तर्जः म्हारी दीन तणी…
प्रभुवर ये ही भावना, मगन रहूँ निज माँहि हो ।। टेक ।।
निज को पहिचाने बिना, पाये दुःख अपार हो।
भेदज्ञान प्रभु दर्श तैं, अब उपज्यो सुखकार हो।। 1।।
देखन योग्य स्वरूप निज, दीख्यो प्रभुता रूप हो।
नित्य-निरंजन ज्ञानमय, शुद्ध चिद्रूप अनूप हो।। 2।।
दुर्वेदन दुर्विकल्पमय, अब तो सहो न जाय हो।
लीनी चरण-शरण प्रभु, आकुलता मिट जाय हो।। 3 ।।
परमानन्दमय ध्येय निज, ध्याऊँ क्षण-क्षण नाथ हो।
एकाकी निर्ग्रन्थ रहूँ, नहीं चाहूँ कुछ साथ हो।। 4।।
तृप्त निजानंद में अहो, झलके ज्ञेय अनन्त हो।
सहजहिं केवलज्ञान में, प्रभुता को नहीं अन्त हो ।। 5 ।।
सर्व जीव आनन्दमय, समझें आत्म स्वभाव हो।
अविनाशी शिव सुख लहें, नाशें सर्व विभाव हो।। 6।।
ईति-भीति व्यापे नहीं, नहिं आधि-व्याधि हो।
अखण्ड ज्ञानमय भावना, वर्ते सहज समाधि हो।। 7।।
सहज नमन आनन्दमय निर्विकल्प जिनराज हो।
आवागमन विमुक्त हो, पाऊँ सिद्ध समाज हो।। 8।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’