प्रभुवर ! संयम कब प्रगटे | prabhuvara samyama kaba pragate

प्रभुवर ! संयम कब प्रगटे।

निजानंद में तृप्त रहूँ विभु ! सर्व विकल्प मिटें ॥ टेक ॥
नया बंध होवे नहीं स्वामिन् ! चिद्विलास विलसे।
साम्य भाव वर्ते सुखकारी, पूरव कर्म कटें॥ 1॥

पर द्रव्यों में भले-बुरे का, मिथ्या भाव नशे।
क्रोध न होवे मान न आवे, माया लोभ मिटे ॥ 2 ॥

होऊँ जितेन्द्रिय परम अहिंसा परिणति में विलसे।
हो स्वरूप विश्रान्ति आनंदमय, इच्छा नहीं उपजे ॥ 3 ॥

निरतिचार निर्ग्रन्थ दशा हो, ज्ञानानंद वर्ते।
सहज अकिंचन जीवन होवे, ब्रह्मचर्य विलसे ॥ 4 ॥

बाह्य प्रतिष्ठा बाहरी वैभव, विभु ! निस्सार लगे।
ज्ञान-ज्ञान में होय प्रतिष्ठित, भाव यही सुफले ॥ 5॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’