क्या सभी धर्म परस्पर विरुद्ध रहते हैं
-प्रो. वीरसागर जैन
प्रश्न- स्याद्वाद में कहते हैं कि परस्पर विरुद्ध धर्मों का एकत्र अवस्थान होता है, परंतु क्या इस बात को भी एकांततः स्वीकार करना चाहिए?
उत्तर- नहीं, ऐसा नहीं है, सभी धर्म परस्पर विरुद्ध ही हों -ऐसा अनिवार्य नहीं है। जो धर्म परस्पर विरुद्ध हो सकते हैं वे ही होते हैं, शेष अनंत धर्म ऐसे भी होते हैं जो परस्पर विरुद्ध नहीं होते हैं। जैसा कि ‘धवला’ के इस कथन से भलीभाँति स्पष्ट होता है-
"अस्त्वेकस्मिन्नात्मनि भूयसां सहावस्थानां प्रत्यविरुद्धानां संभवो नाशेषाणामिति चेत् ? क एवमाह समस्तानाप्यवस्थितिरिति चैतन्याचैतन्यभव्याभव्यादिधर्माणामप्यक्रमणैकात्मन्यवस्थितिप्रसंगात्। किंतु येषां धर्माणां नात्यंताभावो यस्मिन्नात्मनि तत्र कदाचित्क्वचिदक्रमेण तेषामस्तित्वं प्रतिजानीमहे।(-धवला 1/1/11/167)
प्रश्न-जिन धर्मों का एक आत्मा में एक साथ रहने में विरोध नहीं है वे रहें, परंतु संपूर्ण धर्म तो एक साथ एक आत्मा में रह नहीं सकते हैं? उत्तर- कौन ऐसा कहता है कि परस्पर विरोधी और अविरोधी समस्त धर्मों का एक साथ आत्मा में रहना संभव है? यदि संपूर्ण धर्मों का एक साथ रहना मान लिया जावे तो परस्पर विरुद्ध चैतन्य-अचैतन्य, भव्यत्व-अभव्यत्व आदि धर्मों का एक साथ एक आत्मा में रहने का प्रसंग आ जायेगा। इसलिए संपूर्ण परस्पर विरोधी धर्म एक आत्मा में रहे हैं- अनेकांत का यह अर्थ नहीं समझना चाहिए, किंतु जिन धर्मों का जिस आत्मा में अत्यंत अभाव नहीं वे धर्म उस आत्मा में किसी काल और किसी क्षेत्र की अपेक्षा युगपत् भी पाये जा सकते हैं, ऐसा हम मानते हैं।
इससे ज्ञात होता है कि सभी धर्मों में नहीं, बल्कि यथायोग्य धर्मों में ही विरोध हैं।