प्रभु पार्श्वनाथ की जय बोलो | Prabhu Parshvanath Ki Jay Bolo

प्रभु पार्श्वनाथ की जय बोलो।

जय बोलो-जय बोलो, मोह ग्रंथि क्षण में खोलो ।। टेक ।।

पन्द्रहमास रतन बरसे थे, जग के सब प्राणी हरषे थे।
प्राणत स्वर्ग से आकर प्रभुवर, मरुदेवी उर आन बसे थे ।। 1 ।।

अश्वसेन घर जन्म हुआ था, तिहुँ जग में आनन्द हुआ था।
इन्द्रादिक ने मेरु शिखर पर, प्रभुवर का अभिषेक किया था ।। 2 ।।

रहे बालयति सुखकारी, यौवन में दीक्षा धारी।
कमठ घोर उपसर्ग किया, रहे ध्यान में अविकारी ।। 3।।

क्षपक श्रेणी आरोहण करके, त्रेसठ प्रकृति नशाई थी।
गुणस्थान तेरहवाँ प्रगटा, केवल लक्ष्मी पाई थी।। 4।।

देवों ने रच समवशरण, प्रभु का बहुमान जताया था।
दिव्यध्वनि द्वारा प्रभु ने, जग को शिवपथ दर्शाया था।। 5 ।।

दिव्य तत्त्व विभु ! एक बताया, अखिल विश्व में निज शुद्धात्म।
कर्म मुक्त सम्मेदशिखर से, स्वामी हुए निकल परमात्म ।। 6 ।।

भाव सहित नित करो वंदना, निज शुद्धातम को पाओ।
भविजन आत्म-ध्यान द्वारा ही, अविनाशी पद प्रगटाओ ।। 7 ।।

Artist: ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’


स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ ११२

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