समझ से स्वर्ग (बाल ब्र. सुमतप्रकाश) | Samajh Se Swarg (Bal Br. Sumatprakash)

18. सौतिया डाह

मध्य भारत में वज्रगढ़ नाम का एक प्रसिद्ध व बड़ा भारी साम्राज्य था। …उससे भी ज्यादा प्रसिद्ध था, वहाँ के राजा का प्रजा के प्रति प्रेम। अँग्रेजों से हार नहीं मानी, परन्तु अपने गुणों से जीतकर उन्हें अपना मित्र बना लिया था।

राजा का नाम था अमरसिंह। उनकी रानी का नाम भद्राणी था। राजा उसके रूप-सौन्दर्य में खोये रहते ।…दोनों इंद्र-इंद्राणी की तरह लगते और प्रायः ही नाग-नागिन की तरह भोगों में तृप्त रहते। उससे उनके दो संतानें हुईं - एक राजकुमार विजयसिंह एवं दूसरी राजकुमारी रूपकुमारी। …

एक दिन राजा महल में आये और अपनी प्रिया से लिपट गये… तब रानी ने अहंकार से भरे वचन बोल दिए - “तुम भोग के कीड़े हो …मेरे बिना एक पल को भी नहीं रह सकते हो …इतना गंदा आदमी नहीं देखा। …नहीं करने योग्य क्रीड़ायें भी बड़े प्रेम से कर लेते हो…।”

मर्म पर चोट खाकर राजा तत्काल महल से चला गया।

कुछ समय बाद मित्रों के परामर्श से दूसरा विवाह प्रतापगढ की राजकुमारी सुमित्रा से हो गया। …यह रानी भी बड़ी सुन्दर थी …युवा थी …राजा के चित्त को अपने में रंजायमान करने में पटु थी। सबसे ज्यादा आकर्षण था उसका संगीत-प्रेम …गायन। ओह!

सफेद मक्खन-से चेहरे के ऊपर गुलाबी ओष्ठों से झरती मुस्कान का क्या कहना! सुकोमलता-मांसलता ऐसी कि चित्रित कृति! नृत्य में अंगोपांग की थरथराहट एवं कटिभाग का लोच! एकदम परी समान रंग-रूप पाकर कौन उन्मत्त न हो जाये? …राजा उसका साथ पाकर दिन-रात उसके भोगों में अपने को एवं अपनी बड़ी रानी को सर्वथा भूल गया।

इधर भद्राणी खार खा रही थी। …वह एक-एक पल सौतिया डाह से पीड़ित थी। न दिन में चैन, न रात में। वह राजा से एवं सौतन से लड़ने का एक भी मौका नहीं छोड़ती थी। उसने राजा में मोह उत्पन्न करने की एक चाल चली …राजकुमार को राजा के सामने ही पीटती, ताकि राजा दया खाये और पुत्र-प्रेम में उसके पास आये… उसे लगा “जब मैं विजय को छोड़ूँगी ही नहीं तो राजा को मेरे पास आना ही पड़ेगा।”

परन्तु हुआ उल्टा …राजा अब उससे और ज्यादा घृणा करने लगा। राजा ने कोशिश की कि वह राजकुमार को स्वयं अपने पास रख ले, क्योंकि नई रानी सुमित्रा भी उस बालक को बड़े प्यार से देखती थी; लेकिन बड़ी रानी ने राजकुमार को अपने से दूर नहीं होने दिया।

इधर भद्राणी का व्यवहार अभद्र होता जा रहा था। …वह छोटी रानी को डायन सिद्ध करने में लग गई थी - “जादूगरनी ने मेरे पति को छीन लिया। …देख लेना, इसके काले जादू से एक दिन राजा के प्राण न चले जायें तो कहना! …यह खा जाएगी उन्हें! …यह रूप की आड़ में चुड़ैल है, …राजा को चूस रही है, …राजा कमजोर हो रहे हैं, …न्याय कराने को प्रजा कहाँ जाये? जब मैं ही महीनों में, वर्षों में कभी बड़ी मुश्किल से उनके दर्शन कर पाती हूँ …तो आम जनता का क्या होता होगा? अधिकारियों, मंत्रियों व पुरोहितों के मजे हैं …राजा सुर-सुरा-सुरी में डूबा हुआ रहता है…।”

इधर राजा सचमुच सुमित्रा के रूप एवं कला पर अत्यंत मोहित था। …रानी को रंजित करने व सिखाने के लिए देश भर से संगीतकार बुलाये जाते। एक बार रानी ने समस्त संगीतकारों और अन्य कला-विशेषज्ञों से सलाह कर के संगीत-समारोह कराया। …देश भर के राजघरानों को आमंत्रित किया गया था। बड़ा भव्य कार्यक्रम हुआ। …अनेकों राजा-रानियाँ इस दश-दिवसीय कार्यक्रम पर मुग्ध हो गये। हर कला का प्रदर्शन किया गया। हर प्रांत का नृत्य, संगीत, चित्र-लेखन, वादन, शिल्प …शिकार …यहाँ तक कि हर प्रकार के पशुओं का रति-उत्सव भी दिखाया गया। गज-नृत्य …सिंह-नृत्य …हिरनी का नृत्य देखकर तो लोगों ने दाँतों तले उँगली दबा ली।

भीलों के समूह-नृत्य के साथ-साथ गायों का नृत्य तो देखते ही बनता था। लोग अचंभित थे - क्या इतना प्रशिक्षण गायों को भी दिया जा सकता है! ‘न भूतो, न भविष्यति’ - यह उक्ति उस कार्यक्रम पर अक्षरशः चरितार्थ हो रही थी। सारा देश इस कार्यक्रम का प्रशंसक बन गया था।

जाते-जाते सबने सलाह दी कि इस कला को जीवित रखना चाहिए…। परिणामस्वरूप सुमित्रा के एक इशारे पर राजा ने 200 एकड़ भूमि दान में दे दी …और सारे विशेषज्ञों को वहीं बसाने के लिए अपने महल दे दिए। और प्रारंभ हो गया संगीत-विश्वविद्यालय। …दूर देश से एक-एक साल तक पैदल चलकर भी लोग यहाँ आते और संगीत सीखते। ईरान, अफगानिस्तान, चीन, मंगोलिया, ताईवान, नेपाल व भूटान जैसे देशों से भी विद्यार्थी यहाँ आते और संगीत-कला के विशेषज्ञ बनकर अपने देशों को जाते। …इस तरह वह विश्वविद्यालय अमर-कीर्ति का सृजक हो गया। अँग्रेजों की मैडम यहीं आ जातीं तो नवाबों की बीबियाँ हरम में बैठकर सीखती थीं।

आज भी वह विश्वविद्यालय शान से चल रहा है। …एशिया का सर्वश्रेष्ठ संगीत-विश्वविद्यालय कहलाता है …भारत में कहीं भी यदि संगीत सिखाया जाता है तो वह इस विश्वविद्यालय से ही सम्बद्ध है।

बड़ी रानी अब और भी जलती-भुनती जा रही थी …अब तो उसका पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा था। प्रतिदिन किसी न किसी बात को लेकर कहा-सुनी होती और वातावरण विषाक्त हो जाता। इससे राजा अपने को बड़ा अपमानित अनुभव करते थे। सारे राज्य में लोग इनके किस्से चटखारे लेकर प्रसारित करते रहते थे।

अंततः अँग्रेज मित्रों की सलाह से उसके भरण-पोषण के लिए पर्याप्त धन एवं महल देकर उसे अलग कर दिया गया।

राजा उसके व्यवहार से अवसाद में चला गया था… दुर्बल होता जा रहा था …और बड़ी रानी इसका दोष भी छोटी रानी के संदिग्ध चरित्र पर लगाती रही थी। महल की कलह का रूप भयंकर था। …आखिर एक दिन राजा का देहावसान हो गया… राजकुमार विजयसिंह भी रोगों से लड़ते हुए मारा गया। दोनों की राजकुमारियों का विवाह भी मुश्किल से किसी तरह हो गया।

इधर भारत आजाद हो चुका था। दूसरी रानी ने अपने को राजा का वारिस सिद्ध किया तो बड़ी रानी ने भी अपना अधिकार जताया। दोनों विधवायें आज भी कोर्ट में खड़ी हैं … छोटी रानी कहती है - “जब राजा ने जीते-जी तुम्हारे हिस्से का दे दिया था तो अब तुम्हें कुछ भी क्यों मिलना चाहिए?”

बड़ी रानी कहती है - मैं बड़ी हूँ …मेरा हक है …मेरे पास राजकुमार था …तुम्हारे पास तो केवल एक लड़की मात्र है …तुम्हें क्या करना है?"

यह बहस आज भी ख़त्म नहीं हुई… महलों पर सरकारी ताले लग गये हैं और खजाने सरकारी लॉकअप में चले गए हैं …न्याय होने तक वे सब बंद रहेंगे …संपत्ति पर जाले लग रहे हैं।

दोनों रानियाँ अपने कर्मचारियों के घर में किराए के मकान में रहती हैं और उनके आलीशान महल में आज भी कर्मचारी रहते हैं, …कुत्ते पलते हैं, …विद्यालय चलता है, …सब कुछ ठीक चल रहा है …आज भी ख्याति एवं इतिहास की सुगन्ध फ़ैल रही है …बस, दोनों वृद्ध विधवायें आज भी दुख भोगने को अभिशप्त हैं।

काश! सौतिया-डाह न होती… दोनों मिलकर रहतीं। सच है, ईर्ष्या की अग्नि सबको भस्म कर देती है, …लौकिक सम्पदा भोगने का पुण्य भी। पति एवं राजकुमार को भस्म करके भी दोनों को ही समझ में नहीं आ रहा है। एक कुछ देने को तैयार नहीं है तो दूसरी मरने से पहले सब कुछ पाना चाहती है। दो बिल्लियों की लड़ाई में बन्दर की मौज है। 80-90 वर्ष की उम्र वाली रानियाँ देखो! कब तक गुरूर के सिंहासन पर बैठी रहती हैं।

एक दिन समाप्त हो चुके विशाल साम्राज्य और उसकी संपत्ति यहीं पड़ी रह जाएगी। और …दोनों आत्मायें शायद जन्म-जन्मातर तक वैर भँजाती रहेंगी। अहंकार एवं पर-द्रव्यों का स्वामित्व जो दुख न दे सो कम है! ऐसा अज्ञान कभी किसी के भी न हो। प्रेम-समता से इस लोक में एवं उसके फल में जन्मान्तरों में भी सुख होता है - यह समझें। विवाद-मुकदमे के कारण आज दोनों रानियाँ अपना सर्वस्व खो बैठीं, बस, गुरूर जिन्दा है। …न कीमती महलों का भोग कर सकीं, न वस्त्र-आभूषण का भोग; …किराये के घर में नौकरों के हाथों से दवा खा रही हैं और जीवन की साँझ की अंतिम घड़ियाँ व्यतीत हो रही हैं।

हाय री सौतिया-डाह!

19. जंक्शन दादी

महलका नाम के नगर में कभी 58 सदस्यों का भरा-पूरा परिवार रहता था, अब तो वह महानगर में बस गया है। उस परिवार में एक अनोखी दादी थीं। जब तक वे रहीं, सारे परिवार को बाँधकर रखा। सभी हँसी-खुशी रहते थे। अब वे दादी भी तो नहीं रही। अब तो इतिहास की यादें ही शेष हैं।

असली नाम किसी को याद ही नहीं था। परिवार एवं ग्राम में जंक्शन दादी के नाम से प्रसिद्ध थीं। बड़ी बूढ़ी परदादी, 98 वर्ष की, परन्तु पूर्ण स्वस्थ। चेहरे पर जवानी का राज्य था अर्थात् झुर्रियाँ नहीं थीं। दाँत पूरे थे, ओष्ठ से गुलाब का रंग झरता था। तत्त्वज्ञान से रंगी होने से मात्र पति की ही समाधि ही नहीं कराई, अपितु सारे ग्राम में अनेकों साधुओं-साध्वियों सहित अनेकों श्रावकों की भी कुशल परिचर्या सहित समाधि का मार्गदर्शन किया था।

परिश्रम एवं प्रसन्नता ही उनके स्वास्थ्य का राज था।

उनके घर में अनेकों बहुएँ थीं। शासकीय इंटर कॉलेज में अध्यापिका प्रियंका, हार्ट विशेषज्ञा डॉ. अंशु, मधुमिता, सरला, विमला, निर्मला, विरली, कान्या, विनन्या, श्रुति, काव्या, दिव्या, कुंती, अंती, प्रिया नाम की अनेकों बहुएँ और नात बहुएँ थीं।

किसी की कोई बात किसी दूसरे तक नहीं जा पाती थी और समाधान भी मिल जाता था। अतः सब उनके पास बैठकर अपने दुखड़े सुनातीं और बदले में समाधान लेकर जाती थीं।

महिला चौपाल की मानो वे अध्यक्षा ही हों; ग्राम के किसी भी घर में कोई समस्या आई नहीं कि जंक्शन दादी के पास महिलायें झट आ जातीं।

एक दिन की बात है। बत्तीस वर्षीय नात बहू प्रिया रोते हुए आ गई… सबसे पहले उसके सारे दुख सुन लिये, उसे गले लगाया… गोद में सुलाया… फिर उसके बालों को सँवारते हुए लाड़ करते हुए बोली - "तुम बहुत अच्छी हो… मुझे तो तुम जैसी बहू पूरे नगर में नहीं दिखती। वैसे दिक्कत कहाँ हैं?

प्रिया - “अरे! मैं ही मैं काम करती हूँ।”

दादी - “शेष?”

प्रिया - “वे सब… कुछ नहीं करतीं।”

दादी - “अच्छा (विस्मय से) तुम 58 लोगों के सारे कपड़े अकेले धो लेती हो?”

प्रिया - “नहीं, वो तो बड़ी भाभी सर्फ भरे पानी में भिगो कर चली जाती हैं… मँझली ब्रश करती है… सँझली निचोड़ देती है… बच्चे फैला देते हैं… नौकरानी उठा लेती है… दादी बैठे-बैठे तह कर देती हैं।”
दादी - “तो फिर इनमें से सोता कौन है?”
प्रिया - “कोई नहीं… परन्तु चौके में तो मैं ही अकेले लगी रहती हूँ। प्रियंका तो कुछ भी नहीं करती… सुबह-सुबह स्कूल पढ़ाने चली जाती है… आकर भोजन करना बस… आराम करने लगती है।”
दादी - “अच्छा, तो ऐसा कहो न प्रियंका काम नहीं करती… तुम तो सबको ही कामचोर कह रही थीं। मुस्कुराते हुए दादी बोली।”
प्रिया - “अरे! कोई कुछ काम नहीं करता… चूल्हे पर काम करो, तब पता लगे … कपड़े धोने में रखा ही क्या है? स्कूल चलीं गईं, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि घर में कोई काम ही नहीं करो।”
दादी - “जब वह बहू नहीं आई थी, तब बच्चे पढ़ने-लिखने में कैसे थे?”
प्रिया - “फिसड्डी … इतनी ट्यूशन लगाने पर भी बच्चे कमजोर रह जाते थे।”
दादी - “और अब?”
प्रिया - (खुश होते हुए) “अब तो सारे बच्चे टॉप कर रहे हैं… स्कूल में नाम हो रहा है अपने परिवार का।”

दादी - “और कितना कमा कर लाती है?”

प्रिया - “एक लाख … परन्तु उसका क्या आचार डालें? काम तो काम से होता है।”

दादी - “सही है … परन्तु उसके धन से चार नौकर काम पर लगकर उसके हिस्से का काम करते हैं और 75000 रुपये बचता भी है। और ट्यूशन पर दी जाने वाली फीस के 15000 भी बचते हैं। सब बच्चे उसे पसंद भी करते हैं, सबकी जिम्मेदारी उसकी है। किसी भी बहू को अपने बच्चों की चिंता नहीं हैं। बारह बच्चे कितने आराम से पढ़ रहे हैं।”

प्रिया - सो तो है, मेरे बस का नहीं है चिंटू … नर्सरी का होम-वर्क कराने में पसीना आ जाता है। पहले अल्फावेट तक नहीं लिख पाता था। ऊपर से ड्राइंग … डांस … पोयम… हे भगवान! कितना कठिन है!

दादी - “अब वह किससे पढ़ता है?”

प्रिया - “प्रियंका से।”

दादी - “तो उसे घर से अलग कर दें तो वह अपने आप घर के सारे काम कर लेगी। यहाँ तो करती नहीं है।”

प्रिया - (सोचते हुए) “नहीं,… फिर बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा कौन लेगा?”

दादी - “अब समझ में आया … सब काम कर रहे हैं … बस हमें दिखाई नहीं देता है। जो काम आपको आता है, वह आप करते हो। आवश्यकता पड़ने पर वह भी तो काम कर लेती है।”

प्रिया - "हाँ सो तो है … संडे को इमरती बनाई थी, ओह!

मैं तो खाते ही रह गई। वैसे उनके हाथों में रसायन है… जो भी बनाती हैं बड़ा स्वादिष्ट, और बड़े दिल से, परन्तु…।"

दादी - “परन्तु… क्या?”

प्रिया - “जो अंशु है, वह भी तो काम नहीं करती… डॉक्टर क्या बन गई… अपने आप को न जाने क्या समझती है!”

दादी - “(आश्चर्य से) अच्छा, अंशु की समस्या है… वह तो काम ही नहीं सीखी … करेगी कैसे? (दादी ने पक्ष लिया।)”

प्रिया - “कुछ भी हो, काम तो आना चाहिए न?”

दादी - “तुम एक काम करो… मैं उसे अलग कर देती हूँ… अपने घर की समस्या से अपने आप निपटेगी, अपने को क्या!”

प्रिया - “(सोचते हुए) नहीं, अलग मत करो… परन्तु घर के काम तो जरूर सीखना चाहिए न!”

दादी - “अरे! जब सर पर पड़ेगी तब अपने आप सीखेगी, अपने को क्या… वह बाजार में खाए, चाहे घर में बनाये… चाहे नौकर बनाएँ… अपने को क्या!”

प्रिया - (सोचते हुए) “लेकिन सारे घर के इलाज का क्या होगा? पिछले वर्ष उनके कारण ही तो मुंबई में मेरे पिताजी के दिल का इलाज फ्री में हो गया था। बड़ा सफल ऑपरेशन हुआ था। समय रहते दीदी ने सम्पर्क करके सही इलाज करा दिया था।”

दादी - “लेकिन वह काम तो नहीं कर सकती… फिर इसका क्या होगा?”

प्रिया - “मत करने दो… आजकल डॉक्टरों का अंधेर मचा हुआ है… नर्सिंग होम में लुटाई चल रही है… दीदी सबके स्वास्थ्य का बड़ा ध्यान रखती हैं। हैं भी बड़ी हँसमुख… सारे नगर में उनके
नाम के चर्चे हैं।”
दादी - “तो फिर?”
प्रिया - “कुछ नहीं … मैं जा रही हूँ।”
दादी - “कहाँ?”
प्रिया - “किचन में, मम्मी जी को बुखार है… उनके लिए
चिरायते का काढ़ा बनाना है।”
दादी - “मत बना… वे स्वयं बना लेंगी… नहीं तो कोई
और बना देगा।”
प्रिया - “ऐसा कैसे हो सकता है … जब मुझे बुखार आता
है तो सारा घर चिंता करता है। मम्मी जी तो रात को भी मेरे पास
ही सो जाती हैं। स्वयं अपने हाथ से दूध पिलाती हैं। मैं तो
चली…।”
दादी - “परन्तु तेरी समस्या का क्या हुआ? पुकारती रह
गई…।”
प्रिया - “समाधान।”
जंक्शन दादी उसे स्मित वदन देखती रह गई…।
एक दिन निर्मला बिसूर रही थी… “मैं कहाँ आ पड़ी… पूरे
घर का झाड़ू-पोंछा मैं ही करती रहूँ। साफ सफाई का ध्यान भी मुझे
ही रखना पड़ता है। मेरा पूरा दिन इसी में निकल जाता है हाय! मेरी
किस्मत फूट गई…।”
दादी ने प्रेम से समझाया… - “बेटे! आटा कौन
पीसता है?”

निर्मला (उदास-सी बोली) - “मशीन… इसमें क्या रखा है… खड़े रहो। बस… आटा तो स्वतः ही पिस जाता है। झाड़ू पोंछा करो तो खबर पड़े।”

दादी - (विस्मित नेत्रों से देखते हुए) “अच्छा, इतना कठिन है, यह कार्य? दूध लाना सरल है… तुम कल से दूध ले आना… झाड़ू पोंछा विरली कर लेगी, समझी!”

निर्मला - “नहीं बाबा! मेरे बसकी नहीं है… एक घंटा खड़े रहो… कहीं गाय नहीं पना रही, पना रही है तो पैर मार रही है…। कहीं सानी बन रही है… कहीं कोई दूध ढंग से नहीं नापता… पैसे का हिसाब रखो। और वहाँ की बदबू… उफ़…।”

दादी - “तो फिर कोई और काम पकड़ लो?”

निर्मला - “कौन-सा?” (आशा भरी नजरों से देखती हुई)

दादी - (जिज्ञासा शांत करते हुए)… “सब्जी लाने का?”

निर्मला - “नहीं, सब्जी-बाजार में सबके पसंद की सब्जी न लाओ तो बुराई होगी। फल ज्यादा आ जायें तो सड़ने का डर… कम आवें तो सबको न मिल पायें। सबके पसंद के फल अलग-अलग… सबका ध्यान रखो। भाव-ताव करो… बड़ी आफत है।”

दादी - “तो जो यह काम सम्हाल रही है, उसके बारे में क्या कहना है?”

निर्मला - “मधुमिता जीजी का कमाल है… यह काम तो वे ही अच्छे से कर सकती हैं।”

दादी - “देखो, जिसमें जो काम करने की योग्यता है, वह वही करे और दूसरे के काम को आसान भी न समझें और ईर्ष्या भी न करें तो; सारा घर प्रसन्नता से रह सकता है। अभी हमारे पल्ले एक-दो मुख्य काम ही तो होते हैं। अकेले में तो घर के सारे काम ही करने पड़ते हैं। ज़रा भी फुर्सत नहीं मिलती है।”
निर्मला (सिर हिलाते हुए) - “बात तो सही है।”
दादी - “तो…?”
निर्मला - “हाँ (स्मित वदन प्रणाम करते हुए) सही ही है।… अच्छा प्रणाम! आप हो तो समाधान का विश्वास है… दादीजी!”


एक दिन कमली शिकायत करने आ गई… उसका मन भारी था।
कमली - सिल्की बुआ जब देखो, तब बुराई करती रहती हैं… उनसे तो किसी का सुख देखा नहीं जाता है…।
दादी - अच्छा! सिल्की को आने दो… मैं उसे डाटूँगी … तू कहे तो मारूँगी भी।
कमली - नहीं मारना नहीं! कभी-कभार तो हमारे घर आती है। (उपेक्षा से पीछा छुड़ाते हुए) जैसी है, ठीक है, हमें क्या? वे ही भुगतेंगी।
दादी - अरे! गलती है तो उसके सुखमय जीवन के लिए उसे सुधारने की आवश्यकता तो पड़ेगी न?
कमली - अभी तक नहीं सुधरीं तो अब क्या सुधरेंगी।
दादी - यह तो कोई बात नहीं हुई, आखिर हमारे घर की लाड़ली ही तो है। आने दो… वैसे बुराई क्या-क्या की?

कमली - एक बात हो तो कहूँ … कभी किसी से किसी की बुराई, कभी किसी की किसी से … किसी के बारे में सुनकर तो राय नहीं बनाना चाहिए न?

दादी - ठीक है कमली!.. तुम डरो नहीं … सारी बातें बताओ … मैं उसे समझाऊँगी … आगे से वह भी किसी की बातों में नहीं आएगी। मैं भी तुम्हारे कहे अनुसार राय नहीं बना रही हूँ। उसके मन में उस समय क्या चल रहा था, जब उसने बुराई की… की भी या नहीं?.. यह सब निर्णय करना ही पड़ेगा।

(सिल्की बुआ एक दिन घर आईं तो मीटिंग बैठ गई।)

दादी - (दुलारते हुए) बेटे! किसी की बुराई क्यों करती हो?

सिल्की - मैं और बुराई… कभी नहीं करती। हाँ, सुधार के लिए अवश्य ही कुछ इशारे करती हूँ। अच्छी बातें कहना भी कभी-कभी कष्टप्रद हो जाता है।

दादी - तुमने कहा था कि कमली आलसी है?

सिल्की - नहीं, वे बैठे रहने वाले काम करती हैं; जिससे उनकी कमर में दर्द बन आया है। मैंने ही उनको सलाह दी थी कि थोड़े उठने-बैठने वाले काम किया करो… झाड़ू-पोंछा करोगी तो कमर का दर्द समाप्त हो जाएगा। एक ही प्रकार के काम करते रहने से भी बीमारी होती है। इसका आशय उन्होंने क्या समझा? क्षमा करो, परन्तु मैं आज भी उनके हित में यही सोचती हूँ।

दादी - बेटी कमली! तुझे क्या लगता है… बुआ ने गलत कहा।

कमली - परन्तु बार-बार तो नहीं कहना चाहिए।

दादी - हित की बात हितैषी ही बार-बार करते हैं। इसमें बुरा क्या है?

कमली - कुछ नहीं… (झेंपते हुए) बस, मोह को बुरा लगता है। बुआजी क्षमा करना… पैर छूती है।

सिल्की - कोई बात नहीं, मेरी अच्छी भतीजी… खुश रहो!

दादी मुस्करा रही थी।

एक दिन की बात है। तेरह वर्षीय कुनाल रोता हुआ आया “… दादी माँ! मुझे कोई प्यार नहीं करता… सब मारते हैं…” (नन्हीं गदियों से आँखों को मीढ़े जा रहा था) मुख के बाईस दाँतों के बीच में गुलाबी जिह्वा को घेरे उलटते ओष्ठ किले की दीवार के समान फैले हुए दिख रहे थे।

दादी ने गोद में ले लिया … (बलैयाँ लेते हुए) … “अरे! रे! क्या हुआ मेरे राजा बेटे को?.. किसने मारा? … कैसा फूल-सा चेहरा है, मेरे राजा बेटे का?.. कैसा लाल लाल हो रहा है?..
देखो तो कितने मोती गिर गये? (आँसू पोछते हुए) … चुप हो जा
बेटे। अब बोल, क्या बात है? किसने मारा है आपको?”

“मम्मी ने।” - (शिकायती स्वर में) कुनाल बोला।

दादी - “अच्छा! मम्मी ने मारा… कोई बात नहीं… अब
नहीं मारेगी, वह… मैं समझा दूँगी… अब खेल आओ, जाओ।”

कुनाल - “वोही तो… खेलने से मना कर रही है…।”

दादी - “क्यों? खेलना तो बच्चों का जन्म सिद्ध अधिकार
है।” (कुनाल का पक्ष लेते हुए।)

कुनाल - (खुश होते हुए) “मम्मी को इतनी-सी बात
समझ में नहीं आती…।”

दादी - “क्या कहती हैं, वो?”

कुनाल - “होमवर्क करो… अरे! बाबा रोज तो करता हूँ…
एक दिन न किया तो क्या होता है!..”

दादी - “होता है बेटे! भोजन रोज करते हैं… श्वास तो
सदा लेते हैं… रोज होमवर्क करते हैं तो मार भी तो रोज नहीं पड़ती
है न। एक दिन पड़ गई तो क्या होता है?”

कुनाल - “थोड़ी दया करो … मुझे नहीं पढ़ना।”

दादी - “अच्छा! आपको फेल होना अच्छा लगता है
क्या?”

कुनाल - “नहीं।”

दादी - “फर्स्ट रेंक बुरी होती है?”

कुनाल - “नहीं।”

दादी - “तो फिर पढ़ो मेरे राजा बेटे! रोज का काम समय पर करने की आदत से ही डॉक्टर, वकील, मैनेजर बनते हैं।”

कुनाल - “मम्मी मारती हैं… पापा से शिकायत करके पिटवाती भी हैं… फिर शिकायत उभरी।”

दादी - “अच्छा! लेकिन तुम्हारा नया स्वेटर किसने बुना था?”

कुनाल - “मम्मी ने।”

दादी - “साइकिल किसने दिलवाई थी?”

कुनाल - “पापा ने।”

दादी - “प्यार से कि पीटकर?”

कुनाल - “प्यार से।”

दादी - “मनपसंद नाश्ता लंच-बॉक्स में कौन रखता है?”

कुनाल - “मम्मी।”

दादी - “तुम्हारे मोज़े शूज कौन सम्हालता है?”

कुनाल - “मम्मी।”
दादी - “तो उसको नाना के घर भेज दें … हमेशा के लिए?”
कुनाल - “नहीं, दादी नहीं। फिर मेरे काम कौन करेगा?”
दादी - “मारती है न?”
कुनाल - “वह तो मेरी गलती पर, मुझे सुधारने के लिए मारती है।”
दादी - “तो फिर…।”
कुनाल - “कुछ नहीं… मैं जा रहा हूँ?”
दादी - “कहाँ, मेरे राजा बेटे!”
कुनाल - “होमवर्क करने।”
(कुनाल शांत-चित्त होकर पढ़ने बैठ गया, मम्मी-दादी सब उसके भोलेपन पर मुस्कुरा रहे थे।)


मधुमिता बहू के पिताजी बचपन में ही नहीं रहे, सो बचपन से ही उसे घर-बाहर के काम करने की आदत पड़ गई थी। उसे सब्जी, वस्त्र-चयन में महारत थी। वह दुकानदारों को देखते ही समझ जाती थी कि वह चालू है, उसकी नीयत में खोट है या ईमानदार है, सरल है, करुणा-प्रिय है - इत्यादि।
प्रिया गरीब घर से आई थी। संघर्ष करने में उसकी सानी नहीं थी। घर के सारे काम उसके बाएँ हाथ के थे; क्योंकि उसने घर में कभी नौकरानी नहीं देखी थी। वह पूर्ण स्वस्थ थी, परन्तु पीहर की गरीबी के कारण उसे अंतर में मानसिक दुर्बलता बनी रहती थी। उसे लगता, सब उसे दैन्यता से देखते हैं, कोई करुणा करे यह तो अच्छा नहीं लगता न! वह भी सारे घर जैसे वस्त्र पहनती, खाती-पीती… पति, देवर, जेठजी एवं ससुर का स्नेह, अपनत्व की कोई कमी न थी, परन्तु एक दिन दिव्या ने गुस्से में कह ही तो दिया … “सब पता है तुम्हारे खानदान का … ज्यादा तीन पाँच न करो, नहीं तो सब पोल खोल दूँगी।”

इस बात को लेकर अनेक दिनों तक हंगामा बना रहा। आखिर दिव्या ने अपने क्रोध के लिए क्षमा माँगी। और प्रिया ने दादी के समझाये पाठ के कारण सरल हृदय से उसे क्षमा कर दिया; क्योंकि वह अगले भव में स्त्री नहीं बनना चाहती थी और गरीब तो बिलकुल भी नहीं। मोह एवं क्रोध आदि का तो काम ही है शान्ति में खलल डालना।

सरला बिलकुल सरल थी, परन्तु पढ़ी लिखी दसवीं तक ही थी। सुंदर एवं शिष्ट थी, परन्तु पढ़े लिखे लोगों को बड़ी हसरत भरी नजरों से देखती थी। धार्मिक थी, दुनिया की ज्यादा गंध न थी। स्वाध्याय करते रहना उसे अच्छा लगता था। सारे घर को पुराण सुनाते समय सीखे नीति वचन उसे खूब याद थे… जब देखो, तब वह पद्मपुराण, यशस्तिलक चम्पू महाकाव्य से सुनाती रहती। प्रद्युम्न चरित्र, पांडव पुराण, महापुराण तो मानो उसके कंठ में ही बसे हो। जब-तब परिवार में उसके प्रवचन हुआ करते थे।

विमला हरियाणा तरफ की होने से उसकी भाषा में खड़ापन रहता था… शब्द उच्चारण का बहाव अलग-सा भासता था - “अरे! लोंडे इधर आ…” अब ऐसा तो इस तरफ कभी किसी ने सुना नहीं था। वहाँ तो लाड़ले बच्चे को लोंडा कहा जाता है। सुरेंदर, नरेंदर … परवचन आदि उच्चारण अनेकों दिनों तक सबको आनन्द देते रहे; क्योंकि संयुक्त अक्षर हरियाणा, पंजाब, दिल्ली तरफ आज भी नहीं होते हैं। उसके परिवार में आते ही कई दिनों तक हास-परिहास का वातावरण बना रहा। धीरे-धीरे बोली में सुधार आ गया।

निर्मला को बाह्य क्रियाओं का बड़ा पक्ष था। उसके बिना वह धर्म मानने को तैयार ही न होती थी। इस हठ से उसके लिए शास्त्र शस्त्र का कार्य करते थे। उसे कोई भी धर्मात्मा अच्छा नहीं लगता था। सबको शिथिलाचारी मानती थी। एक मुनिराज या साध्वी तक को अच्छा न मानती थी; क्योंकि औदयिक भाव में कहीं न कहीं कमी दिख ही जाती थी। कमियाँ घट कर मिटती हैं, परन्तु उसे तो यथाख्यात देखने की रुचि थी।

दादी जी ने समझाया “कमियाँ मात्र भगवान में नहीं होती हैं, शेष सब साधकों में कमियाँ होती हैं। तब ही तो उन्हें दूर करने के लिए साधनाशील होते हैं। बंध बिना मोक्ष नहीं, ऐसे ही कमी बिना सुधार कैसे होगा। कमियाँ होती हैं, वे बुरी नहीं हैं। हाँ, उनका पक्ष करना बुरा है। वे भी समय से चली जायेंगी।”

कुछ दिनों में उसे भी समझ में आ गया - "कमियों के कारण बच्चे घर से फेंक नहीं दिए जाते हैं, धैर्य और अपनत्व से अपनी संतान को पाला जाता है और एक दिन वही बालक योग्य समर्थ बनकर प्रौढ़ पुरुष सिद्ध होता है। ऐसे ही कमियाँ दिखने पर घृणा नहीं अपितु उसके प्रति करुणा, प्यार, धैर्य, अपनत्व और वात्सल्य से उसकी कमियों को नहीं पर उसे अपनाते हुए, उसकी पूर्णता की योग्यता का इन्तजार करते हैं। यह भी एक प्रकार की साधना है।

कान्या - मद्रास विश्वविद्यालय से पढ़ी लिखी थी। दर्शन विभाग में विभागाध्यक्ष थी। उसने जैनोपैथी में डॉक्टरेट की डिग्री ली थी। उसे सेमिनारों में बुलाया जाता था। उसके लेख समाचार पत्रों में भी छपते थे, रेडियो टीवी पर उसके नजरिये की बड़ी प्रशंसा होती थी। महावीर जयंती पर उसका कार्यक्रम अनेकों देशों में सुना-देखा गया था।

विनन्या - शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य करने में दक्ष थी, शरीर बिलकुल लोच पूर्ण और कमनीय था, परन्तु दादी के अनुशासन में उसने पर-पुरुषों की हाजिरी में नृत्य करने का त्याग कर दिया। घर में डांस क्लास एवं कॉलेज में संगीत की प्राध्यापिका है। उसके वदन पर किसी ने घमंड की छाया तक नहीं देखी। घर के काम करने में मानो उसके अंग-अंग नृत्य करते हो। बालों में गजरा लगाना सबने उससे सीखा था।

श्रुति - इसका जापा बिगड़ गया था। इस कारण थोड़ी मोटी लगने से उसे दीनता बनी रहती थी। कमर एवं सिर में दर्द भी बना रहता था। ऊपर से हँसती, परंतु अंदर से रोती रहती थी। दादी की कृपा से उसने असाता एवं नाम कर्म की प्रकृतियाँ समझीं और सहज शांत जीवन जीने लगी। आखिर मोटा-पतला, रूखा-चिकना, हल्का-भारी, स्वर आदि सब नाम कर्म की प्रकृतियों की ही तो देन है… उसमें किसी का क्या दोष है…। जरूर पूर्व भव में किसी के अंगोपांग का उपहास किया होगा, सो अब न करने का संकल्प लिया है। घर में भी किसी ने मोटापे को लेकर उस पर कभी कटाक्ष नहीं किया।
काव्या - इसके हाथ की रसोई बड़ी स्वास्थ्यवर्धक एवं स्वादिष्ट बनती थीं। सारा घर-परिवार उसके हाथों से बने व्यंजन एवं मिष्ठान्न की माँग करते थे और वह भी नित नवीन चीजें बनाकर खिलाती रहती थी। उसने मातृत्वपूर्वक सबको प्रेम से भोजन कराना सीखा था। सब उसकी मदद करके रसोई कला में पारंगत होती रहती थीं। इस तरह रसोई बनाने का भार उस अकेली पर नहीं रहता था। ननदें ससुराल में इनकी रसोई कला के कारण प्रसिद्धि पा रही थीं। मक्के की खीर, चावल की वरी, मैथी की भाजी का हलवा, अरहर का पराठा, रोटी के पकोड़े कभी आपने सुने हैं? … परन्तु उसके हाथों से बने हुए ये व्यंजन ननदों की ससुराल में भी चाव से खाए जाते थे। इस घर में कभी कोई चीज व्यर्थ सड़कर नहीं फिकी। उतना ही बनता जितना खाया जाता, जितना खाया जाता, उतना ही बनता… आखिर यह सब कैसे सम्भव है…। दादी जी की बुद्धि का कमाल है। सुबह की रोटी शाम को खाई जाती, परन्तु मुरब्बे या आचार के रूप में और वह भी लड़कर अर्थात् चाव से। सामान बच गया तो भी फिका नहीं। हाँ, गाय, भैंस, बकरी को भी पर्याप्त भोजन मिलता था और वह भी समय से। सब्जियों के छिलके सदा सड़ने से पहले उन तक पहुँचते थे।
दिव्या - नात-बहू थी। बड़ी चंचल … चुलबुली, परन्तु फिर भी सबको प्रिय। आखिर बाग़ में सभी तरह के फूल खिले होने से कौन रोक सकता है। और यही तो बाग़ को सुंदर बनाता है। इस घर की यही विविधता लोगों को विस्मय पैदा करती है कि कोई दुखी क्यों नहीं? सबके स्वभाव के साथ कैसे रहा जा सकता है?

दादी इसके साथ खूब समय व्यतीत करती। दुनिया, देश-विदेश, राजनीति की जानकारी पाकर हर्ष व्यक्त करती और बीच-बीच में उस ही में से हित शिक्षा बताती जाती। फिर सारे घर में उसके ज्ञान की प्रशंसा करती… देखो, दिव्या ने कितनी अच्छी बात बताई, मुझे तो ज्ञात ही नहीं थी। सब समझो… दुनिया में रहना और उसका ज्ञान करना बुरा नहीं है… उसमें डूबना बुरा है। बताओ, आजकल फिल्मों में ऐसे गंदे गाने एवं नाच भी होता है। ये बताते थे… पहली बार मूक फिल्म में हरिश्चन्द्र की पत्नी का रोल करने को वेश्या तक तैयार नहीं हुई थी। आखिर अपने रसोइया को ही स्त्री के रोल के लिए तैयार किया था। बताओ, आज कल की बिटियें स्वेच्छा से ही वेश्या से भी गया-बीता काम करती हैं। अपने पिता, पुत्र, पुत्री, पति किसी की भी लाज भय नहीं।

नव्या - सबसे छोटी नात बहू थी। अभी पिछले साल ही आई थी। इसके पास शृंगार हाव-भाव का ही काम था। घूमने-फिरने से कोई रोकता भी नहीं था। पाँच साल तक कोई किसी को कुछ भी नहीं सिखाता, परन्तु पाँच साल में सब कुछ आने लगता और वह भी बिना झगड़े के। धीरे-धीरे कब वह दूध में शक्कर की तरह घुल जाती और इस घर के संस्कार एवं कार्य-व्यवहार में ढल जाती किसी को खबर ही नहीं पड़ती। सच है, बड़े परिवार में नया सदस्य भी शिशु की तरह सब कुछ सीख जाता है। इस बहू ने कभी भी घर से दूर रहने की नहीं सोची।

कुंती की अपने पति सुखकुमार से नहीं बनती थी। वह बड़ों की अवज्ञा करता था, धन कमाने का उसे बड़ा अहंकार था। पत्नी के कम पढ़ी लिखी होने से वह उसे कुछ न समझता था, परन्तु दादी जी के प्रयत्नों से पाँच वर्ष में ही दोनों में बड़ा स्नेह हो गया।

समय तो लगता ही है… उसके मित्रों की सुंदर पढ़ी-लिखी पत्नियाँ मोबाइल पर, परपुरुषों से बातें करते हुए पकड़ी गईं… तलाक से उनके घर बिखरने लगे… उनके बच्चों को मजबूरी में होस्टल में डालना पड़ा… गृह-क्लेश से उसके एक मित्र ने तो आत्महत्या भी कर ली। तब उसे समझ में आया कि उसकी पत्नी कितनी समझदार, शीलवान, सेवा-शील है। सारे घर को प्रसन्न रखती है, सारे रिश्तेदार उसका सम्मान करते हैं।

विरली बड़ी गहरी स्वाध्यायशील स्त्री थी। उसने कभी कोई शिकायत नहीं की। हाँ, उसे साधना का गहरा भाव था और वह दीक्षा की प्रतीक्षा में अनासक्त भाव से घर में रहती थी। उससे किसी को कोई शिकायत भी नहीं थी। सब उसको समझते एवं उसकी साधना की अहमियत समझकर उसे आदर देते थे। पाप-पुण्य, साता-असाता के उदय में उसकी मुस्कान एवं समता दर्शनीय-स्तुत्य बन गई थी। उसने छह प्रतिमाओं का पालन शुरू कर दिया था। मात्र पति की कामना पूर्ण करने के सिवाय अन्य कोई विकल्प शेष न था। पचासवें वर्ष में पति आज्ञा से उसने सातवीं प्रतिमा ले ली। सबने उसके ब्रह्मचर्य की अनुमोदना की।

थोड़े दिनों बाद वह आर्यिका संघ की शोभा बन गई। आज वह गणिनी पद की शोभा वृद्धि कर रही है।

विरली तो दीक्षा लेकर चली गई, परन्तु उसकी स्वाध्याय के समय लिखी डायरी आज भी हम सबको मार्गदर्शन दे रही है। देखो न! उसके अनुभव कितने सुंदर जो हैं।

दिनांक 2-5-26, तत्त्वार्थसूत्र 1/16

बहुबहुविध : अपने दोषों के बारे में अनेक प्रकार से सोचना चाहिए, लेकिन दूसरों के बारे में तो एक ही प्रकार से सोचना चाहिए कि ‘यह निर्दोष है और भगवान बनने लायक है।’

क्षिप्र : अपनी कमियों के बारे में शीघ्रता से सोचना चाहिए जबकि मोह सोचना भी नहीं चाहता। हाँ, दूसरों के दोष देखने, कहने, सोचने में धैर्य होना चाहिए।

अनिःसृतः : व्यक्त में जो दिख रहा है, वह कर्मोदय का विपाक मात्र है; अतः अव्यक्त भगवान देखने का उद्यम करो। जल्दी किसी से प्रभावित न होओ। धैर्य रखो… पुद्गल (भोजन, वस्त्र, ख्याति) में सुख दीखता है, परन्तु है किंचित् मात्र भी नहीं।

अनुक्त : क्या कहा जा रहा है? यह महत्त्वपूर्ण है, यह महत्त्वपूर्ण नहीं होता है कि कौन कह रहा है? कैसे कहा रहा है? कब कह रहा है…? “उक्त से अनंतगुना अनुक्त होता है।” अतः उक्त के स्थान पर अनुक्त को समझकर दूसरे के चारित्र या व्यक्तित्व को अच्छे से समझ सकते हैं।

ध्रुव : क्षणिक (बुराई, असाता, लाभ-हानि) उदय अध्रुव है, परन्तु हम उन्हें अपने दिमाग में सतत चलाकर ध्रुववत् देखकर बिना बात भगवान अनुभवने से दूर होते जाते हैं। यही तो अंतराय कर्म का उदय एवं बंध है।

● न बदला लो, न किसी को बदलने की अपेक्षा रखो, मात्र ज्ञाता रहो; क्योंकि ऐसे ही जीव सदा सर्वत्र मिलते रहेंगे और मैदान छोड़कर भागने की व्यवस्था नहीं है।

● संयोग एवं उदय कभी खराब नहीं होता है। हाँ, दृष्टिकोण सुधार कर सुखी अवश्य हो सकते हैं।

● विरुद्ध बात सुनकर भी सफाई मत दो, न ही माँगो। समय शक्ति बर्बाद हो जायेगी। आस्रव-बंध होगा। इतना ही समय स्व-पर को भगवान देखने-दिखाने में लगाओ।

● धैर्य मोक्षमार्ग का प्राण है। बाहर के प्रसंग नहीं रोके जा सकते हैं। क्रोध, मान, माया, लोभ के प्रसंग कदम-कदम पर बनते रहेंगे।

● निर्दोष पार्श्वनाथ एवं सीताजी को उदय आता है तो हमारे उदय में क्या आश्चर्य है।

अंतिम संकल्प : हम सब भगवान बनकर रहेंगे।

अंतिम शुभेच्छा - आप हमारे दोषों को क्षिप्रता से क्षमा कर दें।


अंती की पुत्री मंद बुद्धि थी। अपने काम भी स्वयं अपने हाथों से नहीं कर पाती थी, परन्तु सबने उसका नाम रखा तीक्ष्णा। सब उसे बड़ा प्यार करते थे और उसे सुप्रिया कहकर बुलाते थे। वह सबकी गोदों में पली। 17 वर्ष की उम्र में वह चल बसी… परन्तु आज भी सब उसके मानव भव की दुर्लभता की बातें करते हैं। दादी जी ने सदा उसका विशेष ध्यान रखा… सब उसको ‘आत्मा’ कहकर पुकारने लगे थे। यह देह तुम नहीं हो… वह यह सुनकर प्रसन्न होती थी। उसने भी स्वयं को कभी हतभागी नहीं माना… अंत समय में उसने दादी की गोद में ‘हूँ भगवान’ सुनते हुए प्राण त्यागे थे।

इस घर में सभी एक-दूसरे के सुख-दुख में सही अर्थों में सहभागी थे। एक भी व्यक्ति दुखी रहे, भोजन न करे तो अन्य कोई भी सदस्य भोजन नहीं करता था। सबसे पहले उसे ही भोजन का मंगल करना होता था। अतः नाराजी टिक ही नहीं पाती थी।

दादी कहा करती थीं कि जिस समय किसी को गुस्सा आ रहा हो, उस समय उसे शांति से सुनो; क्योंकि वह तीव्र आकुलता में है। उसे समझाने से कोई लाभ नहीं होगा, उलटे क्रोध ही भड़केगा। उसे लगना चाहिए कि कोई तो है जो उसकी प्रतिक्रिया को; रोने, चिल्लाने, चीखने, उदासी, रूठने को समझता है।

प्रत्येक व्यक्ति को लगना चाहिए कि घर में उसकी अहमियत है। हमें उसके कार्य की सराहना करना चाहिए, साथ ही बताना चाहिए कि सबकी अहमियत है…। घड़ी का प्रत्येक पुर्जा अपना काम करता है, तब ही घड़ी समय से चलती है। घर में सुख-शान्ति का आधार होता है समन्वय… कोई किसी को कम न समझे। तब ही तो आराम से समाधि होती है।

दादी अक्सर महिला चौपाल में पारिवारिक समस्याओं को सुलझाने आमंत्रित की जातीं।

कई बार नई-नई बहुएँ उनसे पूछतीं - “कितना अच्छा हो यदि घर में कोई किसी को बुरा न कहे, रोके टोके नहीं… अरे! दूसरों के दोष देखने की आवश्यकता ही क्या है?”

उनका समाधान था -

"घर में ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई किसी की बुराई न करे। बुरी बात को बुरी कहना-सोचना सम्यग्ज्ञान है। पाप का उदय आने पर तो सही बात भी बुरी लगती है। अच्छे की सलाह भी टोकना, कमेंट्स लगती है। लगता है - ‘मुझे मत सिखाओ’… ‘बड़ी आई सिखाने वाली’… ‘खुद ही सुधर जाओ पहले’… आदि आदि।

परन्तु इस समय तो मोह को ही बुरा लगता है, आत्मा को नहीं … यहाँ व्यक्ति बुरा नहीं होता है … थोड़ी देर बाद वही व्यक्ति स्वीकार करता है कि बात तो सही है।

“बचपन से ही कुछ गलत धारणाएँ बन जाती है, जैसे - स्पष्ट मत बोलो, सामने बुराई मत करो, दबो नहीं, बुराई करने वाला दुश्मन होता है …। परन्तु बड़ों के आगमोचित निर्देशन में इन धारणाओं को तोड़ना भी चाहिए; क्योंकि गलत को गलत कहना-सुनना-समझना सम्यग्ज्ञान है।”

जब भी किसी परिवार में धन को लेकर झगड़ा कलह होता, तब दादी समझातीं -

"देखो! झगड़े की जड़ बुरे लोग नहीं, बुरी सोच है। जैसे हम दूसरों के दोषों के बारे में अनेक दृष्टिकोणों से सोचते हैं, परन्तु अपने नहीं। हमारी बुराई से होने वाली धार्मिक-आर्थिक हानि, सम्बन्धों में खटास, इस भव एवं पर भव में होने वाले पाप के उदय के बारे में ज़रा सोचो तो बुरा व्यवहार स्वतः ही दूर होता जाएगा। मोह के विरुद्ध लड़ना बड़ा पुरुषार्थ है; क्योंकि मोह को यह सब विचारना बर्दाश्त कहाँ होता है।

आखिर दादी कितनी क्लास पास थी?

ऑफ़्फ़ो! यही तो अफ़सोस है कि जिनको सारे पढ़े-लिखे लोग चाहते थे, वे स्वयं कभी स्कूल पढ़ने नहीं गईं। जीवन की पाठशाला में उनने वह सब पढ़ा था, जो दुनिया में सुख से रहने एवं मोक्ष जाने के लिए पर्याप्त था। ग्राम की महिलाओं के जापे सुधारने, स्वास्थ्य के मामले में वे कुशल वैद्य थीं। उन्हें ग्रन्थ पढ़े बिना लगन से सुनकर याद रह जाता था। उनके सामने कोई चार अनुयोग से भटक कर चर्चा-वार्ता या व्यवहार नहीं कर सकता था।

तब ही तो सबकी समाधि कराते-कराते स्वयं ने भी सानन्द समाधि की। आज भी उनका एक बहुत बड़ा चित्रपट समाज ने मन्दिर जी में लगवाया हुआ है। उनकी प्रसन्न मुद्रा आज भी मानो कह रही हो कि सांसारिक सुख और मोक्षमार्ग के लिए अलग से कुछ नहीं करना है। सब आत्माओं को सिद्ध-समान देखो… करुणा स्वयमेव आ जायेगी। सब प्रसन्न हों तो आप दुखी कैसे रह सकते हो!

स्व-पर को भगवान देखना सचमुच सुखी होने का सबसे बड़ा मन्त्र है।

दादी के नारे

खूब काम, करो निष्काम।
आनन्द ही परमौषधि है।

20. आत्मघात नहीं, आत्मसाधना

मुंबई स्थित कॉलोनी के एक घर से रात्रि 11 बजे।

“कुछ सुनती है तू…? कब से चिल्लाये जा रहा हूँ और तू है कि अब तक एक कप चाय भी लेकर नहीं आई। दफ्तर में बॉस की चक-चक और घर में तेरी उपेक्षा।”

“तुम्हें दिखता नहीं… मैं खाली थोड़े ही बैठी हूँ। इस तुम्हारी फौज के लिए सुबह से शाम तक काम में ही जुटी रहती हूँ। कभी रसोई में तो कभी राशन की कतार में। जब से तुम्हारे घर आई हूँ, मैंने तो कभी चैन की साँस ही नहीं ली। एक मिनट की भी फुरसत नहीं मिलती मुझे तो। मेरी जिंदगी तो नरक से भी बदतर बन कर रह गई है।”

पति राकेश और पत्नी निर्मला का यह नाटक एक दिन का हो तो भी खैर हो, परन्तु यह महाभारत तो प्रतिदिन सुबह से ही चालू हो जाती थी।

विश्व के मध्य लोक स्थित घरों से ऐसी आवाजें सुनाई देने का आश्चर्य नहीं हो सकता, अतः समाधान देने का एक प्रयास तो किया ही जा सकता है।

राकेश ने कई बार विचारा - “जहर खुद खा लूँ या इन सब को दे दूँ।” और आखिर एक रविवार अनमना-सा चल पड़ा, बोरीवली स्थित पोदनपुर के पीछे आठ किलोमीटर दूर संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान की गुफाओं एवं पहाड़ की ओर…।

भाग्यवशात् भद्राचार्य जी उस ही वन में एक वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ मिल गये। उन्हें देखकर वह वहीं पर रुक गया।

वह सोचने लगा - “ये सुखी हैं तो क्यों…? सुख के बाह्य साधन तो नहीं हैं। शायद कोई अन्तरंग में साधन होना चाहिए।”

जिज्ञासा से भरे राकेश ने प्रणम्य मुद्रा को प्रणाम किया… मन की जिज्ञासा भी सामने रखी।

“आप बिना सुविधाओं के कैसे नग्न दिगम्बर सहज शांत दिख रहे हैं?”

“मेरे पास तो करोड़ों रुपये हैं, सर्व सुविधाएँ हैं, मात्र पत्नी बच्चे अनुकूल नहीं परिणमते हैं, इसी से दुखी हूँ।”

आचार्य (स्मित वदन) - “सुख सदा स्वाधीन होता है, सुविधा पराधीन होने से सुख का कारण नहीं हो सकती है। सुख एवं सुविधा का अंतर समझो वत्स! आत्मघात कोई सुखी होने का उपाय नहीं है… भेद-विज्ञान करते हुए सर्वत्र सुखी रह सकते हो।” (अंतर्मुख मुद्रा शांत थी।)
राकेश (विस्मित था) - “हाँ प्रभो! मैं अपने दुर्विचारों पर शर्मिंदा हूँ, लेकिन गृहस्थी में रहते हुए सुखी कैसे हुआ जाये?”
आचार्य - “तुम हालातों से नहीं, मिथ्यात्व से दुखी हो। भावना ही विपरीत है… सभी जीवों को बदलना चाहते हो, सत्य यह है कि कोई भी जीव दूसरे जीवों जैसा एवं स्वयं भी सदा एक जैसा नहीं सोच सकता है। तुम वृथा ही दुखी हो रहे हो। सबको अपने समान भगवान आत्मा देखो, फिर देखो। शान्ति स्वयमेव ही जीवन में अवतरित हो जायेगी।”
राकेश घर आकर विचार करता रहा…। यदि मैं भगवान आत्मा हूँ तो वह भी तो भगवान आत्मा ही है। मैं उदय से परेशान हूँ तो क्या वह सिद्धालय में रह रही है? उसको भी तो उदय-प्रमाण पीड़ा होती होगी… मैं काम करता हूँ तो क्या वह निरंतर काम नहीं करती रहती। ऊपर से जब मैं हारा-थका घर पहुँचता हूँ तो हाथ-पैर दबाती है, सिर की मालिश कर देती है। फिर भी मैं अपना गुस्सा उस पर ही निकालता रहता हूँ।
आज रात में राकेश को नींद नहीं आ रही थी…। पूर्व जीवन की दुखद स्मृतियाँ आराम से सोने नहीं दे रही थीं। उसे करवटें बदलते देखकर पत्नी भी न सो सकी।
निर्मला - “क्या बात है? कोई कष्ट हो तो बोलो… उपाय करूँ?”
“नहीं, तुम सो जाओ…। कहते हुए राकेश रुँआसा हो गया। निम्मो! मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ… तुमने क्या नहीं किया मेरे एवं मेरे परिवार के लिए, मेरे बच्चों के लिए और एक मैं दुष्ट पुरुष हूँ, जो तुम्हारे कष्टों से कोई सरोकार न रखते हुए तुम्हें ही सताता रहता हूँ। आज मन ग्लानि से भर रहा है…। काश! तुम्हारा जीवन खुशहाल होता। किसी भद्र पुरुष के योग्य थी… तुम सीता हो… परन्तु मैं राम नहीं हूँ…। ग्लानि नेत्रों के द्वार से बह रही थी।”

निर्मला - (बड़े प्रेम से बालों को उँगलियों से सहलाते हुए) “तुम ही मेरे राम हो… मेरे ही कर्मों के उदय में मैं स्त्री बनी…। सारे रिश्ते के पुरुषों को अच्छे से जानती हूँ…। मिथ्यात्व अवस्था में सुख कैसे हो सकता है? हर घर में अपेक्षाओं का ही दुख है। आज आपने मुझे क्या नहीं दिया? इस घर में सब प्रकार की सुविधाएँ हैं… मुझे धर्म करने, दान देने की आजादी है। मैं तो भाग्यशाली हूँ, जो आप जैसा पुरुष मेरा स्वामी है।”

राकेश - “मैं कितना गुस्सा करता हूँ… और तुम मुझे अच्छा कह रही हो?”

निर्मला - “जहाँ प्यार एवं अपनत्व होता है, वहाँ दिल पारदर्शी हो जाता है…। आप उसे गुस्सा क्यों कहते हो? क्या मैं भी आपसे चाहे जैसा नहीं कह देती हूँ? हम दोनों ‘दो शरीर एक प्राण’ ऐसे ही नहीं हैं। मानसिक थकान कहीं किसी अपने को ढूँढती है जहाँ वह अपना गुस्सा वमन कर सके। क्रोध तो बड़ा बुरा होता है, वह सुख-सुविधा का ध्यान नहीं रखता है, उपेक्षा करता है, तिरस्कार करता है।”

राकेश - “तुमने मेरी दादी एवं मम्मी की जो समाधि के समय सेवा की है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। पिताजी एवं भैया को कोरोना के समय जो अपनत्व देकर सेवा-परिचर्या की है, वह सारे नगर में स्तुत्य हो गई है और मैं उस समय भी तुम पर मेरी उपेक्षा करने का आरोप लगाता रहा।”
निर्मला - “वह तो धर्मात्मा का सहज कर्तव्य है … मैंने वही किया, जो एक आम स्त्री करती। सचमुच उनसे मुझे धैर्य एवं समाधि सीखने को मिली है। रही आपकी बात … जिस समय मैथुन संज्ञा सताती है, उस समय कुछ नहीं सूझता है…। भला भूख के समय भी कोई शांत रह सकता है?”
राकेश - “आगे से मैं तुम्हारा ध्यान रखूँगा…, बुरा नहीं बोलूँगा।”
निर्मला - “बुरा नहीं बोलते थे… और बोलने का ढंग आगे भी नहीं बदलेगा।”
राकेश - “सुधार तो करना ही चाहिए?”

निर्मला - “सुधार तो अभिप्राय में होता है… वचन तो उदय एवं बंध की योग्यता प्रमाण निकलते हैं। उसे आप और मैं दोनों नहीं बदल सकते हैं।”
राकेश - “तो तुम्हें मेरा बुरा नहीं लगता था?”
निर्मला - “लगने की कौन कहे? जिसे लगता था, वह भी मैं नहीं, मेरी क्षणिक कषाय ही होती थी… वह तो आगे भी रहेगी…। हाँ, स्थायी रूप से बुरा नहीं मानती; क्योंकि… हम दोनों कर्मोदय से भिन्न भगवान हैं और भगवान बनने के लिए जन्मे हैं। दोष आपके एवं मेरे, दोनों के समय से घट कर मिटेंगे। अतः धैर्य से स्व-पर की कषाय को देखती-जानती रहती हूँ।”
राकेश - “ये सब अच्छी बातें तुमने कहाँ से सीखीं?”
निर्मला - “आपके द्वारा दी गई स्वतन्त्रता से… मैं शेष समय में स्वाध्याय करती हूँ, मन्दिर में सत्संग करती हूँ। पूर्व जन्म के उदय प्रमाण रहती हुई नया बंध नहीं करने की इच्छा से नवीन निदान नहीं करना चाहती हूँ।”
राकेश - “तुम जैसी पत्नी पाकर मेरा भाग्य खुल गया…। अब तो भगवान से एक ही भावना भाता हूँ… जन्म-जन्म में तुम ही मेरा साथ निभाओ।”
निर्मला (संकोच सहित मुस्कुराकर) - “परन्तु मैं ऐसा नहीं चाहती…। यह निदान बड़ा महँगा है…। इसके लिए या तो तुम मेरा पीछा करोगे… या मैं आपका।”
राकेश - “क्या मतलब?”
निर्मला - "साथ रहने का मतलब है… नरक, तिर्यंच, मनुष्य, देवगति में साथ-साथ जन्म-मरण। मैं नहीं चाहती कि नाग-नागिन, कुत्ता-कुतिया बनते फिरो…। अब तो सिद्धालय में मिलेंगे, इससे पहले कहीं न मिलें।

राकेश की नींद अब भी उड़ गई… तब तक मुर्गों की आवाज आने लगी, निर्णय किया - "अब वह भी परिग्रह घटाकर, व्यवसाय मर्यादित करके आज से स्वाध्याय करके आत्महित में लगेगा।

“जीवन की समस्या का समाधान आत्मघात नहीं, आत्म-साधना है।” यह उक्ति चरितार्थ हो गई।

खलनायक

वीतरागता का कोई शत्रु नहीं होता है। राग ही शत्रुता का जन्मदाता है। वास्तव में शत्रु नाम का कोई द्रव्य नहीं होता है, वहाँ तो उसका परिणमन मात्र होता है, परन्तु अज्ञानी उसमें अपनी मान्यता का उपचार करके शत्रु-मित्रता की कल्पना करता है। अतः धैर्य ही अवलंबन है; कोई उत्तर या प्रतिक्रिया समाधान नहीं है। यही हमारी विजय है। यही हमें निर्विकल्प दशा में लाकर आत्म-लीन बनाएगा।

अंत में विजेता होने पर भी हम लघुता नहीं खोयेंगे। अपनी विजय में उनकी हार जो नहीं दिख रही है; उनके क्षमा भाव के जन्म में उनकी विजय है। हमारा आनंद हमारी विजय है। कोई प्रतिक्रिया नहीं देना, कोई योजना नहीं बनाना हमारी विजय है। हमारे दुखी होने में हमारी पराजय है। वास्तव में तो हमारे दुखी होने का उपचार मात्र से वे शत्रु से दीखते हैं, हैं नहीं।

इसी पुस्तक से…

● कर्तव्य करने वाली स्त्री को शोक का अवसर नहीं होता है।

  • पृष्ठ-207

● सुख में नहीं, दुख में स्त्री के सतीत्व की परीक्षा होती है।

  • पृष्ठ-169

● जहाँ प्यार एवं अपनत्व होता है, वहाँ दिल पारदर्शी हो जाता है…।

  • पृष्ठ-267

● टोकना भारत की सबसे सुन्दर संस्कृति है।

  • पृष्ठ-116

● रत्नत्रय से आप सजें, इससे ज्यादा सजा तो कर्म भी नहीं दे सकते हैं।

  • पृष्ठ-196

● सुकांता ने आखिर मान लिया - मधुर सम्बोधन से मधुर सम्बन्ध इस ही प्रकार बनते हैं।

  • पृष्ठ-29

● भय से वस्तु-स्वरूप एवं मार्ग दोनों ही समझ में नहीं आते हैं।… अंध-विश्वास से संसार-मार्ग की ही वृद्धि हो सकती है।

  • पृष्ठ-41

● बेटे! असाता के उदय से ज्यादा हानि नहीं होती है, पर संक्लेश परिणामों से बंध होता है…। सम्बन्ध खराब होने से बड़ी हानि और दूसरी कौन-सी होगी?

  • पृष्ठ-59

ब्र. सुमतप्रकाशजी द्वारा रचित; हर वर्ग के लिए सदाचार, संस्कार, नैतिक मूल्यों एवं अध्यात्म से पूरित अन्य उपयोगी साहित्य पढ़ने के लिए QR Code SCAN करें तथा अन्य जानकारियों के लिए Website- WWW.SUMATPRAKASHJI.IN का अवलोकन करें।

सती अनंतमति
श्रीपाल चरित
परिवार चलाना है तो सीखना होगा
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