तर्ज : पायो जी मैंने जैन धरम धन पायो …
प्रभुजी मन मंदिर में आओ।
नाथ पुजारी हूँ मैं तेरा, सेवक को अपनाओ ।। टेक।।
शुद्ध हृदय से करूँ वीनती, आतम ज्ञान सिखाओ।
पर परिणति तज निज परिणति का सच्चा, भाव कराओ ।। 1 ।।
मैं तो भूल गया था तुमको, तुम ना मुझे भुलाओ।
जीवन धन्य बनाऊँ अपना, ऐसी राह सुझाओ।। 2।।
कर्म जटिल हैं संग न छोड़ें, इनसे मुझे बचाओ।
करके दया वृद्धि सेवक पर, आवागमन मिटाओ।। 3।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७२ से ७३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’