तर्ज : प्रभु बाहुबली ऐसा बल हो…
प्रभु बाहुबली जय-जय-जय-जय,
हे योगीश्वर तज जगत् विभव।
पाया निज आत्म-विभव अक्षय ।। टेक।।
अशरीरी शुद्ध चिद्रूप अहो,
निष्क्रिय अतीन्द्रिय आनंद भयो।
निर्ग्रन्थ सहज निज पद ध्याया,
हो गया सर्व कर्मों का क्षय ।। 1।।
प्रभु अचल ध्यानमय शुभ मुद्रा,
दर्शाती निज प्रभुता अव्यय ।
बस यही भावना होती है,
परिणति होवे निज माँहि विलय ।। 2 ।।
तुम सम तन, भोग भुजंग दिखें,
धारूँ मुनि मुद्रा हो निर्भय।
निश्चिंत रहूँ, निज ध्यान धरूँ,
हो जीवन एकाकी निस्पृह ।। 3।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १३९ से १४०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’