तर्जः आयो-आयो रे हमारो बड़ो भाग्य…
पायो-पायो रे शरण सुखकार, जिनेश्वर चरणों में ।। टेक ।।
शुद्धातम ही जगत् में, निश्चय शरणा एक।
वीतराग प्रभु को निरख, जागा सहज विवेक ।। 1।।
स्त्री-पुत्र-कुटुम्ब सब, स्वारथ के ही मीत।
सुख-दुख भोगे एकला, झूठी इनकी प्रीति।। 2।।
धन वैभव के हेतु से, होंय अनन्ता पाप।
काम न आवे रंच भी, दुर्गति जावे आप।। 3।।
दल बल देवी देवता, मंत्र-तंत्र बहु होय।
सुख साता देवे नहीं, मरत बचाय न कोय।। 4।।
पुण्योदय भी जगत् में, धन-बिजुरी उनहार।
तातें भेद-विज्ञान कर, होओ भव से पार ।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५८ से ५९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’