प्रभु को देखें भक्ति उल्लसे | prabhu ko dekhem bhakti ullase

प्रभु को देखें भक्ति उल्लसे ।। टेक ।।

धन्य स्वरूप है, धन्य है परिणति,
धन्य है मुद्रा, धन्य है वाणी।
धन्य भयो मैं जिनदर्शन से।। 1।।

धन्य अलौकिक अंतरंग वैभव,
अद्भुत जग में बाहरी वैभव।
इन्द्रादिक चरणों में नमते ।। 2।।

चरण नखों की दिव्य प्रभा से,
इन्द्रादिक के मुकुट प्रकाशे।
लोकालोक ज्ञान में भासे ।। 3।।

समवशरण की शोभा न्यारी,
देखत भागें भाव विकारी।
अन्तरीक्ष निर्लिप्त विराजे ।। 4।।

भक्त निहारें प्रभो आपको,
आप निहारें स्वयं आपको।
अविचल अन्तर्दृष्टि धरते ।। 5।।

प्रभो! आपके ही प्रसाद से,
निज प्रभुता निज में ही दरसे।
परमानन्द प्रगट्यो अनुभव से ।। 6।।

अहो ! अहो !! आदर्श हो जिनवर,
दशा आपसी होवे सत्वर ।
भक्ति सहित चरणों में नमते ।। 7।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३९ से ४०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’