तर्ज : दिन-रात मेरे स्वामी
प्रभु सहज भावना है, जीवन सहज-सहज हो।
होवे नहीं आडम्बर, निर्ग्रन्थता सहज हो॥ 1॥
निरपेक्ष तत्त्व अपना, होवे न कुछ अपेक्षा।
वर्ते सु ज्ञानधारा, आराधना सहज हो ॥ 2 ॥
परिपूर्ण प्रभु सदा ही, स्वयमेव स्वयं में ही।
निज में ही पूर्णता का, प्रभु अनुभवन सहज हो ॥ 3 ॥
होवे न कोई वाँछा, जागें नहीं कषायें।
प्रभु साम्य भाव वर्ते, आनन्द भी सहज हो॥ 4 ॥
एकाकी तृप्त निज में, नहीं संग की जरूरत।
शाश्वत स्व-ध्येय अनुपम, प्रभु ध्यान भी सहज हो ॥ 5 ॥
नाशें कर्म सहज ही, अविनाशी प्रभुता प्रगटे।
निर्मुक्त नित-निरंजन, प्रभु सिद्ध पद सहज हो॥ 6 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४३ से ३४४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’