तर्जः अरहंत सा कोई दाता नहीं है …
प्रभु आप सा कोई दाता नहीं है।
जो ध्याता है वह कष्ट पाता नहीं है ।। टेक ।।
प्रभो ! है तुम्हारी तो नासाग्र दृष्टि,
मिटी है समस्त विकारों की सृष्टि ।
कि इस जग में तुझसा सुहाता नहीं है ।। 1 ।।
धर्मरूप अमृत की तुमसे हो वृष्टि,
जिसे पान कर हों सुखी भव्य सृष्टि ।
मुझे तुम सिवा कुछ सुहाता नहीं है।। 2 ।।
तुम्हीं हो प्रभु देव देवों के देवा,
करें भक्ति सेवा लहे ज्ञान मेवा।
उसे फिर करम भी सताता नहीं है ।। 3।।
गुण-द्रव्य-पर्याय से जान ले जो,
तुम सा ही निज को श्रद्धान ले जो।
उसे मोह मिथ्यात्व आता नहीं है ।। 4।।
भेदज्ञान होता है लखने से तुमको,
पद तुम सा मिलता है भजने से निज को।
फिर वह जगत् में भ्रमाता नहीं है।। 5।।
हे प्रभु! तुम्हीं सा मैं श्रद्धान धारूँ,
निज को ही साधूँ, सभी कुछ विसारूँ ।
मुझे अब विषय सुख भाता नहीं है।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३६ से ३७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’