रत्नकरण्ड श्रावकाचार — मद का निषेध कैसे हो (श्लोक 27)
यदि पापनिरोधोऽन्यसम्पदा किं प्रयोजनम्।
अथ पापास्रवोऽस्त्यन्यसम्पदा किं प्रयोजनम्॥२७॥
अवतरणिका: कुल, ऐश्वर्य आदि से सम्पन्न मनुष्यों के द्वारा मद का निषेध किस प्रकार किया जा सकता है, यह कहते हैं—
टीकार्थ: विवेकी जनों को ऐसा विचार करना चाहिये कि यदि मेरे ज्ञानावरणादि अशुभ कर्मों के आस्रव को रोकने वाले रत्नत्रय-धर्म का सद्भाव है, तो मुझे कुल-ऐश्वर्य आदि अन्य सम्पदा से क्या प्रयोजन है? क्योंकि उससे भी श्रेष्ठतम सम्पत्ति-रूप रत्नत्रयधर्म मेरे पास विद्यमान है। इस प्रकार का विवेक होने से उन कुल-ऐश्वर्यादि के निमित्त से अहङ्कार नहीं होता। इसके विपरीत यदि ज्ञानावरणादि अशुभ कर्मरूप पाप का आस्रव हो रहा है — मिथ्यात्व, अविरति आदि आस्रवभाव विद्यमान हैं — तो अन्य सम्पदा से क्या प्रयोजन है? क्योंकि उस पापास्रव से दुर्गति गमन आदि फल की प्राप्ति नियम से होगी; ऐसा विचार करने से कुल-ऐश्वर्य आदि का गर्व दूर हो जाता है।
(स्रोत: जैनकोश — मूल श्लोक + आचार्य प्रभाचन्द्र कृत टीका)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — श्लोक २८ · जाति-कुल मद का निषेध
सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातङ्गदेहजम्
देवा देवं विदुर्भस्मगूढाङ्गारान्तरौजसम् ॥२८॥
टीकार्थ: चाण्डाल कुल में उत्पन्न होने पर भी यदि कोई पुरुष सम्यग्दर्शन से सम्पन्न है तो वह आदर सत्कार के योग्य है, ऐसा गणधरादिक देव कहते हैं । क्योंकि ‘देवा वि तस्स पणमन्ति जस्स धम्मे सया मणो’ — जिसका मन सदा धर्म में लगा रहता है उसे देव भी नमस्कार करते हैं, ऐसा कहा गया है । अतएव ऐसे व्यक्ति का तेज भस्म से प्रच्छादित अंगारे के भीतरी तेज के समान निर्मलता से युक्त है ।
पद-विवरण (टीका): देवम् = आराध्यम् · विदुः = मन्यन्ते · मातङ्गदेहजमपि = चाण्डालमपि · सम्यग्दर्शनसम्पन्नं = सम्यग्दर्शन से युक्त · भस्मगूढाङ्गारान्तरौजसं = भस्म से ढका अंगार, जिसका भीतरी ओज विद्यमान है ।
अष्ट मद प्रकरण: श्लोक २५ में कुल और जाति भी आठ मदों में गिनाए गए थे; यहाँ दृष्टान्त द्वारा उन्हीं का मूलोच्छेद किया गया है ।
(स्रोत: रत्नकरंड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र स्वामी — मूल + आचार्य प्रभाचन्द्र टीका)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार — धर्म और अधर्म का फल (श्लोक 29)
श्वापि देवोऽपि देवः श्वा जायते धर्मकिल्विषात्
कापि नाम भवेदन्या सम्पद्धर्माच्छरिरीणाम् ॥२९॥
अर्थ: सम्यग्दर्शनादिरूप धर्म के माहात्म्य से कुत्ता भी देवपर्याय को प्राप्त कर लेता है, और मिथ्यात्वादि अधर्म-पाप के उदय से देव भी कुत्ता हो जाता है। इस तरह धर्म का अद्वितीय माहात्म्य है कि जिससे संसारी प्राणियों को ऐसी सम्पदा की प्राप्ति होती है जो वचनों के द्वारा कही नहीं जा सकती — इसलिए प्रेक्षावानों को धर्म का ही अनुष्ठान करना चाहिए।