प्रभु! तुम नैनन-गोचर नाहीं
प्रभु! तुम नैनन-गोचर नाहीं …
मो मन ध्यावै भगति बढ़ावै, रीझ न कछु मनमाहीं॥प्रभु. ॥१॥
जनम-जरा-मृत-रोग-वैद्य हो, कहा करैं कहां जाहीं॥प्रभु.॥२॥
‘द्यानत’ भव-दुख-आग-माहिंतैं, राख चरण-तरु-छाहीं॥प्रभु.॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ८१
अर्थ
हे प्रभु! आप इन्द्रिय-गोचर नहीं हो, इन नेत्रों से दिखाई नहीं देते, इस शरीर से देखे-जाने नहीं जाते। मेरा मन आपका ध्यान करता है और आपके प्रति अपनी भक्ति भावना को बढ़ाता है, उसमें वृद्धि करता है। मन में कोई मोह नहीं है। आप जन्म, बुढ़ापा, मृत्युरूपी रोग का निवारण करनेवाले वैद्य हो। आपको छोड़कर हम कहाँ जावें, क्या करें? द्यानतराय कहते हैं कि मुझे भव भव के दुःखों की दाह से, आग से बाहर निकालकर अपने चरण-रूपी वृक्ष की छाँह में रख लीजिए, शरण दीजिए अर्थात् तपन को दूरकर शीतलता प्रदान कीजिए।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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