सागर की लहरें
( कविता-संग्रह )
प्रो. वीरसागर जैन
अनुक्रमणिका
- प्राकृत-काव्य
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- बाहुबलि-स्तुति
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- बाहुबलिस् पूअण
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- आरदी बाहुबलि सामिणो
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- देव-सत्थ-गुरु-वंदणा
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- अरिहंते तुह जुणणो (लोरी)
- संस्कृत-काव्य
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- नित्यं ध्यायन्ति योगिनः
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- प्रकीर्णिकाः
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- मोह-वर्णनम्
- हिन्दी-काव्य
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- महावीराष्टक स्तोत्र
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- पार्श्वनाथ-पूजा
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- भरत-स्तुति
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- तत्त्वज्ञान दोहावली
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- जिनवाणी अमृतवाणी
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- छोटा-सा मन्दिर बनाएँगे
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- कल मैंने इक सपना देखा
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- जीवन में करिये तप पाप
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- पयोनिधि विषयों से बचना
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- तुम नित्य निरन्तर भजन करो
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- पहले मन से तोलो / चोट्टी
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- उस पर कोई ध्यान न दो
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- एक कैरेट की अभिलाषा
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- हम करते हैं तो क्या हुआ
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- सब ऐसे बनाते भगवान्
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- आत्मा का हित होगा
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- आत्म-परिचय
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- चिन्तागम
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- छायानुवाद (प्राकृत-संस्कृत-काव्यों का)
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- जिनवाणी शतक (मुक्तक-संग्रह)
पूरी पुस्तक (PDF): सागर_की_लहरें_कविता_संग्रह_.pdf (0.5 MB)