तर्जः धीर वीर गम्भीर बनेंगे…
प्रभु सम नहीं कोई उपकारी ।। टेक ।।
निज स्वभाव में लीन हुए जब,
प्रगटी दशा परम अविकारी।
रागादिक सब दोष विनष्टे,
हुए अनन्त चतुष्टय धारी।। 1।।
नहीं प्रयोजन शेष रहा कुछ,
प्रभु कृतार्थ चैतन्य-विहारी।
भव्य भाग्यवश खिरी दिव्यध्वनि,
सहज रूप जग मंगलकारी।। 2।।
शाश्वत सुखमय, तत्त्व बताया,
श्रद्धा-ज्ञान चरण हितकारी।
सम्यक् मुक्तिमार्ग समझकर,
हुए सहज ही शिवमगचारी।। 3।।
पाया प्रभु आदर्श आपका,
साधें समयसार सुखकारी।
हुआ सहज निष्काम निराकुल,
प्रभु चरणों में धोक हमारी।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’