प्रभुजी प्रभू सुपास
प्रभुजी प्रभू सुपास! जगवासतें दास निकास ॥टेक॥
इंदके स्वाम फनिंद के स्वाम, नरिंद के चन्द के स्वाम ।
तुमको छांड़के, किसपै जावैं, कौनका ढूंढ़ें धाम ॥1॥
भूप सोई दुःख दूर करै है, साह सोई दै दान ।
वैद सोई सब रोग मिटावै, तुमी सबै गुनवान ॥2॥
चोर अंजन से तार लिये हैं, जार कीचक से राव ।
हम तो सेवक सेव करै हैं, नाम जपैं मन चाव ॥3॥
तुम समान हुए न होंगे, देव त्रिलोक मँझार ।
तुम दयाल देवों के देव हो, ‘द्यानत’ को सुखकार ॥4॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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