प्रभो वीतरागी हितंकर तू ही है ।
तू ही कृपासिंधु दयाकर तू ही है ॥
चराचर का हामी तू है सबका स्वामी ।
परोपकारता का समन्दर तू ही है ॥
अहिंसा का पेगाम तू ने सुनाया ।
बिला शक जगत का जिनेश्वर तू ही है ॥
न रागी न द्वेषी तुझे सब बराबर ।
हितेषी जहाँ में सरासर तू ही है ॥
तू है सच्चिदानंद कल्याणरूपी ।
अवश्य सदगुणों का हाँ सागर तू ही है ॥
अपूरब दयामय है वाणी तुम्हारी ।
मुक्ति जाने वालों का रहबर तू ही है ॥
अंधेरा जहालत का तुमने मिटाया ।
सिदाकत का बेशक दिवाकर तू ही है ॥
धरम का धुरंधर है शिवमग का नेता ।
तू ही सार है सबसे बेहतर तू ही है ॥
लगा दीजे न्यामत को रस्ते पे स्वामी ।
शरण में हूँ तेरी कि बरतर तू ही है ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ७२ (विभिन्न कवियों के भजन)
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