प्रभु रूप लखत मेरे सुमति भयी | prabhu rupa lakhata mere sumati bhayi

तर्जः जिन देख मगन भयो…

प्रभु रूप लखत मेरे सुमति भयी ।। टेक ।।

देह, कर्म, रागादिक न्यारे, मैं चिन्मूरति ज्ञानमयी।
अक्षय प्रभुता अंतर में ही, दिखी परम आनंदमयी ।। 1 ।।

सर्व विकल्प असार दिखावें, भोग लगें अति दुःखमयी ।
मिथ्या जगत् प्रपंच न भावें, परिणति भई संवेगमयी ।। 2 ।।

धन्य-धन्य प्रभु दशा आपकी, अद्भुत ज्ञान विरागमयी ।
शीस नवाऊँ भावना भाऊँ, प्रगटे प्रभुता ज्ञानमयी ।। 3।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’