प्रभु जैसा ही ध्यान लगावें | prabhu jaisa hi dhyana lagavem

प्रभु जैसा ही ध्यान लगावें,

भक्त नहीं हमको प्रभु बनना ॥ टेक ॥
वस्तु न कोई सुख-दुःख दाता,
व्यर्थ जगत में मैं भरमाता ।
आतम को आतम में साता,
सुख अतीन्द्रिय मुझको भरना ॥ 1 ॥

जो होना है सो ही होता,
मैं तो मूर्खपने से रोता।
धर्मध्यान का अवसर खोता,
अब न मुझे कुछ विकल्प करना॥ 2 ॥

यह भव पाया भव हरने को,
पावन रत्नत्रय धरने को।
समता रस आस्वादी बनकर,
निज शाश्वत शिव पद को वरना ॥ ३॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’