प्रभु यही भावना होती है, निर्ग्रन्थ दशा मंगलमय हो ॥ टेक ॥
श्रद्धान सहज सम्यक् वर्ते, श्री देव-शास्त्र अरु गुरुओं का ।
श्रद्धान सहज सम्यक् वर्ते, जीव अजीवादि नव-तत्त्वों का ॥ 1 ॥
श्रद्धान सहज सम्यक् वर्ते, आतम का और अनातम का।
श्रद्धान सहज सम्यक् वर्ते, निज चित्स्वरूप शुद्धातम का ॥ 2 ॥
अतिचार नहीं कोई लागे, भय भी हमसे भय कर भागे।
अन्तर में तत्त्व भावना हो, वृद्धिंगत आत्म साधना हो ॥ 3 ॥
अन्तर का बल बढ़ता जावे, रागादिक मल धुलता जावे ।
अंतर में सहज विराग धार, परिग्रह प्रपंच में लात मार ॥4॥
गुरुवर के चरणों में जावें, मुनि दीक्षा की अनुमति पावें।
कर केश लौंच अपने कर से, अति प्रीति धार आतम घर से ॥ 5 ॥
शुद्धोपयोगमय धर्म धरें, उपसर्गों से भी नहीं डरें।
परीषह जीते धर सहज भाव, निज पद पाने का परम चाव ॥ 6 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९५ से १९६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’