पाया मंगलमय जिनधर्म, समझो सत्य तत्त्व का मर्म | paya mamgalamaya jinadharma samajho satya tattva ka marma

तर्ज : रोम-रोम पुलकित हो जाए…

पाया मंगलमय जिनधर्म, समझो सत्य तत्त्व का मर्म ।
दूर होय सब मिथ्या भर्म, नाशें दुखदायी दुष्कर्म ॥ टेक ॥
ज्ञाता रूप सु जीव है, रागादि भिन्न जान।
स्वयं सिद्ध परमात्मा, गुण अनंत की खान ॥ 1 ॥

देहादिक सु अजीव हैं, सर्व अचेतन जान।
सुख-दुःख वेदन नहीं करे, जाना विधि पहिचान॥ 2।
मोहादिक आश्रव तजो, अपनो रूप निहार।
शाश्वत ज्ञानानंदमय, बंध रूप संसार ॥ 3 ॥

मिथ्या क्रूर कठोर अरु, कुटिल लोभमय भाव।
पाप रूप जानो दुःखद, तज विषयों की चाल ॥ 4 ॥

दया भक्ति व्रत शील तप, सम्यक् तत्त्व विचार।
रत्नत्रय से पूर्व-सह-उत्तर चर व्यवहार ॥ 5॥

पुण्य-पाप जानो सभी, स्याद्वाद सुख रूप।
अनेकांतमय आत्मा, उपादेय शिव भूप॥ ६॥

शुद्धातम का अनुभवन, संवर है सुख रूप।
शुद्ध भावना निर्जरा, फल है मुक्ति स्वरूप ॥ 7 ॥

धर सम्यक् श्रद्धान उर, करो सदा अभ्यास ।
हो निर्वृत्त पर भाव से, आत्म भाव परकाश॥ 8॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २६६ से २६७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’