प्रभो ! निवार्च्छक तृप्त रहूँ | Prabho Nivarcchak Trpt Rahu

प्रभो ! निवार्च्छक तृप्त रहूँ।

ज्ञान सहज ही परमानन्दमय, वेदन सहज करूँ।।टेक ।।

मोही बनकर व्यर्थ भ्रमाया, इच्छाओं का जाल बिछाया।
उनकी पूर्ति नहीं कर पाया, चहुंगति में बहु क्लेश उठाया।।
अब तो प्रभुवर तुमको पाया, मिथ्या मोह तजूँ ।।1।।

ज्ञायक में अनुबन्ध नहीं है, पर से कुछ सम्बन्ध नहीं है।
ग्रहण-त्याग नहीं होय कदा ही, पूर्ण स्वयं में स्वयं सदा ही ।।
निज प्रभुता निज में विलसाये, नित संतुष्ट रहूँ।।2।।

चित्र-विचित्र शक्ति-समुदाय, अनिराकृत, खण्ड अखण्ड रहाय ।
है एकान्त-शान्त ध्रुव अद्भुत, तेजपुंज ज्ञायक सुखदाय।।
हो निश्चिंत निराकुल निर्भय, निज में मग्न रहूँ।।3।।

अरे मोह के वशवर्ती हो, भ्रमता था पर में दुखकार।
मोह मिटा एकाग्र ज्ञान में, दिखा विश्व का सब विस्तार ।।
चाह दाह विनशी समतामय, मुक्ति सहज वरूँ।।4।।

हे निष्काम परम योगीश्वर, निज में लीन त्रिजग के ईश्वर।
राग रहित सबके उपकारी, शुद्ध चिद्रूप सदा अविकारी ।।
मुक्तिमार्ग के परम प्रणेता, चरणन शीश धरूँ ।।5।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’