परीक्षामुख सूत्र एवं सूत्रार्थ (आचार्य माणिक्यनन्दि) | Parikshamukh Sutra Evam Sutrarth (Acharya Manikyanandi)

परीक्षामुख सूत्र एवं सूत्रार्थ

आचार्य माणिक्यनन्दि

न्याय ग्रंथ परीक्षामुख के संस्कृत मूल सूत्र, छहों परिच्छेद, कुल 208 सूत्र, हर सूत्र के नीचे उसका सूत्रार्थ, हर परिच्छेद इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ। सूत्रार्थ संलग्न ग्रंथ (डॉ. योगेशचन्द्र जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर) में छपे “सूत्रार्थ” से ज्यों का त्यों लिया है; विस्तार और उदाहरण नहीं लिए, वे नीचे की पीडीएफ में हैं। मंगलाचरण और प्रशस्ति मूल टॉपिक में हैं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल सूत्र (मंगलाचरण, प्रशस्ति और टिप्पणियों सहित): परीक्षामुख मूल सूत्र (आचार्य माणिक्यनन्दि) | Parikshamukh Mool Sutra (Acharya Manikyanandi)

स्रोत: Pariksha mukh.pdf

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प्रथम परिच्छेद (सूत्र 1 से 13)

स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम् ॥1॥

सूत्रार्थ: ‘स्व’ अर्थात् अपने आपको और ‘अपूर्वार्थ’ अर्थात् जिसे किसी अन्य प्रमाण से जाना नहीं है, ऐसे पदार्थ का निश्चय करनेवाले ज्ञान को प्रमाण कहते हैं।


हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थं हि प्रमाणं ततो ज्ञानमेव तत् ॥2॥

सूत्रार्थ: हित (सुख) की प्राप्ति और अहित (दुख) के परिहार में समर्थ प्रमाण है। वह प्रमाण स्वरूप से स्वीकार्य वस्तु ज्ञान ही होने के योग्य है, अज्ञान रूप सन्निकर्षादिक नहीं है।


तन्निश्चयात्मकं समारोपविरुद्धत्वादनुमानवत् ॥3॥

सूत्रार्थ: वह प्रमाण पदार्थ का निश्चयात्मक है, समारोप (संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय) का विरोधी होने से, अनुमान की तरह।


अनिश्चितोऽपूर्वार्थः ॥4॥

सूत्रार्थ: जिस पदार्थ का पहले किसी प्रमाण से निश्चय न किया गया हो, वह अपूर्वार्थ कहलाता है।


दृष्टोऽपि समारोपात्तादृक् ॥5॥

सूत्रार्थ: पूर्व में देखे हुए पदार्थ में भी यदि समारोप अर्थात् संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय आ जाता है तो वह पदार्थ भी अपूर्वार्थ बन जाता है। (जैसे पढ़ी हुई पुस्तक अनभ्यास से पुन: अपठित जैसी हो जाती है।)


स्वोन्मुखतया प्रतिभासनं स्वस्य व्यवसायः ॥6॥

सूत्रार्थ: स्वयं की तरफ सन्मुख होने से जो अनुभवन होता है, वही स्व-व्यवसाय कहलाता है।


अर्थस्येव तदुन्मुखतया ॥7॥

सूत्रार्थ: जिसप्रकार पदार्थ के प्रति सन्मुख होने से पदार्थ का निश्चय होता है अर्थात् ज्ञान होता है, उसीप्रकार स्व की ओर उन्मुख होने पर स्व का निश्चय होता है।


घटमहमात्मना वेद्मि ॥8॥

सूत्रार्थ: घट को मैं (आत्मा) अपने (ज्ञान) द्वारा जानता हूँ। यहाँ जैसे ‘घट’ पदार्थ रूप कर्म का प्रत्यक्ष होता है। वैसे ही कर्ता - आत्मा, करण - ज्ञान और जानने रूप क्रिया इन तीनों का प्रतीतिरूप प्रत्यक्ष होता है।


कर्मवत्कर्तृकरणक्रियाप्रतीतेः ॥9॥

सूत्रार्थ: घट को मैं (आत्मा) अपने (ज्ञान) द्वारा जानता हूँ। यहाँ जैसे ‘घट’ पदार्थ रूप कर्म का प्रत्यक्ष होता है। वैसे ही कर्ता - आत्मा, करण - ज्ञान और जानने रूप क्रिया इन तीनों का प्रतीतिरूप प्रत्यक्ष होता है।


शब्दानुच्चारणेऽपि स्वस्यानुभवनमर्थवत् ॥10॥

सूत्रार्थ: शब्दों का उच्चारण किये बिना भी अपना अनुभव होता है। जैसे पदार्थों का घट आदि रूप वचन बोले बिना भी उसका ज्ञान होता है।


को वा तत्प्रतिभासिनमर्थमध्यक्षमिच्छंस्तदेव तथा नेच्छेत् ॥11॥

सूत्रार्थ: ऐसा कौन (लौकिक या परीक्षक) पुरुष है जो ज्ञान के द्वारा अनुभव हुए पदार्थ को तो प्रत्यक्ष माने और उस ज्ञान को ही प्रत्यक्ष न माने अर्थात् उसे अवश्य ही ज्ञान को प्रत्यक्ष मानना चाहिए।


प्रदीपवत् ॥12॥

सूत्रार्थ: ऐसा कौन (लौकिक या परीक्षक) पुरुष है जो ज्ञान के द्वारा अनुभव हुए पदार्थ को तो प्रत्यक्ष माने और उस ज्ञान को ही प्रत्यक्ष न माने अर्थात् उसे अवश्य ही ज्ञान को प्रत्यक्ष मानना चाहिए।
इसके लिए ‘प्रदीपवत्’ अर्थात् ‘दीपक की तरह’ का उदाहरण दिया है। जैसे दीपक में ‘स्व’ की प्रकाशकता या प्रत्यक्षता को स्वीकारे बिना उसके द्वारा प्रकाशित किये गये पदार्थों में प्रत्यक्षता सिद्ध नहीं होती है।


तत्प्रामाण्यं स्वतः परश्च ॥13॥

सूत्रार्थ: उस प्रमाण की प्रामाणिकता कहीं स्वतः होती है और कहीं पर से भी होती है।

द्वितीय परिच्छेद (सूत्र 1 से 12)

तद्द्वेधा ॥1॥

सूत्रार्थ: वह प्रमाण दो प्रकार का है।


प्रत्यक्षेतरभेदात् ॥2॥

सूत्रार्थ: प्रत्यक्ष और इतर अर्थात् परोक्ष के भेद से प्रमाण दो प्रकार का होता है।


विशदं प्रत्यक्षम् ॥3॥

सूत्रार्थ: विशद अर्थात् निर्मल और स्पष्ट ज्ञान को प्रत्यक्ष कहते हैं।


प्रतीत्यन्तराव्यवधानेन विशेषवत्तया वा प्रतिभासनं वैशद्यम् ॥4॥

सूत्रार्थ: दूसरे ज्ञान के व्यवधान से रहित और विशेषता से होनेवाले प्रतिभास को वैशद्य कहा जाता है।


इन्द्रियानिन्द्रियानिमित्तं देशतः सांव्यवहारिकम् ॥5॥

सूत्रार्थ: इन्द्रिय और मन के निमित्त से होनेवाले एकदेश विशद ज्ञान को सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहते हैं।


नार्थालोकौ कारणं परिच्छेद्यत्वात्तमोवत् ॥6॥

सूत्रार्थ: पदार्थ व प्रकाश सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष के कारण नहीं हैं, क्योंकि ये परिच्छेद्य अर्थात् ज्ञान के विषय हैं-जाननेयोग्य ज्ञेय हैं। जो ज्ञान का विषय होता है, वह ज्ञान का कारण नहीं होता, जैसे अन्धकार।


तदन्वयव्यतिरेकानुविधानाभावाच्च केशोण्डुकज्ञानवन्नक्तंचर ज्ञानवच्च ॥7॥

सूत्रार्थ: पदार्थ और प्रकाश ज्ञान के कारण नहीं, क्योंकि ज्ञान का पदार्थ और प्रकाश के साथ अन्वय-व्यतिरेक रूप संबंध का अभाव है। जैसे, केश में भ्रम से होनेवाले मच्छर ज्ञान के साथ तथा नक्तंचर अर्थात् रात्रि में चलनेवाले उलूक आदि को रात्रि में होनेवाले ज्ञान के साथ देखा जाता है।


अतज्जन्यमपि तत्प्रकाशकं प्रदीपवत् ॥8॥

सूत्रार्थ: पदार्थ से उत्पन्न नहीं होकर भी ज्ञान पदार्थ का प्रकाशक होता है, दीपक के समान।


स्वावरणक्षयोपशमलक्षणयोग्यतया हि प्रतिनियतमर्थं व्यवस्थापयति ॥9॥

सूत्रार्थ: अपने आवरण कर्म के (ज्ञानावरण, वीर्यान्तराय) क्षयोपशम लक्षणवाली योग्यता प्रत्यक्ष प्रमाण प्रतिनियत पदार्थों के जानने की व्यवस्था करता है।


कारणस्य च परिच्छेद्यत्वे करणादिना व्यभिचारः ॥10॥

सूत्रार्थ: कारण को परिच्छेद्य अर्थात् ज्ञेय मानने पर करण अर्थात् इन्द्रियों के साथ व्यभिचार दोष आता है।


सामग्रीविशेषविश्लेषिताखिलावरणमतीन्द्रियमशेषतो मुख्यम् ॥11॥

सूत्रार्थ: सामग्री की विशेषता से विश्लेषित अर्थात् दूर हो गये हैं, समस्त आवरण जिसके ऐसे अतीन्द्रिय और पूर्णरूप से विशद ज्ञान को मुख्य प्रत्यक्ष कहते हैं।


सावरणत्वे करणजन्यत्वे च प्रतिबंधसम्भवात् ॥12॥

सूत्रार्थ: आवरण सहित होने पर और इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न होने पर प्रतिबंध सम्भव है।

तृतीय परिच्छेद (सूत्र 1 से 97)

परोक्षमितरत् ॥1॥

सूत्रार्थ: पहले प्रत्यक्ष प्रमाण का स्वरूप कहा था, उससे पृथक् स्वरूप वाला परोक्ष कहलाता है अर्थात् अविशद ज्ञान परोक्ष प्रमाण है।


प्रत्यक्षादिनिमित्तं स्मृतिप्रत्यभिज्ञानतर्कानुमानागमभेदम् ॥2॥

सूत्रार्थ: जिसमें प्रत्यक्ष प्रमाण आदिक निमित्त हैं, वह परोक्ष प्रमाण है। आदिक से अभिप्राय परोक्ष प्रमाण के भेदों से है, जो उत्तरवर्ती प्रमाण ज्ञान के कारण हैं। वे परोक्ष प्रमाण स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान, आगम के भेद से पाँच प्रकार के हैं। ये परोक्ष प्रमाण अपनी उत्पत्ति में पूर्ववर्ती प्रमाणज्ञानों की अपेक्षा रखते हैं। इसीलिए परोक्ष के इन भेदों को एक विशेषक्रम में रखना ही आवश्यक एवं अनिवार्य है।


संस्कारोद्बोधनिबन्धना तदित्याकारा स्मृतिः ॥3॥

सूत्रार्थ: संस्कार की प्रगटता के कारण से ‘वह’ इसप्रकार का आकार (प्रतिभास) वाले ज्ञान को स्मृति कहते हैं।


स देवदत्तो यथा ॥4॥

सूत्रार्थ: जैसे वह ‘देवदत्त’ इसप्रकार का प्रतिभास होना स्मृति है।


दर्शन-स्मरणकारणकं संकलनं प्रत्यभिज्ञानम्। तदेवेदं, तत्सदृशं, तद्विलक्षणं, तत्प्रतियोगीत्यादि ॥5॥

सूत्रार्थ: प्रत्यक्षदर्शन और स्मृति के द्वारा जो जोड़रूप ज्ञान होता है, उसको प्रत्यभिज्ञान कहते हैं। उसके वह ही यह है, यह उसके समान है, यह उससे विलक्षण है यह उसका प्रतियोगी है इत्यादि अनेक भेद हैं।


यथा स एवायं देवदत्तः, गोसदृशो गवयः, गोविलक्षणो महिषः, इदमस्माद् दूरम्, वृक्षोऽयमित्यादि ॥6॥

सूत्रार्थ: जैसे वह ही यह देवदत्त है, गाय के समान नील गाय होती है, गाय के विलक्षण (भिन्न) भैंस होती है, यह इससे दूर है, यह वृक्ष है इत्यादि क्रमशः एकत्व प्रत्यभिज्ञान, सादृश्य प्रत्यभिज्ञान, वैलक्षण्य प्रत्यभिज्ञान, प्रतियोगी प्रत्यभिज्ञान और सामान्य प्रत्यभिज्ञान के उदाहरण जानने चाहिए।


उपलम्भानुपलम्भनिमित्तं व्याप्तिज्ञानमूहः ॥7॥

सूत्रार्थ: उपलंभ (प्राप्ति, साध्य के होने पर साधन का होना) तथा अनुपलंभ (साध्य के अभाव में साधन का नहीं होना, अप्राप्ति) के निमित्त से होनेवाले व्याप्ति ज्ञान को तर्क कहते हैं।


इदमस्मिन्सत्येव भवत्यसति तु न भवत्येव ॥8॥

सूत्रार्थ: यह साधन रूप वस्तु इस साध्यरूप वस्तु के होने पर ही होती है और साध्यरूप वस्तु के नहीं होने पर नहीं होती।


यथाऽग्नावेव धूमस्तदभावे न भवत्येवेति च ॥9॥

सूत्रार्थ: जैसे अग्नि के होने पर ही धुआँ होता है। अग्नि के अभाव में धुआँ नहीं ही होता है।


साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानम् ॥10॥

सूत्रार्थ: साधन से होनेवाले साध्य के ज्ञान को अनुमान प्रमाण कहते हैं अर्थात् साधनरूप लिंग से साध्यरूप लिंगी का जो ज्ञान होता है, उसे अनुमान प्रमाण कहते हैं। जैसे, धूम देखकर अग्नि का ज्ञान करना।


साध्याविनाभावित्वेन निश्चितो हेतुः ॥11॥

सूत्रार्थ: साध्य के साथ अविनाभाव रूप से रहना जिसका निश्चित हो उसको हेतु कहते हैं।


सहक्रमभावनियमोऽविनाभावः ॥12॥

सूत्रार्थ: सहभाव नियम और क्रमभाव नियम ऐसे अविनाभाव के दो भेद हैं।


सहचारिणोर्व्याप्यव्यापकयोश्च सहभावः ॥13॥

सूत्रार्थ: सहचारी रूप-रसादि में और व्याप्य-व्यापक पदार्थों में सहभाव अविनाभाव होता है।


पूर्वोत्तरचारिणोः कार्यकारणयोश्च क्रमभावः ॥14॥

सूत्रार्थ: पूर्व और उत्तर-काल भावी पदार्थों में और कार्य-कारणों में क्रमभाव नियम अविनाभाव होता है।


तर्कात्तन्निर्णयः ॥15॥

सूत्रार्थ: तर्क से उसका अर्थात् अविनाभाव संबंध का निर्णय होता है।


इष्टमबाधितमसिद्धं साध्यम् ॥16॥

सूत्रार्थ: इष्ट, अबाधित और असिद्धभूत पदार्थ को ‘साध्य’ कहते हैं।


संदिग्धविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां साध्यत्वं यथा स्यादित्यसिद्धपदम् ॥17॥

सूत्रार्थ: सन्दिग्ध, विपरीत और अव्युत्पन्न पदार्थ साध्यरूप हो सकें, इस हेतु से साध्य का लक्षण करते समय असिद्ध विशेषण दिया है।


अनिष्टाध्यक्षादिबाधितयोः साध्यत्वं मा भूदितीष्टाबाधितवचनम् ॥18॥

सूत्रार्थ: अनिष्ट एवं प्रत्यक्षादि प्रमाण से बाधित पदार्थ साध्यरूप नहीं होवें, इसलिए ‘इष्ट’ और ‘अबाधित’ ये दो विशेषण साध्यपद के साथ प्रयोग किये हैं।


न चासिद्धवदिष्टं प्रतिवादिनः ॥19॥

सूत्रार्थ: जिसप्रकार असिद्ध विशेषण प्रतिवादी की अपेक्षा से है, उसीप्रकार इष्ट विशेषण प्रतिवादी की अपेक्षा से नहीं है।


प्रत्यायनाय हीच्छा वक्तुरेव ॥20॥

सूत्रार्थ: विषय प्रतिपादन एवं समझाने की इच्छा वक्ता को ही हुआ करती है अर्थात् अपने इष्ट तत्त्व के प्रतिपादन करने के लिए वक्ता को (वादी को) ही इच्छा होती है।


साध्यं धर्मः क्वचित्तद्विशिष्टो वा धर्मी ॥21॥

सूत्रार्थ: व्याप्ति का प्रयोग करते समय ‘धर्म’ साध्य होता है; और कहीं अर्थात् अनुमान का प्रयोग करते समय धर्म से युक्त धर्मी साध्य होता है।


पक्ष इति यावत् ॥22॥

सूत्रार्थ: धर्मी का दूसरा नाम पक्ष भी है।


प्रसिद्धो धर्मी ॥23॥

सूत्रार्थ: धर्मी प्रसिद्ध होता है अर्थात् वह प्रमाण से सिद्ध होता है, काल्पनिक नहीं। उस धर्मी की प्रसिद्धि तीन तरह से होती है ह्न प्रमाण से, विकल्प से तथा उभयरूप से।


विकल्पसिद्धे तस्मिन् सत्तेतरे साध्ये ॥24॥

सूत्रार्थ: जब धर्मी विकल्प सिद्ध होता है, तब साध्य सत्ता और असत्ता इन दो रूप हो सकता है।


अस्ति सर्वज्ञो नास्ति खरविषाणमिति ॥25॥

सूत्रार्थ: जब धर्मी विकल्प सिद्ध होता है, तब साध्य सत्ता और असत्ता इन दो रूप हो सकता है। जैसे ‘सर्वज्ञ है’ ऐसे प्रतिज्ञारूप वाक्य में सत्ता साध्य है। तथा ‘खर विषाण’ (गधे के सींग) नहीं हैं’ - ऐसे प्रतिज्ञा वाक्य में असत्ता साध्य है।


प्रमाणोभयसिद्धे तु साध्यधर्मविशिष्टता साध्या ॥26॥

सूत्रार्थ: प्रमाण सिद्ध धर्मी के रहते हुए एवं उभयसिद्ध धर्मी के रहते हुए साध्य धर्म विशिष्टता साध्य होती है।


अग्निमानयं देशः परिणामी शब्दः इति यथा ॥27॥

सूत्रार्थ: प्रमाण सिद्ध धर्मी के रहते हुए एवं उभयसिद्ध धर्मी के रहते हुए साध्य धर्म विशिष्टता साध्य होती है। जैसे यह प्रदेश अग्नियुक्त है ह्व यह प्रत्यक्ष प्रमाणसिद्ध धर्मी का उदाहरण है। शब्द परिणामी है ह्व यह उभयसिद्ध धर्मी का उदाहरण है।


व्याप्तौ तु साध्यं धर्म एव ॥28॥

सूत्रार्थ: व्याप्ति का प्रयोग करते समय धर्म को ही साध्य बनाते हैं न कि धर्म विशिष्ट धर्मी को; क्योंकि धर्मी को साध्य बनाने पर व्याप्ति घटित नहीं हो सकती है अर्थात् जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ धर्मी पर्वत है ह्न ऐसी व्याप्ति घटित नहीं होती; अपितु जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ साध्य धर्म अग्नि है ह्न ऐसी व्याप्ति ही घटित होती है। इसका भी एक कारण है कि धर्मी के साथ हेतु का अन्वय असिद्ध है।


अन्यथा तदघटनात् ॥29॥

सूत्रार्थ: व्याप्ति का प्रयोग करते समय धर्म को ही साध्य बनाते हैं न कि धर्म विशिष्ट धर्मी को; क्योंकि धर्मी को साध्य बनाने पर व्याप्ति घटित नहीं हो सकती है अर्थात् जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ धर्मी पर्वत है - ऐसी व्याप्ति घटित नहीं होती; अपितु जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ साध्य धर्म अग्नि है - ऐसी व्याप्ति ही घटित होती है। इसका भी एक कारण है कि धर्मी के साथ हेतु का अन्वय असिद्ध है।


साध्यधर्माधारसन्देहापनोदाय गम्यमानस्यापि पक्षस्य वचनम् ॥30॥

सूत्रार्थ: साध्यरूप धर्म के आधार के विषय में उत्पन्न हुए सन्देह को अपनोद अर्थात् दूर करने के लिए गम्यमान अर्थात् जाने हुए भी पक्ष का कथन करना आवश्यक है।


साध्यधर्मिणि साधनधर्मावबोधनाय पक्षधर्मोपसंहारवत् ॥31॥

सूत्रार्थ: जिसप्रकार साध्य से युक्त धर्मी में साधन रूप धर्म का ज्ञान कराने के लिए पक्षधर्म के उपसंहार रूप उपनय का प्रयोग किया जाता है।


को वा त्रिधा हेतुमुक्त्वा समर्थयमानो न पक्षयति ॥32॥

सूत्रार्थ: ऐसा कौन वादी-प्रतिवादी है कि जो तीनप्रकार के हेतु को कहकर पुनश्च उसका समर्थन करता हुआ भी पक्ष का प्रयोग नहीं करें? अपितु करेगा।


एतद्द्वयमेवानुमाङ्गं नोदाहरणम् ॥33॥

सूत्रार्थ: ये दो ही अनुमान के अंग हैं, उदाहरणादिक नहीं।


न हि तत्साध्यप्रतिपत्त्यङ्गं तत्र यथोक्तहेतोरेव व्यापारात् ॥34॥

सूत्रार्थ: वह उदाहरण साध्य की प्रतिपत्ति अर्थात् ज्ञान में अंग अर्थात् कारण नहीं है; क्योंकि साध्य के ज्ञान में यथोक्त (साध्याविनाभावी) हेतु का ही व्यापार होता है।


तदविनाभावनिश्चयार्थं वा विपक्षे बाधकप्रमाणबलादेव तत्सिद्धेः ॥35॥

सूत्रार्थ: वह उदाहरण अविनाभाव के निश्चय के लिए भी कारण नहीं है; क्योंकि विपक्ष में बाधक प्रमाण से ही अविनाभाव सिद्ध हो जाता है।


व्यक्तिरूपं च निदर्शनं सामान्येन तु व्याप्तिस्तत्रापि तद्विप्रतिपत्तावनवस्थानं स्याद् दृष्टान्तान्तरापेक्षणात् ॥36॥

सूत्रार्थ: निदर्शन अर्थात् उदाहरण तो व्यक्तिरूप (पर्वतरूप या महानस आदि को ग्रहण करनेवाला) होता है और व्याप्ति सामान्य रूप अर्थात् सर्वदेश-काल की उपसंहार (पूर्ण व्याप्त) करनेवाली होती है। अत: इस उदाहरण में भी विवाद होने पर भी अन्य उदाहरण की अपेक्षा पड़ने से अनवस्था दोष प्राप्त होगा।


नापि व्याप्तिस्मरणार्थं तथाविधहेतुप्रयोगादेव तत्स्मृतेः ॥37॥

सूत्रार्थ: तीसरी बात यह भी है कि व्याप्ति का स्मरण कराने के लिए भी उदाहरण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसका स्मरण तो अविनाभाव स्वरूप वाले हेतु के प्रयोग से ही हो जाता है।


तत्परमभिधीयमानं साध्यधर्मिणि साध्यसाधने सन्देहयति ॥38॥

सूत्रार्थ: वह उदाहरण परम अर्थात् मात्र कहे जाने पर तो साध्य धर्म वाले धर्मी में साध्य के सिद्ध करने में सन्देह करा देता है, यदि ऐसा नहीं होता तो उदाहरण के पश्चात् ही उपनय व निगमन के प्रयोग की आवश्यकता ही क्यों होती ? इससे यह सिद्ध होता है कि मात्र उदाहरण संशय को पैदा करता है।


कुतोऽन्यथोपनयनिगमने ॥39॥

सूत्रार्थ: वह उदाहरण परम अर्थात् मात्र कहे जाने पर तो साध्य धर्म वाले धर्मी में साध्य के सिद्ध करने में सन्देह करा देता है, यदि ऐसा नहीं होता तो उदाहरण के पश्चात् ही उपनय व निगमन के प्रयोग की आवश्यकता ही क्यों होती ? इससे यह सिद्ध होता है कि मात्र उदाहरण संशय को पैदा करता है।


न च ते तदंगे, साध्यधर्मिणि हेतुसाध्ययोर्वचनादेवासंशयात् ॥40॥

सूत्रार्थ: उपनय व निगमन भी अनुमान के अंग नहीं हैं; क्योंकि साध्यधर्मी (पक्ष) में साध्य और हेतु का कथन करने में ही साध्यधर्म वाले धर्मी में संशय नहीं रहता है।


समर्थनं वा वरं हेतुरूपमनुमानावयवो वास्तु साध्ये तदुपयोगात् ॥41॥

सूत्रार्थ: समर्थन ही हेतु का वास्तविक रूप है, अत: वही अनुमान का अवयव माना जावे; क्योंकि साध्य की सिद्धि में उसी का उपयोग होता है।


बालव्युत्पत्त्यर्थं तत्त्रयोपगमे शास्त्र एवासौ, न वादेऽनुपयोगात् ॥42॥

सूत्रार्थ: बालबुद्धि वाले शिष्यों को ज्ञान कराने के लिए उदाहरणादिक तीनों अंगों का स्वीकार शास्त्र के समय ही किया गया है, वाद के समय नहीं, वाद में उदाहरणादिक तो अनुपयोगी हैं।


दृष्टान्तो द्वेधा अन्वय-व्यतिरेकभेदात् ॥43॥

सूत्रार्थ: दृष्टान्त दो प्रकार का है ह्न अन्वय दृष्टान्त व व्यतिरेक दृष्टान्त।


साध्यव्याप्तं साधनं यत्र प्रदर्श्यते सोऽन्वयदृष्टान्तः ॥44॥

सूत्रार्थ: जहाँ पर साध्य से व्याप्त साधन को दिखाया जाता है, उसे अन्वय दृष्टान्त कहते हैं। जैसे ह्न अग्नि को साध्य करने पर रसोईघर का दृष्टान्त देते हैं अर्थात् जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है ह्न जैसे ह्न रसोईघर।


साध्याभावे साधनाभावो यत्र कथ्यते स व्यतिरेकदृष्टान्तः ॥45॥

सूत्रार्थ: जहाँ पर साध्य के अभाव में साधन का अभाव कहा जाता है, वह व्यतिरेक दृष्टान्त है। जैसे ह्व जहाँ अग्नि नहीं है, वहाँ धूम भी नही होता। जैसे ह्व जलाशय।


हेतोरुपसंहार उपनयः ॥46॥

सूत्रार्थ: हेतु के दुहराने को उपनय कहते हैं।


प्रतिज्ञायास्तु निगमनम् ॥47॥

सूत्रार्थ: प्रतिज्ञा के दुहराने को निगमन कहते हैं।


तदनुमानं द्वेधा ॥48॥

सूत्रार्थ: वह अनुमान दो प्रकार का होता है। १. स्वार्थ अनुमान २. परार्थ अनुमान।


स्वार्थपरार्थभेदात् ॥49॥

सूत्रार्थ: वह अनुमान दो प्रकार का होता है। १. स्वार्थ अनुमान २. परार्थ अनुमान।


स्वार्थमुक्तलक्षणम् ॥50॥

सूत्रार्थ: स्वार्थ अनुमान का लक्षण कहा जा चुका है।


परार्थं तु तदर्थपरामर्शिवचनाज्जातम् ॥51॥

सूत्रार्थ: उस स्वार्थानुमान के विषयभूत अर्थ का परामर्श अर्थात् विषय करनेवाले वचनों से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे परार्थानुमान कहते हैं।


तद्वचनमपि तद्धेतुत्वात् ॥52॥

सूत्रार्थ: परार्थानुमान के कारण होने से ‘तद्’ अर्थात् परार्थानुमान के प्रतिपादक वचनों को भी परार्थानुमान कहते हैं।


स हेतुर्द्वेधा उपलब्ध्यनुपलब्धिभेदात् ॥53॥

सूत्रार्थ: वह हेतु दो प्रकार का है ह्न १. उपलब्धिरूप हेतु, २. अनुपलब्धिरूप हेतु।


उपलब्धिर्विधिप्रतिषेधयोरनुपलब्धिश्च ॥54॥

सूत्रार्थ: उपलब्धि रूप हेतु विधि और प्रतिषेध दोनों का साधक है। इसी तरह अनुपलब्धि रूप हेतु भी दोनों का साधक है।


अविरुद्धोपलब्धिर्विधौ षोढ़ा व्याप्यकार्यकारणपूर्वोत्तरसहचरभेदात् ॥55॥

सूत्रार्थ: विधिरूप साध्य के रहने पर अविरुद्ध-उपलब्धिरूप हेतु के छह भेद होते हैं ह्न १. व्याप्य अविरुद्धोपलब्धि हेतु २. कार्य अविरुद्धोपलब्धि हेतु ३. कारण अविरुद्धोपलब्धि ४. पूर्वचर अविरुद्धोपलब्धि ५. उत्तरचर अविरुद्धोपलब्धि और ६. सहचर अविरुद्धोपलब्धि हेतु।


रसादेकसामग्र्यनुमानेन रूपानुमानमिच्छद्भिरिष्टमेव किंचित्कारणं हेतुर्यत्र सामर्थ्याप्रतिबन्धकारणान्तरावैकल्ये ॥56॥

सूत्रार्थ: रस से एक सामग्री के अनुमान द्वारा रूप का अनुमान स्वीकार करनेवाले बौद्धों ने कोई विशिष्ट कारणरूप हेतु माना ही है। जिसमें कि सामर्थ्य का प्रतिबन्ध नहीं है और दूसरे कारणों से विकलता (अपूर्णता) नहीं है।


न च पूर्वोत्तरचारिणोस्तादात्म्यं तदुत्पत्तिर्वा कालव्यवधाने तदनुपलब्धेः ॥57॥

सूत्रार्थ: पूर्वचर और उत्तरचर हेतुओं का साध्य के साथ तादात्म्य संबंध नहीं है, अत: स्वभाव हेतु में अन्तर्भाव नहीं होगा तथा तदुत्पत्ति संबंध भी नहीं है, अत: कार्य-हेतु और कारण-हेतु में भी अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि ये दोनों संबंध काल के व्यवधान (अन्तराल) में नहीं होते हैं।


भाव्यतीतयोर्मरणजाग्रद्बोधयोरपि नारिष्टोद्बोधौ प्रति हेतुत्वम् ॥58॥

सूत्रार्थ: भावीमरण और अतीत जाग्रत बोध के भी अरिष्ट (अपशकुन) और उद्बोध के प्रति कारणपना नहीं है।


तद्व्यापाराश्रितं हि तद्भावभावित्वम् ॥59॥

सूत्रार्थ: कारण के व्यापार के आश्रित ही कार्य का व्यापार हुआ करता है।


सहचारिणोरपि परस्परपरिहारेणावस्थानात्सहोत्पादाच्च ॥60॥

सूत्रार्थ: सहचारी पदार्थ भी परस्पर के परिहार से रहते हैं। अत: सहचर हेतु का स्वभाव हेतु में अन्तर्भाव नहीं हो सकता, तथा वे एकसाथ उत्पन्न होते हैं, अत: उनका कार्य हेतु और कारण हेतु में भी अन्तर्भाव नहीं हो सकता है। जैसे युगपद उत्पन्न हुए गाय के सींग में कार्य-कारणभाव नहीं; फलों के रूप और रस में कार्य-कारण नहीं है। अत: सहचर हेतु को भिन्न ही मानना चाहिए।


परिणामी शब्दः, कृतकत्वात् । य एवं स एवं दृष्टो यथा घटः । कृतकश्चायम्, तस्मात्परिणामीति । यस्तु न परिणामी, स न कृतको दृष्टो यथा वन्ध्यास्तनन्धयः । कृतकश्चायम्, तस्मात्परिणामी ॥61॥

सूत्रार्थ: शब्द परिणमनशील है (प्रतिज्ञा) क्योंकि वह किया जाता है (हेतु) जो कृतक होता है, वह परिणामी देखा जाता है ह्न जैसे घट (अन्वय दृष्टान्त), चूँकि शब्द कृतक है (उपनय) अत: परिणामी है (निगमन) जो परिणामी नहीं होता वह कृतक भी नहीं देखा जाता है, जैसे वन्ध्या स्त्री का पुत्र (व्यतिरेक दृष्टान्त), और शब्द कृतक है (उपनय), इसलिए वह परिणमी है (निगमन)।


अस्त्यत्र देहिनि बुद्धिर्व्याहारादेः ॥62॥

सूत्रार्थ: इस शरीर-धारक प्राणी में बुद्धि है, क्योंकि बुद्धि के कार्य वचन आदिक पाये जाते हैं।


अस्त्यत्रछाया छत्रात् ॥63॥

सूत्रार्थ: यहाँ छाया है, क्योंकि यहाँ छाया का अविरोधी कारण छत्र मौजूद है।


उदेष्यति शकटं कृतिकोदयात् ॥64॥

सूत्रार्थ: यहाँ मुहुर्तान्त पद का अध्याहार करना चाहिए। तब इसका अर्थ होगा कि एक मुहुर्त के बाद शकट अर्थात् रोहणी नक्षत्र का उदय होगा, क्योंकि अभी कृतिका नक्षत्र का उदय हो रहा है।


उद्गाद् भरणिः प्राक्तत एव ॥65॥

सूत्रार्थ: यहाँ ‘तत एव’ पद से कृतिकोदय का अर्थ लेना चाहिए। तदनुसार अर्थ होगा कि एक मुहूर्त के पूर्व ही भरणी का उदय हो चुका है, क्योंकि अभी कृतिका का उदय हो रहा है। यहाँ भरणी से कृतिका नक्षत्र उत्तरचर है।


अस्त्यत्र मातुलिंगे रूपं रसात् ॥66॥

सूत्रार्थ: इस मातुलिंग (विजौरा) में रूप है, क्योंकि उसका अविरोधी सहचर रस पाया जा रहा है। यहाँ रूप का अविरुद्ध सहचर रस उपस्थित हो रहा है।


विरुद्धतदुपलब्धिः प्रतिषेधे तथा ॥67॥

सूत्रार्थ: प्रतिषेध सिद्ध करनेवाली विरुद्धोपलब्धि के भी छह भेद हैं :- १. विरुद्धव्याप्योलब्धि, २. विरुद्धकार्योपलब्धि, ३. विरुद्धकारणोपलब्धि, ४. विरुद्धपूर्वचरोपलब्धि, ५. विरुद्धउत्तरचरोपलब्धि, ६. विरुद्धसहचरोपलब्धि।


नास्त्यत्र शीतस्पर्शः औष्ण्यात् ॥68॥

सूत्रार्थ: यहाँ पर शीतस्पर्श नहीं है, क्योंकि उष्णता पायी जाती है।


नास्त्यत्र शीतस्पर्शो धूमात् ॥69॥

सूत्रार्थ: यहाँ पर शीतस्पर्श नहीं है, क्योंकि धूम है।


नास्मिन् शरीरिणि सुखमस्ति हृदयशल्यात् ॥70॥

सूत्रार्थ: इस शरीरधारी प्राणी में सुख नहीं है, क्योंकि हृदय में शल्य पायी जाती है।


नोदेष्यति मुहूर्त्तान्ते शकटं रेवत्युदयात् ॥71॥

सूत्रार्थ: एक मुहुर्त के पश्चात् रोहिणी का उदय नहीं होगा, क्योंकि अभी रेवती नक्षत्र का उदय चल रहा है।


नोदगाद्भरणिर्मुहूर्त्तात्पूर्वं पुष्योदयात् ॥72॥

सूत्रार्थ: एक मुहूर्त के पहले भरणि नक्षत्र का उदय नहीं हुआ,क्योंकि पुष्यनक्षत्र का उदय चल रहा है।


नास्त्यत्र भित्तौ परभागाभावोऽर्वाग्भागदर्शनात् ॥73॥

सूत्रार्थ: इस दीवाल में परभाग का अभाव नहीं है, क्योंकि अर्वाग्भाग अर्थात् इधर का भाग दिखायी दे रहा है।


अविरुद्धानुपलब्धिः प्रतिषेधे सप्तधा स्वभावव्यापककार्यकारणपूर्वोत्तरसहचरानुपलम्भभेदात् ॥74॥

सूत्रार्थ: प्रतिषेध अर्थात् अभाव को सिद्ध करनेवाले अविरुद्धानुपलब्धि रूप हेतु के सात भेद हैं ह्व १. अविरुद्ध स्वभावानुपलब्धि २. अविरुद्ध व्यापकानुपलब्धि, ३. अविरुद्ध कार्यानुपलब्धि ४. अविरुद्धकारणानुपलब्धि ५. अविरुद्धपूर्वचरानुपलब्धि, ६. अविरुद्धोत्तरचरानुपलब्धि, ७. अविरुद्धसहचरानुपलब्धि।


नास्त्यत्र भूतले घटोऽनुपलब्धेः ॥75॥

सूत्रार्थ: इस भूतल पर घट नहीं है; क्योंकि उपलब्धि योग्य स्वभाव के होने पर भी वह पाया नहीं जा रहा है।


नास्त्यत्र शिंशपा वृक्षानुपलब्धेः ॥76॥

सूत्रार्थ: यहाँ पर शीशम नहीं है, क्योंकि वृक्ष नहीं पाया जा रहा है।


नास्त्यत्राप्रतिबद्धसामर्थ्योऽग्निर्धूमानुपलब्धेः ॥77॥

सूत्रार्थ: यहाँ पर बिना सामर्थ्य रुकी अग्नि नहीं है अर्थात् गीले ईंधन के संयोग होने पर धुएं रूप कार्य को पैदा करने की सामर्थ्य वाली अग्नि नहीं है, क्योंकि धुआँ की अनुपलब्धि है। अप्रतिहत शक्तिवाली अग्नि का अभाव उसके अविरोधी कार्य धूम के नहीं पाये जाने से सिद्ध है।


नास्त्यत्र धूमोऽनग्नेः ॥78॥

सूत्रार्थ: यहाँ पर धूम नहीं है, क्योंकि धूम के अविरोधीकारण अग्नि का अभाव है। अत: यह अविरुद्ध कारणरूप अनुपलब्धि का उदाहरण है।


न भविष्यति मुहूर्त्तान्ते शकटं कृतिकोदयानुपलब्धेः ॥79॥

सूत्रार्थ: एक मुहूर्त के पश्चात् रोहिणी (शकट) का उदय नहीं होगा, क्योंकि अभी कृतिका का उदय नहीं पाया जाता है। यहाँ पर रोहिणी के उदय का अविरोधी पूर्वचर जो कृतिका का उदय है, उसके नहीं पाये जाने से यह अविरुद्धपूर्वचरानुपलब्धि हेतु का उदाहरण है।


नोदगाद्भरणिर्मुहूर्त्तात्प्राक् तत एव ॥80॥

सूत्रार्थ: एक मुहूर्त से पहले भरणी का उदय नहीं हुआ है, क्योंकि अभी उसके उदय के अविरोधी उत्तचर कृतिका का उदय नहीं पाया जाता है।


नास्त्यत्र समतुलायामुन्नामो नामानुपलब्धेः ॥81॥

सूत्रार्थ: इस समान तोलने वाली तराजू में एक ओर ऊँचापन नहीं है, क्योंकि एक ओर के ऊँचेपन का अविरोधी सहचर दूसरी ओर का नीचापन नहीं पाया जाता है।


विरुद्धानुपलब्धिर्विधौ त्रेधा विरुद्धकार्यकारणस्वभावानुपलब्धिभेदात् ॥82॥

सूत्रार्थ: विधि अर्थात् वस्तु के सद्भाव को सिद्ध करने में विरुद्धानुपलब्धि के तीन भेद हैं :ह्न १. विरुद्धकार्यानुपलब्धि २. विरुद्धकारणानुपलब्धि ३. विरुद्धस्वभावानुपलब्धि।


यथाऽस्मिन् प्राणिनि व्याधिविशेषोऽस्ति, निरामयचेष्टानुपलब्धेः ॥83॥

सूत्रार्थ: जैसे इस प्राणी में व्याधि विशेष (कोई रोग) है, क्योंकि निरामय (रोग-रहित) चेष्टा नहीं पायी जा रही है।


अस्त्यत्र देहिनि दुःखमिष्टसंयोगाभावात् ॥84॥

सूत्रार्थ: इस जीव में दु:ख है, क्योंकि इष्ट संयोग का अभाव है।


अनेकान्तात्मकं वस्त्वेकान्तस्वरूपानुपलब्धेः ॥85॥

सूत्रार्थ: वस्तु अनेकान्तात्मक होती है, क्योंकि वस्तु के एकांतस्वरूप की अनुपलब्धि है।


परम्परया सम्भवत्साधनमत्रैवान्तर्भावनीयम् ॥86॥

सूत्रार्थ: परम्परा से जो साधनरूप हेतु सम्भव है, उनका इन ही हेतुओं में अन्तर्भाव कर लेना चाहिए।


अभूदत्र चक्रे शिवकः स्थासात् ॥87॥

सूत्रार्थ: इस चक्र पर शिवक हो गया है, क्योंकि स्थास पाया जाता है।


कार्यकार्यमविरुद्धकार्योपलब्धौ ॥88॥

सूत्रार्थ: इस चक्र पर शिवक हो गया है, क्योंकि स्थास पाया जाता है।


नास्त्यत्र गुहायां मृगक्रीडनं मृगारिसंशब्दनात् । कारणविरुद्धकार्यं विरुद्धकार्योपलब्धौ यथा ॥89॥

सूत्रार्थ: इस गुफा में हिरण की क्रीड़ा नहीं है, क्योंकि सिंह की गर्जना हो रही है। यह मृगारिसंशब्दनात् हेतु कारण के विरुद्ध जो कार्य है, उस रूप है, अत: इस हेतु का विरुद्धकार्योपलब्धि नामक हेतु में अन्तर्भाव होगा, क्योंकि हिरण की क्रीड़ा का कारण उसकी निर्भयता है और उसका विरोधी सिंह के गर्जना रूप कार्य है (जो भय को उत्पन्न करता है) अत: यह हेतु विरुद्ध कार्योपलब्धि है।


व्युत्पन्नप्रयोगस्तु तथोपपत्त्याऽन्यथानुपपत्त्यैव वा ॥90॥

सूत्रार्थ: व्युत्पन्नमति (विद्वान्) पुरुषों के लिए तथोपपत्ति अथवा अन्यथानुपपत्ति रूप हेतु का ही प्रयोग होता है।


अग्निमानयं देशस्तथैव धूमवत्त्वोपपत्तेर्धूमवत्वान्यथानुपपत्तेर्वा ॥91॥

सूत्रार्थ: यह प्रदेश अग्निवाला है, क्योंकि तथैव अर्थात् अग्निवाला होने पर ही धूमवाला हो सकता है, अथवा अग्नि के अभाव में धूमवाला हो नहीं सकता।


हेतुप्रयोगो हि यथा व्याप्तिग्रहणं विधीयते, सा च तावन्मात्रेण व्युत्पन्नैरवधार्यते ॥92॥

सूत्रार्थ: वस्तुत: हेतु का प्रयोग ही उसी तरह का किया जाता है कि जिससे व्याप्ति का ग्रहण हो जावे। अत: वह व्याप्ति उतने मात्र से व्युत्पन्न पुरुषों द्वारा अवधारित अर्थात् निश्चित की जाती है। इसी कारण दृष्टांतादि के प्रयोग से व्याप्ति अवधारण करना आदि कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता।


तावता च साध्यसिद्धिः ॥93॥

सूत्रार्थ: उतने तथोपपत्ति आदि रूप हेतु मात्र से ही साध्य की सिद्धि हो जाती है।


तेन पक्षस्तदाधारसूचनायोक्तः ॥94॥

सूत्रार्थ: इसी कारण से साध्य के आधार की सूचना करने के लिए पक्ष का प्रयोग करने को कहा है।


आप्तवचनादिनिबन्धनमर्थज्ञानमागमः ॥95॥

सूत्रार्थ: आप्त के वचनादि कारण हैं जिसमें ऐसे पदार्थ के ज्ञान को आगम कहते हैं।


सहजयोग्यतासंकेतवशाद्धि शब्दादयो वस्तुप्रतिपत्तिहेतवः ॥96॥

सूत्रार्थ: शब्द,वर्ण, वचनादि में ऐसी सहज योग्यता है कि जिस योग्यता के कारण तथा संकेत होने के कारण (यह घट है, इस पदार्थ को घट शब्द से पुकारते हैं, इत्यादि संकेत के कारण) वे शब्दादिक अर्थ का ज्ञान कराने में हेतु हो जाते हैं।


यथामेर्वादयः सन्ति ॥97॥

सूत्रार्थ: जैसे मेरु पर्वत आदि पदार्थ हैं ह्न ऐसा कहते ही आगमोक्त मेरुपर्वत की प्रतीति हो जाया करती है।

चतुर्थ परिच्छेद (सूत्र 1 से 9)

सामान्यविशेषात्मा तदर्थो विषयः ॥1॥

सूत्रार्थ: सामान्य और विशेष आत्मा अर्थात् स्वरूप है जिसका ऐसा पदार्थ वह प्रमाण का विषय है।


अनुवृत्तव्यावृत्तप्रत्ययगोचरत्वात्पूर्वोत्तराकार परिहारावाप्तिस्थिति-लक्षण परिणामेनार्थक्रियोपपत्तेश्च ॥2॥

सूत्रार्थ: वस्तु सामान्य-विशेषादि अनेक धर्मवाली है, क्योंकि वह अनुवृत्तप्रत्यय और व्यावृत्त प्रत्यय की विषय है तथा पूर्व आकार का परिहार, उत्तर आकार की प्राप्ति और स्थिति लक्षण परिणाम के साथ उसमें अर्थक्रिया पायी जाती है।


सामान्यं द्वेधा तिर्यगूर्ध्वताभेदात् ॥3॥

सूत्रार्थ: तिर्यक् सामान्य व ऊर्ध्वता सामान्य के भेद से सामान्य दो प्रकार का होता है।


सदृशपरिणामस्तिर्यक् खण्डमुण्डादिषु गोत्ववत् ॥4॥

सूत्रार्थ: सदृश अर्थात् सामान्य परिणाम को तिर्यक् सामान्य कहते हैं, जैसे खण्डी-मुण्डी आदि गायों में गायपना समानरूप से रहता है।


परापरविवर्तव्यापिद्रव्यमूर्ध्वता मृदिव स्थासादिषु ॥5॥

सूत्रार्थ: पूर्व और उत्तर पर्यायों में रहनेवाले द्रव्य को ऊर्ध्वता सामान्य कहते हैं, जैसे स्थास, कोश, कुसूल आदि घट की विभिन्न पर्यायों में मिट्टी रहती है।


विशेषश्च ॥6॥

सूत्रार्थ: और विशेष के भी दो भेद हैं। पर्याय विशेष और व्यतिरेक विशेष।


पर्यायव्यतिरेकभेदात् ॥7॥

सूत्रार्थ: और विशेष के भी दो भेद हैं। पर्याय विशेष और व्यतिरेक विशेष।


एकस्मिन्द्रव्ये क्रमभाविनः परिणामाः पर्याया आत्मनि हर्षविषादादिवत् ॥8॥

सूत्रार्थ: एक द्रव्य में क्रम से होनेवाले परिणामों को पर्याय कहते हैं ह्न जैसे आत्मा में हर्ष और विषाद आदि परिणाम क्रम से होते हैं। ये ही पर्याय विशेष कहलाते हैं।


अर्थान्तरगतो विसदृशपरिणामो व्यतिरेको गोमहिषादिवत् ॥9॥

सूत्रार्थ: एक पदार्थ की अपेक्षा अन्य पदार्थ में रहनेवाले विसदृश परिणाम को व्यतिरेक कहते हैं। जैसे गाय-भैंस आदि में विभिन्नता पायी जाती है।

पंचम परिच्छेद (सूत्र 1 से 3)

अज्ञाननिवृत्तिर्हानोपादानोपेक्षाश्च फलम् ॥1॥

सूत्रार्थ: अज्ञान की निवृत्ति, हान, उपादान और उपेक्षा ये प्रमाण के फल हैं।


प्रमाणादभिन्नं भिन्नं च ॥2॥

सूत्रार्थ: वह फल प्रमाण से कथंचित् अभिन्न है, और कथंचित् भिन्न है।


यः प्रमिमीते स एव निवृत्ताज्ञानो जहात्यादत्ते उपेक्षते चेति प्रतीतेः ॥3॥

सूत्रार्थ: जो प्रमाण से पदार्थ को जानता है, उसी का अज्ञान निवृत्त होता है, वही अनिष्ट वस्तु का त्याग करता है, इष्ट वस्तु को ग्रहण करता है और जिसे अपने लिए इष्ट-अनिष्ट रूप नहीं समझता है, उसकी उपेक्षा करता है। इसप्रकार की प्रतीति होने से सिद्ध है कि, प्रमाण से फल कथंचित् अभिन्न है।

षष्ठ परिच्छेद (सूत्र 1 से 74)

ततोऽन्यत्तदाभासम् ॥1॥

सूत्रार्थ: उनसे अर्थात् ऊपर जिनका वर्णन किया गया है, ऐसे प्रमाण का स्वरूप, संख्या, विषय और फल से अन्य अर्थात् विपरीत को तदाभास कहते हैं।


अस्वसंविदितगृहीतार्थदर्शनसंशयादयः प्रमाणाभासाः ॥2॥

सूत्रार्थ: अस्वसंविदित, गृहीतार्थ, दर्शन और संशय-विपर्यय-अनध्यवसाय ज्ञान प्रमाणाभास है।


स्वविषयोपदर्शकत्वाभावात् ॥3॥

सूत्रार्थ: उपर्युक्त ज्ञान प्रमाणाभास इसलिए हैं, क्योंकि वे अपने विषय का निश्चय नहीं कराते हैं।


पुरुषान्तरपूर्वार्थगच्छत्तृणस्पर्शस्थाणुपुरुषादिज्ञानवत् ॥4॥

सूत्रार्थ: अस्वसंविदित ज्ञान प्रमाण नहीं है, क्योंकि वह अपने विषय का निश्चय नहीं करता है, जैसे दूसरे पुरुष का ज्ञान। गृहीतार्थ ज्ञान, प्रमाण नहीं है, क्योंकि वह भी अपने विषय-विशेष का ज्ञान नहीं कराता, जैसे पूर्व में जाने हुए पदार्थ का ज्ञान। निर्विकल्प दर्शन प्रमाण नहीं है, क्योंकि वह भी अपने विषय का निश्चय नहीं करता, जैसे चलते हुए पुरुष के तृणस्पर्शादि का ज्ञान। संशयादिक भी प्रमाण नहीं हैं; क्योंकि वे भी अपने विषय का निश्चय नहीं कराते जैसे कि यह स्थाणु है या पुरुष, इत्यादि ज्ञान।


चक्षुरसयोर्द्रव्ये संयुक्तसमवायवच्च ॥5॥

सूत्रार्थ: द्रव्य में चक्षु और रस के संयुक्त समवाय के समान।


अवैशद्ये प्रत्यक्षं तदाभासं बौद्धस्याकस्माद्धूमदर्शनाद्वह्निविज्ञानवत् ॥6॥

सूत्रार्थ: बौद्ध का अविशदरूप निर्विकल्प ज्ञान को प्रत्यक्ष मानना प्रत्यक्षाभास है, जैसे कि अकस्मात् धूम के देखने से उत्पन्न हुआ अग्नि का ज्ञान अनुमानाभास है, क्योंकि ये दोनों ही अपने विषयभूत पदार्थ का निश्चय नहीं कराते हैं।


वैशद्येऽपि परोक्षं तदाभासं मीमांसकस्य करणज्ञानवत् ॥7॥

सूत्रार्थ: विशद ज्ञान को भी परोक्ष मानना परोक्षाभास है। जैसे मीमांसक करणज्ञान को परोक्ष मानते हैं। उनकी यह मान्यता परोक्षाभास है।


अतस्मिंस्तदिति ज्ञानं स्मरणाभासं, जिनदत्ते स देवदत्तो यथा ॥8॥

सूत्रार्थ: जिसका पूर्व में कभी धारणा रूप से अनुभव नहीं किया, उसमें ‘वह है’ इसप्रकार के ज्ञान को स्मरणाभास कहते हैं। जैसे जिनदत्त में वह देवदत्त है, ऐसा स्मरण करना।


सदृशे तदेवेदं तस्मिन्नेव तेन सदृशं यमलकवदित्यादि प्रत्यभिज्ञानाभासम् ॥9॥

सूत्रार्थ: एक जैसे सदृश पदार्थ में ‘यह वही है’ इस तरह कहना, उसी पदार्थ में यह उसके समान है ऐसा कहना। जैसे एक साथ जन्में हुए दो बच्चों में भ्रम से विपरीत ज्ञान हो जाता है, इसे ही प्रत्यभिज्ञानाभास कहते हैं।


असम्बद्धे तज्ज्ञानं तर्काभासम् ॥10॥

सूत्रार्थ: अविनाभाव सम्बन्ध से रहित पदार्थ में अविनाभाव-संबंध का ज्ञान करना तर्काभास है। जिसप्रकार किसी स्त्री विशेष के पुत्रों की श्यामपने के साथ व्याप्ति नहीं है, फिर भी उसके गर्भस्थ शिशु के संबंध में कहना कि वह पुत्र होगा और श्यामवर्ण होगा।


इदमनुमानाभासम् ॥11॥

सूत्रार्थ: यह अनुमानाभास है, जो अब आगे कहा जायेगा।


तत्रानिष्टादिः पक्षाभासः ॥12॥

सूत्रार्थ: उनमें अनिष्ट, बाधित और सिद्ध को पक्ष बनाना पक्षाभास है।


अनिष्टो मीमांसकस्यानित्यः शब्दः ॥13॥

सूत्रार्थ: मीमांसक का यह कहना कि शब्द अनित्य है ह्व यह अनिष्ट पक्षाभास है, क्योंकि मीमांसक मत में शब्द नित्य है।


सिद्धः श्रावणः शब्दः ॥14॥

सूत्रार्थ: शब्द कानों से सुना जाता है यह कथन सिद्धपक्षाभास है, क्योंकि स्वयंसिद्ध बात को पक्ष बनाना व्यर्थ है।


बाधितः प्रत्यक्षानुमानागमलोकस्ववचनैः ॥15॥

सूत्रार्थ: बाधित पक्षाभास प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, लोक और स्ववचनों से बाधित होने के कारण पाँच प्रकार का है।


तत्रप्रत्यक्षबाधितो यथा, अनुष्णोऽग्निर्द्रव्यत्वाज्जलवत् ॥16॥

सूत्रार्थ: उनमें से प्रत्यक्ष-बाधित पक्षाभास का उदाहरण ह्व जैसे अग्नि उष्णता रहित अर्थात् शीतल है, क्योंकि वह द्रव्य है। जो द्रव्य होता है, वह शीतल होता है, जैसे जल।


अपरिणामी शब्दः कृतकत्वाद् घटवत् ॥17॥

सूत्रार्थ: शब्द अपरिणामी अर्थात् नित्य होता है, क्योंकि वह कृतक है। जो दूसरे के द्वारा किया जाता है, वह अपरिणामी होता है, जैसे घट।


प्रेत्यासुखदो धर्मः पुरुषाश्रितत्वादधर्मवत् ॥18॥

सूत्रार्थ: धर्म परलोक में दु:ख देनेवाला होता है, कारण कि वह पुरुष के आश्रित होता है। जो पुरुष के आश्रित होता है, वह दु:खदायी होता है, जैसे अधर्म।


शुचि नरशिरः कपालं, प्राण्यंगत्वाच्छंखशुक्तिवत् ॥19॥

सूत्रार्थ: मनुष्य के शिर का कपाल पवित्र है, क्योंकि वह प्राणी का अंग है। जो प्राणी का अंग होता है, वह पवित्र होता है जैसे शंख-सीप आदि।


माता मे वन्ध्या पुरुषसंयोगेऽप्यगर्भत्वात्प्रसिद्धवन्ध्यावत् ॥20॥

सूत्रार्थ: मेरी माता वन्ध्या (बाँझ) है, क्योंकि पुरुष का संयोग होने पर भी उसके गर्भ नहीं रहता है ह्न जैसे कि प्रसिद्ध वन्ध्या स्त्री।


हेत्वाभासा असिद्धविरुद्धानैकान्तिकाकिंचित्कराः ॥21॥

सूत्रार्थ: असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक और अकिंचित्कर ये चार हेत्वाभास के भेद हैं।


असत्सत्तानिश्चयोऽसिद्धः ॥22॥

सूत्रार्थ: जिस हेतु की सत्ता का ही अभाव हो अथवा उस हेतु का ही निश्चय न हो सके, वह असिद्ध-हेत्वाभास है।


अविद्यमानसत्ताकः परिणामी शब्दश्चाक्षुषत्वात् ॥23॥

सूत्रार्थ: जिस हेतु की स्वरूप से ही सत्ता अविद्यमान है, उसे स्वरूपासिद्ध कहते हैं; जैसे शब्द परिणामी है, क्योंकि वह चाक्षुष अर्थात् चक्षु से जाना जाता है।


स्वरूपेणासत्त्वात् ॥24॥

सूत्रार्थ: क्योंकि शब्द के चाक्षुषपना स्वरूप से ही असिद्ध है। शब्द का तो स्वरूप ही यह है कि वह कानों से जाना जावे उसे चाक्षुष (चक्षुरिन्द्रिय का विषय) कहना स्वरूपासिद्ध है।


अविद्यमाननिश्चयो मुग्धबुद्धिं प्रत्यग्निरत्र धूमात् ॥25॥

सूत्रार्थ: मुग्धबुद्धि अर्थात् अज्ञानी व्यक्ति से यह कहना कि यहाँ अग्नि है, क्योंकि धूम है, यह अविद्यमान निश्चयवाले सन्दिग्धासिद्ध हेत्वाभास का उदाहरण है।


तस्य बाष्पादिभावेन भूतसंघाते सन्देहात् ॥26॥

सूत्रार्थ: क्योंकि उसे भूतसंघात (चूल्हे से तत्काल उतारे हुए पात्र) में वाष्प आदि के रूप से सन्देह हो जाता है।


सांख्यम्प्रति परिणामी शब्दः कृतकत्वात् ॥27॥

सूत्रार्थ: सांख्य के प्रति यह कथन कि शब्द परिणमनशील है, क्योंकि वह किया जाता है। यह हेतु सांख्य के लिए असिद्ध ही है।


तेनाज्ञातत्वात् ॥28॥

सूत्रार्थ: क्योंकि सांख्य कृतकपना मानता ही नहीं है।


विपरीतनिश्चिताविनाभावो विरुद्धोऽपरिणामी शब्दः कृतकत्वात् ॥29॥

सूत्रार्थ: साध्य के विपरीत पदार्थ के साथ जिसका अविनाभाव निश्चित हो, उसे विरुद्ध हेत्वाभास कहते हैं। जैसे शब्द अपरिणामी है, क्योंकि वह कृतक है।


विपक्षेऽप्यविरुद्धवृत्तिरनैकान्तिकः ॥30॥

सूत्रार्थ: जिसका विपक्ष में भी रहना अविरुद्ध है अर्थात् जो हेतु पक्ष, सपक्ष के समान विपक्ष में भी बिना किसी विरोध के रहता है, उसे अनैकान्तिक हेत्वाभास कहते हैं।


निश्चितविपक्षवृत्तिरनित्यः शब्दः प्रमेयत्वाद् घटवत् ॥31॥

सूत्रार्थ: शब्द अनित्य है, क्योंकि वह प्रमेय है। जो प्रमेय होता है, वह अनित्य होता है, जैसे घट। यहाँ प्रमेयत्व हेतु पक्ष रूप ‘शब्द’, सपक्ष रूप घट में तो रहता ही है, परन्तु विपक्ष में भी रहना उसका निश्चित है।


आकाशे नित्येऽप्यस्य निश्चयात् ॥32॥

सूत्रार्थ: क्योंकि नित्य आकाश में भी इस प्रमेयत्व हेतु के रहने का निश्चय है।


शंकितवृत्तिस्तु नास्ति सर्वज्ञो वक्तृत्वात् ॥33॥

सूत्रार्थ: सर्वज्ञ नहीं है, क्योंकि वह वक्ता है अर्थात् बोलनेवाला है।


सर्वज्ञत्वेन वक्तृत्वाविरोधात् ॥34॥

सूत्रार्थ: क्योंकि सर्वज्ञपने के साथ वक्तापने का कोई विरोध नहीं है।


सिद्धे प्रत्यक्षादिबाधिते च साध्ये हेतुरकिंचित्करः ॥35॥

सूत्रार्थ: साध्य के सिद्ध होने पर और प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधित होने पर दिया गया हेतु अकिंचित्कर हेत्वाभास कहलाता है।


सिद्धः श्रावणः शब्दः शब्दत्वात् ॥36॥

सूत्रार्थ: शब्द श्रावण है अर्थात् श्रवणइन्द्रिय का विषय है; क्योंकि वह शब्द है।


किंचिदकरणात् ॥37॥

सूत्रार्थ: क्योंकि इस अनुमान में शब्दत्वहेतु ने कुछ भी नहीं किया है।


यथाऽनुष्णोऽग्निर्द्रव्यत्वादित्यादौ किंचित्कर्तुमशक्यत्वात् ॥38॥

सूत्रार्थ: जैसे, अग्नि उष्ण नहीं है, क्योंकि वह द्रव्य है ह्न इत्यादि अनुमान में प्रयुक्त यह हेतु साध्य की कुछ भी सिद्धि करने के लिए समर्थ नहीं है।


लक्षण एवासौ दोषो व्युत्पन्न प्रयोगस्य पक्षदोषेणैव दुष्टत्वात् ॥39॥

सूत्रार्थ: यह अकिंचित्कर हेत्वाभासरूप दोष हेतु के लक्षण प्रतिपादन काल में ही है, वादकाल में नहीं; क्योंकि व्युत्पन्न पुरुषों का प्रयोग पक्ष के दोषों से ही दुष्ट हो जाता है।


दृष्टान्ताभासा अन्वयेऽसिद्धसाध्यसाधनोभयाः ॥40॥

सूत्रार्थ: अन्वय दृष्टान्ताभास के तीन भेद हैं ह्व १. असिद्ध साध्य या साध्य विकल २. असिद्ध साधन या साधनविकल ३. असिद्धोभय या उभयविकल।


अपौरुषेयः शब्दोऽमूर्त्तत्वादिन्द्रियसुखपरमाणुघटवत् ॥41॥

सूत्रार्थ: शब्द अपौरुषेय है, क्योंकि वह अमूर्त है। जैसे इन्द्रिय सुख, परमाणु और घट।


विपरीतान्वयश्च यदपौरुषेयं तदमूर्तम् ॥42॥

सूत्रार्थ: पूर्वोक्त अनुमान में ‘जो अपौरुषेय होता है, वह अमूर्त होता है’, इसप्रकार की विपरीत अन्वय-व्याप्ति को दिखलाना विपरीतान्वय नाम का दृष्टान्ताभास है और इसका कारण सूत्रकार बतलाते हैं कि ह्व


विद्युदादिनाऽतिप्रसंगात् ॥43॥

सूत्रार्थ: क्योंकि उसमें विद्युत् आदि के साथ अतिप्रसंग दोष आता है।


व्यतिरेकऽसिद्धतद्व्यतिरेकाः परमाण्विन्द्रियसुखाकाशवत् ॥44॥

सूत्रार्थ: व्यतिरेक दृष्टान्ताभास के भी तीन भेद हैं ह्न असिद्धसाध्य व्यतिरेक, असिद्धसाधन व्यतिरेक और असिद्धोभय व्यतिरेक। इनके उदाहरण क्रमश: परमाणु, इन्द्रिय सुख और आकाश हैं।


विपरीतव्यतिरेकश्च यन्नामूर्तं तन्नापौरुषेयम् ॥45॥

सूत्रार्थ: पूर्वोक्त अनुमान में ‘जो अमूर्त नहीं है वह अपौरुषेय नहीं है’ इसप्रकार से विपरीत व्यतिरेक-व्याप्ति को दिखाना भी व्यतिरेक दृष्टान्ताभास है।


बालप्रयोगाभासः पंचावयवेषुकियद्धीनता ॥46॥

सूत्रार्थ: अनुमान के पंच अवयव प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन में से कितने ही कम अवयवों का प्रयोग करना बालप्रयोगाभास है, क्योंकि इससे बालबुद्धि को सच्चा व स्पष्ट ज्ञान नहीं हो सकेगा।


अग्निमानयं प्रदेशो धूमवत्वाद्यदित्थं तदित्थं यथा महानसः ॥47॥

सूत्रार्थ: यह प्रदेश अग्निवाला है, क्योंकि धूमवाला है। जो धूमवाला होता है, वह अग्निवाला भी होता है, जैसे रसोईघर।


धूमवांश्चायमिति वा ॥48॥

सूत्रार्थ: अथवा उपनय का भी प्रयोग करना कि ‘यह धूमवाला है, तो भी बालप्रयोगाभास है।


तस्मादग्निमान् धूमवांश्चायम् ॥49॥

सूत्रार्थ: इसलिए यह अग्निवाला है और यह भी धूमवाला है।


स्पष्टतया प्रकृतप्रतिपत्तेरयोगात् ॥50॥

सूत्रार्थ: पाँच अवयवों में से कम प्रयोग करने पर या विपरीत करने पर शिष्यादि को प्रकृत वस्तु का सही ज्ञान नहीं हो पाता, इसलिए उन्हें बाल प्रयोगाभास कहते हैं।


रागद्वेषमोहाक्रान्तपुरुषवचनाज्जातमागमाभासम् ॥51॥

सूत्रार्थ: राग, द्वेष और मोह से युक्त पुरुष के वचन से उत्पन्न हुए पदार्थ के ज्ञान को आगमाभास कहते हैं।


यथा नद्यास्तीरे मोदकराशयः सन्ति, धावध्वं माणवकाः ॥52॥

सूत्रार्थ: जैसे ह्न हे बच्चो ! दौड़ो, नदी के किनारे मोदकों (लड्डू) के ढेर पड़े हुए हैं।


अङ्गुल्यग्रे हस्तियूथशतमास्त इति च ॥53॥

सूत्रार्थ: अंगुली के अग्रभाग पर हाथियों के सैंकड़ों समूह रहते हैं। यह कथन भी आगमाभास है।


विसंवादात् ॥54॥

सूत्रार्थ: विसंवाद होनेसे उपर्युक्त वचन आगमाभास है।


प्रत्यक्षमेवैकं प्रमाणमित्यादि संख्याभासम् ॥55॥

सूत्रार्थ: प्रत्यक्ष ही एक मात्र प्रमाण है, इत्यादि कथन संख्याभास है।


लौकायतिकस्य प्रत्यक्षतः परलोकादिनिषेधस्य परबुद्ध्यादेश्चासिद्धेरतद्विषयत्वात् ॥56॥

सूत्रार्थ: लौकायतिक अर्थात् चार्वाक का केवल एक प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानना संख्याभास है। प्रत्यक्ष से परलोक आदि का निषेध और पर की बुद्धि आदि की सिद्धि नहीं होती है; क्योंकि वे उसके विषय नहीं बन सकते हैं, और जो जिसका विषय नहीं, वह उसका खण्डन व मण्डन नहीं कर सकता है।


सौगतसांख्ययौगप्राभाकरजैमिनीयानां प्रत्यक्षानुमानागमोपमाना-र्थापत्याभावैरेकैकाधिकैः व्याप्तिवत् ॥57॥

सूत्रार्थ: जिसप्रकार सौगत, सांख्य, यौग, प्राभाकर और जैमिनीयों के प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अर्थापत्ति और अभाव ह्न इन एक-एक अधिक प्रमाणों के द्वारा व्याप्ति का निर्णय नहीं किया जा सकता है।
(इसीप्रकार प्रत्यक्ष प्रमाण से भी चार्वाक अन्य मनुष्य की बुद्धि आदिक का निर्णय नहीं कर सकते हैं।)


अनुमानादेस्तद्विषयत्वे प्रमाणान्तरत्वम् ॥58॥

सूत्रार्थ: अनुमानादि को पर-बुद्धि आदि का विषयपना मानने पर अन्य प्रमाणों के मानने का प्रसंग प्राप्त होता है।


तर्कस्येव व्याप्तिगोचरत्वे प्रमाणान्तरत्वमप्रमाणस्याव्यवस्थापक-त्वात् ॥59॥

सूत्रार्थ: जैसे कि तर्क को व्याप्ति का विषय करनेवाला मानने पर सौगतादिक को उसे एक भिन्न प्रमाण मानना पड़ेगा, क्योंकि अप्रमाण ज्ञान पदार्थ की व्यवस्था नहीं कर सकता है।


प्रतिभासभेदस्य च भेदकत्वात् ॥60॥

सूत्रार्थ: प्रतिभास का भेद ही प्रमाणों का भेदक होता है।


विषयाभासः सामान्यं विशेषो द्वयं वा स्वतंत्रम् ॥61॥

सूत्रार्थ: मात्र सामान्य को अथवा मात्र विशेष को अथवा स्वतंत्र रूप से दोनों को प्रमाण का विषय मानना विषयाभास है।


तथाऽप्रतिभासात्कार्याकरणाच्च ॥62॥

सूत्रार्थ: तथा अर्थात् मात्र सामान्यरूप से अथवा विशेषरूप से अथवा स्वतंत्र दोनों रूप से वस्तु का प्रतिभास तो होता ही नहीं है, और उस रूप में पदार्थ अपना कार्य भी नहीं कर सकते हैं, इसलिए वे विषयाभास हैं।


समर्थस्य करणे सर्वदोत्पत्तिरनपेक्षत्वात् ॥63॥

सूत्रार्थ: यदि वह सर्वथा एकान्तात्मक पदार्थ समर्थ होता हुआ कार्य करेगा, तो कार्य की उत्पत्ति सर्वदा ही होनी चाहिए ? क्योंकि वह किसी दूसरे की अपेक्षा ही नहीं रखता, जिससे कि सर्वदा कार्य की उत्पत्ति न हो सके।


परापेक्षणे परिणामित्वमन्यथा तदभावात् ॥64॥

सूत्रार्थ: दूसरे सहकारी कारणों की अपेक्षा रखने पर तो पदार्थ के परिणामीपना प्राप्त हो जाता है और ऐसा नहीं मानने पर पदार्थ के कार्य करने का ही अभाव हो जायेगा।


स्वयमसमर्थस्याकारकत्वात्पूर्ववत् ॥65॥

सूत्रार्थ: स्वयं असमर्थ पदार्थ कार्य का करनेवाला नहीं हो सकता। जैसे कि वह सहकारी कारणों से रहित अवस्था में अपना कार्य करने के लिए असमर्थ था, उसीप्रकार सहकारी कारणों के मिल जाने पर भी अपना कार्य करने में असमर्थ रहेगा।


फलाभासं प्रमाणादभिन्नं भिन्नमेव वा ॥66॥

सूत्रार्थ: प्रमाण से उसके फल को सर्वथा अभिन्न ही, अथवा भिन्न ही मानना फलाभास है।


अभेदे तद्व्यवहारानुपपत्तेः ॥67॥

सूत्रार्थ: यदि प्रमाण से उसके फल को सर्वथा अभिन्न माना जायेगा तो यह प्रमाण है और यह उसका फल है ह्न ऐसा भेद व्यवहार नहीं हो सकेगा। फल ही रहेगा या फिर प्रमाण, दोनों एकसाथ नहीं रह सकेंगे, जो कि उचित नहीं है।


व्यावृत्यापि न तत्कल्पना फलान्तराद् व्यावृत्याऽफलत्वप्रसंगात् ॥68॥

सूत्रार्थ: अफल की व्यावृत्ति से फल की कल्पना नहीं की जा सकती है, क्योंकि फिर तो दूसरे समानजातिवाले फल की व्यावृत्ति से भी अफल की कल्पना माननी पड़ेगी। अत: कल्पनामात्र से फल का व्यवहार नहीं चलाया जा सकता है।


प्रमाणान्तराद् व्यावृत्त्येवाप्रमाणत्वमस्य ॥69॥

सूत्रार्थ: जिस तरह से अन्य प्रमाण की व्यावृत्ति से अप्रमाणपने का प्रसंग बौद्धों ने स्वीकारा है, उसीतरह फलान्तर की व्यावृत्ति से अफलत्व का भी प्रसंग आ जायेगा।


तस्माद्वास्तवो भेदः ॥70॥

सूत्रार्थ: अत: प्रमाण और उसके फल में भेद वास्तविक है।


भेदे त्वात्मान्तरवत्तदनुपपत्तेः ॥71॥

सूत्रार्थ: प्रमाण व उसके फल में भेद मानने पर तो अन्य आत्मा के फल के समान यह इस प्रमाण का फल है, ऐसा व्यवहार नहीं बन सकेगा।


समवायेऽतिप्रसंगः ॥72॥

सूत्रार्थ: समवाय संबंध के मानने पर अतिप्रसंग दोष आता है।


प्रमाणतदाभासौ दुष्टतयोद्भावितौ परिहृतापरिहृत दोषौ वादिनः साधनतदाभासौ प्रतिवादिनो दूषणभूषणे च ॥73॥

सूत्रार्थ: वादी के द्वारा प्ररूपित किये प्रमाण और प्रमाणाभास, प्रतिवादी के द्वारा दोषरूप से प्रगट किये जाने पर वादी से परिहृत दोष वाले अर्थात् वह उन दोषों का परिहार कर देता है तो वे वादी के लिए साधन और दोषों का परिहार नहीं कर पाता है तो साधनाभास है, और प्रतिवादी के लिए यही क्रमशः दूषण और भूषण है।


सम्भवदन्यद्विचारणीयम् ॥74॥

सूत्रार्थ: वस्तु तत्त्व की सिद्धि के लिए सम्भव अन्य नय-निक्षेपादि भी विचारणीय हैं अर्थात् उनका भी ज्ञान करना चाहिए।