प्रभु यही भावना होती है’,
ऐसा आने वाला पल हो, प्रभु यही भावना होती है।
हो परिणति परिणति ज्ञानमयी, जीवन अनंत आनंदमय हो ॥ टेक ॥
भ्रमते-भ्रमते चिरकाल हुआ, सुख की न मिली किंचित् छाया।
झूठे संकल्प-विकल्पों में, अकुलाया व्यर्थ ही भरमाया ॥
सौभाग्य महा जिनधर्म मिला, प्रभु यही भावना होती है ॥ 1 ॥
दृष्टि स्वभाव पर टिकी रहे, आचरण ज्ञान समतामय हो ।
प्रभु स्वयं स्वयं में तृप्त रहूँ पर की किंचित् अभिलाष न हो ॥
निर्ग्रन्थ रहूँ निर्द्वन्द्व रहूँ प्रभु, यही भावना होती है॥ 2 ॥
निज वैभव मैं सन्तुष्ट रहूँ, बस निजानंद में लीन रहूँ।
हो कर्त्ता-कर्म अनन्य सहज ही ज्ञाता-दृष्टा मात्र रहूँ ॥
भोगों की वांछा लेश नहीं, प्रभु यही भावना होती है ॥ 3 ॥
वैराग्य भाव अन्तर वर्ते, निर्ग्रन्थ मार्ग अनुसरण करूँ।
भाते-भाते चैतन्य भावना, अक्षय शिव सुख वरण करूँ ॥
हो चुका थकित भव-भव भ्रमते, प्रभु यही भावना होती है ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’