परिग्रह डोरी से, झूठ और चोरी से, पापी बने हैं हुज़ूर | Parigrah Dori Se, Jhooth Aur Chori Se, Paapi Bane Hain Huzoor

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परिग्रह डोरी से, झूठ और चोरी से, पापी बने हुज़ूर।

पर नारी पर धन पर, क्यों मन को लुभाया?
भोगों पे ललचाया, ये दुखड़े उठाया।
भोगों पे ललचाया, क्यों खुद को भुलाया?
पाएगा ये सज़ा तू पाप भार का।।1।।

देखो तुम जो आए, क्या करतब है तुम्हारा?
इंसां बन के देखो, दो दीनों को सहारा।
पाएगा ये दुआ दीनों के प्यार का।।2।।

तेरी दीन बनी है, आतम उसको तू पहचान ले।
इसकी शक्ति इतनी, अरे इसको तू अब जान ले।
पाएगा मोक्ष को, छूटे संसार भार से।।3।।

रचयिता : अज्ञात
स्वर : पण्डित श्री मांगीलाल जी, कोलारस

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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।