प्रभु ज्ञायक का ही अनुभव होगा, कि अन्तर्दृष्टि रहे ।
तब ही पर्यय में सुख प्रकट होगा, कि पर्यय अन्तर झुके ।।टेक।।
पर्यय के ही मोह में, बीता काल अनन्त ।
अपरिणामी आत्मा, अव्याबाध अनन्त ।।
अब पर्यय में मोह का नाश, होगा कि पर्यय दृष्टि तजी ।।1।।
निश्चय अरु व्यवहार का जाना नहीं मरम ।
दोनो ही अन्तर में हैं, प्रगटा आत्म धरम ।।
मेरे निश्चय में मेरा वजन होगा, कि अन्तर्दृष्टि रहे ।।2।।
मेरी रचना में रहे, निज स्वरूप विस्तार ।
प्रभुता प्रगटे पूर्ण ही, प्रभु स्वयं त्रिकाल ।।
निज प्रभुता में ही मैं मगन होऊँगा, कि प्रभु प्रभु रूप दिखे ।।3।।
ज्ञान ही कर्ता, ज्ञान कर्म, ज्ञान करण प्यारा ।
सम्प्रदान अपादान भी, ज्ञान ही आधारा ।।
षट्कारक का भेद विलय होगा, कि आत्मा अन्तर दिखे ।।4।।
मैं ही मुझको मोहि में, मेरे हेतु त्रिकाल ।
मैं ही मुझमें रहे ध्रुवता रूप अपार ।।
अभेद कारक ही अनुभव रूप होयगा, कि ऐसी परिणतिधरो ।।5।।
पर्यय निज के भेद का, अहो करे परित्याग ।
ज्ञान मात्र हूँ अनुभवन, होता रहे त्रिकाल ।।
ऐसे द्रव्य और पर्यय अभेद होगा, कि आनंद खूब रहे ।।6।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ७९