तर्जः जानूँ मैं जाननहारा …
प्रभु शान्त रूप सुखदाई, अद्भुत प्रभुता झलकाई ।
यह प्रभुता मुझको भाई, अंतर में स्वयं लखाई ।। टेक ।।
सब लोकालोक जनावे, पर एक विकल्प न आवे।
अद्भुत समता प्रगटाई ।। प्रभु. ।। 1 ।।
प्रभु सर्व विभाव नशाया, ध्रुव चिदानन्द पद ध्याया।
पंचमगति सहजहिं पाई ।। प्रभु. ।। 2 ।।
ज्ञाता स्वरूप दरशाया, परमानन्द उर न समाया।
मुक्ति निज में ही पाई ।। प्रभु. ।। 3 ।।
जिन हुआ भेद-विज्ञाना, अन्तर का लखा खजाना।
तृप्ति निज में ही पाई ।। प्रभु. ।। 4 ।।
बाहर में कुछ न सुहावे, बस जाननहार जनावे।
प्रभु समरस धार बहाई ।। प्रभु. ।। 5 ।।
चरणों में शीस झुकावें, थिरता प्रभु सम ही पावें।
बस यही भावना आई ।। प्रभु. ।। 6 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५६ से ५७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’