती के तीन दिन तक भोजन न करने से उनके परिवार में नगर में हलचल मची हुई थी। …फिर उसके भैया के आने पर उसने बड़े ठाठ से पूजा की थी और उस ही दिन वह पीहर को रवाना कर दी गई थी। और उस ही दिन के बाद से गजमोती दिखाई नहीं दिए। …हो न हो, ये गजमोती उस ही ने चढ़ाये होंगे। …उसके बेटे को दहेज में बड़ी कीमती चीजें मिली थीं। हो सकता है गजमोती भी वही दहेज में लेकर आई हो …और उसके न होने से अब कोई गजमोती चढ़ा भी नहीं रहा है।

सेठ सोमदत्त को राजा ने बुलवाया और पूछताछ की। “…सेठ! आपका छोटा बेटा कहाँ गया?”

सोमदत्त - (संकोच से) “व्यापार करने।”

राजा - “उसके साथ कौन-कौन गया?”

सोमदत्त - “अकेला।”

राजा - “यह कैसे सम्भव है? (प्रश्नवाचक मुद्रा में देखते हुए)… हमारे नगर से कोई भी व्यापारी सार्थवाह के बिना नहीं जाता है, ताकि अनुभवियों के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में सभी व्यापारी सुरक्षित रहें।”

सोमदत्त चुप रहा।

राजा - “चुप क्यों हो?”

सोमदत्त - “उसने अकेले ही जाने की जिद की थी।” (झूठ बोलकर बचने का प्रयास किया।)

राजा - “असम्भव। …कुछ न कुछ दाल में काला है। …तुम झूठ बोले थे कि तुम्हारे पास कोई गजमोती नहीं हैं, …परन्तु तुम्हारी बहू ने गजमोती चढ़ाये थे। यह सबको ज्ञात है।” (राजा ने अँधेरे में तीर छोड़ा।)

(तीर सही दिशा में लगा।)

सोमदत्त - (घबराते हुए) “मुझे कुछ ज्ञात नहीं है…।”

राजा - “फिर झूठ? …एक झूठ को छिपाने के लिए कितने झूठ बोलोगे?”

सोमदत्त - (हताश भाव उभरा) “महाराज! आपसे झूठ बोलने का कोई सवाल ही नहीं उठता। …आपके विश्वास से बढ़कर दुनिया में गजमोती नहीं हो सकते हैं।”

राजा - “तुमने गजमोती देने के लिए मुझे इनकार तो कर दिया था, परन्तु तुम्हारे बड़े बेटे की बहू ने समाज को यह बात बताई है कि इस तरह मनोवती के आने एवं प्रतिदिन गजमोती का पुंज चढ़ाने से सारे गजमोती समाप्त हो जायेंगे …तो कंगाली आने के डर से बुधसेन को व्यापार के बहाने घर से निकाल दिया गया है।” (फिर अनुमान से तीर दे मारा और एक बार फिर तीर सही दिशा में लगा।)
सेठ पहले तो खीझ उठा और फिर लगभग बिलखते हुए कहने लगा - “महाराज! क्षमा करें, …इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। …बुढ़ापे में बेटों-बहुओं के सामने मेरी चलती नहीं है। …मैं उसे जाने से रोक न सका।”
राजा - (सारा माजरा समझते ही) “ठीक है, तुमने हमारे राज्य में पहली बार विश्वासघात किया है। …तुम्हें एक ही दंड दिया जा सकता है, …तुम हमें गजमोती दो या नहीं; …परन्तु उस पुण्यशाली बुधसेन एवं उसकी धर्मात्मा मनोवती को लाकर हमारे राज्य की शोभा लौटाओ, अन्यथा एक माह में आप सब भी इस राज्य को छोड़ कर चले जाओ।”
सेठ प्रसन्न हुआ …उसने तत्काल हस्तिनापुर एवं सारे रिश्तेदारों के नगरों में सम्पर्क किया, परन्तु …हाय, उसका कोई पता न लगा।
अब क्या करें?
परिवार के बत्तीस लोग धन लेकर राज्य छोड़कर चल पड़े। …रास्ते में पाप का उदय आ गया। …वे लुटेरों-डाकुओं द्वारा लूट लिये गए। अब तो कीमती वस्त्र तक न बचे। …डाकू धन, गजमोती एवं आभूषण तक उतार कर ले गये।
वे लोग कंगाल हो गये। …अनेक दिनों तक भूखे-प्यासे बैठे रहे, क्योंकि कोई उन पर विश्वास नहीं करता था। …बिना पूँजी, सड़क पर उतर कर कोई व्यापार करने की आदत न थी। मजदूरी ढूँढने लगे। कभी भीख माँगते …अपना देश छोड़कर अन्य देशों में भटकते फिर रहे थे।


उस समय इंद्रप्रस्थ का राजा सुकेतुवाहन था। उसकी रानी सुमुखी थी। इन सबके प्राणों से भी अधिक प्यारी सुनयना नाम की सुन्दर सुशील कन्या थी। राज्य में बड़ा न्याय, धर्म एवं शान्ति का वातावरण था। सर्वत्र भावी-सिद्धों का आहार-विहार हुआ करता था।
चलते-चलते मनोवती एवं बुधसेन इंद्रप्रस्थ पहुँच गए।

…भूख-प्यास से हाल बेहाल थे, परन्तु जिनमन्दिर को देखते ही दोनों ने मन्दिर के किनारे पर स्थित कूप पर स्नान किया एवं श्री जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक-पूजन किया, स्वाध्याय किया।

उस नगरी में एक सुदत्त श्रेष्ठी के घर में मुनि भगवंत के आहार हो रहे थे। …दोनों ने बड़ी भाव-भक्ति से उन्हें आहार दिया। साधर्मी जानकर श्रेष्ठी ने उन दोनों को भोजन करने का आग्रह किया, परन्तु मनोवती ने तो दर्श प्रतिज्ञा होने से अपने उपवास का बहाना किया और बुधसेन को आहार के लिए बैठा दिया; परन्तु बुधसेन ने भी एक शर्त लगा दी कि मैं कुछ कमाने के बाद ही आहार करूँगा, अन्यथा नहीं।

सुदत्त - “ठीक है, ठीक है। …आप भोजन ग्रहण कीजिए।”

सानन्द भोजन ग्रहण किया…।

व्यापार का प्रबंध होने लगा। …बाजार में गये तो एक घर के बाढ़ में बह जाने से उसकी मियार¹ नदी में तैरती हुई आई थी, सो एक 60 वर्षीय वृद्ध लकड़हारा रमुआ काछी उसे बेचने का प्रयास कर रहा था। परन्तु वह पुरानी, गंदी, सड़ी-सी मियार देखकर कोई खरीद ही नहीं रहा था। जलाने वाले भी उसे काटने से डर रहे थे। …जब सीधी (कटी हुई) लकड़ियाँ ही जलाने को मिल रही हों तो श्रम कौन करे? वह रुआँसा होने लगा। …उसका नदी से निकालने एवं बोझ ढोने का मूल्य भी उसे न मिला …अंततः वह उसे सस्ते दामों पर बेचने को तैयार हो गया, मियार फिर भी न बिकी।

रमुआ को उदास देखकर बुधसेन को उसके दारिद्र्य पर दया आ गई। (…उँगली से हीरे की अँगूठी उतारते हुए कहा) “जा तू यह अँगूठी ले जा और यह मियार मेरे जिन-मन्दिर के पास के आँगन में डाल आ।”
रमुआ - “इसका आप क्या करोगे?”
बुधसेन - “करना क्या है? तेरी दरिद्रता दूर करनी है। इसे बेचकर तू अमीर हो जायेगा। …आज के बाद तू मजदूरी न करना। हाँ, धर्म में अवश्य लगना।”
रमुआ - “परन्तु इतनी कीमत इस लकड़ी की नहीं है।…मैं अन्याय का धन कैसे ले सकता हूँ? …आप तो मुझे दो रुपये दे दो, बस! …इससे ज्यादा की मुझे चाह नहीं है।”
बुधसेन - “आप संतोषी हो, इसीलिए तो मैं दे रहा हूँ। …आप भगवान आत्मा हैं। …आप मुझे एवं अपने को देह से मत देखो; …पूर्व में अनंत जन्मों में आप से मेरे अनेकों नाते रहे हैं। भविष्य में आप एवं मैं सिद्धालय में मिलेंगे। …उसकी भेंट दे रहा हूँ। आप अपने बेटे की भेंट समझ कर रख लो।”
“आप इस उम्र में भी चोरी नहीं कर रहे हैं …और मैं आपको धर्मात्मा जानकर ही कुछ कर रहा हूँ।”
रमुआ - “भगवान! तेरी लाख-लाख दया! …मेरी कोई संतान नहीं थी, आज तूने देवता के वेश में मुझे ‘पिता’ शब्द सुना ही दिया।” उसकी आँखों में आँसू तैर रहे थे। “बेटे! अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।” (वह बिना रुपये लिये ही जाने लगा।)
बुधसेन - " अरे! क्या आप मुख से ही मुझे अपना बेटा कहते हो? हृदय से नहीं?"

रमुआ - (उसकी आँखें आँसुओं से तर थीं) “…नहीं बेटा!
…भगवान का दिया मेरे पास सब कुछ था, परन्तु एक संतान की आस से दुखी था। आज वह सुख मुझे मिल गया। …अब मुझे और क्या चाहिए?”
बुधसेन - “आपके घर में और कौन है?”
रमुआ - “कोई नहीं।”
बुधसेन - “तो चलो! आज से मेरे साथ रहोगे।”
रमुआ - “कहाँ?”
बुधसेन - “भगवत्-शरण में। …मेरे पास भी घर नहीं, मात्र उनकी ही पावन शरण है।”
रमुआ - “अरे! फिर यह कीमती अँगूठी आप मुझे क्यों दे रहे थे?”
बुधसेन - "दे नहीं रहा था, …व्यापार करने निकला था।

यदि मेरा पुण्य होगा तो धन सहज, स्वतः मेरे पास आ जायेगा। जैसे अभी-अभी मैंने एक पावन ‘पिता’ कमा लिया। आगे की मुझे क्या चिंता है? चलिए! आपकी बहू आपकी प्रतीक्षा कर रही है।"
दोनों धर्मशाला के आँगन में आये…।
बुधसेन - (आनन्द से पुकारते हुए) "मनो! सुनो! …देखो, आज हमारे धर्म-पिता पधारे हैं।
…सुनते ही मनो ने सिर पर पल्ला रखकर चारों ओर देखा उसे तो लकड़हारे के सिवाय कोई अन्य न दिखाई दिया।
बुधसेन - “ये हमें पिताश्री की याद को विस्मृत कराने वाले धर्म-पिता हैं। इन्हें भगवंत एवं हमारे सिवाय किसी का भरोसा नहीं है… हम इनकी वैयावृत्ति करके अपना मानव भव सार्थक करेंगे।”
उसने रमुआ का परिचय कराया तो वह उनके चरणों में झुक गई। …शीघ्र ही शीतल जल ले आई। इस सबके बीच में रमुआ ने मियार जमीन पर पटक दी। …शीतल जल के आदान-प्रदान में किसी का भी ध्यान मियार पर नहीं गया …परन्तु निवृत्त होने पर तीनों ने देखा …मियार चकनाचूर हो चुकी थी और… अरे! यह क्या? उसमें से विपुल धनराशि सहित गजमोतियों का भंडार एवं एक पत्र निकला। …उसमें लिखा था -
“शाश्वत आत्मज्ञान से भरपूर प्रियात्मन्!
मेरी विनय गंभीरता से पढ़ो,
मैंने अपने खून-पसीने की, ईमानदारी की कमाई को अपने पापी, सप्त व्यसनी पुत्रों को देने से अच्छा नदी में बहाना समझा है। …मुझे मोह न होता तो मैं इसे किसी सत्कार्य, मन्दिर-निर्माण, साधर्मी-स्थितिकरण या धर्म-प्रभावना में खर्च करता, परन्तु अपनी संतान के सुधरने की मोहपूर्ण प्रतीक्षा में मैं धन का सदुपयोग ही न कर सका। आज जिस किसी व्यक्ति को यह धन मिले - यह सब उस ही धर्मात्मा के उपभोगार्थ रहेगा। …मैं उसके सत्कर्मों की अनुमोदना से पुण्य-बंध करके जा रहा हूँ; परन्तु यदि कोई सप्त व्यसनी, भोगी, पापी व्यक्ति इस धन का उपभोग करेगा तो उसे मेरी हाय लगेगी और वह जन्म-जन्मांतरों तक दरिद्र रहेगा।
मैं तुम्हारा मोक्ष-महल में इंतजार करूँगा।”

  • सेठ विचक्षण धर्मा
    पत्र पढ़ते ही बुधसेन की आँखों में आँसू आ गये …सारा धन सम्हाल लिया। उसने फैसला किया कि यह धन मात्र जिन-मन्दिर बनाने के लिए ही प्रयोग किया जायेगा। उस समस्त धन को लेकर वह राजा के पास पहुँचा।
    बुधसेन - (निवेदन किया) “स्वामी! यह पत्र आप पढ़ लीजिए और जैसी आज्ञा हो, सो कीजिए। हमारी इच्छा एक सुन्दर जिन-मन्दिर बनवाने की है …आपकी आज्ञा हो तो आपके राज्य में योग्य स्थान पर भवोद्धारक जिन-शासन की देशना गुंजाने वाले मन्दिर का निर्माण कराना चाहते हैं।”
    राजा ने उस भरपूर धन को देखा और वह बुधसेन को देखने लगे …उन्हें बुधसेन के त्याग, उदारता, निःस्पृहता, न्यायशीलता देखकर बड़ा आनन्द हुआ। …बुधसेन का सम्पूर्ण परिचय पाकर मनोवती से मिलकर उसे अत्यंत हर्ष हुआ।
    राजा (विनीत स्वर में) - “हे देवानुप्रिय! आपको पाकर आज मुझे बड़ा आनंद हुआ है। यदि आप मुझे अनुमति दें तो मैं आपको आधा राज्य भेंट करना एवं अपनी प्रिय पुत्री सुनयना का विवाह आपसे करना चाहता हूँ।”
    बुधसेन - (स्वगत) “रहने का ठौर-ठिकाना नहीं और …विवाह?.. व्यवसाय तक तो है नहीं।” …बुधसेन असहज हो गये। …वे इसके लिए मनोदशा लेकर तो नहीं आये थे।
    मनोवती की ओर देखने लगे बुधसेन …मनोवती समझ गई। पुण्यशाली के पुण्योदय को इनकार कौन कर सकता है?
    राजा - “इन गजमोतियों पर आपका ही अधिकार है, आपकी भावनानुसार इससे जिनमन्दिर का निर्माण हो सकता है, पर उतना धन मैं स्वयं व्यय करके जिनमन्दिर बनवाऊँगा। …आपके दिशा-निर्देशानुसार जिनमन्दिर बनेगा।”
    इतने में सुनयना आकर मनोवती के चरणों में नम गई - “हे दीदी! आपकी छोटी बहन को आप दोनों के चरणों की सेवा करने की आज्ञा प्रदान कीजिए।”

मनोवती ने सुना तो तत्काल उसे गले से लगा लिया और दोनों का हस्त-मिलाप करा दिया। और कोमल हस्त कठोर हस्त से गर्म हो गया।

सभी को महल में चलने का आग्रह किया गया। राजमाता अपनी नई बेटी एवं भावी दामाद को बड़े आग्रह से लिवा ले गईं। वे तो वापस मन्दिर की शरण में ही जाना चाहते थे, …परन्तु पलक झपकते ही उनका नगण्य सामान राजमहल में आ चुका था।

मनोवती ने गजमोती चढ़ाकर दर्शन-पूजन करके अपना नियम निर्वाह किया। तीनों ने महल में सुस्वादु भोजन ग्रहण किया।

कुछ ही दिन में सुनयना और बुधसेन का विवाह हो गया।

जिन-मन्दिर निर्माण

जिन-मन्दिर का निर्माण प्रारम्भ हो गया। सर्व प्रथम कुआँ खोदा गया। …पश्चात् शुभ मुहूर्त में शिलान्यास किया गया। चिनाई में पानी छानकर ही लगाया जा रहा था। दो आदमी सम्पूर्ण समय पानी छानते ही नहीं थे, साथ ही उनके जीवों की बिलछानी इतनी सावधानी से करते थे कि एक भी जीव मरण को प्राप्त न हो।

आदमियों से काम कम कराया जाता था और धन ज्यादा दिया जाता था, परन्तु अहिंसा का पूरा ध्यान रखा जाता था। और जब जलकाय, पृथ्वीकाय का ध्यान रखा जायेगा तो मजदूरों की देह में रहने वाले शुद्धात्मा का ध्यान क्यों न रखा जायेगा?

अल्पकाल में ही इस मन्दिर के निर्माण में वरती जाने वाली उदारता, करुणा व धार्मिकता का यश दशों दिशाओं में गुंजायमान होने लगा।

विराधना का फल

वल्लभीपुर से निकले बत्तीस सदस्यों की दशा अत्यंत शोचनीय थी। कभी एक दिन, में कभी दो दिन में एक बार भोजन की व्यवस्था बनती; यहाँ तक कि झूठन तक खानी पड़ती थी। बच्चे अनाथ की तरह दूसरे बच्चों को खाते हुए देखते थे। किसी दूसरे बच्चे के हाथ से मिठाई, पूरी, रोटी का टुकड़ा जमीन पर गिरता तो वे उसे लपक लेते थे।

सदा भावना भाते - “हे प्रभो! किसी के हाथ से कुछ न कुछ गिर जाए तो उनके पुण्य का उदय आ जाए।”

बच्चों की ऐसी दशा देखकर माता-पिता को रुलाई आ जाती। …अनेक दिनों तक उन्होंने दूध-घी के दर्शन नहीं किये थे। …अग्नि उनके चूल्हे से रूठी हुई थी। …जलती गीली लकड़ी के धुएँ से झोपड़ी के साथ उनके चेहरे भी काले हो जाते थे। सच है, धर्म-धर्मात्मा से द्वेष करने का फल क्या नहीं होता है?

अजीव के प्रेम में निगोद और जीव के प्रेम से मोक्ष स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।

एक दिन आगरा में इन सबने भी इस जिन-मन्दिर के निर्माण की ख्याति सुनी और उनके भाव भी हो गये कि - “चलो, पापियों की सेवा से तो अच्छा है जिन-मन्दिर के निर्माण में अपना पसीना बहाया जाये। जीवन में हमने कुछ भी तो अच्छा नहीं किया, ऊपर से धर्मी-धर्मात्माओं का तिरस्कार और इस अजीव, वेश्या-समान चंचल धन को स्थिर समझकर पाप ही पाप किये। अपने मासूम भाई एवं संतान को ही घर से दूर कर दिया। न जाने वह कहाँ किस हाल में होगा?”

“मन्दिर-निर्माण से ही अपने जीवन में धर्म का उदय हो जाये” - इस आशा से भरे हुए चल पड़े इंद्रप्रस्थ नगरी की ओर। रास्ते में उनके परिणाम उज्ज्वल होते जा रहे थे। सच है, धर्म-मार्ग की अनुमोदना एवं पाक्षिक श्रावक होते ही पाप-कर्म पुण्य में बदलने लगते हैं। असाता कम होने लगती है और साता-पुण्य बढ़ने लगते हैं।

उसी दिन से ही उनके भोजन की अनुकूलता बनने लगी। …वे भजन, कीर्तन, तत्त्व-चर्चा करते हुए चले जा रहे थे। …रास्ते में सब उन्हें साधर्मी समझकर उनकी तीर्थ-राह को आसान बनाने के लिए स्वतः आगे आकर उनके अशन-वसन की व्यवस्था करने लगे।

उनके साथ अन्य दुखी मनुष्य भी भजन, तत्त्व-चर्चा करते हुए मन्दिर-निर्माण में अपना सौभाग्य खोजने चल पड़े। …बड़ा जुलूस-सा जहाँ से गुजरता सबके मन को मोहने लगा।

वे सब जिन-मन्दिर निर्माण के लिए जा रहे थे, सो मार्ग में लोगों ने केशरिया ध्वज उनके हाथों में थमा दिए। वे अपना आनन्द अपने साथ लिये बर्तन और तालियाँ बजा कर प्रकट कर रहे थे। सो मार्ग में खंजरी, मंजीरा व ढोलक बजाने वाले भी संगीत की तान गुंजाने लगे।

जिन-भक्ति का फल

इंद्रप्रस्थ तक आते-आते सबके भाव बदल गये। …सबने मन्दिर-निर्माण में मजदूरी का काम करना स्वीकार कर लिया और बड़ी भाव-भक्ति, लगन और ईमानदारी से काम करने से उनके जीवन में पुण्योदय आने लगा।

माता-पिता को अपनी संतान को दूर करने का बड़ा दुख था। वे निरंतर पश्चात्ताप की आग में जल रहे थे, सो संयोग से उन दोनों को महलों में रहने एवं सेवा करने का अवसर मिला। माताजी प्रतिदिन सुनयना की सेवा करती रहतीं, परन्तु एक दिन मनोवती को पारणा उत्सव के समय सुनयना के महल में आने का काम पड़ा, तब उसने गौर से बुजुर्ग दासी को देखा। …चूँकि मनोवती मात्र तीन दिन ही ससुराल में रही थी, अतः सास से ज्यादा परिचय न हो पाने से स्मरण नहीं हो रहा था। और सासू भी उम्मीद नहीं कर सकती थी कि यह मेरी बहू हो सकती है; …क्योंकि उनके अनुसार तो वह हस्तिनापुर में रहती होगी अथवा तो पति के साथ-साथ कहीं मारी-मारी फिर रही होगी। दोनों को लगा तो कि यह कोई जानी-पहचानी आवाज है, …कहीं देखा है? परन्तु ‘कहाँ देखा’ - यह याद नहीं आया। … मनोवती ने बड़े आदर से उस दासी को बुलाया और परिचय लिया। …एकान्त में बैठे-बैठे उसकी कथा सुनी। …आँखों में आँसू बह रहे थे, …समझ में आ गई सारी बातें।

सास-ससुर का परिचय

मनोवती तत्काल लौट कर अपने महल में आ गई। …रात्रि में बुधसेन के आने पर वार्ता हुई -
बुधसेन - “प्रिये! जिन-मन्दिर निर्माण में कोई कमी दिख रही है क्या? तुम आज उदास क्यों हो? सब ठीक तो चल रहा है न?”
मनोवती - "निर्माण तो ठीक चल रहा है, लेकिन कहीं गलत भी हो रहा है। (व्यथित स्वर में)
बुधसेन - (बेचैनी छा गई) “कहाँ? कब? कैसे? क्या गलत हुआ? किसने गलत किया? कुछ बताओ तो समझ में आये।”
मनोवती - “हम सुख से हैं, परन्तु हमारे माता-पिता, भ्राता-भावजों का स्मरण मुझे सताता है।”
बुधसेन - “तो तुम मिल कर आ सकती हो, हस्तिनापुर निकट ही है। …या फिर रथ भेजकर उन्हें बुलवा भी सकती हो। इसमें परेशान होने की तो कोई बात नहीं है।”

मनोवती - “नहीं स्वामी! आपको माता-पिता का कोई स्मरण नहीं देख कर दुख होता है, आपने उन तक कोई समाचार देने का प्रयास नहीं किया है और न ही उनके समाचार लेने का। …और इसमें मैं भी बराबरी से अपराधिनी हूँ।”
बुधसेन - “ओह! तुम्हारा कहना सही है, …परन्तु वे तो सर्व प्रकार से सुखी ही होंगे; अतः कोई प्रयास नहीं किया। …हाँ, विवाह आदि के प्रसंग में कुछ समाचार देने का अवसर स्मरण में नहीं रहा - यह मेरी चूक है।”
मनोवती - “आपको ज्ञात है, वे इस समय कहाँ हैं?”
बुधसेन - “नहीं!” (जिज्ञासा से देखते हुए)
मनोवती - (बिलखते हुए) “माता-पिता…”
बुधसेन - “क्या हुआ? …आप रोने क्यों लगीं?”
मनोवती - (आँसू पोंछते हुए) “…वे सब पापोदय में लुट गये। राजा के भय से सारी संपत्ति लेकर भागे तो मार्ग में डाकुओं ने सर्वस्व हर लिया। …और अब आपके मन्दिर-निर्माण में मजदूरी कर रहे हैं।”
यह सुनते ही बुधसेन अवाक् रह गये, बोले - “क्या? … यह क्या कह रही हो? …ऐसा कैसे हो सकता है?”
मनोवती - “ऐसा हो चुका है। …माँजी सुनयना की सेवा में लगी हुई हैं, …पिताजी, आपके रथ व घोड़ों आदि की देख-रेख का काम कर रहे हैं और जेठ-जेठानियाँ बच्चों सहित मजदूरी कर रहे हैं।”
बुधसेन - “कब से?”

मनोवती - “दो माह से।”

बुधसेन - "और तुमने आज बताया ?

बुधसेन कक्ष में बैचेनी से चक्कर लगाने लगे। चेहरे पर पसीना उतर आया।

मनोवती - (शांत स्वर में) “मुझे तो यह सब वृत्तान्त आज ही सुनयना के महल में पारणा-उत्सव में जाने पर ज्ञात हुआ।”

बुधसेन - (बाहर जाने को उद्यत होते हुए) “ओह! मैं अभी मिलने जाता हूँ।”

मनोवती - “रुको! ऐसे नहीं, …अभी नहीं। …अभी आप राजा हैं। …राजा के माता-पिता का सम्मान होता है। …प्रजा में माता-पिता की उदय-वश बनी चूक का उपहास न हो, इष्टजनों को दीनता न लगे, ऐसा उपाय करना चाहिए। उनकी प्रतिष्ठा एवं सम्मान ही आपका सम्मान एवं प्रतिष्ठा है।”

बुधसेन - (रो पड़ा) “ओह! समय से पहले मैं उनसे मिल भी नहीं सकता हूँ। धिक्कार है! ऐसे राज-वैभव, झूठे मान-सम्मान को, जिस कारण मैं अपने माता-पिता को देखकर भी चरण-स्पर्श नहीं कर सकता हूँ।”
मनोवती - (पीठ पर सहानुभूति भरा स्पर्श देते हुए) “यह बात आप और हम तक ही रहेगी। …मैंने सुनयना को भी नहीं बताया है।”
बुधसेन - “तुमने अच्छा किया, …परन्तु आगे क्या करूँ? यह समझ में नहीं आता है।”
मनोवती - “उन्हें मजदूरी कराना शोभा नहीं देता है। …सर्व-प्रथम उन्हें वहाँ से निकालना ठीक रहेगा।”
बुधसेन - (चिन्तित हो) “फिर वे जायेंगे कहाँ?”
मनोवती - “उनको मथुरा के महल में पहुँचा दिया जाये, …और वहाँ से दूत आकर उनके समाचार देगा, तब हम उनकी अगवानी करने को जायेंगे और बड़े ठाठ-बाट से उनका नगर-प्रवेश करायेंगे।”
बुधसेन - “उनकी त्रुटि न होने पर भी उन्हें कैसे निकाला जाए?”
मनोवती - “उनकी त्रुटि है - ‘कोमल गात’। …उन्होंने कभी शारीरिक श्रम नहीं किया है, अतः अन्य मजदूरों की तुलना में काम का बोझ उतना नहीं उठा सकते हैं। इस कारण उनको निर्माण कार्य से निकाला जायेगा।”
बुधसेन - “क्या उन्होंने मेरा नाम नहीं सुना…?”
मनोवती - “नाम सुना है, कथा भी सुनी है; परन्तु उनको लगता होगा कि ये कोई समान नाम वाले व्यक्ति होंगे। मोह के कारण अपनी संतान के पुण्य का भरोसा करना कठिन ही होता है।”
बुधसेन - “हो सकता है …एक गलती सिर उठाने में भी असमर्थ बना देती है।”
मनोवती - “यहाँ से निकलते समय उन्हें कष्ट होगा, परन्तु नगर के बाहर सराय में उन्हें निःशुल्क आहार एवं आवास की व्यवस्था मिल जाएगी। और तीन दिन बाद वहाँ से अनपेक्षित व्यक्ति-समुदाय कहकर रथ में बैठाकर मथुरा महल की जेल में भिजवा दिया जाए।”
बुधसेन - “उन पर क्या गुजरेगी? सोचा है तुमने?”
मनोवती - "हाँ …यह सब मज़बूरी है। भेजा तो उन्हें महल में जायेगा, जेल का तो मात्र कथन है। …वहाँ उन्हें राजसी वस्त्र-आभूषण और पूर्ण राजसिक सुविधायें मिलेंगी और हमारा गुप्त पत्र पिताजी के नाम रहेगा। उनके सुव्यवस्थित स्वस्थ होते ही, अलंकृत होते ही उनका दूत हमारे राजा साहब पिताजी के पास समाचार लायेगा, तब हम सब हाथी-घोड़ों व सेना द्वारा उनका सत्कार करेंगे। समधी-भेंट होगी…।
बुधसेन ने आँखों में आँसू भरकर मनोवती के दोनों हथेलियों में अपना मुख छिपा लिया - “तुमने मुझे निर्भार कर दिया, मनो! ऐसा ही होगा।”
मनोवती - “चलो, अब शयन करते हैं। कल प्रातः मुझे बत्तीस सदस्यों की अगवानी हेतु सारी तैयारी करनी है। सारे वस्त्र-आभूषण चुनने हैं।”

बुधसेन - “और उन्हें मथुरा तक पहुँचाना भी तो है।”
(पिताजी-माताजी के स्मरण में डूब गये) “क्षमा करना प्रभु! मैंने ऐसे कौन-से पाप किये थे, जिनके फल में मैंने अपने परिजनों से मजदूरी करवा ली? हाय! ऐसा दिन कभी किसी संतान को न देखना पड़े।”
मनोवती बुधसेन को बिस्तर पर लिटाकर सिर में तेल की मालिश करती है, फिर चरणों की सेवा में निमग्न हो जाती है। आत्मसंतोष-युक्त स्मित उसके मुख को अलंकृत करने लगता है।

माता-पिता आदि कुटुम्ब का मिलन

बुधसेन के परिजनों के नगर-आगमन पूर्व सम्पूर्ण इन्द्रप्रस्थ वंदनवारों से पट गया था। घर-घर में छतों पर, खिड़कियों में, जिज्ञासा एवं उल्लास से भरे नर-नारी एवं बच्चे आनन्द-उत्सव मना रहे थे। रंगोली-चौक पूरे गये। …घर-घर में आरती के थाल सजाये गये थे। …स्वागत-द्वार हर घर को अलंकृत कर रहे थे। कितने ही घरों के बाहर किमिच्छक-दान दिया जा रहा था। शहनाई, भेरी, मृदंग कर्ण को बहरा बना रहे थे।
राजसैनिक सैन्य-परिवेश में घोड़ों पर विचरण कर रहे थे। कोतवाल हर चौराहे पर व्यवस्था बना रहे थे।
नगर-वधुएँ नृत्य द्वारा प्रजा-समूह का मन मोह रही थीं। रहवासियों को लग ही नहीं रहा था कि यह वही इन्द्रप्रस्थ है, जिसमें वे रह रहे थे। आज तो यह नगरी स्वर्ग को भी तिरस्कृत कर रही थी।
सही समय पर समधी गाजते-बाजते दोनों दिशाओं से आगे बढ़ते चले आये। उनकी भेंट हुई। …मनोवती सर्व-प्रथम सास-ससुर के चरणों में नमी रह गई और पश्चात् उसने अपनी जेठानियों के चरण-स्पर्श किए। उसका ही अनुकरण सुनयना ने भी किया। सब गले मिल रहे थे।

सास-ससुर सहित समस्त परिवार ऐसा लग रहा था, मानो स्वर्ग से उतरा हो। सारी प्रजा सभी बहुओं के रूप-सौन्दर्य, धार्मिकता व उदारता के गुण-गान में निमग्न थी। मनोवती एवं बुधसेन के चेहरे पर अतीन्द्रिय आनन्द की-सी आभा छाई हुई थी। माता-पिता एवं वरिष्ठ जनों के सम्मान से किसे न संतोष होगा!

पश्चात्ताप

उत्सव समाप्त होने के बाद महल में भोजन के उपरान्त एकान्त में सारा परिवार एकत्रित होकर बैठा हुआ था।

मंगलसेन - “भाई! हम तुम्हें बुद्धू समझते थे, परन्तु तुम तो बुद्धिमान निकले।”

बुधसेन - “नहीं भाई! यह तो आप सबका दुलार-प्रेम ही था, जिससे मैं धर्म में संलग्न रहा। …मुझे आपने सांसारिक उलझनों से बचाया, तब ही तो मैं धर्म ध्यान व स्वाध्याय में लग सका था। यह सब सम्पन्नता आपकी ही कमाई हुई है।”

गुणसेन (अपराध बोध सहित) - “यह तो तुम्हारा सम्यग्ज्ञान ही है, जो हमें श्रेय दे रहे हो। वरना हमने तो तुम्हारे साथ बुरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।”

बुधसेन - “नहीं भैया! यह तो विधि का विधान था, जो मेरे साथ घटित हुआ। इसने आप सबको धर्म-मार्ग में लगने का अवसर दे दिया। मुझे तो इसका भरपूर आनन्द है।”
गुणसेन (साश्रु) - “हमने पाप किये थे, …उनका ही फल भोगा है। …तुम जैसे देवता को घर से निकाल कर हम ही घर से निकल गये।”
सोमदत्त - “सच है, बेघर करने का फल ही था यह। कंगाली के डर से हमने धन की रक्षा की, धर्म की नहीं। …और उसके फल में ही कंगाली आ गई। सारी चतुराई चालाकी ही नहीं, मूर्खता सिद्ध हुई।”
बुधसेन - “पुरानी बातें याद करने से क्या लाभ? आज हम सबका आत्मा एक है। …चलो स्वाध्याय करें।”
सोमदत्त - “बेटे! अब तो तुम ही हमारे गुरु हो।”
बुधसेन - “पिताजी! गुरु सदा गुरु ही होते हैं और संतान सदा संतान। हम तो आपके चरणों के चेरे हैं।”
हेमश्री - “हमने तो तुम्हें कुछ नहीं दिया…। तुम्हारे साथ-साथ अबोध निर्दोष निरपराध बहू को भी घर से निकाल दिया, क्या आत्मग्लानि नहीं होगी?”
बुधसेन - “कर्मोदय में जीव निमित्त कहलाता है। …आपका इसमें कोई दोष नहीं है। …स्वयं हम आपके चरणों की सेवा से वंचित रह गये। इसमें हमारा भी तो पापोदय था। …हम दोष देने किसे जाएँ?”
हेमश्री - “आज तुम घर पर रहे होते, …हमने षड्यंत्र करके न निकाला होता तो सब कितने सुखी होते? कभी कंगाली न आती… हमारा घर स्वर्ग था …पर हमारी ही करतूत से मुख पर कालिख पुत गई है। आज तुमने उसे अपने सद्व्यवहार से ढँक दिया है, परन्तु स्मृति से तो उसे नहीं निकाल पाओगे।”

बुधसेन - “जो दिखता है वह परम सत्य नहीं है। …परम सत्य है अकर्तृत्व। …कोई किसी को सुख-दुख नहीं देता है और न ही दे सकता है। हमारा अनुभव मिथ्या है। आत्मा अनादि से अनंत अपराध-विराधना करता आया है। उसके फल में एक-दूसरे को निमित्त बनकर सविपाक निर्जरा में निमित्त बनता है। इतनी-सी बात है। हम दोनों को आपसे कभी भी शिकायत नहीं रही।”

हेमश्री - (आत्म-ग्लानि से) “काश! शिकायत होती; तो हमें आज इतना भार न लगता।”

बुधसेन - “अच्छा! …(विनोद करते हुए) इसमें हमारी क्या गलती है? …आपने किसी को दोष न देने के संस्कार डाले हैं, …हम क्या कर सकते हैं? आपके संस्कार के बदले में आज हम सभी के पुण्योदय आया - क्या यह सब बुरा हुआ है?”

सोमदत्त - “यह तो बुरा नहीं हुआ है, …परन्तु इसके पहले तो ठीक नहीं हुआ न।”

बुधसेन - “आपके संस्कार ने ही मुझे नरक-निगोद जाने से बचाया है। …आज जो कुछ हुआ है उसमें आपका ही उपकार है। हम तो भोले-भाले बालक मात्र हैं।”

सोमदत्त - (आत्म-ग्लानि से भर कर) “हम पामर हैं! हमने तुम्हें स्वार्थ से नीचे गिराया और तुमने राजा-प्रजा के सामने सिंहासन दे दिया। इससे हम और भी अपनी नजरों में गिर गये हैं।”

बुधसेन - "आत्मा पाकर भी मरना - यही पामरता है।

आप आत्म-ग्लानि, करके अपराध-बोध करके अपने पापों को धो चुके हो। …आपने परिणाम-विशुद्धि कर ली है। रही मेरी बात, …तो उसमें तो आपका कोई दोष ही नहीं था। …मेरे कर्मोदयानुसार बनाव बना, मेरा भवितव्य था, उसमें तो सर्वज्ञ भी आपको दोषी नहीं कहते हैं। पिताश्री! अब आप मोक्षमार्ग के योग्य हो चुके हैं।"
सोमदत्त - “बेटे! कुछ भी कहो, …हम तो अपराधी हैं। …इस अबोध बिटिया का क्या दोष था, जो हमने इसे दुख दिया है?”
बुधसेन - “चलो, माना आपका अपराध हुआ है। …तो फिर आपको दंड देने का अधिकार किसको है?”
हेमश्री - “आपको।”
बुधसेन - “तो आज से आप सबको सजा भुगतनी है, …आप तैयार हैं न?”
सारा परिवार - (हाथ जोड़कर) “हाँ, हम तैयार हैं।”
मनोवती एवं बुधसेन - (एक साथ) “तो वचन दो कि आज से हम दोनों को अपने चरणों की सेवा एवं छत्रछाया से कभी दूर न करेंगे।”
चित्रलेखा, काममाला, गुणमाला, चन्द्रावती, सूर्यावती, मंगलावती… सभी के चेहरे अपराध-बोध से अधोमुखी हैं। सुनते ही सभी रो पड़ीं।
काममाला - “यह दंड नहीं है, …मैं ही इस कथा की सूत्रधार हूँ। …मैंने ही इनके कान भरकर सब बहनों को तुम्हारे विरुद्ध किया था।”

बुधसेन - “यह तो आपकी विशुद्धि की सूचना है, जो आप अपने दोषों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर रही हैं। …मुझे एवं मनो को तो इस विषय में जानने की स्वप्न में भी जिज्ञासा तक नहीं हुई; क्योंकि हमारे शुभ उदय में इस ही प्रकार की नियति थी। और अब आपका जीवन आत्म-कल्याण की भावना से सज रहा है, …रत्नत्रय से आप सजें, इससे ज्यादा सजा तो कर्म भी नहीं दे सकते हैं।”

सूर्यावती - “तुम लोग बड़े उदार हो, …अतः ऐसा ही सोचोगे…।”

मंगलावती - “अब हम भी प्रभु-भक्ति, स्वाध्याय में उपयोग लगायेंगे।”

बुधसेन - “अनंत काल से विराधना की है, अब तो विराधना के त्याग का अवसर आया है। प्रभु का लाख-लाख उपकार है, जो हमें आत्महित की बात समझ में आ गई।”

मनोवती - “हाँ, दोष बुरे लगना और न होना ही धर्म है। स्व-पर को निर्दोष आत्मा देखना ही संवर है; इससे ही पूर्वकृत पापों की निर्जरा हो जाएगी… और कुछ सविपाक निर्जरा तो स्वतः हो भी गई है। अतः उन्मुक्त होकर आत्मानंद का भोग करो।”

सब मुस्करा रहे थे, परन्तु आँखें नम थीं।

बुधसेन - “भूतकाल तो नहीं बदला जा सकता है, परन्तु आज से निर्दोष आचरण करके, निर्ग्लान जीवन जीकर भविष्य अवश्य सुधारा जा सकता है।”

रात ज्यादा काली थी, परन्तु चतुर्थी का चन्द्र मुस्करा रहा था …मानो इन सबको भविष्य का दर्शन देकर पूनम की प्रतीक्षा करने की ही उमंग भर रहा था। सब शयन करने लगे… प्रातः जागृत होते ही प्रभातियाँ जो गानी थीं।

यथासमय जिन-मन्दिर का निर्माण पूर्णता को प्राप्त हुआ, हर्षोल्लासपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा का उत्सव भी सम्पन्न हुआ। सबको बाह्य उत्सव का आनन्द आ रहा था, परन्तु मनोवती एवं बुधसेन को अन्तरंग आत्म-संतोष शाश्वत हो गया था। उनके निमित्त से नवीन जंगम जिन-देवताओं का सृजन जो प्रारम्भ हो चुका था। अब तो सब अल्प काल में सिद्धालय में अनंत काल तक एक साथ रहेंगे।


टिप्पणियाँ

पृष्ठ 176: 1. मियार- मकान के छप्पर के नीचे दो दीवालों में लगी प्रमुख लकड़ी

13. चन्द्रनखा का भीषण शोक

आगे युद्ध की विभीषिका और भीषण होती गई और आज का युद्ध का अंतिम दृश्य देखकर तो चन्द्रनखा बेहाल-बेभान थी।

चन्द्रनखा अपने महल के अंतिम तल पर झरोखे से इस युद्ध की विभीषिका की झलक दृष्टिगत कर रही थी। …उसकी अंतिम आशंका भी सत्य साबित हुई। …अंतिम आशा की किरण सहोदर रावण के अवसान एवं श्रीलंका की पराजय के समाचार आ ही गए। सुनते ही चन्द्रनखा अपने महल के झरोखे में बेभान हो गई।

परिजन हतप्रभ थे, किंकर जड़वत् खड़े थे। रुदन का स्वर व्योम को गुंजा रहा था। लंका के अन्तरिक्ष में धुएँ व धूल का उठता गुबार सारे विश्व को मानो शोक-संदेश दे रहा था। सुवर्ण लंका विवर्ण लंका नाम को प्रसिद्ध करने में व्यस्त दिख रही थी। शुक्ल-धवल वस्त्रों में विधवा देवी चन्द्रनखा आहत सरस्वती-सी भास रही थी। कोई उसे होश में लाने का साहस भी नहीं कर पा रहा था; क्योंकि वह आज विश्व की सर्वाधिक पीड़ित नारी थी। राजवैद्य एवं अन्य अनुभवी प्रौढ़ मेधा के धनी वृद्धजन भी आज मूर्तिवत् खड़े रहने को विवश थे एवं स्व-पर के अश्रुओं के सैलाब को रोकने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे।

हाय! क्या यही दिन देखना सौभाग्य कहलाता है, जब जीवन मृत्यु से भी अधिक भारी हो गया हो? मेरी समस्त भाभियाँ, भतीज-बहुयें, नानी-दादी, नात-बहुयें, सभी तो मेरी त्रुटि से विधवापने को प्राप्त हो गईं। हाय! इन्हें मैं अब किस तरह अपना मलिन मुख दिखाऊँ? अपनी बहन का साथ न देने पर छोटे सहोदर विभीषण पर तब क्रोध तो बहुत हो आया था, परन्तु उसने राम का पक्ष लेकर उचित ही किया; अन्यथा आज उसकी पत्नियाँ भी विधवा हो जातीं। कुल का चिराग ही बुझ जाता।

हाय-हाय!! आज मेरे कारण ही मेरे दोनों भतीजे इन्द्रजीत एवं मेघनाद तथा मँझले भैया भानुकर्ण तद्भव मोक्षगामी होकर भी युद्ध में गये और इस जीवन में प्रथम एवं अंतिम बार युद्ध-बंदी बन गये। हाय! आज उनकी स्त्रियाँ मुझे दोष न देंगी तो किसे देंगी? उनकी संतानें एवं ससुराल-पक्ष मुझे घृणा की नजरों से देख रहा है।

सच है, यदि मैंने बेटे को अस्त्र-शस्त्र का लालची न बनाया होता तो आज मेरा बेटा सुरक्षित होता। और तो और मेरे स्वामी भी क्यों मारे जाते? मेरे भाई का सम्पूर्ण परिवार मेरे मोह के कारण ही तो हता (मारा) गया। शेष जीवित परिजन भी अब दीक्षा लेकर अनंतवीर्य केवली की शरण में चले गये। उनके परिजन भी तो विधवा-अनाथ समान ही अनुभव करेंगे। हाय! हँसता-खेलता इतना बड़ा कुल एक क्षण में उजड़ गया।… मानो हरा-भरा वन मरुस्थल हो गया हो।

मुझे जीवित रहने का क्या अधिकार है?.. हाय! मैं अपने परिजनों, संतानों, कुटुम्बियों के लिए अभिशाप बनकर पृथ्वी तल पर भार बन गई हूँ। क्या बचपन, क्या जवानी, क्या ही सुन्दर दिवस बीते थे? और आज सब कुछ उजड़ गया। हाय! सब आत्महित के मार्ग में जा रहे हैं पर मैं किस मुख से दीक्षा ले सकती हूँ?

उपस्थित सभी जनों के नेत्र पृथ्वी तल को निहारते, रोते-बिलखते दिख रहे थे। विधवा स्त्रियों का रुदन तो मानो शोक की प्रतिस्पर्धा ही कर रहा हो। कोई भी स्त्री, किसी को समझाने के प्रयास में असमर्थ पाकर मात्र विलाप ही कर सकती थी। सर्वत्र महलों में रुदन से भीगे वस्त्र भी आँसू बहा रहे थे और कक्षों में से आँसुओं का दरिया ही बहा जा रहा था। दुख एवं क्रोध में वे अपने अलंकार तोड़-तोड़ कर गलियों में फेंक रही थीं, मानो राम की विजय में वे रत्न-वृष्टि कर रही हों और अश्रुपूरित गलियों में धूल के सहवास से बनी कीचड़ में पड़े अलंकार मानो जल-जन्तुओं की चमकती आँखें ही हों। ऐसा लग रहा था, मानो रावण का वैभव राम का स्वागत करने को ही भूसात् हुआ हो।

अंततः सभी लोग चन्द्रनखा को शोकमहल में अकेला छोड़कर चले गये। उसकी बेहोशी पर दया दिखाकर, दीवार पर पड़े विशाल पटों ने एवं स्तम्भों पर झूलते झीने पटों ने तथा झरोखों पर उलझते पटों ने मिलकर वायु का सहारा लेकर झकझोर कर ही मानो सोती नींद से जगाया हो। वह जागी, अपने नेत्रों एवं मन पर उसे भरोसा नहीं हो रहा था। उसने बारम्बार रणक्षेत्र में भूसात् भाई रावण की ओर देखा कि शायद अभी ही वह उठ खड़ा होगा और देव उसको समर्थ बनाकर उसकी ही विजय की घोषणा कर रहे होंगे। …परन्तु आज का दिवस अर्ध-चक्रवर्तित्व का अंतिम दिन था। उसका भाई अर्ध-चक्री था। जिसने सदा विजय प्राप्त की और आज अचानक उसकी विजयश्री का सूर्यास्त ही हो गया। चिरकालीन अमावस्या के अंधकार में जीने को विवश नगरी रुदन ही कर सकती थी। सच है, हवा के सहारे से उठने वाली धूल अंततः जमीन पर पड़ती ही है। अहो! यह जड़ पुण्य-वैभव का छल! …वेश्या-समान आज राम के गुणगान में निमग्न है।
महाविनाशक हिंसक युद्ध की विभीषिका का केंद्र यदि नारी हो तो असफलता में उसे समाज में दुश्मन की तरह देखा जाता है।
चन्द्रनखा - “यदि मैंने भ्राता रावण से शिकायत न की होती तो वह मेरे पति की मदद करने जाते ही क्यों? बाद में सीता दिखलाई दी और फिर…। इस तरह मन की चंचलता तो भाई की थी, परन्तु लोग तो मुझे ही दोष देंगे। सीता का हरण करते समय तो उसका प्रयोजन मात्र राम-लक्ष्मण को वियोग की पीड़ा का अनुभव कराना था, परन्तु आगे परिणाम बिगड़ते गये…। आखिर मुझे मेरे बेटे का वियोग असह्य था तो था ही। उसे कौन रोक सकता था? परन्तु आज सारे तर्क मेरे खिलाफ ही हैं। सच है, कर्मोदय में तर्क काम नहीं आते हैं। अब तो जो हुआ सो हुआ …परन्तु मन का चैन मिलने का कोई रास्ता बाहर तो नहीं ही है।”
“मुझे आज कौन-सा मानवीय न्याय सम्मान दिला सकता है? मोहल्ला-मोहल्ला मेरी ही आलोचना व निन्द्य कथाओं से गूँज रहा है। वीथियों में निकलना भारी हो गया है। परिवार में क्या मेरे जैसी डायन हुई है या होगी? जो पीहर व ससुराल में सबको ही निगल गई हो? हाय! अब कौन शरण है? इस जगत में जितने मेरे अनुमोदक थे, वे ही अब मेरा तिरस्कार कर रहे हैं। मेरे बचपने का अंत क्यों न आया, मैं प्रौढ़-व्यवहार भी तो कर सकती थी। मेरे आक्रोश की चिंगारी ने सम्पूर्ण शौर्यधारी भैया पति, सेना, कुल, साम्राज्य सब ही को तो भस्मसात् करके रख दिया।”
हाय! मेरी सन्तान आत्म-कल्याण करने से पूर्व ही काल के गाल में समा गई। हाय! अब कहाँ जाऊँ? कोई दुख नहीं बाँटता।

वह वक्षःस्थल पीट-पीट कर रोये जा रही थी। कभी सोचती- वह महल से कूद जाये या कि अग्निदाह कर ले। अब घर, समाज, नगर में जीवित रहना तो सम्भव ही नहीं है।

मन्दोदरी की सूझ-बूझ एवं दीक्षा

तब ही मन्दोदरी स्वयं उसे प्रिय सम्बोधन से सचेत करने आ पहुँची - “मेरी एक मात्र ननद, जिसने सदा सब ही को आनंद दिया है, क्या आज तत्त्वज्ञान से शून्य हो गई है? जब कोई मार्ग न सूझे, तब अपना उपयोग अपने में लगाना योग्य है। द्रव्य-मरण हो या न हो - यह हमारे हाथ में नहीं है; परन्तु भाव-मरण से तो बचा ही जा सकता है। …हम अनंत द्रव्य-जन्म-मरण से बच सकते हैं। वृथा ही अपने आपको दोष न दो, …याद है। एक कार्य में अनेक कारण होते हैं?”

जो देह छोड़ गये उसमें शत्रु-पक्ष कारण नहीं, स्वयं के ही आयु-कर्म की पूर्णता है। जो घायल हुए हैं, वे स्वयं के असाता-वेदनीय के उदय से व्यथित हैं, जो विधवा या अनाथ हुए हैं - वह सब भी कर्मोदय-वश हुआ है। साता के बाद असाता आने का आश्चर्य नहीं है। राज्य-सम्पदा कभी किसी की नहीं हुई। जिन्हें आज मिली है, वे भी सदा उसका भोग न कर सकेंगे। धन्य हैं राम-लक्ष्मण, जिन्होंने सम्पदा पाकर भी उसे अपने भैया भरत के लिए छोड़कर वन में आ गये और लंका जीतकर भी हमारे ही छोटे भैया-देवर विभीषण को समर्पित कर दी। देखा जाये तो हमने आर्थिक, भौगोलिक, धार्मिक रूप से खोया कुछ भी नहीं है; परन्तु परनारी-प्रेम की चिंगारी ने एवं उसकी अनुमोदना ने ही स्वयं को नष्ट किया है। इसमें राम-लक्ष्मणजी का कोई दोष नहीं है।
चन्द्रनखा - “परन्तु भाभीश्री, …”
मन्दोदरी - “परन्तु क्या? हमने परिवार, समाज से कुछ चाहा था, इसलिए परेशानी थी; परन्तु आत्मा की परिपूर्णता अनुभव में आने पर हमें भगवान से भी कुछ माँगने की गुंजायश नहीं रही।”
“अब अपने-आपसे ग्लानि छोड़कर झूठे लोक-व्यवहार में आत्म-व्यवहार की पवित्रता को न भूलो। मेरी उपस्थिति आपकी निर्दोषता को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। आपको स्व-पर घात जैसे कदम उठाने से बचना है।” (चन्द्रनखा के आँसू पोंछकर अपने अंक में भर लेती है।)
“आपने मुझे भव-सागर में पतित होने से बचा लिया। आपकी स्थितिकरण भावना ने एक अबला नारी को सही समय पर सबला बना दिया। आज आपकी ही वजह से जिन-शासन की अभूतपूर्व प्रभावना होगी।” चन्द्रनखा बोली।
मन्दोदरी - “याद है… मुझमें धर्म-तत्त्वज्ञान के बीज आपने ही बोये थे! आज मेरे चित्त में जो शान्ति है, उसका श्रेय आपको ही है। आपने भगिनी की तरह सदा मेरी रक्षा की है। आज हम आपके नेतृत्व में ही महाश्रमण संघ में दीक्षा लेना चाहते हैं। आप नारी परिषद में पधार कर हमारा मार्ग-दर्शन करें।”
इधर कर्तव्य-पथ पर शांतचित्त मन्दोदरी ने एक दुखित विधवा असहाय नारी परिषद की सभा आयोजित की।
मन्दोदरी - “मैं मय की बेटी, मन्दोदरी ने अपने पति दशानन को यथाशक्ति, यथामर्यादा सत्पथ पर लाने की चेष्टा की थी। उन्हें स्वयं आगम से ज्ञात था और हम सब रानियों ने भी उन्हें आगमोक्त वार्ता से सावधान भी किया था कि ‘कोटिशिला लक्ष्मण ने उठा ली है, वह अवश्य ही आपको पराजित करके हमें वैधव्य प्रदान करेगा।’ उन्होंने स्वीकार भी किया, परन्तु भवितव्य के आगे उनकी भी न चली।”
मैंने अपने अंतर में समझ लिया था कि भवितव्य अनिवार्य है, पति की आयु का अंत निकट ही है, अतः मुझे आत्महित में सावधान रहना चाहिए…। मैं तब से ही परिपूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन कर रही हूँ, भेदविज्ञान में सावधान रहने लगी हूँ। भोजन-पानी तो कब का ही मुख से छूट चुका था।
इस प्रकार वह एकाकी अपनी सहपत्नियों को सम्बोधती, साहस बँधाती थी। और वैराग्य-रस में पगते-पगते उसने दीक्षा की तैयारी कर ली थी। और शायद उन्हें लेने ही अनंतवीर्य केवली के संघ में शशिकान्ता आर्यिका का संघ भी पधारा था। उनसे दीक्षा लेने से पूर्व उसने एक विधवा-सम्मेलन आयोजित किया।
मन्दोदरी के महल के मध्य एक विशाल सभागार था, जिसमें एक लाख बहनें आसनों पर बैठ सकती थीं। यहीं पटरानी की आज्ञा से लंका की सारी विधवायें एकत्रित हुईं। सभी सफेद साड़ी पहने हुए असीम दुख-समुद्र में डूबी हुई, रुदन करती हुई परिषद में आईं। वे चीख-चीख कर व्योम गुंजा रही थीं।
पटरानी को देख विधवायें बिलख उठीं - “हमारे वीर स्वामी एवं पुत्रों को खोकर अब हम कैसे जियें? हमें भी उनके शवों के साथ दाह-संस्कार की आज्ञा दो।”
कुछ बेहोश हो रहीं थीं। कुछ प्रौढ़ महिलाएँ उन्हें सम्भाल रही थीं। बड़े प्रयासों एवं कष्ट से उन्हें शांत कराया जा सका। पटरानी आसन पर शांत विराजमान थीं। उनके धैर्य को देखकर सभी अचंभित थे। दुखी महिलाएँ भी उन्हें देखकर अपने दुख का संवर करने लगी।

अंततः वातावरण शांत होने पर मन्दोदरी बोली - “मेरे पूज्य स्वामी के दैव-दुर्भाग्य से अनिवार्य भवितव्य के द्वारा जो कुछ हुआ है, वह सब आपके सामने है। आपके स्वामियों एवं संतानों ने जो स्वामि-भक्ति दिखलाई है, वह निश्चित ही स्तुत्य है। इतिहास में उन्हें वीरता एवं देश-निष्ठा के सुनहरे पृष्ठों पर लिखा जायेगा, परन्तु उसे पढ़ने वाला कौन होगा?”

“हमारे द्वारा बारम्बार सावधान किये जाने पर भी मोह की तीव्रता एवं असंयम का यही हश्र होता है, सो हुआ। क्या ऐसा ही दुख भवान्तरों में भी चाहती हैं?”

सभी स्त्रियाँ कातर-स्वर में बोली - “नहीं, कभी नहीं।”

“तो सुनो! थोड़ा देह के स्तर से ऊपर उठकर सोचो। हम सब आत्मायें हैं, हमें भी मुक्त होने का सदा अधिकार है …आज हम पति के साथ दाह को प्राप्त होकर भी कुगतियों में जाने से न बच सकेंगे। आत्मघात कोई संसार-दुख से छूटने का मार्ग नहीं है। यदि फिर से स्त्री-देह मिल गई तो फिर किसी को पति बनाना पड़ेगा, …फिर वह भी युद्ध में वीरगति को प्राप्त होगा। इस संसार का यही नियति-चक्र है। हम कितने भवों तक विधवा होती रहेंगी? फिर नरक, तिर्यंच और निगोद में चिरकाल के लिए जाने से कौन बचा सकेगा?”

विवेकी स्त्रियाँ शांत होकर उपाय समझने लगीं।

मन्दोदरी उच्च स्वर में बोली - “हमारे पास स्त्रीलिंग छेदने एवं अल्प-भवों में मोक्ष जाने का द्वार सदा ही खुला हुआ है। मेरे देवर, पुत्र और पौत्र एवं उनकी भार्यायें तथा समस्त भगिनी-वृन्द वन-कान्तार में समागत अनंतवीर्य स्वामी के संघ में, जो मानो हम सबको मोक्ष-महल में ले जाने के लिए ही सही समय पर आ पहुँचा है, आत्म-कल्याण के पथ को प्रशस्त करने जा रहे हैं।”

(हाथ जोड़कर परोक्ष नमस्कार करती हुई) “अहो सिद्धों का संदेशा आ गया है। कर्तव्य करने वाली स्त्री को शोक का अवसर नहीं होता है। हमने यथाशक्ति अपने परिजनों को बचाने व यथार्थ आत्महित के मार्ग में लगाने का जतन किया है। अब आत्महित में सम्पूर्ण जीवन देने का अवसर आया है। अतः मैंने महाश्रमणी दीक्षा लेने का निर्णय किया है।”

राजा मय एवं रानी हेमवती की बेटी मन्दोदरी के साथ अति पुरुषार्थी चन्द्रनखा आदि 48000 स्त्रियों ने खेद छोड़कर शशिकान्ता आर्यिका के संघ में देश-संयम रूप आर्यिका-पद की दीक्षा ली। अपने उपयोग को असार संसार के सुख से भरने के असम्भव व निरर्थक प्रयासों को छोड़ कर आत्म-कल्याण में अशेषरूप से लगाने के लिए आनंद के मार्ग में चली गईं।
लंका स्थित कुसुमायुध वन में रावण के दाह-संस्कार करने के बाद विभीषण आदि सीधे अनंतवीर्य महाराज के चरणों में जा पहुँचे।
शेष ने भी अपने भवितव्य एवं पुरुषार्थ के अनुसार नियम-संयम अंगीकार किये। कुछ विधवायें ऐसे संकल्प के साथ कि अपनी संतान के स्वावलंबी होने अथवा असहाय सास-ससुर के समाधि-निर्वाह होने के बाद वे भी यथासमय दीक्षा लेकर आत्म-साधना के पथ पर आयेंगी, वापस अपने आवासों रूपी कारागार में लौट गईं।
मिथ्यादृष्टि स्त्रियाँ साक्षात् भोगों के नाम पर ठगे जाने पर भी, बदले की भावना में जल कर, अपनी संतानों को वीर बनाने की बातें कर रही थीं। वे अपने एवं अपनी संतानों के लिए मजबूती से अधोगति का द्वार खोलने को सन्नद्ध थीं। वे अमृत को दूर से ही छोड़कर, वहाँ से खाली हाथ क्रोध, दुख, शोक सहित असीम काल के लिए अश्रु-समुद्र को सुरक्षित रखकर अपने खंडहरों में जीने को विवश हो गई थीं।

14. परीक्षा में तो अपना विवेक चाहिए

आज्ञा-प्रधानी से परीक्षा-प्रधानी को भला कहा है। भगवान की आज्ञा भी परीक्षा करने से ‘स्वानुभूत्या चकासते’ कहलाती है।

चरणानुयोग में विवेक की प्रधानता होती है। और यह जीव तर्क से नहीं, परीक्षा करने से निराकुल (सहज) परिणति का स्वामी होता है।

आज प्रत्यक्ष केवली या आत्म-ज्ञानियों का विरह दिखाई देता है। अतः उनके मन्तव्य को नाना जीव अपने अनुभव से लिखते हैं …जिससे कभी-कभी अंतर्विरोध भी दिखाई देता है। अतः पूर्वापर विरोध दूर करके ही आज्ञा-पालन करना चाहिए। किसी भी एक पक्ष को सर्वथा सही मानने के (खींचने के) स्थान पर स्याद्वाद से समझने का प्रयास करें।

अन्यथा हमारी दशा उस बहू जैसी होगी।

चौल देश में चूर्णिका नाम की बहू थी। उसकी सासू कनकप्रभा के प्रति अत्यंत भक्ति थी …वह इसीलिए उनके आदेश या कथन को वस्तु-स्वरूप की तरह ही अंतिम सत्य मानकर अंध-श्रद्धा से भरी हुई प्रवर्तती थी। एक बार पड़ोस में एक स्त्री विधवा हो गई… तो सासू ने अपनी बहू को बैठक में भेज दिया…।

कनकप्रभा - जाओ बेटे! बैठ आओ …बड़ी दुख की बात है …सहानुभूति दे आना।

चूर्णिका गई। वहाँ सब रो रहे थे।
चूर्णिका - “आप रोइए नहीं …(स्मित वदन) हमें आपसे सहानुभूति है। मेरी माँ ने कह कर भेजा है कि आपको सहानुभूति दे देना।”
सब लोग आपस में बातें करने लगे - “रोयें नहीं तो क्या गायें? …यह कैसी महिला है? …पति को खोकर रोना तो आयेगा ही न!”
चूर्णिका ने घर आकर सासू को वृत्तान्त सुनाया तो सासू बोली - “अरे बेटे! रोने वालों को देखकर पहले दुखी होना चाहिए …रोना आता तो और अच्छा लगता! समझदार बनो बेटे! लोग नाम रख रहे हैं।”
चूर्णिका - “अच्छा मम्मी! आगे से ध्यान रखूँगी।”
कुछ दिन बाद उसे सगाई में भेजा गया।
कनकप्रभा - “जाओ बेटे! रामचंदान के घर चंदा की सगाई है, उसे बधाई दे देना। ध्यान रखना कोई गलती न हो।”
चूर्णिका - “अच्छा मम्मी! मैं इस बार कोई भी गलती नहीं करूँगी।”
(चंदा को बधाई देते समय उसे सासू की बात याद आयी) वह जोर-जोर से रोने लगी …सब चुप कराने लगे, “शगुन के कार्यक्रम में रोने की क्या बात है?”
चूर्णिका - “अरे! यह तो ख़ुशी का अवसर है। जीवनभर रोना न पड़े …अतः बधाई हो। …चंदा तुम्हारी सगाई पर मुझे हर्ष है।”

लोग उसके कहने का मतलब न समझ सके …फिर बातें होने लगी - “कैसी मूर्खा है! …शगुन के समय अपशगुन कर रही है।”
घर आकर सारी बातें सुनने के बाद सासू उदास हो गयी।
कनकप्रभा - “बेटे! रोने की बात क्या थी?”
चूर्णिका - “पिछली बार आपने कहा था न माँ? मैंने पक्का स्मरण रखा था कि अगले आयोजन में यह गलती नहीं करूँगी …सो पहले मैं रोई, फिर …बधाई दी।”
कनकप्रभा - “नहीं बेटे! शगुन के समय रोने से अपशगुन होता है।”
चूर्णिका - “तो क्या करना चाहिए माँ?”
कनकप्रभा - “ऐसे अवसरों पर हँसना चाहिए …खुश होना चाहिए, आनन्दपूर्वक अपनी भावनायें व्यक्त करना चाहिए।”
अगली बार सामने के सेठजी के घर में आग लग गई …बहू को वहाँ औपचारिकता के लिए भेजा। जाते समय सासू कनकप्रभा ने समझाया - "बेटा, सम्हलकर जाना …अब तुम बड़ी हो गई हो …तुम्हारे व्यवहार में समझदारी झलकनी चाहिए …समझी?
चूर्णिका - “हाँ माँ! अब की बार आपको कुछ सुनने को नहीं मिलेगा।” (प्रणाम करके चली गई।)
सेठजी के घर में सब रो रहे थे …धन-हानि बड़ी थी …सबके चेहरे उतर रहे थे…।
चूर्णिका - (घर पहुँचते ही ताली बजाकर गायन करने लगी) “धन्य-धन्य आज घड़ी कैसी सुखकार है …राम का उपकार है, यह राम का उपकार है।” …फिर धीरे से पूछा - “भला आपके घर में आग कैसे लग गई?”
गीतिका - (झुँझलाते हुए) “रामजी ने लगा दी।”
चूर्णिका - “असम्भव …रामजी क्यों लगाने आये भला?किसने देखा? राम को बदनाम न करो।”
गीतिका - “तुम ही तो गा रही थीं।”
चूर्णिका - “वह तो भजन है…।”
गीतिका - “किस समय क्या गाना? क्या बोलना? - यह तो समझदारी का ही काम है …परन्तु तुम तो… तुम क्या समझो!”
सासू ने समाचार जानने के बाद माथा पकड़ लिया। बोली - “ओह! मेरे मरने के बाद क्या होगा? ऐसा लगता है कि इस घर का नाम तो मिट्टी में ही मिल जायेगा …क्या करूँ प्रभु!” (वह रो रही थी।)
चूर्णिका - “क्षमा करें माँ! भजन सुनने से तो शान्ति मिलती है - यही सोचकर मैंने… इसमें मेरी क्या गलती है?”
कनकप्रभा (उसके भोलेपन पर रीझकर) - “सही है बेटे! दुनिया नहीं समझती है …तू भोली है …यह दुनिया तो रोने वाले को जो रुलाये उसे सही मानती है …सगाई होने के बाद जीवन भर रोना पड़ता है, सो तूने तो सही संदेश दिया था, परन्तु लोग समझ न सके। आगे से तू विपरीत कार्य करना। …शायद लोग सही समझ जायें!”
चूर्णिका बड़ी प्रसन्न हुई…।
एक बार किसी घर में करोड़ रुपयों का लाभ हुआ। सब बड़े प्रसन्न थे, …परन्तु चूर्णिका बहू उदास थी। …लोगों ने कारण पूछा तो बोली - “दाल-चावल, रोटी, वस्त्र का तो भोग होता है; परन्तु ज्यादा आये धन की प्रसन्नता, भोग बिना की होती है, इसलिये बिना भोगे जब यह चला जायेगा, तब रोना पड़ेगा। भोग का आनन्द तो समझ में आता है, परन्तु… इसीलिए मैं उदास हूँ। …कल आप बड़े दुखी होंगे।”
और सच में एक सप्ताह बाद उनके घर में चोरी हो गई। वह सारा धन बिना भोग एवं दान के ही चला गया। सारे घर के सदस्य कह रहे थे - “इससे तो अच्छा होता कि भोग लेते या दान ही दे देते; परन्तु अब क्या करें?”
एक घर में एक बेटे को माता-पिता की सारी संपत्ति मिली, जबकि वह अयोग्य था; वहीं दूसरे को एक रुपया भी नहीं दिया गया था, जबकि वह एक करोड़ रुपया साल का कमा रहा था। अधिकारी बेटे की पत्नी रो रही थी। अपने साथ हुए अन्याय की दुहाई दे रही थी।

माधवी - “दुनिया में भलाई के दिन ही नहीं रहे …करो भला होता बुरा …चूल्हा छोड़ भाड़ में जाए दुनिया …माता-पिता को हमने रखा, देवर को हमने पढ़ाया, ननद की शादी हमने की। और तो और, खुद माता-पिता का इलाज भी हमने ही कराया …फिर भी हमें अच्छा नहीं समझा गया!.. अरे! हम तो पराये हैं …हमें तो फूटी कोड़ी तक न मिली।”
चूर्णिका बहू - “आपकी सासू ने सही किया है …अन्याय नहीं किया है।”
माधवी - “ऐसे कैसे? जब हमने सेवा की है तो वसीयत पर पहला अधिकार तो हमारा ही बनता है न?”
“नहीं, … माता-पिता ने आपको पढ़ाया-लिखाया, अच्छे संस्कार दिए, जिससे आज तुम करोड़ रुपये कमाने में समर्थ हुए हो; जबकि दूसरे बेटे में योग्यता नहीं है, यदि उसे धन न दिया जाये तो वह पाँच-पाँच लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई व विवाह आदि कैसे कर सकेगा?
एक बेटा और अधिक अमीर हो जाये और एक को खाने को रोटी-दाल भी न मिल सके - ऐसा कौन माता सोच सकती है? अतः तुम्हारी सासू ने एकदम सही न्याय किया है।”
"हाय! मेरे साथ हुए अन्याय को कोई न समझेगा… " - वह रोने लगी
"रोओ नहीं … माता-पिता ने आपको दया, स्नेह, भाईचारा, करुणा व अपनत्व का पुण्य बाँधने का सुअवसर दिया है। इससे आप स्वर्ग कमा सकते हैं। और आप हैं कि दुखी होकर पाप बंध कर रहे हैं। …छोटे भाई के प्रति दरिद्रताजन्य दुख की इच्छा करने से तो असाता का बंध होगा और भविष्य में उस जैसी दरिद्रता के साथ आपको भी धन मिल जाएगा। बोलो चाहती हो?
माधवी को बात समझ में आने पर आनन्द आया, बोली - “…ओह! भैया जैसी विवशता भगवान किसी को भी न दे। वे भी सुखी रहेंगे, तब ही तो हमारा कुटुम्ब समृद्ध कहलायेगा। मुझे अतिरिक्त धन मिल भी जाता तो हमारे क्या काम का था? …परन्तु उनके घर में ये सब चीजें बड़ी काम की हैं।”
वह स्वयं योग्य वस्त्र व भोजन-सामग्री लेकर देवरानी के घर गई …सारी दुनिया देखकर हैरान थी।
अब लोग चूर्णिका बहू को समझ पा रहे थे। …भोली व अनपढ़ होने पर भी उसे मायाचारी करनी नहीं आती थी। शास्त्रों के मर्म को उसने बिना पढ़े ही पा लिया था।

15. गृहस्थ आश्रम

मराठवाड़ा की वाशिम नगरी में एक बड़ा झाँझरी परिवार था। उसमें पाँच बहुयें थीं। परिवार में 65 सदस्य थे। बड़ा खुशहाल परिवार था। सब अपनी योग्यता-प्रमाण व्यवसाय करते थे। सारी बहुयें अपनी-अपनी योग्यता-प्रमाण काम करती थीं।

श्रमिका नाम की एक बहू शरीर से मजबूत थी। गरीब घर की होने पर भी सब उसको भावी भगवान मानकर बड़ा प्रेम करते थे। वह भी सारे घर के लिए आटा-बेसन पीसना, दालें दलना, नमक कूटना, मसाले तैयार करना आदि काम करती रहती थी। गेहूँ आदि अनाज धोना-सुखाना व शोधना - इस ही में उसका समय निकल जाता था।

दूसरी माधुरी नाम की बहू थी। वह रसोई बनाने में बड़ी दक्ष थी, वह इसमें ही व्यस्त रहती थी। …सारी बहुएँ भी उसे यथायोग्य सहयोग करती थीं।

तीसरी बहू कल्याणी थी। वह सुशिक्षित थी, सो घर के सब बीस बच्चों के अध्ययन व होमवर्क आदि की चिंता करती थी। सारे बच्चे उसको ही अपनी माँ समझते थे। वह बड़े प्यार से सबका ध्यान रखती थी।

चतुर्थ बहू धवलिका थी। वह सारे घर में साफ़-सफाई, वस्त्र-धुलाई, सब्जी सँवारना, वस्त्रों की सिलाई, बर्तन-सफाई, घर-संपत्ति की सुरक्षा रखना तथा लिपाई-पुताई आदि कामों में एकदम दक्ष थी।

पंचम बहू मलिका थी। वह सारे गहनों की रक्षा करती थी। आमदनी व व्यय का हिसाब यही रखती थी। इसके होते हुए किसी भी बहू को साड़ी व चप्पल आदि खरीदने तक की चिंता नहीं करनी पड़ती थी। कब कौन तीर्थयात्रा करेगा - इसका फैसला यही बहू लेती थी।

सब मिलकर अंत्याक्षरी करती हुई, गाथायें व भजन याद करती रहतीं। अलग-अलग काम करते हुए भी पाँचों एकरस रहती थीं।

सास-ससुर घर के बड़े होने पर भी तनाव-रहित मोक्ष जैसा आनन्द ले रहे थे। वे बस न्याय देने का कार्य करते थे, उनके न्याय-निर्णय को सब बड़े विश्वासपूर्वक आदर से स्वीकार करते थे। वे तत्काल न्याय नहीं देते थे …तीन दिन बाद लिखित रिपोर्ट करने को कहते थे। 90% झगड़े तो तब तक स्वतः मिट जाते थे।

इस घर में दुखी रहना मना था और दुख व्यक्त करने का कोई बुरा भी नहीं मानता था। दुखी सदस्य को अन्य सब दया की नजर से वात्सल्यपूर्वक देखते थे। सब उसे प्यार करते थे, कोई भी उसके क्रोध का बुरा नहीं मानता था।

जब भी किसी के पाप का उदय आता, तब वह अलग रहने की बात करती …तो उसे घर के उस भाग में, जहाँ एक बड़े सुंदर उपवन के साथ कुछ कक्ष भी थे, रहने को दे दिया जाता था। वह अपने बच्चों को लेकर उसमें चली जाती। …वहाँ से कोई भी यहाँ नहीं आ सकता था और यहाँ से भी कोई वहाँ नहीं जा सकता था।

एक बार किसी बात पर छोटी बहू मलिका खिन्न होकर अपने बच्चों को लेकर वहाँ चली गई।

अब वह वहाँ एक दो-दिन तो प्रसन्न रही, परन्तु बाद में उसे बड़ा कष्ट होने लगा। …बच्चे दिन भर भाई-बहिनों के साथ पढ़ने-खेलने को तरसते-बिसूरते रहते …दादा-दादी, ताऊ-ताई को याद कर रोते रहते। अपनी योग्यता के अलावा शेष कार्य भी स्वयं को ही करने होते थे - इससे भी उसे बड़ा कष्ट होता। बच्चे पढ़ाई-लिखाई नहीं करते, पति भी उसकी नहीं सुनते थे। वे व्यापार में मग्न रहते…।

सुख-दुख को बाँटने वाला कोई न रहा। अकेले रोओ तो रोओ, हँसो तो हँसो…कोई पूछने वाला नहीं था। विभिन्न साड़ियों-गहनों को पहनने की स्वतन्त्रता समाप्त हो गई। मुनिराज को आहारदान देना कठिन हो गया। अंत्याक्षरी, धार्मिक यात्रा, मन्दिर, पूजा-पाठ सब छूटने लगे।

अब उसे समझ में आने लगा कि "अकेले रहने में कोई सार नहीं है… बच्चे तक नहीं सम्हलते …सड़क पर कहाँ से आ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं? कुछ पता ही नहीं चलता था …कमरे में अकेले बच्चे श्लील-अश्लील कैसी-क्या प्रवृत्ति कर रहे हैं?.. ज्ञात ही नहीं होता था। नौकर घर में छिप-छिप कर खाते, चोरी करते …अब तो दिन भर संक्लेश में बीतने लगा।

एक दिन एक नौकर को बहुत डाँटा तो कुछ दिन बाद उसने अकेले में बहू को पकड़ कर, मुँह बंद करके उसे लूटने का प्रयास किया। …विरोध करने पर शील तक पर आँच आने की स्थिति बनने का अंदेशा हो गया, स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि मरते-मरते बची। …बेहोश घायल अवस्था में बहुत खून बह गया। संयोग से बड़ी भाभी की बेटी चंचला ने आवाज सुनी तो उसने फौरन सबको कुछ सावधान किया।

आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया… जहाँ चारों बहुयें चारों ओर खड़े होकर उसका ध्यान रख रही थीं …भतीजे-भतीजियाँ - सभी बच्चे रो रहे थे - “…चाची घर चलो।” …बाहर पाँचों भाई चिंता में सहभागी थे। बहू कुछ भी बोल नहीं पा रही थी। ससुर-सासू ने उसे करुण हृदय साश्रु देखा - "…बेटा! चिंता न करो …जो हुआ सो हुआ… चारित्र बचा, सो सब कुछ बच गया। धन गया तो कुछ नहीं गया…। स्वास्थ्य गया, वह तो लौट आयेगा।

घायल बहू का हृदय भर आया।

पूर्ण स्वस्थ होने पर घर जाने की बात आई …उसने ताँगा संयुक्त परिवार वाले घर के सामने जाकर रोका और उतरकर सास-ससुर व समस्त जेठ-जेठानियों को प्रणाम किया, क्षमा माँगी। …सबने उसे गले से लगा लिया। उस दिन से वह उपवन वाला घर खाली पड़ा हुआ है।

16. विसंवाद का अंत

उज्जैन नगरी में पवन गोधा का एक धार्मिक परिवार रहता था। उनके घर में तीन बहुएँ थीं।

एक बार उनमें विवाद हो गया। वे पृथक्-पृथक् रहने को उतारू हो गईं। सबकी सभा जुड़ी।

पवन गोधा - “आपको कष्ट क्या है?”

सरला - “मैं सबका काम क्यों करूँ? हमें किसी से क्या मतलब? हमें आजादी चाहिए।”

पवन गोधा - “अच्छा तो क्या-क्या बाँटेंगे?”

सरला - “सब कुछ।”

पवन गोधा - “किसके लिए?”

सरला - “अपने लिए।”
पवन गोधा - “कितने समय के लिए, अनंत काल के लिए?”
इस प्रश्न का वह उत्तर न दे पायी।
…और तीन दिन में विचार कर लो।
चौथे दिन पवन गोधा का परिवार-सभा में व्याख्यान हुआ-
प्यारी बेटियों,
बँटवारा करना नहीं, समझना है। सब अपने-अपने वस्त्र ही पहनते हैं, अपनी-अपनी पसंद के ही गहने पहनते हैं। सभी अपनी पसंद का खाते हैं। अपनी इच्छा से ही सोते-जागते हैं। यहाँ तक कि एक-दूसरे की सेवा भी स्वयं की इच्छा से सामने वाले के पुण्य के उदय-प्रमाण करते हैं। इससे होने वाला पाप-पुण्य का हिसाब भी सभी का स्वतंत्र है। कोई किसी को न अभी देता है और न भविष्य में… इसलिए बँटवारा तो असंभव है। देह-आत्मा को देखा जाये तो वह भी बँटे हुए हैं। देह तो आत्मा से अत्यंत पृथक् ही है। रही बात संपत्ति की तो वह तो प्रत्येक भाग्यशाली परिवार के सदस्य को स्वतः ही मिल जाएगी; क्योंकि यहाँ से मरते समय कोई भी कुछ नहीं ले जायेगा। किसी एक को नहीं, प्रत्येक को उसे पाने का अधिकार है। उसमें मेरा-तेरा नहीं, सब अपने ही बच्चे हैं।
संपत्ति तो धर्मशाला में मिली सुविधा के समान है। जब तक देह में रहना हो रहा है, तब तक इनका सदुपयोग नैतिकता-पूर्वक करते रहो, ईमानदारी से एक परमाणु-मात्र को अपना न मानते हुए जिओ और फिर आनन्दपूर्वक समाधिमरण कर लो।

इस बँटवारे के विवाद का समाधान संपत्ति का बँटवारा नहीं, बल्कि अपने उपयोग को समेटना है…। (बात पर वज़न देते हुए) न्यारे होना तो कदापि नहीं।

कर्णिका (उपेक्षापूर्वक) - “हम इतनी गहरी बातें नहीं समझते, पापाजी!”

पवन गोधा - "(अभिप्राय को और स्पष्ट करते हुए) “हम दोनों कुछ लेकर नहीं जा रहे। …सब आप लोगों के लिए ही है। 10-20 वर्ष में सब कुछ आपका होगा। 40-50 वर्ष बाद आप भी एक भी बर्तन, गहना या वस्त्र लेकर नहीं जायेंगे …आप भी सब कुछ अपने बच्चों को ब्याज सहित दे जाओगे… बँटवारे में मिली राशि का भोग आप भी नहीं करोगे।”

“हाँ, आज से आप पूर्ण आज़ाद हैं। …एक-दूसरे को कोई रोकेगा नहीं, टोकेगा नहीं, …मात्र अपना उपयोग ही समेटा जायेगा। …बँटवारे के बाद आपको बड़े भाई का कमरा झाड़ने का विकल्प नहीं आयेगा, क्योंकि वे न्यारे हैं …उन्हें भोजन कराने का विकल्प नहीं रहेगा …तो अभी से ही ध्यान मत रखो।”

“हम लोग विसंवाद होते ही क्या करते हैं? राग-द्वेष एवं टोकने के प्रसंग में उपयोग ही को तो समेटते हैं! तो संग रहकर ही समेट लो।”

“बेटे! मानव-समाज संगठन का नाम है। एक-दूसरे को एक-दूसरे की आवश्यकता पड़ती है। आज युद्ध नहीं है, इसीलिए मानव भोगवादी होता जा रहा है। लेकिन जिम्मेदारियों से दूर भागने का नाम शीघ्र मौत है। जीवन ज़िंदा लाश जैसा हो जाता है। आप अकेले में माता-पिता की जिम्मेदारियों से दूर भागते हैं, फिर संतान पालना कठिन हो जाता है। माता-पिता के बिना संतान की एवं सन्तान-विहीन आदमी की वृद्धावस्था कितनी दर्दनाक होगी! ज़रा विचारिए। …पति या पत्नी अकेले कैसे जियेंगे? विधवा स्त्री की रक्षा, भोजन-व्यवस्था कौन करेगा? आज विदेशों में, करोड़ों रुपये होने पर भी वृद्ध जन NGO की कृपा पर पल रहें हैं। आप दयनीय बनकर कैसे जियेंगे?”

अभी हमें बुजुर्गों से प्रतिकूलता लगती है। कल के दिन, अकेले में रहने पर पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे को प्रतिकूल हो जाते हैं। निर्णय करने वाला, सहयोग-मदद करने वाला, कोई नहीं बचता है। संतान को बड़ों की उपयोगिता की समझ नहीं बचती है। …दादा-दादी, बुआ, नाना-नानी, मौसी, चाचा-चाची, मामा-मामी का प्यार और इनकी आवश्यकता क्या होती है? यह उसे समझ में नहीं आता है।

सरला (जेठानी) - “मैं काम कर-करके हार गई, छोटी को कोई कुछ नहीं कहता …जैसे सबको सिखाने-बिगाड़ने का ठेका मैंने ही ले रखा है।”

विरला (देवरानी) - “जीजी! आप बड़ी हैं तो …जिम्मेदारी भी तो बड़ी है। …हम तो आपके चरणों की सेवा ही कर सकते हैं। हाँ, गलती मेरे से ही ज्यादा होती है …तो मैं क्षमा माँगने में कभी पीछे न रहूँगी …और बोलो! मैं क्या कर सकती हूँ?”

निर्मला (मँझली) - “तुम्हारा कोई दोष नहीं हैं बहना! उम्र के अनुसार ही अनुभव में प्रौढ़ता आती है … और अनुभव-हीनता अपराध नहीं कहलाता है।”

विमला (सासू) - “देखो बेटे! आप बुरा न मानो …जो बात कही जाती है, वह सत्य ही हो - ऐसा आवश्यक नहीं है, परन्तु वह सर्वथा गलत भी नहीं होती है। हम सब भी इस दौर से ही गुजरे हैं।”

कमला (दादी सास) गम्भीरता से - “कही बातों का कोई क्या करें?”

उर्मिला (आजी सास) - “अरे! सरल-सा गणित है …कही, सुनी, समझी, सीखी और भूली …बस!”

विमला (ननद) - “मैं ही थोड़ा ज्यादा पटर-पटर बोलती हूँ। …सब कुछ मेरे कारण ही होता है। …सबको लगता है कि मैं ही इधर की उधर करती हूँ …बात सही भी है, …परन्तु मुझे अनुभव ही नहीं है कि बातों को सुनकर कब, कहाँ, किससे, कैसे कहना या कहने-सुनने से बचना चाहिए। आगे से सीखने का प्रयास जारी रहेगा …अन्यथा मैं भी ससुराल में तंग होऊँगी, वैसे भी…।”

प्रमिला (70 वर्षीय बाल-विधवा बुआ) - “कितने दिन की हो लाड़ो! बस सुधार आवश्यक है, सो है ही।”

सबकी बातें सुनकर सरला को बड़ी शर्मिंदगी हुई … "मुझे सभी क्षमा करें … ऐसे भगवान जैसे साधु-पुरुष श्वसुर कहाँ मिलेंगे? सच है, कहा-सुनी तो होगी … घर के लोग कहते हैं तो अपनत्व भासता है …आप नहीं कहेंगे तो सहयात्री कहेंगे, …पथिक या चिकित्सक कहेंगे। "

उसने प्रतिज्ञा की कि अब से वह छोटी-छोटी बातों को ज्यादा तूल नहीं देगी।

“पीढ़ियाँ बदल रही हैं, किन्तु परम्परायें नहीं”, …इस घर में शान्ति का वातावरण आज भी नहीं बदला। …कहा-सुनी तो तब भी हुई और अभी भी होती रहेगी, परन्तु मनोमालिन्य कभी उत्पन्न नहीं हुआ, न होगा।

परिणाम बिगड़ना, गलती दिखना या कहना - यह अपराध नहीं है। वह अपराध तब बन जाता है, जब उसका पक्ष रखकर बचाव किया जाता है; आत्मा का पक्ष आते ही समस्त विकथायें क्रमशः छूटती जाती है।

क्या गजब बात है - क्षणिक परिणाम के पीछे त्रिकाल निर्दोष आत्मा को दोष देकर सदा हीनता का अनुभव या बोध कराना अनंत पाप है।

गुस्सा आने पर…

'समय बहुत सख्त शिक्षक है। अच्छा हो कि आप माता-पिता या गुरुजनों से सीख लें। 50 वर्ष तक माता-पिता या गुरुजनों से ही निर्णय लेने की आदत डालें। गुस्सा आने पर किसी का भी अनादर न करें, अपनी सारी उत्तेजना एक डायरी में लिख देवें।

यदि 3 दिन तक आप उस उत्तेजना पर सहमत हों, तो विनम्रता से उसे बड़ों को पढ़ा देवें और उनसे 3 दिन में न्याय की अपेक्षा रखें; तब तक आप किसी के भी प्रति मन कड़वा न करें।’

17. चिंतामणि हारा

महल-सी आलीशान कोठी में कीमती बिस्तर पर सेठ पकोड़ीमल अंतिम श्वासें गिन रहा था…। मुख का स्वर विदा ले चुका था …आँखों की रोशनी ने देखने से इनकार कर दिया था… कानों ने सुनने से इनकार कर दिया था। …नाक सूँघने में असमर्थ थी अथवा तो उसके लिए देह की दुर्गन्ध के सिवाय अब कुछ और विषय ही न बचा था। …उस पर भी श्वास के सहयोग के लिए ऑक्सीजन-मास्क लगा हुआ था। …हाथ-पैर मशीनों पर लटकी 2-3 बोतलों से निकले पाइपों की सुइयों से घोंचे हुए थे… आँखों में पानी ही उसके हृदय की पीड़ा को व्यक्त कर रहा था।

उसके बच्चे उसकी सम्पत्ति का हिसाब लगा रहे थे। …पत्नी के कान भी स्वयं की सुरक्षा की व्यवस्था जानने को व्यग्र थे। …सगे भाइयों-भावजों-भतीजों ने अभी तक घर आकर स्वास्थ्य के समाचार नहीं लिये थे। …याद आने लगी जवानी के दिनों की लड़ाइयाँ।

“कैसे मैं उनसे अलग हुआ था… मैंने घर की आन का भी ध्यान न रखा था… पिताजी-माताजी मुझे समझा कर हार गये थे…। मैंने अपने सबसे छोटे भाई की बुद्धिहीनता का जमकर लाभ लिया। भावजों-भतीजों पर ज़रा भी दया नहीं दिखाई। …आखिरकार वे अपनी आजीविका के लिए स्कूल-ट्यूशन पर निर्भर होकर रह गये। …आज भतीजा बैंगलोर में इंजीनियर है…। इतना सब होने पर भी आज वे मेरे स्वास्थ्य की जानकारी लेने आये। …मैं उनके सामने लज्जित था। पूरे पाँच करोड़ की वसीयत मुझे मिल गई थी। … मेरी पत्नी के साथ-साथ मेरे ससुराल के लोगों ने भी मेरे उत्सव में साथ दिया था। … हालाँकि इसकी कीमत मैंने अपनी बुआ, फूफाजी, चाची-चाचाजी, माता-पिता सबका विश्वास खोकर चुकाई। आज मेरे पास कोई नहीं खड़ा है …मेरे बच्चे मेरी सम्पत्ति के लिए एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। काश! मैंने अपने पाँच बच्चों को 15-15 करोड़ के स्थान पर 14-14 करोड़ दिये होते, परन्तु ‘यह समझ दी होती कि आपसी भाईचारा, विश्वास, प्रेम ही सबसे बड़ी पूँजी है…।”

“ओह! मेरी पत्नी आज असुरक्षित अनुभव कर रही है… मेरे सामने ही जब मेरे साथ यह सब हो रहा है तो मेरे बाद उसका क्या होगा? यह सब स्पष्ट ही दिख रहा है। मुझे क्या मिला? मेरी देह को भी क्या फर्क पड़ा? ज्यादा छोड़ने से और कम छोड़ने से क्या अंतर पड़ गया? मैं तो सारे जीवन का क्लेश व चालाकी की सजा भुगतने को अगली गति में चल दिया …। ओह काश, आज मैं अपने अनुभव अपने बच्चों को बाँट सका होता …। जब तक उन्हें इसकी खबर होगी, तब तक देर हो चुकी होगी…।”
अनायास ही उनके मुख से एक लंबी ‘आह’ निकल गई, जिसे किसी ने न तो सुनने की कोशिश की और न उनकी पीड़ा को अनुभवने की।
अपना पूरा भूतकाल आँखों के सामने घूमने लगा…।
25 वर्ष तक अध्ययन, वह भी 12 घंटे के कठोर श्रम के साथ, प्रातःकाल के स्कूल थे; सो जैनत्व विदा ले गया था…। शेष कसर छात्रावास ने दूर कर दी थी…। आलू-प्याज, रात्रि भोजन, लड़कियों से दोस्ती, ड्रिंक, नशा, फ़िल्में… सब शुरू हो गया। …मन खेलने को करता, परन्तु भविष्य को सुनहरा बनाने के चक्कर में सोचता - थोड़े दिन की बात है, फिर तो अवकाश ही अवकाश होगा…। मन मारता रहा…, देह कमजोर होती रही…, स्टेमिना वीक होता चला गया…, चश्मा लग गया… दुर्बल होने पर भी सब लोग खुश थे, क्योंकि मैं ‘यूनिवर्सिटी टॉपर’ जो था। …इसके बाद नौकरी ने मेरे प्रतिदिन 12 घंटे खाये। …आराम व व्यायाम को अवसर ही नहीं मिला। …अब समझ में आता है कि जिन्दगी आराम नहीं लेने देती है। नौकरी एवं विवाह के पहले से ही दवाइयाँ चालू हो गई थीं, जो घटने के बजाए अपनी डोज़ बढ़ाती जा रही थीं।
काम का बोझ अब और बढ़ गया था…। इधर घर पर माँ के साथ पत्नी का मेल बिठाने की बड़ी भारी चुनौती थी… दोनों का अपना अहं और अपनी सोच… दोनों के मत में ‘झुकना’ तो मानो मानव-भव की पराजय ही हो। मैं दोनों के बीच में पिस रहा था…, रात्रि को अपराधी नजरों से पत्नी का सामना करता तो प्रातः मम्मी के सामने नजरें चुराता…। अवसाद बढ़ने लगा। क्लेश तो मानो मेरा मित्र ही बन गया था …मैं उसका अभ्यस्त हो गया। …चुप रहने लगा तो भी दोनों को मैं ही खलता था।

मैंने नाराज होकर भी देख लिया, तब भी दोनों के ही उपदेश सुनने पड़ते थे -

“बस, दो बातें नहीं सुन सकते अपनी पत्नी के खिलाफ… हमने तेरे लिए क्या-क्या दुख नहीं सहे बेटा? …माता-पिता को पूछता ही कौन है? …इससे तो मर जाना भला…” - भावुकता-पूर्ण माँ का रुदन हृदय को क्षार-क्षार कर जाता।

इधर पत्नी ताना मारती - “मेरा कौन है यहाँ? …आपके तो सब हैं।”

…परन्तु मैं मर्द हूँ …पढ़ा-लिखा, समझदार… पिंजरे के पंछी रे… तेरा दरद न जाने कोय…। अब तक पत्नी व माँ का रुदन सुनना तो मेरी जिन्दगी की नियति बन चुकी थी।

इस बीच पैकेज भी अच्छा हो जाने से धन तेजी से बढ़ रहा था। …सम्पत्ति कमाने बनाने में मुकदमों का सामना तो करना ही पड़ता है, …पटवारी से लेकर हर कदम पर घूस प्राण-पीड़न कर रही थी। शेयर, सोना-चाँदी, फ्लैट, म्युचुअल फंड… जगह-जगह धन का निवेश बढ़ रहा था, फिर भी पारिवारिक जीवन की पीड़ा एक समय को भी कम नहीं हो रही थी।

मैं सोचता ही रह गया…। बुढ़ापे ने कब डेरा आ जमाया…कुछ खबर ही नहीं लगी। …जिसके लिए सारा समय चला गया वसीयत;

शेयर, धन-संपदा और उसके कारण हुए गृह-कलह इन सबसे मुझे क्या मिला? दुखद जीवन… निष्फल जीवन… हाय! मनुष्य-भव यूँ ही चला गया…। मात्र भोजन-वस्त्र के लिए मैंने कितनी चाकरी की… मरते समय करोड़ों रुपये मेरे किस काम आये? अज्ञानियों को मेरे इस बेशकीमती जीवन की क्या कीमत? ओह! मैं चाहता तो आत्महित में लगकर, अपनी विशुद्धि कमाकर अपने साथ ले जाता। रत्नत्रय का अवसर अब चार गतियों में कहाँ मिलेगा…?
अरे! आत्मा तो छोड़ो, मैंने ऐहिक जीवन के लिए भी कुछ न कमाया - कुछ न पाया। स्वास्थ्य, प्रसन्नता, निश्चिन्तता… कुछ भी तो हाथ नहीं आया। यह भी कोई जीवन है जहाँ कोई भी संतुष्ट नहीं हुआ! …मैं किसी की भी शिकायतें दूर न कर सका… संतान को जो न मिला वे उसका रोना जीवन भर रोते रहे… पत्नी, …माताजी, पिताजी, रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी …सभी को कुछ न कुछ शिकायत! …यहाँ तक कि बहिन को भी शिकायत है - "मुझे क्या मिला? …वर्ष में एक बार रक्षाबंधन का ही तो अवसर मिलता है! भाभी को तो सारे साल साड़ियाँ-गहने… मुझे तो…?
भगवान मेरी ओर नहीं देखते… शायद इशारा कर रहे हो - “दुनिया को, पर को प्रसन्न करने वाला कोई पैदा नहीं हुआ… अपने से, अपनी प्रभुता से राजी हो जा और निकल जा इस असार-संसार से। …खुश होने का उपाय बड़ा सरल है, खुश करना असम्भव।”
अंततः माताजी के हिस्से के धन में से पिताजी के सारे अंतिम संस्कार किये गये। सभी भाई माताजी को सबसे छोटे भाई के भरोसे छोड़कर चले गये। माताजी के पास नगद कुछ न बचा।

हाँ, बँटवारे के नाम पर पाँच करोड़ की संपत्ति के कागज जरूर थे - उस संपत्ति के, जिस सम्पत्ति को वह कभी बेच न सकेगी; क्योंकि उस घर में सारे बेटे लोग रहते हैं।
छोटे बेटे ने अपनी माँ की सेवा की …पोता इंजीनियर बन गया था। उसने एक अच्छे अस्पताल में माँ का इलाज कराया था …और अंत में छोटे भाई के परिवार ने ही उनकी सुन्दर समाधि कराई, जिसमें बड़े भाइयों ने झाँकने का प्रयास तक नहीं किया।
समाचार-पत्र में माँ के देहान्त के समाचार पढ़ने के बाद वे सभी श्मशान-घाट पर नजरें नीची झुकाये खड़े थे।


प्रतिभा

“प्रतिभा आपको संकट में नहीं फसने देती है। यदि आप दुखी हैं तो इसका मतलब है कि आपके पास समाधान की प्रतिभा नहीं है। अविनय उपेक्षा अविश्वास बतलाता है कि आपको सीखने की गरज नहीं है। गरज वाले विनम्र ही होते हैं।”


पुनर्विवाह…?

'पुनर्विवाह कोई सही रास्ता नहीं है। यदि भाग्य में पति या दाम्पत्य सुख होता तो पहला पति ही क्यों गुजरता अथवा वह क्यों झगड़ा करके दुख देता? दूसरे विवाह में भी कर्मों का पुण्य-पाप तो स्वयं का ही होता है। यदि वह भी दुख देगा या गुजर जाएगा तो क्या आप फिर से विवाह करेंगी? फिर अनेकों पुरुषों में रमने वाली वेश्या और आप में फर्क ही क्या रह जाएगा?"