प्राणों से भी प्यारा है, तीरथ हमारा।
ऊँचे-ऊँचे शिखरों वाला है, तीरथ हमारा ॥ टेक ॥
चन्द्र प्रभु की टोंक देख लो, पार्श्व प्रभु के चरण पूज लो।
मंगलमय अविकारा है, तीरथ हमारा ॥1॥
भावों से हम करें वंदना, मन में कोई नहीं कामना।
वैराग्य बढ़ावन हारा है, तीरथ हमारा ॥ 2 ॥
हिल-मिल कर हम भक्ति रचावें, ज्ञान जगावें मोह नशावें।
वात्सल्य बढ़ावन हारा है, तीरथ हमारा ॥3॥
सर्व प्रपंचों को हम छोड़ें, निज उपयोग सु निज में जोड़ें।
बंध मिटावन हारा है, तीरथ हमारा ॥4॥
अपने में सिद्धत्व निहारें, सबको आप समान विचारें।
आनंद बढ़ावन हारा है, तीरथ हमारा ॥ 5 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २९६ से २९७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’