तर्जः शुद्धात्मा ही शरणा…
प्रभु ! स्वाश्रित जीवन हो, स्वानुभवमय जीवन हो।
निस्पृह निरपेक्ष सहज, मंगलमय जीवन हो॥ टेक ॥
दुर्भागों में फँसकर, जीवन अनन्त खोये,
तृप्ति न मिली क्षणभर, दुःख के ही बीज सदा बोये ।
धिक् विषय-कषायों को, निवृत्तिमय जीवन हो ॥ 1 ॥
झूठी मृगतृष्णा दुःखमय पर की आशा,
आशा तृष्णा से ही हो चहुँगति में वासा।
अनुबन्ध नहीं कोई सन्तोषी जीवन हो ॥ 2 ॥
विभु ! भव-भव की पीड़ा, अब नहीं सही जाती,
प्रभुतामय थिरतामय तब शान्त दशा भाती।
ध्रुवदृष्टि शुद्धोपयोग, पुरुषार्थी जीवन हो ॥ ३॥
पर-आश्रित मोह अरु क्षोभ, स्वाश्रय से सहज मिटे,
दुःखमयी भव-बन्धन, स्वाश्रय से सहज कटे।
निर्ग्रन्थ निराकुल प्रभु समतामय जीवन हो॥ 4 ॥
स्वाधीन स्वयं में ही अनुभव-रस पान सदा,
झलके सब विश्व भले, निज में ही मग्न सदा।
बस सर्व विकल्पों से, प्रभु तुम सम जीवन हो ॥ 5॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४६ से ३४७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २२३