पाया जिनागम सार, भक्ति से नमन करें।। टेक।।
आगम औ अध्यात्म पढ़ें-पढ़ावें,
तत्त्व-अभ्यास में चित्त लगावें।
नाशें मिथ्यात्व अंधकार ।। भक्ति से. ।। 1 ।।
पाप वासना दूर भगावें,
तत्त्व भावना नित ही भावें।
खोलें सु मुक्ति का द्वार ।। भक्ति से. ।। 2 ।।
अनेकान्तमय ज्ञान प्रकाशे,
साम्यभाव चारित्र विकासे ।
पावें समय का सार ।। भक्ति से. ।। 3।।
पक्षातिक्रान्त अनुभूति विलासी,
हो तीव्र मैत्री ज्ञान-क्रिया की।
सहज ही हों भव पार ।। भक्ति से. ।। 4 ।।
रत्न अमोलक हाथ है आया,
आनंद अंतर में न समाया।
आनंद अपरम्पार ।। भक्ति से. ।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’