प्रभाती (कविवर दौलतराम) | Prabhati (Kavivar Daulatram)
प्रात काल मन्त्र जपो णमोकार भाई ।
अक्षर पैंतीस शुद्ध हृदय में धराई ।।टेक।।
नर भव तेरो सुफल होत पातक टर जाई ।
विघन जासों दूर होत संकट में सहाई ।।१।।
कल्पवृक्ष कामधेनु चिन्तामणि जाई ।
ऋद्धि सिद्धि पारस तेरो प्रकटाई ।।२।।
मन्त्र जन्त्र तन्त्र नव जाही से वनाई ।
सम्पति भण्डार भरे अक्षय निधि आई ।।३।।
तीन लोक माँहि सार वेदन में गाई ।
जगत् में प्रसिद्ध धन्य मंगलीक भाई ।।४।।
Artist: कविवर दौलतराम
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ५२८