पास अनादि अविद्या मेरी, हरन पास परमेशा है
पास अनादि अविद्या मेरी, हरन पास परमेशा है ।
चिद्विलास सुखराशप्रकाशवितरन त्रिभोन - दिनेशा है ।।
दुर्निवार कंदर्पसर्पको दर्पविदरन खगेशा है ।
दुठ-शठ-कमठ-उपद्रवप्रलयसमीर - सुवर्णनगेशा है ।।१।।
ज्ञान अनन्त अनन्त दर्श बल, सुख अनन्त पदमेशा है ।
स्वानुभूति-रमनी-वर भवि-भव-गिर-पवि शिव-सदमेशा है ।।२।।
ऋषि मुनि यति अनगार सदा तिस, सेवत पादकुशेसा है ।
वदनचन्द्रतैं झरै गिरामृत, नाशन जन्म-कलेशा है ।।३।।
नाम मंत्र जे जपैं भव्य तिन, अघअहि नशत अशेषा है ।
सुर अहमिन्द्र खगेन्द्र चन्द्र ह्वै, अनुक्रम होंहिं जिनेशा है ।।४।।
लोक-अलोक-ज्ञेय-ज्ञायक पै, रति निजभावचिदेशा है ।
रागबिना सेवकजन-तारक, मारक मोह न द्वेषा है ।।५।।
भद्रसमुद्र-विवर्द्धन अद्भुत, पूरनचन्द्र सुवेशा है ।
‘दौल’ नमैं पद तासु, जासु, शिवथल समेदअचलेशा है ।।६।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ९७ से ९८
अर्थ
अर्थ-मेरे अनादिकालीन अज्ञान के बन्धन को दूर करने के लिए श्री पार्श्वनाथ भगवान ही परमेश्वर हैं- परम समर्थ हैं। वे चैतन्य से विलास करनेवाले है और सुख के भण्डार को प्रकाशित करके तीनों लोको मे वितरित के लिए सूर्य के समान हैं।
श्री पार्श्वनाथ भगवान कामदेव रूपी दुर्निवार सर्प के दर्प को चकनाचूर करने के लिए गरुड़ पक्षी के समान है और दुष्ट व कपटी कमठ के उपद्रव की प्रलयंकर वायु के लिए सुमेरु पर्वत के समान हैं।
वे अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त बल और अनन्त सुखरूपी लक्ष्मी के स्वामी हैं। वे स्वानुभूतिरूपी स्त्री के पति हैं, भव्यजीवों के संसाररूपी पर्वत को चकनाचूर करने के लिए वज्र हैं और मोक्षरूपी महल के स्वामी हैं।
ऋषि, मुनि, यति, अनगार सदा उनके चरण-कमलों की सेवा करते हैं। उनके मुखरूपी चन्द्रमा से ऐसा वचनरूपी अमृत झरता है, जो संसार के सर्वदुःखों को नष्ट कर देता है। जो भव्यजीव आपके नामरूपी मन्त्र का जाप करते हैं उनके समस्त पापरूपी साँप नष्ट हो जाते हैं और वे स्वयं भी देव, अहमिन्द्र, विद्याधर, चन्द्र आदि होकर क्रमशः जिनेन्द्र बन जाते हैं। श्री पार्श्वनाथ भगवान लोक और अलोक के ज्ञेयों को जानते हैं, तथापि अपने चैतन्य स्वभाव में लीन रहते हैं। यद्यपि उनके राग नहीं है, तथापि वे सेवक जनों को तारनेवाले हैं और यद्यपि उनके द्वेष नहीं है, तथापि वे मोह को मारनेवाले हैं। कविवर दौलतराम कहते हैं कि जो पार्श्वनाथ भगवान कल्याणरूपी समुद्र को बढाने के लिए अद्भुत पूर्ण चन्द्रमा के समान हैं और जिनकी निर्वाण-भूमि सम्मेदशिखर नामक श्रेष्ठ पर्वत है, मैं उनके चरणों में प्रणाम करता हूँ।
स्रोत: दौलत विलास, पद 18।
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