तर्ज : रत्नत्रय श्रृंगार है …
प्रभु वीतराग पद वंद्य रे ।। टेक ।।
सौम्य दशा अवलोकत उपजे सहजहिं परमानन्द रे ।। 1 ।।
गुण चिन्तत ही भेदज्ञान हो, नशे सकल दुख द्वन्द्व रे ।। 2 ।।
अन्तर में प्रत्यक्ष दिखावे, आतम आनन्द कन्द रे ।। 3 ।।
सहज होय निर्ग्रन्थ भावना, छूटे परिग्रह फन्द रे।। 4 ।।
होय दिगम्बर साधें निज पद, अविनाशी निर्बन्ध रे ।। 5 ।।
धन्य-धन्य जिनदर्शन महिमा, कैसे कहूँ मतिमंद रे ।। 6 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’