प्राणी! सोऽहं सोऽहं ध्याय हो
प्राणी! सोऽहं सोऽहं ध्याय हो…
वाती दीप परस दीपक ह्वै, बूंद जु उदधि कहाय हो ।
तैसैं परमातम ध्यावै सो, परमातम ह्वै जाय हो ॥ प्राणी. ॥ १ ॥
और सकल कारज है थोथो, तोहि महा दुखदाय हो।
‘द्यानत’ यही ध्यानहित कीजे, हूजे त्रिभुवनराय हो ॥ प्राणी. ॥ २ ॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ३५
अर्थ
हे प्राणी! आत्मा का जो सिद्ध/शुद्ध रूप है मैं वह सिद्ध/शुद्धरूप हूँ, वह मैं हूँ - इसी तथ्य का निरन्तर ध्यान करो। दीपक के स्पर्श से संसर्ग में बाती भी दीपक कहलाने लगती है। जैसे एक-एक बूँद समुद्र की घटक है, वह एक बूँद भी समुद्र का एक अंश है - समुद्र है। समुद्र के साथ रहने से पानी की एक बूँद भी समुद्र कहलाती है। वैसे ही परमात्मा का ध्यान करनेवाले प्राणी ध्यान करते-करते परमात्मस्वरूप हो जाते हैं।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 118।
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