पारस-पद-नख प्रकाश, अरुन बरन ऐसो
पारस-पद-नख प्रकाश, अरुन बरन ऐसो ।।टेक।।
मानो तप, कुंजरके, सीसको सिंदूर पूर ।
रागरोषकाननकों-दावानल जैसो ।।१।। पारस. ।।
बोधमई प्रातकाल, ताको रवि उदय लाल ।
मोक्षवधू-कुच-प्रलेप, कुंकुमाभ तैसो ।।२।। पारस. ।।
कुशल-वृक्ष-दल-उलास, इहविधि बहु गुण-निवास ।
‘भूधर’ की भरहु आस, दीनदास केसो ।।३।। पारस. ।।
Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ २५
अर्थ
हे भगवान पार्श्वनाथ! आपके चरणों के अग्रभाग से फैल रहा लाल रंग का प्रकाश ऐसा है जैसे आपके तप से राग-द्वेषरूपी जंगल में दावाग्नि भड़क उठी हो, और वह ऐसा भास रहा है मानो किसी गजराज का सिन्दूर से पूरित मस्तक सुशोभित हो रहा हो।
आपके चरणों का वह प्रकाश ऐसा है जैसे प्रातःकाल के उदय होते हुए सूर्य की लाली होती है, केवलज्ञान होने पर जैसे मोक्षरूपी वधू के स्तनों पर कुंकुम के लेप की शोभा हो रही हो वैसी आभा प्रकाशित हो रही है। जैसे पूर्ण विकसित वृक्ष की उल्लसित कोपलें फूटती हैं, वैसे ही हे प्रभु, आपके गुण प्रकट हो रहे हैं। भूधरदास विनती करते हैं कि मैं निर्बल और निर्धन आपका ही दास हूँ, मेरी आस पूरी कीजिए।
शब्दार्थ: अरुन = लाल। कुंजर = हाथी। रागरोषकानन = राग-द्वेषरूपी वन।
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पद 21।
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