पुण्यों की जब तक मिठास है वीतरागता नहीं सुहाती ।
जड़ की रुचि में चिन्मूरति की रुचि कभी न भाती ।।
चेतन के प्रति अकर्मण्य है और अचेतन के प्रति कर्मठ ।
निजभावों से है विरक्त परभावों की चिरपरिचित हठ ।।
इन्द्रिय सुख में अरे अतीन्द्रिय सुख की व्यर्थ कल्पना करता ।
अनुभव गोचर वस्तु सहज है रागातीत विराग न वरता ।।
सहजभाव संपदायुक्त है तो भी इस पर दृष्टि न जाती ।
पुण्यों की जब तक मिठास है.
परममत्व की मादकता से तत्त्वाभ्यास नहीं हो पाता ।
पर में जागरूक रहता है निज में स्वयं नहीं खो पाता ।।
ज्ञायक होकर ज्ञान न जाना और ज्ञेय में ही उलझा है ।
ध्याता ध्यान ध्येय ना समझा अंत न अब तक यह सुलझा है ।।
तर्क कुतर्क मान्यता मिथ्या भव भव में है इसे रुलाती ।
पुण्यों की जब तक मिठास है.
महावीर का अनुयायी है महावीर को कभी न माना ।
रागवीर ने हेय बताया इसने उपादेय ही जाना ।।
पाप हेय है यह तो कहता किन्तु पुण्य में लाभ मानता ।
मोक्षमार्ग में दोनों बाधक यह सम्यक् निर्णय न जानता ।।
भूल भूल ही इस चेतन को भव अटवी में है अटकाती ।
पुण्यों की जब तक मिठास है.
साधक साध्य साधना साधन का विपरीत रूप है माना ।
स्वयं साध्य साधन सब कुछ है इसे भूल भटका अनजाना ।।
चिदानंद निर्द्वंद निजातम का आश्रय ले अगर बढे यह ।
तो निश्चय पुरुषार्थ सफल हो मुक्ति भवन सोपान चढे यह ।।
ज्ञान पृथक है राग पृथक है ऐसी निर्मल सुमति न आती ।
पुण्यों की जब तक मिठास है.
वीतराग विज्ञान ज्ञान का अनुभव ज्ञान चेतना लाता ।
कर्म चेतना उड जाती है निज चैतन्य परम पद पाता ।।
वीतराग निजमार्ग यही है केवल लो अपना अवलंबन ।
रागमात्र को हेय जान निज भावों से काटो भवबंधन ।।
तत्त्वों की सम्यक् श्रद्धा से मोक्ष संपदा है मिल जाती ।
पुण्यों की जब तक मिठास है..
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ ८०