परिणति भी होवे तुम सम ही महावीर-महावीर | parinati bhi hove tuma sama hi mahavira mahavira

तर्जः रंगा दे मेरे वीर…

परिणति भी होवे तुम सम ही महावीर-महावीर ।

ध्रुव स्वभाव तो तुम सम ही है अचल ज्ञानमय धीर।। टेक ।।

तत्त्वों का सम्यक् निर्णय हो, भेद-विज्ञान स्व-पर का हो।
परम पारिणामिक ध्रुव आतम, सहज विषय दृष्टि का हो ।।
निर्विकल्प आनन्दमय अनुभव, क्षण-क्षण शुद्धातम का हो।
जाननहार जनाय भेद नहिं, ज्ञाता-ज्ञान- ज्ञेय का हो।।
तृप्त स्वयं में तुष्ट स्वयं में, भाव रहें गम्भीर ।। 1।।

संशय विभ्रम मोह रहित हो, ज्ञान परम सुखकार।
वर्ते नित वैराग्य-भावना, विषय-कषाय विडार ।।
होय विरागी सब परिग्रह तज, निर्ग्रन्थ दीक्षा धार।
चर्या हो निर्दोष ज्ञानमय, साम्य भाव अविकार ।।
घोर परीषह उपसर्गों में, होऊँ नहीं अधीर ।। 2।।

ध्याता-ध्यान-ध्येय का भी, प्रभु न किंचित् भेद।
निर्मल शुक्लध्यान आनन्दमय प्रगटे, विनशे खेद।।
मोह मुक्त हो भाव मुक्त हो, अर्हत् पद प्रगटाय।
दर्श-ज्ञान-सुख-बल अनन्त प्रभु व्यक्तपने विलसाय ।।
होय प्रवर्तन धर्मतीर्थ का, मिटे उपद्रव पीर।। 3।।

अहो ! आत्मा तो अनादि से ही, सदैव निर्द्वन्द्व ।
आराधन का सुमधुर फल है, अव्याबाध आनन्द।।
होय अयोगी दशा सहज ही, सर्व विभाव नशाय ।
अशरीरी हो ज्ञान शरीरी, लोकोत्तम पद पाय।।
आवागमन रहित हो स्वामी, मैं भी तिष्ठूँ तुम ढिंग वीर ।। 4 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १२१ से १२२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’