आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी रचित रत्नकरण्ड श्रावकाचार के सम्यग्दर्शन अधिकार से प्रतिदिन एक श्लोक — विशेष रूप से अष्ट-अंग (जो रोज़मर्रा के व्यवहार्य भाव हैं)। यहाँ प्रतिदिन एक श्लोक क्रम से जोड़ा जाएगा।
श्लोक ४ — सम्यग्दर्शन का लक्षण
श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् ।
त्रिमूढापोढमष्टाङ्गं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥४॥
अर्थ — सच्चे देव (आप्त), शास्त्र (आगम) और गुरु (तपस्वी) — इन परमार्थभूत पदार्थों का श्रद्धान; जो तीन मूढ़ताओं से रहित हो, आठ अंगों सहित हो और आठ मदों से रहित हो — वही सम्यग्दर्शन है।
निःशंकित अंग — सम्यग्दर्शन का पहला अंग
इदमेवेदृशमेव, तत्त्वं नान्यन्न चान्यथा।
इत्यकम्पायसाम्भोवत्, सन्मार्गेऽसंशया रुचिः॥ ११॥
अर्थ — जैसे तलवार पर चढ़ी लोहे की धार निश्चल-अकम्प होती है, वैसे ही सन्मार्ग (आप्त-आगम-गुरु = सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र) के विषय में “तत्त्व यही है, ऐसा ही है, अन्य नहीं और अन्य प्रकार भी नहीं” — ऐसी निश्चल, संशयरहित श्रद्धा ही सम्यग्दर्शन का निःशंकित अंग है।
(रत्नकरण्ड श्रावकाचार, श्लोक ११ — आचार्य समन्तभद्र स्वामी)
निःकांक्षित अंग (श्लोक 12)
कर्मपरवशे सान्ते, दुखैरन्तरितोदये।
पापबीजे सुखेऽनास्था, श्रद्धानाकाङ्क्षणा स्मृता॥१२॥
अर्थ: जो सुख कर्म के अधीन हैं, नाशवान हैं, जिनका उदय दुःखों से घिरा हुआ है, और जो पाप के बीज रूप हैं — ऐसे सांसारिक (विषय) सुखों में चाह या आस्था न रखना, यही निःकांक्षित अंग (अनाकांक्षा रूप श्रद्धा) कहा गया है।
निर्विचिकित्सा अंग (श्लोक 13)
स्वभावतोऽशुचौ काये, रत्नत्रयपवित्रिते।
निर्जुगुप्सा गुणप्रीति-र्मता निर्विचिकित्सिता॥१३॥
अर्थ: यह शरीर स्वभाव से ही अशुचि (अपवित्र) है, फिर भी सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप रत्नत्रय के द्वारा यही शरीर पवित्रता व पूज्यता को प्राप्त होता है। ऐसे रत्नत्रय-पवित्रित शरीर में ग्लानि न करके गुणों में जो प्रीति होती है — वही निर्विचिकित्सा अंग है।
(स्रोत: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र स्वामी — सम्यग्दर्शन अधिकार)
अमूढदृष्टि अंग (श्लोक 14)
कापथे पथि दु:खानां, कापथस्थेऽप्यसम्मतिः ।
असम्पृक्तिरनुत्कीर्तिरमूढादृष्टिरुच्यते ॥१४॥
अर्थ: कुमार्ग (मिथ्यादर्शनादि, जो संसार-भ्रमण का मार्ग है) को, अथवा उस कुमार्ग में स्थित जीव को —
- मन से “यह कल्याण का मार्ग है” ऐसी सम्मति न देना,
- शरीर से (चुटकी बजाकर, सिर हिलाकर) प्रशंसा न करना,
- वचन से उसका संस्तवन न करना —
इस प्रकार मन-वचन-काय से कुमार्ग व कुमार्गी की प्रशंसा न करना ही सम्यग्दर्शन का अमूढदृष्टि गुण है।
(स्रोत: रत्नकरंड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र स्वामी — जैनकोष)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — उपगूहन अंग (श्लोक १५)
स्वयं शुद्धस्य मार्गस्य, बालाशक्तजनाश्रयाम् ।
वाच्यतां यत्प्रमार्जन्ति, तद्वदन्त्युपगूहनम् ॥१५॥
अर्थ: रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग स्वभाव से ही निर्मल-पवित्र है। परन्तु कदाचित् अज्ञानी (बाल) अथवा व्रताचरण में असमर्थ (अशक्त) जनों के निमित्त से यदि मार्ग या उसके धारकों में कोई दोष/अपवाद उत्पन्न हो, तो सम्यग्दृष्टि उसका निराकरण करते हैं — दोषों को ढँकते हैं, प्रकट नहीं करते। यही उपगूहन अंग है।
(स्रोत: jainkosh.org — मूल श्लोक + प्रभाचन्द्र टीका)
स्थितिकरण अंग (श्लोक 16)
दर्शनाच्चरणाद्वापि, चलतां धर्मवत्सलै: ।
प्रत्यवस्थापनं प्राज्ञै:, स्थितिकरणमुच्यते ॥१६॥
अर्थ: दर्शन (श्रद्धा) अथवा चारित्र से चलायमान होते हुए पुरुष को, धर्म में प्रेम रखने वाले प्राज्ञ जनों द्वारा फिर से उसी व्रत/मार्ग में स्थित कर देना — यह सम्यग्दर्शन का स्थितिकरण अंग कहलाता है। कोई जीव बाह्य आचरण करता हुआ भी श्रद्धा से भ्रष्ट हो जाता है, कोई दृढ़ श्रद्धानी होकर भी अशक्तता/प्रमाद से आचरण से भ्रष्ट होता है; धर्मवत्सल जनों का कर्तव्य है कि उन्हें पुनः धर्म में स्थिर करें।
(स्रोत: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र स्वामी — प्रभाचन्द्र टीका सहित)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — वात्सल्य अंग (सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक १७)
स्वयूथ्यान्प्रति सद्भाव-सनाथापेतकैतवा ।
प्रतिपत्ति-र्यथायोग्यं, वात्सल्यमभिलप्यते ॥१७॥
अर्थ: अपने सहधर्मी बन्धुओं के प्रति सद्भावना सहित — सरल भाव से, मायाचार रहित — यथायोग्य आदर-सत्कार (हाथ जोड़ना, सम्मुख जाना, प्रशंसा के वचन, योग्य उपकरण देना आदि) करना ही वात्सल्य अंग है। वात्सल्य = सहधर्मी बन्धुओं के प्रति धार्मिक स्नेह।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — श्लोक 18 : प्रभावना अंग
अज्ञानतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथम् ।
जिनशासनमाहात्म्य-प्रकाशः स्यात्प्रभावना ॥१८॥
अर्थ — अज्ञानरूपी अन्धकार के प्रसार को यथायोग्य दूर करते हुए जिनशासन के माहात्म्य का, उसके तप-ज्ञानादि के अतिशय का प्रकाशन करना प्रभावना अंग कहलाता है। यह सम्यग्दर्शन के अष्ट-अंगों में अंतिम (आठवाँ) अंग है।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — आप्त का लक्षण (श्लोक ५)
आप्तेनोच्छिन्नदोषेण, सर्वज्ञेनागमेशिना ।
भवितव्यं नियोगेन, नान्यथा ह्याप्तता भवेत् ॥५॥
अर्थ: जिनके क्षुधा-तृषा आदि शारीरिक तथा राग-द्वेष आदि दोष पूर्णतः नष्ट हो गये हैं, जो समस्त पदार्थों को उनकी विशेषताओं सहित स्पष्ट जानते हैं (सर्वज्ञ), और जो आगम के ईश हैं — भव्य जीवों को हेय-उपादेय तत्त्वों का ज्ञान कराने वाले आगम के मूलकर्ता — वे ही सच्चे आप्त (देव) हो सकते हैं। जिनमें ये विशेषताएँ नहीं, वे आप्त नहीं।
(स्रोत: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, सम्यग्दर्शन अधिकार — मूल एवं प्रभाचन्द्र टीका)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — आप्त का लक्षण (श्लोक ६)
क्षुत्पिपासाजरातङ्क-जन्मान्तक-भयस्मयाः।
न रागद्वेषमोहाश्च यस्याप्तः स प्रकीर्त्यते॥६॥
अर्थ: जिस देव में क्षुधा, तृषा, जरा, रोग, जन्म, मृत्यु, भय, मद, तथा राग, द्वेष और मोह — ये अठारह दोष नहीं पाये जाते, वही सच्चा आप्त (देव) कहलाता है।
आगम/शास्त्र का लक्षण
आप्तोपज्ञमनुल्लङ्घ्यमदृष्टेष्टविरोधकम्।
तत्त्वोपदेशकृत्सार्वं शास्त्रं कापथघट्टनम्॥९॥
अर्थ: जो शास्त्र आप्त (सर्वज्ञ वीतराग देव) के द्वारा कहा गया हो, जिसका इन्द्रादि भी उल्लंघन न करें, जो प्रत्यक्ष व अनुमान प्रमाणों के विरोध से रहित हो, सात तत्त्वों/छह द्रव्यों के यथार्थ स्वरूप का उपदेश करने वाला हो, सब जीवों का हित करने वाला हो, और मिथ्यामार्ग का निराकरण करने वाला हो — वही सच्चा आगम/शास्त्र है।
गुरु / तपस्वी का लक्षण (श्लोक 10)
विषयाशावशातीतो निरारम्भोऽपरिग्रहः।
ज्ञानध्यानतपोरक्तः तपस्वी स प्रशस्यते॥१०॥
अर्थ: जो पंचेन्द्रिय के विषयों (माला, स्त्री आदि) की आकांक्षा की अधीनता से पूर्णतः रहित — इन्द्रियविजयी — हैं, जिन्होंने खेती आदि आरम्भ का त्याग कर दिया है, जो बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रह से रहित हैं, तथा ज्ञान-ध्यान-तप रूपी रत्नों में सदा लीन रहते हैं — वही सच्चे तपस्वी गुरु प्रशंसनीय हैं।
(स्रोत: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र स्वामी — प्रभाचन्द्र टीका)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — आप्त की निःस्वार्थ देशना (मुरज दृष्टान्त)
अनात्मार्थं विना रागै:, शास्ता शास्ति सतो हितम्।
ध्वनन् शिल्पिकरस्पर्शा-न्मुरज: किमपेक्षते॥८॥
अर्थ — आप्त (सर्वज्ञ देव) राग रहित होकर, बिना किसी स्वार्थ के, समीचीन भव्य जीवों को हित का (स्वर्ग-मोक्ष के साधनरूप सम्यग्दर्शनादि का) उपदेश देते हैं। लाभ-पूजा-ख्याति की अभिलाषा उनमें नहीं, इसलिए उनकी देशना केवल परोपकार के लिए होती है। जैसे बजाने वाले के हाथ के स्पर्श से बजता हुआ मृदंग अपने लिए कुछ अपेक्षा नहीं करता, वैसे ही सर्वज्ञ केवल जीवों के हित हेतु शास्त्र की देशना करते हैं।
(यह श्लोक आप्त-स्वरूप के पश्चात् आगम/शास्त्र-स्वरूप में प्रवेश कराता है — आप्त की वीतराग देशना ही आगम की प्रामाणिकता का आधार है।)
स्रोत — रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र स्वामी · सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ८ (jainkosh.org, मूल + प्रभाचन्द्र टीका)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — अष्ट अंग की अनिवार्यता (श्लोक २१)
नाङ्गहीनमलं छेत्तुं दर्शनं जन्मसन्ततिम्।
न हि मन्त्रोऽक्षरन्यूनो निहन्ति विषवेदनाम् ॥२१॥
टीकार्थ — जिन निःशंकितादि अंगों का वर्णन ऊपर किया है, उन अंगों से रहित विकलांग सम्यग्दर्शन संसार परम्परा का — जन्म-मरण की सन्तति का — नाश करने में समर्थ नहीं हो सकता।
इसी अर्थ का समर्थन करते हुए मन्त्र का दृष्टान्त देते हैं — जिस प्रकार किसी मनुष्य को सर्प ने काट लिया और विष की वेदना सारे शरीर में व्याप्त हो गई, तो उस विष को उतारने के लिए मान्त्रिक मन्त्र का प्रयोग करता है। यदि उस मन्त्र में एक अक्षर भी कम हो जाय तो जिस प्रकार उस मन्त्र से विष की वेदना दूर नहीं हो सकती, उसी प्रकार संसार-परिपाटी का उच्छेद करने के लिए आठ अंगों से परिपूर्ण सम्यग्दर्शन ही समर्थ है — एक-दो अंगों से रहित विकलांग सम्यग्दर्शन नहीं।
(मूल + प्रभाचन्द्र टीका — जैनकोष)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — श्लोक २२ : लोकमूढ़ता
आपगा-सागर-स्नानमुच्चय: सिकताश्मनाम्।
गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढं निगद्यते॥२२॥
टीकार्थ: नदी, सागर आदि में धर्मबुद्धि से — कल्याण का साधन समझकर — स्नान करना लोकमूढ़ता कही गई है; किन्तु शरीर प्रक्षालन के अभिप्राय से स्नान करना लोकमूढ़ता नहीं है। तथा बालू और पत्थरों के ऊँचे ढेर लगाकर स्तूप बनाना, पर्वतों से भृगुपात करना अर्थात् पर्वत की चोटी से गिरकर आत्मघात करना, अग्नि में प्रविष्ट हो जाना — इत्यादि कार्यों के करने में धर्म मानना, वह लोकमूढ़ता है।
सन्दर्भ: पिछले श्लोक में कहा गया कि सम्यग्दर्शन ‘त्रिमूढापोढ़’ अर्थात् तीन मूढ़ताओं से रहित होता है। उनमें प्रथम — लोकमूढ़ता।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — देवमूढ़ता (श्लोक २३)
वरोपलिप्सयाशावान् रागद्वेषमलीमसाः।
देवता यदुपासीत देवतामूढमुच्यते॥२३॥
अर्थ: जो पुरुष अपने इच्छित फल की प्राप्ति की अभिलाषा से राग-द्वेष से मलिन देवों की उपासना करता है, उसकी वह उपासना देवमूढ़ता कहलाती है।
टीका में स्पष्ट किया है — यदि धन-पुत्रादि वांछित फल की इच्छा से ऐसा किया जाए तो वह सम्यग्दर्शन की मलिनता का कारण है; किन्तु जैनशासन के संरक्षण-संवर्धन में निरत शासनदेवों का यथायोग्य आदर-सत्कार किया जाए, तो वह मलिनता का कारण नहीं होता।
(जैनकोष — मूल + प्रभाचन्द्र टीका)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — श्लोक २४ — पाखण्डिमूढ़ता (गुरुमूढ़ता)
सग्रन्थारम्भहिंसानां संसारावर्तवर्तिनाम्।
पाषण्डिनां पुरस्कारो ज्ञेयं पाषण्डिमोहनम्॥२४॥
अर्थ: जो दासी-दास आदि परिग्रह, खेती आदि आरम्भ और अनेक प्रकार की हिंसा से सहित हैं तथा संसार-भ्रमण कराने वाले हैं, ऐसे (मिथ्या वेषधारी) साधुओं की प्रशंसा करना, उन्हें धार्मिक कार्यों में अग्रसर करना पाखण्ड मूढ़ता है। गुरु के विषय में जो अविवेक है, वह पाखण्ड मूढ़ता है। इन तीन मूढ़ताओं (लोक, देव, पाखण्डी) से रहित सम्यग्दर्शन ही संसार के उच्छेदन का कारण है।
(आचार्य समन्तभद्र स्वामी — सम्यग्दर्शन अधिकार; प्रभाचन्द्र टीका के आधार पर)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — श्लोक २५ (अष्ट मद)
ज्ञानं पूजां कुलं जातिं, बलमृद्धिं तपो वपु:।
अष्टावाश्रित्य मानित्वं, स्मयमाहुर्गतस्मया: ॥२५॥
अर्थ: जिनका मद नष्ट हो गया है, ऐसे जिनेन्द्रदेव कहते हैं — ज्ञान, पूजा-प्रतिष्ठा, कुल (पिता का वंश), जाति (माता का वंश), बल, ऋद्धि (बुद्धि/धन-वैभव), तप और शरीर — इन आठ के आश्रय से जो गर्व होता है, वह मद है। (शिल्प/कला का मद ज्ञानमद में ही गर्भित है, इसलिए आठ ही।)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — श्लोक २६ — मद का दोष (धर्मात्माओं का तिरस्कार)
स्मयेन योऽन्यानत्येति धर्मस्थान् गर्विताशयः।
सोऽत्येति धर्ममात्मीयं, न धर्मो धार्मिकैर्विना ॥२६॥
अर्थ: जिन आठ मदों का पहले वर्णन हुआ, उनके विषय में अहंकार करता हुआ जो पुरुष रत्नत्रय-रूप धर्म में स्थित अन्य धर्मात्माओं का तिरस्कार करता है, अवज्ञा से उनका उल्लंघन करता है — वह जिनेन्द्र-प्रणीत अपने ही रत्नत्रय धर्म का तिरस्कार करता है, क्योंकि रत्नत्रय का पालन करने वाले धर्मात्माओं के बिना धर्म नहीं रह सकता।