पायो जी सुख आतम लखकै
पायो जी सुख आतम लखकै
ब्रह्मा विष्णु महेश्वरको प्रभु, सो हम देख्यो आप हरखकै। पायो. ॥ १ ॥
देखनि जानि समझनिवाला, जान्यो आपमें आप परखकै। पायो. ॥ २ ॥
‘द्यानत’ सब रस विरस लगैं हैं, अनुभौ ज्ञानसुधारस चखकै। पायो. ॥ ३ ॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ३३
खोज: Payo Ji Sukh Atam Lakhkai
अर्थ
आत्मा को देखकर, पहचानकर, अत्यन्त सुख की प्राप्ति/अनुभूति हुई है।
हमने अपने इस ब्रह्मा, विष्णु, महेश-रूप स्वामी को, प्रभु को देख लिया है, पहचान लिया है और इसे देखकर हर्षित हैं, प्रसन्न हैं।
यह ही देखने, जानने और समझनेवाला है। यह हमने अपने में स्वयं में ही अच्छी तरह परखकर, जाँचकर जान लिया है।
द्यानतराय कहते हैं कि अनुभवरूपी ज्ञानामृत को चखने के पश्चात् जगत के सारे अन्य विषयादि रस फीके, नीरस व रसविहीन लगने लगते हैं।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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